काका की महफिल - काका हाथरसी Kaka Ki Mahphil - Hindi book by - Kaka Hathrasi
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काका की महफिल

काका हाथरसी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :168
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4724
आईएसबीएन :81-7182-417-X

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प्रस्तुत पुस्तक में, काकाजी द्वारा बुलायी गई महफिल में श्रोताओं द्वारा पूछे रोचक उत्तर उन्हीं की लेखनी के माध्यम से दिए गए हैं...

Kaka Ki Mahfil

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

काका हाथरसी का व्यक्तित्व ही निराला था। उन्होंने अपनी विशेष शैली से हिंदी-प्रेमियों के दिलों पर वर्षों तक राज किया। हास्य-कविताएँ लिखने के साथ-साथ पाठकों द्वारा पूछे गये प्रश्नों के सटीक उत्तर भी उन्होंने कविता के माध्यम से दिए। प्रश्नोत्तरों का यह सिलसिला विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर देशभर में अत्यधिक लोकप्रिय हुआ।
प्रस्तुत पुस्तक में, काकाजी द्वारा बुलायी गई महफिल में श्रोताओं द्वारा पूछे रोचक उत्तर उन्हीं की लेखनी के माध्यम से दिए गए हैं। बीच-बीच में उनकी हास्य-व्यंग्य-कविताओं का मनोरंजन पुट भी है, जो आपको भरपूर आनंदित करेगा।

महफिल : एक


‘महफ़िल में इस ख़याल से फिर आ गया हूँ मैं
शायद मुझे निकाल के पछता रहे हों आप’
‘अरे वाह बेटा किलोल ! कहाँ से आ रहे हो, और यह क्या उल्टा-सीधा गा रहे हो, हमने तो कभी तुमको महफिल से नहीं निकाला, जब तुम्हारा मन होता है आ जाते हो, जब चाहते हो, यहाँ से फूट जाते हो। यह कौन है तुम्हारे साथ ?’
‘काकू यह मेरी वाइफ है, आपको पिछली बार मैंने बताया था कि मैंने एक टुन-टुन टाइप लड़की से शादी कर ली है।’
‘लेकिन यह तो मोटी नहीं है।’
‘एक महीने तक कराई इसको डाइटिंग तब शेप में आई है। वरना मैं तो अब तक दबकर मर गया होता !
‘डाइटिंग में क्या-क्या प्रयोग किए या कराए तुमने।’
‘सबसे पहिले मैंने इसके मक्खन-भक्षण पर लगाया ब्रेक। यह 10 टोस्ट पर 100 ग्राम मक्खन डकार जाती थी जबकि मक्खन का 500 ग्राम का पैकेट 60 रुपए में आता है। उसे यह 5 दिन में ही कर देती थी साफ। सोचा, यह तो मेरा दिवाला ही निकाल देगी। मैंने घोषणा कराई, सुबह का नाश्ता बंद। न टोस्ट न मक्खन, लगा दिया मुँह पर डाइटिंग का ढक्कन।
‘और क्या किया, आगे बताओ।’

