स्वामी दयानन्द सरस्वती जीवन और दर्शन - लालबहादुर सिंह चौहान Swami Dayanand Sarswati Jivan Aur Darshan - Hindi book by - Lalbahadur Singh Chauhan
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स्वामी दयानन्द सरस्वती जीवन और दर्शन

लालबहादुर सिंह चौहान

प्रकाशक : सावित्री प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :200
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4623
आईएसबीएन :81-7902-006-1

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अंधविश्वास और कुरीतियों को दूर करने के सतत प्रयास पर आधारित पुस्तक...

Swami Dayanand Sarswati Jeevan Aur Darshan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रस्तुत पुस्तक ‘स्वामी दयानन्द सरस्वती : जीवन और दर्शन’ उन्हीं महापुरुषों के जीवन पर लिखी गई एक सारगर्भित पुस्तक है। इसके रचयिता डॉ. लाल बहादुर सिंह चौहान हैं, डॉ. चौहान ने मध्ययुगीन एवं आधुनिक युग के अनेक महापुरुषों की जीवनियां लिखी हैं। हिंदी के जीवनी साहित्य में उनका प्रशंसनीय योगदान रहा है। डॉ. चौहान के लेखन की सबसे बड़ी विशेषता तटस्थता भाव से पूर्वाग्रह रहित होकर अपने ‘नायक’ का चरित्र चित्रण करना होता है। स्वामी दयानन्द सरस्वती के जीवन पर लिखी गई इस पुस्तक में ऐतिहासिकता और तथ्यपरकता का विशेष ध्यान रक्खा गया है, कहीं भी लेखक ने अपनी कल्पना का समावेश नहीं किया है।

तिथि क्रम के अनुसार स्वामी जी की जीवनी का वर्णन किया है। इसकी शैली वर्णात्मक है, इसकी भाषा में सरलता, सरसता एवं सुबोधता है। सदैव प्रचलित किन्तु साहित्यिक भाषा का प्रयोग किया गया है। अनेक स्थलों पर स्वामी जी का चित्रोपम वर्णन किया गया है। जो पाठकों के मन पर एक भव्य चित्र उपस्थित करता है। वर्णन में यथार्थता और ऐतिहासिकता के साथ उत्सुकता एवं कौतुहल की सर्वत्र योजना की गई है, जो पाठक को कथा के अन्त तक अपने साथ बाँधे रखती है। समापन में इस महान समाज सुधारक स्वामी जी का अन्त कितने धोखे से किया गया इसका बड़ा ही करुण चित्रण किया गया है किन्तु स्वामी के पवित्र विचार उनके ग्रंथ, उनका समाज सुधार के कार्य और आर्य समाज ये सभी चिरजीवी होंगे; उनका यशःशरीर अनंत काल तक भारत में रहेगा, ऐसा भाव पुस्तक के अन्त में पाठक के मन पर पड़ता है।

पुरोवाक्

स्वामी दयानंद सरस्वती 19वीं सदी के एक देदीप्यमान सितारे थे। उनके सभी आंदोलनों का मुख्य उद्देश्य भारतवर्ष में सामाजिक तथा धार्मिक कार्यों में सुधार लाना था। वास्तव में बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ होते ही उनके इस महान उद्देश्य का परिवर्तित रूप भारती समाज के सम्मुख आने लगा।
उनके परिवार की पृष्ठभूमि धार्मिक गुणों से परिपूर्ण थी। जीवन के प्रारम्भिक कुछ वर्षों के अनुभव से प्रेरित होकर उन्होंने बारह वर्ष की आयु में सन् 1846 में संन्यासी बनने के लिए अपना घर-परिवार त्याग दिया था और दयानंद नाम ग्रहण किया। उन्होंने स्वामी विरजानंद के संरक्षण में शिक्षा-दीक्षा ग्रहण की व मार्ग-दर्शन प्राप्त किया।

