22 कहानियाँ - महेन्द्र यादव 22 Kahaniyan - Hindi book by - Mahendra Yadav
लोगों की राय

चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट >> 22 कहानियाँ

22 कहानियाँ

महेन्द्र यादव

प्रकाशक : सी.बी.टी. प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :148
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 463
आईएसबीएन :81-7011-915-4

Like this Hindi book 7 पाठकों को प्रिय

133 पाठक हैं

भारत की लोक कथाएं पुरस्कृत पुस्तक "22 शार्ट स्टोरीज" का हिन्दी अनुवाद है।

22 Kahaniyan - A Hindi Book of stories by Mahendra Yadav - 22 कहानियाँ - महेन्द्र यादव

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

हमारे पड़ोसी

देविका रंगाचारी

रवि और मैं खाली बैठे खिड़की से बाहर झांक रहे थे, तभी अगले मकान के सामने एक ट्रक आकर रुका।
‘‘लगता है, कोई आ गया है !’’ मैंने कहा। ‘‘अब क्या करें ? हमने एक-दूसरे की तरफ देखा। उस मकान का बगीचा पिछले महीने से हमारे खेल का मैदान बना हुआ था। वहां हम लोग घंटों मजे करते थे- कभी उसकी घास में ‘खजाने’ की खोज करते तो कभी मन होने पर ‘छुपा-छुपी खेलते। उसकी खिड़की के धुंधले-धुंधले कांच से हम लोग अक्सर झाँका करते थे और सोचते थे कि यह मकान अंदर से कैसा होगा।

‘‘इसमें एक भूत है,’’ रवि कहता। ‘‘मुझे उसकी आवाज सुनाई देती है।’’
मैं डर के मारे काँप उठी और तुरंत भगवान को याद करने लगी। अब हम लोग वहां दुबारा कभी नहीं खेल पाएंगे। अब तो हमें अपने पास-पड़ोंस के मकानों के बीच की पक्की सड़क से ही संतोष करना पड़ेगा।
सुबह से ही बारिश हो रही थी और हम लोग घर में ही छिपे हुए थे।

‘‘देखो, वे हर तरफ रपटते-फिसलते फिर रहे हैं।,’’ रवि ने जबरदस्ती हँसने की कोशिश की। ‘‘वहां कीचड़ ही कीचड़ है, उनके बक्से खराब हो जाएंगे।’’
मैंने भी थोड़ा संतुष्ट होते हुए सहमति में सिर हिलाया और ट्रक से उतारे जा रहे समान को देखती रही। तभी मैं स्तब्ध रह गई। मैंने रवि का कंधा पकड़कर जोर से हिलाया।
‘‘वे तो शंकर साहब हैं,’’ मैं चीख पड़ी। ‘‘उस दरवाजे से वे ही घुस रहे हैं।’’ मेरा जुड़वा भाई रवि, अविश्वासपूर्वक देखता रहा। लंबे, पतले और तश्माधारी सज्जन सामान रखने वालों को निर्देश दे रहे थे।

‘‘हां, वही हैं,’’ रवि ने धीरे से कहा। ‘‘हे भगवान !’’
हम लोग जड़वत खड़े अपने गणित के अध्यापक को देख रहे थे, जो हमारे स्कूल के आतंक थे। उनके मुंह से निकला एक भी शब्द या उनकी कड़ी निगाह हमें छिपने के लिए मजबूर कर देती थी।

‘‘वे ठीक बगल में ही रहते हैं,’’ मैंने दोहराया, ‘‘बचाओ ! अब क्या करें ?’’ हमने अपने मम्मी-पापा को बताया। उन लोगों को तो हमसे बिलकुल ही सहानुभूति नहीं हुई।

‘‘दिक्कत क्या है ?’’ पापा गरज पड़े। ‘‘कुछ भी हो पड़ोसी तो तुम्हारी पसंद से नहीं आएंगे।’’
‘‘जब तुम लोगों को जरूरत पड़े तो उनसे मदद भी ले सकते हो,’’ हमारी माँ खुश होकर बोलीं। ‘‘गणित में हमेशा तुम लोगों को दिक्कत आती है। अब तुम्हारी समस्या हल हो गई।’’
रवि और मैंने एक-दूसरे की तरफ देखा और आहें भरकर रह गए। स्थिति की विकटता के बारे में इन लोगों को समझाने का कोई फायदा नहीं था। इन लोगों से ज्यादा ध्यान तो हमारे दोस्तों ने दिया।