‘और खुश्क रोटी सेवन करो, हरी सब्ज़ियाँ चरो। चिकनाई बंद, दूध पर जो मलाई ऊपर आ जाती है, उसका सेवन मैं कर लेता हूँ, क्योंकि डॉक्टर ने मेरे अंदर विटामिन ‘ए’ की कमी बताई है।’
‘ठीक, इसका अर्थ यह है कि इसका मोटापा घटने लगा, तुम्हारी काया पर चढ़ने लगा।’
‘मैं मजबूर हूँ काका, बिना मक्खन-मलाई के मैं जीवित रह ही नहीं सकता।’
‘मक्खन में मोहन बसे, रबड़ी में श्रीराम, रसगुल्ला में शालिग्राम, जय रघुनंदन, जय सियाराम।’
‘अच्छा यह कीर्तन बंद करो और वह डाक का थैला जो रक्खा है, उसे उठाकर प्रश्न पढ़ते चलो। हम उत्तर देते जाएँगे।’
‘काकू इसमें तो बहुत टाइम लग जाएगा, पहिले मुझे नाश्ता तो कर लेने दीजिए।’
‘जी नहीं, नाश्ता करके फिर आप काम नहीं कर सकेंगे। एक बैठक पूरी कर लें, फिर हम-तुम दोनों रसोई के कमरे में बंद हो जाएँगे और बॉबी वाला वह गीत गुनगुनाएँगे-हम तुम एक कमरे में बंद हों...’
काकाजी, प्रश्नोत्तरों से पहिले आप अपनी वे कविताएँ सुना दीजिए, जो ‘हास्य के गुब्बारे’ के बाद आपने लिखी हैं।
अच्छा सुनो। सबसे पहिले आरती-

आरती : रिश्वतरानी की


जय रिश्वत रानी, मैया जय रिश्वत रानी।
तेरी महिमा से परिचित, सब ज्ञानी-अज्ञानी।।

नाम अनेकों, रूप बहुत, क्या कैसे कह पाएँ।
शेषनाग थक जाएँ, लेखनी आँसू टपकाएँ।।

भेंट, दलाली, नज़राना, बख़्शिश या हक-पानी।
देकर सुविधा-शुल्क, प्राप्त हो सुविधा मनमानी।।

भारत-भू पर, कोई कोना, नहीं दिखा ऐसा।
काम सफल हो जाए जहाँ पर, बिना दिए पैसा।।

ऐप्लीकेशन जिनकी नहिं, नंबर पर चढ़ पाती।
दे देते जो गिफ़्ट, लिफ़्ट झट उनको मिल जाती।।

कोर्ट कचहरी, न्यायालय में जड़ तेरी गहरी।
ईंट-ईंट से निकल रही, रिश्वत की स्वरलहरी।।

सौ-पचास का नोट, पिऊन की पॉकिट में धर दो।
कहो कान में, अमुक केस की फ़ाइल गुम कर दो।।

रेल-मेल में भीड़-भड़क्का, धकापेल-धक्का।
प्लेटफ़ार्म पर खड़े-खड़े, टिपियाते कवि कक्का।।

गार्ड साब ने मारी-सीटी, तब टी.टी. आया।
रुपए बीस दिए जिसने, उसने स्लीपर पाया।।

वेटिंग वालों से दस-दस लें, गायब हो जाएँ।
ड्रैस बदलकर, फ़र्स्ट-क्लास कूपे में सो जाएँ।।

होली पर ससुराल गए, तो पड़े व्यंग्य-कोड़े।
‘फगुआ’ रूपी रिश्वत लेकर, साली ने छोड़े।।

रिश्वत रानी की आरति, जो श्रद्धा से गाए।
होय अँगूठा छाप, नामवर नेता बन जाए।।

ए भाई, वोट डालते चलो



ए भाई ! वोट डालते चलो,
आगे ना देखो, पीछे भी, दाएँ न देखो, बाएँ भी
ऊपर भी नहीं, नीचे भी। ए भाई...।
पाँच-पाँच साल बाद आता ये चुनाव है,
ख्वाब है, तमन्ना है, दिल में भी तनाव है।
जान की एक बाजी है, आखिरी ये दाव है।
काम नहीं, दाम नहीं, सर्विस नहीं, धंधा नहीं।
हानि नहीं, लाभ नहीं, ये तो सेवा है। ए भाई...।
और प्यारे ! ये चुनाव जो दंगल है,
चुनाव जो कुश्ती है,
चुनाव जो किस्मत है,
पाँच-पाँच साल बाद, एक बार आता है।
बड़े को भी, छोटी को भी,
खरे को भी, खोटे को भी,
दुबले को भी, मोटे को भी,
पार्टी की एक जो टिकट पा जाता है
नेता बन जाता है, भाग्य खुल जाता है। ए भाई...।