स्वामी दयानंद ने हिंदू धर्म में व्याप्त घोर अंधविश्वास व कुरीतियों को दूर करने के लिए सतत प्रयास किया, जैसे—मूर्ति-पूजा, अवतारवाद, बहुदेव, पूजा, पशुता का व्यवहार व विचार और अंधविश्वासी धार्मिक काव्य आदि। उन्होंने एकेश्वरवाद का प्रचार किया और अपने उत्तम विचार व्यक्त किए। ईश्वर सर्वज्ञ सर्वत्र व्याप्त, निर्विकार, रूप रहित, आकार रहित, दयालु और न्यायी है। वह विश्वास करते थे कि ईश्वर को समझा व जाना जा सका है; वह ईश्वर सर्वोच्च गुणों से युक्त है तथा भ्रांत रहित ईश्वर की पूजा से ही लोगों में नैतिकता का प्रादुर्भाव हो सकता है। स्वामी दयानंद की प्रेरणा वेद थे। यह विश्वास करते हुए कि ईश्वर अनंत है, उन्होंने पुनः वेदों के अध्ययन-मनन की ओर लोगों को लौटने की प्रेरणा देना प्रारंभ किया। उनका उद्देश्य भारत के अतीत को गौरवान्वित करना तथा लोगों की चेतना को अंतर्मन से जागृत करना था।
धर्म और जाति पर आधारित बहुत-सी बुराइयों तथा अंधविश्वास पर चोट करते हुए और उसके शुद्धिकरण के लिए स्वामी दयानन्द ने कहा कि जो अपने कार्य व व्यवहार से ब्राह्मण तुल्य व्यवहार करता है वही श्रेष्ठ है न कि जन्म जाति के आधार पर। उन्होंने जनसमूह को सच्चाई से अवगत कराया कि छुआछूत की भावना या व्यवहार एक अपराध है जो कि वेदों के सिद्धांत के विपरीत है।

बाल-विवाह का विरोध करते हुए वर-कन्या दोनों के विवाह की आयु क्रमशः पच्चीस व सोलह वर्ष की निश्चित की। उन्होंने विधवा-विवाह के लिए भी लोगों में उत्साह भरा। चरित्र-विकास के लिए शिक्षा महत्त्वपूर्ण है, यह विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने बालक-बालिकाओं की शिक्षा के प्रति जागरुकता उत्पन्न करने का कार्य किया।
स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने अपने जीवन-पर्यंत इस बात का प्रयास किया कि विश्वभर के सारे विद्वान एकमत होकर सर्वसम्मत धर्म को स्वीकार कर लें और विवादग्रस्त बातों को छोड़ दें। जिससे सर्वसाधारण उनका अनुकरण करके सुख-शांति और पारस्परिक प्रेम का जीवन व्यतीत कर सके। ‘उदार चरितानां तु वसुधैव कटुम्बकम्’ के अनुसार स्वामी जी के लिए सारा संसार ही अपना कुटुम्ब था कोई पराया न था। उनका विश्वास था कि वेदों को अब तक संजोए रखने वाली भारत की आर्य-जाति का सुधार हो जाने से संसार का कल्याण होगा। स्वामी जी प्राचीन काल के समान ही फिर संसार को वैदिक शिक्षा देकर संमार्ग पर लाने के आकांक्षी थे। इसीलिए उन्होंने सर्वप्रथम अपनी जन्मभूमि भारत को ही अपना कार्य-क्षेत्र बनाया।

स्वामी दयानंद सरस्वती जी सर्वदा सत्य के लिए जूझते रहे, सत्याग्रह करते रहे। उन्होंने अपने उद्देश्य-प्राप्ति के लिए कभी हेय और अवांछनीय साधन नहीं अपनाए। स्वामीजी ने आने वाली पीढ़ी के सोचने के लिए देश, जाति और समाज के सुधार, उत्थान और संगठन के लिए आवश्यक एक भी बात या पक्ष अछूता नहीं छोड़ा। वे प्रत्येक की पूर्ति के लिए मनसा, वाचा, कर्मणा मरण-पर्न्त प्रयत्नशील रहे उन्होंने अपने उपदेशों, लेखों द्वारा और लोगों के सम्मुख अपना पावन आदर्श तथा श्रेष्ठ चरित्र उपस्थित करके देश में जागृति उत्पन्न कर दी, जिससे भावी राजनीतिक नेताओं का कार्य बहुत ही सुगम व सरल हो गया। निस्संदेह स्वामी दयानंद सरस्वती राष्ट्र-निर्माता थे।