‘‘कितना बड़ा संकट है !’’ माधुरी चिल्लाई थी। ‘‘फंस गए तुम लोग तो।’’
‘‘तुम्हारा बस-स्टॉप भी एक ही होगा,’’ हमारे दुख में शामिल होता हुआ प्रदीप बोला। ‘‘जब भी तुम कोई गड़बड करोगे, वह तुम्हार घर वालों से शिकायत.....।’’
यह बात तो अभी तक हमारे दिमाग में आई ही नहीं थी। लगभग पूरे दिन हम असमंजस की स्थिति में रहे। हमने गणित की कक्षा में मन लगाने का बहुत प्रयास किया लेकिन शंकर साहब का चेहरा सामने आते ही बीजगणित की सारी चर-अचर राशियाँ दिमाग से निकल भागतीं। जब हम उनके साथ ही बस से उतरे थे, तभी से यही हाल था। उन्होंने हमें हलके से आश्चर्य से देखा था।

‘‘क्या तुम लोग यहीं रहते हो ?’’ उन्होंने डपटकर पूछा।
‘‘जी, सर।’’
‘‘हम आपके बगल के मकान में ही रहते हैं, सर,’’ मैंने हिम्मत करके धीरे से कहा। वे जब भी मेरी तरफ देखते थे, मेरा यही हाल होता था।
‘‘अच्छा अब समझा,’’ उन्होंने कहा और लंबे-लंबे कदम बढ़ाते हुए चल दिए।

अगली सुबह बस-स्टॉप पर पहुँचने में हमने थोड़ी देर की। रवि नजर रखे रहा और अंत में बोल पड़ा वे जा रहे हैं।’’
हम बातें करते हुए जान-बूझकर देर कर रहे थे। यहां तक की माँ को फ्रिक होने लगी थी।
‘‘अब तुम लोग निकल ही लो,’’ उन्होंने जोर देते हुए कहा। ‘‘इस तरह से तो तुम्हारी बस छूट जाएगी।’’

रवि को नुक्कड़ से बस मुड़ती दिखाई दी। हम लोग एकदम से भागकर बस-स्टॉप पर पहुँचे। हम लोगों ने लगातार पाँच दिन तक ऐसा ही किया। शंकर हर बार नाराजगी भरी निगाह से हमें देखते। छठे दिन जब हम लोग दौड़ते-भागते और हांफते हुए पहुँचे तो वे नाराज हो गए।

‘‘तुम लोग ठीक समय पर बस-स्टॉप क्यों नहीं पहुंचते ?’’ उन्होंने डांटकर कहा।
‘‘ये तरीका ठीक नहीं है।’’

हम लोगों ने चुपचाप सिर झुका लिया। जानते थे कि हमें हार माननी ही पड़ेगी। इसके बाद से हम लोग सही समय पर बस-स्टॉप पहुँचते और बस रवाना होने तक शंकर साहब के साथ कई पीड़ादायक क्षण गुजारते। वे हमारे अंकों के बारे में सवाल पूछते और जब हमारे अंक कम रहे होते तो बहुत ही अप्रिय अंदाज से गुर्राते।

‘‘तुम लोग आजकल बिल्कुल नहीं पढ़ते हो,’’ उन्होंने क्रोध में एक दिन कहा। ‘‘या तो टी.वी. देखते रहते हो या फिर समय बर्बाद करते रहते हो। इस बारे में कुछ करना पड़ेगा।’’

करना तो मुझे ही पड़ा। ‘‘आज मैं बाहर नहीं निकलूंगी,’’ मैंने शाम को रवि से कह दिया।
‘‘क्यों ? हमने होम-वर्क तो कर ही लिया है।’’
‘‘नहीं ! तुम्हें मालूम तो है कि हम पर किसकी निगाह है। समय बर्बाद करते हुए पकड़े जाने की मेरी कोई इच्छा नहीं है। अगर उन्होंने किसी से शिकायत कर दी तो ?’’