‘‘स्वामी दयानंद सरस्वती : जीवन और दर्शन’ कृति पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत करते हुए संतोष का अनुभव कर रहा हूं। विज्ञ पाठक इस बात का निर्णय स्वयं करेंगे कि पुस्तक कैसी बन पड़ी है
अंत में परम आदरणीय बंधुवर डॉ. श्री भगवान शर्मा, डॉ. चंद लाल पाराशर तथा डॉ. नारायण सिंह दुबे के प्रति हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करता हूं जिन्होंने उक्त कृति की पाडुलिपि का आद्योपांत गहन अध्ययन किया और अविलम्ब अपना अभिमत अंकित कर मेरी हौसलाफजाई की। पुस्तक-लेखन में किए गए सहयोग व प्रेरणा के लिए अपनी जीवन-सहचरी श्रीमती शशिबाला चौहान की मुक्तकंठ से प्रशंसा किए बिना नहीं रह सकता।

-डॉ. लाल बहादुर सिंह चौहान

सम्मति


भू पर तो वे भी जाते हैं, जो जीता या हारा करते हैं।
मिट्टी में छिपे अनल को अपनी ओर पुकारा करते हैं।।
जीते लपटों के बीच मचा भीषण धरती पर कोलाहल।
जाते-जाते दे जाते हैं, भावी युग को निज तेज अनल।।


‘स्वामी दयानंद सरस्वती’ एक ऐसे ही संघर्षशील समाज सुधारक, विचारक, असाधारण वाग्मी एवं संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। उन्होंने 19वीं शती में पौराणिक हिंदू धर्म में व्याप्त जर्जर रूढ़ियों, सड़ी-गली मान्यताओं एवं मूर्तिपूजा आदि का खंडन किया और वैदिक धर्म की स्थापना की। यदि स्वामी जी न होते तो भारत में आज हिंदुओं का नामोंनिसान भी नहीं होता, हां अन्य, प्रभारतीय धर्मों का प्रभुत्व उसी प्रकार हो जाता जिस प्रकार उत्तरी अफ्रीका से लेकर इंडोनेशिया तक पश्चिमी एशियायी धर्मों का प्रभुत्व है। वहां की प्राचीन संस्कृतियां समूल नष्ट हो चुकी हैं। वहां के निवासी अपने पूर्वजों की कला और संस्कृति को पहचानते तक नहीं और न वे उनके प्रति श्रद्धा रखते हैं। स्वामी जी ने भारतीय समाज की और धर्म में व्याप्त सभी बुराइयों का निराकरण किया और वैदिक धर्म की स्थापना की। वस्तुतः उनका चिंतन और दर्शन भारतीय जीवन के लिए संजीवनी सिद्ध हुआ। उन्होंने सम्पूर्ण उत्तरी भारत में घूम-घूमकर वैदिक धर्म संस्कृत और संस्कृति का प्रचार किया।

वस्तुतः समाज सुधारक का जो कार्य कबीर और महानतम कवि तुलसीदास भी नहीं कर सके, वह कार्य स्वामी दयानंद सरस्वी ने कर दिखाया। स्वामीजी भारतीय धर्म और संस्कृति के नवीनतम बैद्धिक संस्करण थे। मेरी दृष्टि में वे आधुनिक भारत के सबसे बड़े एवं महान समाज सुधारक थे। वे गौतमबुद्ध के बाद सबसे बड़े समाज सुधारक हुए।

प्रस्तुत पुस्तक स्वामी दयानंद सरस्वती : जीवन और दर्शन’ उन्हीं महापुरुष पर लिखी गई एक सारगर्भित पुस्तक है। इसके रचयिता ‘डॉ. लाल बहादुर सिंह चौहान’ हैं डॉ. चौहान ने मध्ययुगीन एवं आधुनिक युग के अनेक महापुरुषों की जीवनियां लिखी हैं। हिंदी के जीवन साहित्य में उनका प्रशंसनीय योगदान रहा है। डॉ. चौहान के लेखन की सबसे बड़ी विशेषता तटस्थभाव से पूर्वाग्रह रहति होकर अपने ‘नायक’ का चरित्र-चित्रण करना होता है। स्वामी दयानंद सरस्वती के जीवन पर लिखी गई इस पुस्तक में ऐतिहासिकता और तथ्यपरकता का विशेष ध्यान रखा गया है, कहीं भी लेखक ने अपनी कल्पना का समावेश नहीं किया है। तिथि क्रम के अनुसार स्वामी जी की जीवनी का वर्णन किया है। इसकी शैली वर्णनात्मक है, इसकी भाषा में सरलता, सरसता एवं सुबोधता है। सदैव प्रचलित किंतु साहित्यिक भाषा का प्रयोग किया गया है। अनेक स्थलों पर स्वामी जी का चित्रोपम वर्णन किया गया है। जो पाठकों के मन पर एक भव्य चित्र उपस्थित करता है। वर्णन में यथार्थता और ऐतिहासिकता के साथ उत्सुकता एवं कौतूहल की सर्वत्र योजना की गई है, जो पाठक को कथा के अंत तक अपने साथ बांधे रखती है। समापन में इस महान समाज सुधारक स्वामी जी का अंत कितने धोखे से किया गया इसका बड़ा ही करुण चित्रण किया है किंतु स्वामी के पवित्र विचार उनके ग्रंथ, उनका समाज सुधार के कार्य और आर्य समाज ये सभी चिरजीवी होंगे; उनका यशःशरीर अनंतकाल तक भारत में रहेगा, ऐसा भाव पुस्तक के अंत में पाठक के मन पर पड़ता है।

मैं डॉ. चौहान को ऐसे श्रेष्ठ ग्रंथ की रचना पर हार्दिक बधाई देता हूं और कामना करता हूं कि वे इसी प्रकार सतत रूप से मां भारती के भंडार की श्री वृद्धि करते रहें।

-डॉ. नारायण सिंह दुबे

सम्मति


डॉ. लालबहादुर सिंह चौहान वर्तमान समय के एक सिद्धहस्त रचनाकार है। अपने-अपने रचना-संसार से हिन्दी बाङ्गमय को सतत समृद्ध किया है। जीवनी लेखक के रूप में आपको विशेष प्रसिद्धि प्राप्ति हुई है। युगद्रष्टा स्वामी दयानंद सरस्वती की जीवनी लिखकर हिन्दी प्रेमियों के ज्ञानवर्धन में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निबाही है। स्वामी दयानंद सरस्वती अपने युग के एक महान समाज सुधारक एवं राष्ट्र निर्माता थे। आर्य संस्कृति के उन्नयन में आपने महती भूमिका निबाही है। वेदों को आधार बनाकर पुराणखण्डी पंडित समाज में जिन अंधविश्वासों एवं ढकोसलों को जन्म देकर अपनी स्वार्थ-पूर्ति में रत थे, उनका स्वामीजी ने जमकर विरोध किया है। इस विरोध की प्रतिक्रिया अपनाने से पूर्व उन्होंने शास्त्रों में वर्णित सत्य को स्वयं पहचाना तत्पश्चात उसका जनता-जनार्दन में प्रचार-प्रसार किया।

19वीं सदी में पौराणिक हिन्दू में जो कुरीतियां, अंधविस्वास एवं सड़ी-गली मान्यताएं घर कर गई थीं, उनका पूरी शक्ति से आपने खण्डन किया है। इस प्रक्रिया में कभी-कभी तो पुराणपंथियों के आपका दुर्धर्ष संघर्ष तक करना पड़ा। पुराणपंथियों ने इनको अपने मार्ग से हटाने हेतु अनेक षड्यन्त्र किए। कुछ षड्यन्त्रों का तो आपने अपनी दिव्दृष्टि से स्वतः ही निराकरण समाधान कर दिया था पर अंत में एक वेश्या के षड्यंत्र में फंसकर आपको अपनी जीवन लीला से हाथ धोना पड़ा।

सच्चे ज्ञान की खोज में पारिवारिक वैभव त्यागकर यह दिव्यविभूति गिरिकन्दराओं तथा कंटकाकीर्ण मार्गों में भटकती रही। लेकिन लगन के ऐसे पक्के थे कि बिना सच्चा ज्ञान प्राप्त किए अपने पथ से तनिक विचलित नहीं हुए।
आपके सद्प्रयासों से ही उस युग से हजारों नवयुवक एवं युवतियां, विधर्मी बनने से रुक गए। स्थान-स्थान पर आपने पुराणपंथी वैदिक पंडितों से, ईसाइयों से एवं मुसलमानों से शास्त्रार्थ कर उन्हें पराजित किया और अपनी धर्म ध्वजा फहराई।



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