‘‘पर खेलना तो स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है,’’ रवि ने तर्क दिया। ‘‘राय साहब ऐसा कहते हैं, मालूम है न ?’’ राय साहब हमारे व्यायाम शिक्षक थे और रवि के आदर्श भी।
‘‘कुछ नहीं,’’ मैं बोली। ‘‘मैं बाहर की सीढ़ियों पर बैठती हूँ और वहीं पढ़ूगी ताकि उन पर कुछ असर पड़े। तुम्हें जैसा उचित लगे, करो।’’

नाराज-सा होकर रवि बाहर चला गया, जबकि मैंने एक मोटी-सी किताब उठाई और आगे की सीढ़ियों पर बैठकर पढ़ाई में डूबने का दिखावा करने लगी। पंद्रह मिनट बाद ही, जब मुझे अपने निर्णय पर खेद होने लगा था, तभी रवि आया। उसके पैरों के पास एक कुत्ता था। इस प्यारे-से काले कुत्ते को हम लोग गलियों में घूमते हुए या बहादुरी से हर किसी के बगीचे में घुसते या जांच-पड़ताल करते हुए देख चुके थे। हमने उसे अगले मकान में जाते देखा था और उसकी खैर मनाते रहे थे। मैं झटके से सीढ़ी से नीचे कूदी और उसे सहलाने लगी।

‘‘बहुत प्यारा है,’’ मैंने कहा। ‘‘किसका है ? इसके गले में कोई पट्टा नहीं है।’’ कुत्ता उत्साह से अपनी पूछ हिलाए जा रहा था।
‘‘यह मेरे पीछे-पीछे आया है,’’ रवि शान से बोला। मुझे लगता है, यह मुझे चाहता है।’’
तभी खट से दरवाजा खुला और शंकर साहब सड़क पार कर हमारी ओर आने लगे।

‘‘भगवान, बचाओ,’’ रवि धीरे से बोला और मैंने अपराध-भाव से अपनी किताब की तरफ देखा, जो ऊपर सीढ़ी पर पड़ी थी।
‘‘तुम लोग क्या कर रहे हो....,’’ वे शुरू हो गए।
रवि ने घबराते हुए जवाब दिया, ‘‘कुछ नहीं, सर। हम तो बस, पढ़ने ही जा रहे थे, सर। हम तो...।’’
‘‘चुप रहो, बच्चे—और मेरी बात सुनो, ‘‘शंकर साहब ने फटकार लगाई। ‘‘यह मेरा कुत्ता है। मैं सोच रहा था कि यह गया कहां।’’
हम आश्चर्य से देखते ही रहे। कुत्ता हँसी-खुशी उछल-कूद करता हुआ अपने मालिक के पास पहुंच गया और देखते ही देखते उस घर के अंदर गायब हो गया।

‘‘चलो ! रवि बोला। उसके शब्द में बहुत-से अनकहे मायने छुपे थे।
मैंने सिर हिला दिया।
‘‘मैं शर्त लगा सकता हूं-वे कुत्ते को मारते होंगे,’’ मैंने कहा। ‘‘उनको रोकने-टोकने वाला तो कोई है नहीं। कोई आश्चर्य नहीं जो कुत्तें की आँखों में उदासी छाई है।’’

‘‘अच्छा, ‘ऐसा,’’ रवि बोल पड़ा। ‘‘तुम्हें कैसे पता लगा ? क्या वे आंखें गायों की तरह थी ?’’ रवि तो तभी से जीनवरों से प्यार करने लगा था, जब से वह कुत्तें और बिल्ली में फर्क समझने लायक हुआ था।

‘‘बच्चों, तुम लोग क्या कर रहे हो ?’’ हमारी मां बाहर आकर बोलीं। ‘‘तुम लोगों ने बताया था कि कल तुम्हारा टेस्ट है गणित का है न ?’’
‘‘हाँ,’’ रवि ने उदास स्वर में कहा। ‘‘हम लोगों ने तैयारी कर ली है। वही पुराने सड़े-से समीकरण !’’
यही पुराने ‘सड़े-से समीकरण’, अगले दिन हमारे लिए असली मुसीबत बन गए। ‘शंकर साहब’ ने तो लगता है कि सबसे कठिन प्रश्नों का आविष्कार कर डाला था। हमने बहुतेरा सिर खुजलाया, पेन चबाए। संख्याओं को बहुत संवारा, सरल किया लेकिन उनके उत्तर पकड़ में नहीं आए।

‘‘हाय कक्षा से बाहर निकलते ही माधुरी ने अपनी आँखें मलीं। ‘‘कितना भयानक था, कितना कठिन ! तुम दोनों ने कल जरूर उन्हें नाराज कर दिया होगा। उसी का बदला लिया उन्होंने।’’

असली अग्नि-परीक्षा तो तब हुई, जब हमारी कापियां वापस की गईं। हम सब के सब फेल हो गए थे। शंकर साहब के चमकती आंखों और गरजती आवाज वाले प्रचंड हाव-भाव को देखकर हम सभी घबराए जा रहे थे।
‘‘तुम सब बेकार हो !’’ वे फट पड़े। ‘‘मैंने बिलकुल आसान-सा टेस्ट लिया था और तुम लोग एक भी चीज ठीक से नहीं कर सके।’’
रवि तो सारे दिन अपने अंकों के बारे में ही सोचता रहा। वह अपने आपको गणित का विशेषज्ञ माना करता था और अब उसे चिंता खाए जा रही थी कि वह कहीं फेल ही न हो जाए। मैंने उसे प्रसन्न करने का निश्चय किया।
‘‘आओ, रवि’’, शाम को मैं उसे बाहर खींचते हुए बोली। छुपा-छुपी खेले न जाने कितने दिन हो गए।’’
‘‘नहीं,’’ वह बोला, ‘‘मैं....।’’ वह एकाएक रुक गया। हमारे कानों में किसी के बड़े जोर से हँसने की आवाज सुनाई पड़ी। ये तो बगल वाले मकान के बगीचे से ही आ रही थी। जिज्ञासावश, हम बाड़ पार करके भागे और अपने पुराने खेल के मैदान की तरफ झांकने लगे।

शंकर साहब अपने हाथों में एक गोल-सी प्लेट फ्रिसबी लिए घास पर लेटे थे। उनका कुत्ता उनके चारों तरफ कूदता-फांदता उसे छीनने की कोशिश कर रहा था।
‘‘वे तो हँस रहे हैं !’’ रवि धीरे-से बोला।
मुझे लगा जैसे मैं कोई स्वप्न देख रही होऊं।
शंकर साहब ने तभी ऊपर की ओर देखा और अपने पैरों पर उछलकर खड़े हो गए। दो दिलचस्प दर्शकों को देखकर वे कुछ हड़बड़ा गए थे। कुछ परेशान मुद्रा में उन्होंने उस प्लेट को घुमाया और कुछ सोचने लगे।
‘‘क्या तुम लोग भी खेलना चाहते हो ?’’ उन्होंने पूछा।

रवि मेरी अपेक्षा थोड़ा पहले ही होश में आ गया।
‘‘हां, सर,’’ उसने जवाब दिया और मुझे खींचते हुए उनकी ओर भागा।
कुत्ता दौड़कर हमारे पास आया और हमारे हाथ चाटने लगा।
‘‘त्रिको तुम्हें चाहता है,’’ शंकर साहब बोले।
‘‘त्रिको ?’’ मैंने साहस करके पूछा।
‘‘त्रिकोणमिति की तर्ज पर इसका नाम रखा है,’’ समझाया। ‘‘आओ, तुम लोग वहां खड़े हो जाओ और मैं यह फ्रिसबी तुम्हारी ओर फेंकूंगा।’’
एक ही घंटे बाद हम अपनी किताबें लाने अपने घर की ओर भाग रहे थे।
‘‘तुम लोग कहां जा रहे हो माँ ने पूछ लिया।
‘‘बगल वाले घर में। शंकर साहब हमें गणित के समीकरण हल करने में हमारी मदद करेंगे।


जादुई कालीन


तिथि तवोरा


विकी ! देखो, अब तुमने क्या कर दिया है ?’’ दिव्या चिल्ला पड़ी। ‘‘ठहरो, अभी मां को पता चलने दो !’’
विकी ने अपराध-भाव नए कालीन पर बड़े-से लाल धब्बे की ओर देखा, जो उससे रंग फैल जाने से बन गया था।
‘‘माँ के आने के पहले ही इसे साफ कर देते हैं,’’ वह बोला।
‘‘मैं तुम्हारे लिए यह काम कर दूंगा !’’ कहीं से एक आवाज आई।
दोनों बच्चें चकित हो गए। वे कालीन की तरफ देखे जा रहे थे। आवाज उसी से आई लग रही थी। तभी उनके देखते-देखते रंग का वह धब्बा गायब हो गया। एकदम उड़न छू। बिलकुल पहले जैसा हो गया। उनमें से किसी के भी कुछ भी किए बिना बगैर। उन लोगों की नजरें उसी पर जमी हुई थीं, तभी उनकी मां अंदर आईं। ‘‘तुम दोनों क्या देखे जा रहे हो ?’’ उन्होंने पूछा।
‘‘मां ये कालीन, ये बोलता है...,’’ दिव्या फुसफुसाई।
‘‘यह तो कोई जादुई कालीन है,’’ विकी जोर से बोला।
‘‘दिव्या, कितनी बार मैंने तुम्हें मना किया है कि विकी के दिमाग में अपनी ये काल्पनिक बातें मत भरा करो। कालीन बात करता है, अब इसके बाद और क्या !’’ श्रीमती मेहरा गुस्से में आकर बोलीं।
उस शाम को कालीन फिर से बोल पड़ा।
वे टेलीविजन पर क्रिकेट मैच देख रहे थे। विकी की नजरें परदे पर जमी हुई थीं और हाथ से कटोरी में से चिप्स निकालकर खा रहा था।
‘‘आ-आ-उ-ट !’’ चिल्लाने हुए वह उछलने लगा। उत्साह में उसके हाथ से चिप्स नीचे गिरने लगीं। इसके पहले की वह उन्हें उठाता, वे गायब हो गईं !

‘‘वाह ! बहुत ही मजेदार हैं !’’ तारीफ करती आवाज सुनाई दी।
‘‘दीदी, ये कालीन फिर से बोल रहा है,’’ विकी धीरे से फुसफुसाया। उसकी आवाज कांप रही थी।
दिव्या ने हां में सिर हिलाया। उसे भी आवाज सुनाई दे रही थी।
‘‘सुनो,’’ उसने कालीन की ओर देखते हुए पूछा,’’ तुम कौन हो ?’’
‘‘मैं अजीज हूं, इस कालीन को बनाने वाले बच्चों में से एक,’’ एकदम साफ जवाब आया।
‘‘तुम एक छोटे बच्चे की तरह बोल रहे हो। तुमने यह कालीन कैसे बनाया होगा ?’’ दिव्या ने अविश्वास से पूछा।
‘‘मुझसे भी छोटे बच्चे यह काम करते हैं,’’ अजीज ने उदास स्वर में जवाब दिया।
‘‘कहां ?’’ विकी पूछने लगा।

‘‘कालीन के कारखाने में, जहां मैं रहता हूँ,’’ अजीज बोला।
‘‘तुम वहां रहते हो तो तुम्हारी आवाज यहां कैसे आ रही है ?’’ दिव्या ने पूछा। ‘‘वो क्या है कि एक दिन जब मैं ये कालीन बुन रहा था, तभी मैंने दिन में ही एक सपना देखा। मुझे लगा कि जिन लोगों ने कालीन खरीदा है, वे मुझे भी अपने घर ले आए हैं। जब तुम्हारी मां यह कालीन खरीदकर लाईं, तब मेरा सपना भी साथ में यहां आ गया।’’
‘‘वैसे तुम हो कहां ? असली रूप कहां है तुम्हारा ?’’ विकी जानने पर तुला था।
‘‘वहीं कारखाने में।’’
‘‘क्या तुम वहां खुश नहीं हो ?’’ विकी ने फिर पूछा।
‘‘खुश ? वहां हमें सुबह पांच बचे से लेकर रात आठ बजे तक काम करना पड़ता है। सिर्फ दोपहर में खाना खाने की लिए एक घंटे की छूट मिलती हैं। जब काम खत्म होता है, तब तक हम इतना थक चुके होते हैं कि खेलने का सवाल ही नहीं उठता। हम लेटते ही सो जाते हैं।’’
‘‘तुम्हारा मतलब है कि तुम स्कूल नहीं जाते ?’’ विकी को थोड़ा जलन होने लगी।

‘‘हम तो जाना चाहते हैं, लेकिन हमारे घर बहुत गरीब हैं न ! वे हमें स्कूल भेजना तो दूर खाना तक नहीं खिला पाते है। उन्होंने यह सोचकर हमें यहां भेज दिया था कि यहां हम कुछ ठीक से रहेंगे। उन्हें पता नहीं यहां हमारे साथ कितना बुरा व्यवहार होता है। काश ! मैं अपने घर जा पाता !’’ आवाज में सिसकियां शामिल थीं।
‘‘दीदी, अजीज तो रो रहा है,’’ विकी खुद भी रुआंसा होकर बोला।

‘‘अजीज रोओ मत, हम तुम्हारी मदद करेंगे। हम तुमसे, तुम्हारे असली रूम से कैसे मिल सकते हैं ?’’ दिव्या ने पूछा।
‘‘हां’’, अजीज ने अनिश्चयपूर्वक कहा, ‘‘अगर तुम लोग कारखाने में आओ, तब शायद....।’’ वह चुप हो गया मेहरा जी कमरे में आ चुके थे।
दिव्वा दौड़कर उनके पास पहुँची। ‘‘हम लोग कालीनों के कारखाने में जाना चाहते हैं !’’
‘‘अजीज से मिलने !’’ विकी बीच में टपक पड़ा।
‘‘हां, असली अजीज से !’’ दिव्या जोर देते हुए बोली।
‘‘ए ! ये सब क्या है ? कौन है ये अजीज ?’’ उनके पिता परेशान होते हुए बोले।
‘‘अजीज इस कालीन को बनाने वाला बच्चा है, पापा,’’ दिव्या समझाने लगी। हद होती जा रही है !’’ श्रीमती मेहरा ने डांट लगाई।
‘‘यह मेरी कल्पना नहीं है,’’ दिव्या ने विरोध किया।
‘‘पापा प्लीज,’’ उसने विनती की और अजीज की पूरी कहानी सुनाने लगी। उन्होंने ध्यान से पूरी बात सुनी। ‘‘बहुत अच्छा, हम रविवार को तुम्हारे अजीज से मिलने चलेगें,’’ उन्होंने सहमति दे दी।
‘‘आप इन्हें कालीनों के कारखाने में चलने के बारे में इतने गंभीर हैं’’ श्रीमती मेहरा ने भारी आवाज में कहा। ‘‘यह दिव्या की कोई परी कथा ही है और उसने विकी को भी अपनी बात का विश्वास दिला दिया है।’’
‘‘ऐसा है, तब दिखा लाने में क्या नुकसान है,’’ मेहरा जी ने तर्क दिया।
बच्चों को रविवार का इन्तजार करना भारी पड़ा।
अजीज भी बहुत उत्साहित था।’’ तुम लोग मुझे करघे पर काम करते हुए देखोगे,’’ उसने बताया। ‘‘मालिक साहब किसी को भी करघे देखने की अनुमति नहीं देते क्योंकि वे किसी को पता नहीं चलने देना चाहते है कि उनके यहां बच्चे काम करते हैं। वैसे उन्हें लगे कि तुम उनसे कालीन खरीदोगे, तब वे तैयार हो सकते हैं।’’
कारखाने की ओर जाते समय बच्चों ने सारी बातें अपने पिता को बता दी थीं।

लोगों की राय

No reviews for this book