घर-घर गली-गली, गाँव-गाँव, जहाँ हमारी जनता है
नेता को जनता के पास जाना पड़ता है,
लोगों के जूतों में झुक जाना पड़ता है।
सूखे वायदों को सब्ज़बाग दिखाना पड़ता है। ए भाई...।

कैसा ये करिश्मा है ? कैसा खिलवाड़ है,
चुनाव में किसी का, कौन वफादार है।
एक की कार में बैठ के जो आता है,
दूसरे के कैंप में फौरन घुस जाता है।
माल जिसका खाता है, पैसा जिससे पाता है,
गीत जिसका गाता है।
उसके ही हारने पर तालियाँ बजाता है। ए भाई....।

सेवा-भाव बचपन है, इलैक्शन जवानी है
पराजय बुढ़ापा है और इसके बाद
जीप नहीं, फोन नहीं, माइक नहीं, मंच नहीं,
माला नहीं, प्याला नहीं, कोठी नहीं, कार नहीं।
कुछ भी नहीं रहता है।
खाली-खाली समितियाँ, खाली-खाली सेमिनार
खाली-खाली डेरा है
सारा मुल्क अँधेरा है, ना मेरा है, ना तेरा है,
ऐ भाई....।
-(श्री ‘उपद्रव’ जी की गुजराती कविता का काका द्वारा रूपांतर)



संगीन नेता : रंगीन दोहे



चहुँदिशि उड़ें विमान में, इंकापति राजीव,
अगले आम चुनाव की, जमा रहे हैं नींव।
जिताएँ समाज सेवी, व्यर्थ निकली श्रीदेवी !

करुणानिधि का करुणरस, बदल बन गया हास,
तमिलनाडु में शेष रस, रक्खे अपने पास।
करेंगे नवरस पूरे, न समझो स्वप्न अधूरे !

चंडी चुरहट लाटरी, चाट गई सब खीर,
फड़क रहे गांडीव में, अर्जुनसिंह के तीर।
खोट करते हैं पुत्तर, बापजी क्यों दें उत्तर ?

धीरे-धीरे लग रही, वी.पी.सिंह की हाट,
कब प्रधानमंत्री बनें, देख रहे हैं बाट।
घोषणा कर डाली है, विकल्प जनता-दल ही है !

कहें चंद्रशेखर, रहें सत्ता से हम दूर,
जनता-दल की बेल के, खट्टे हैं अंगूर।
सिंह जी भरकम भारी, दाल नहिं गले हमारी !

कमलापति राजीव को, चिट्ठी लिखते रोज,
पट्ठे उनके कर रहे, पोस्टमैन की खोज।
नहीं कुछ उत्तर आता, बुढ़ापा बढ़ता जाता !

भजनलाल के भजन से, बजें भवन में ढोल
बेटा देवीलाल के, खोल रहे हैं पोल।
वित्त विवरण नहिं देंगे, विरोधी क्या कर लेंगे !

भगत सरीखा जगत में, कौन मिलेगा व्यक्ति,
दिल्ली की किल्ली हिले, दिखलाए जब शक्ति।
दंडवत करते लाला, देखकर चश्मा काला !

बूटासिंह के बूट पर, मक्खन मलिए आप,
कष्ट दूर हो जाएँगे, नष्ट होएँ सब पाप।
कृपा जिसने पाई जी, बन गए डी.आई.जी. !

दिल्ली में रैली हुई, पीड़ित हुए किसान,
टिक नहिं सके टिकैत जी, फ़ेल हो गया प्लान।
दिखाते रहते मुक्का, सामने रखकर हुक्का !

अटलबिहारी अनमने, एकल करें निवास,
अब इनको डाले नहीं, कोई सुमुखी घास।
प्रगति गति ढुलमुल-सी है, भाजपा व्याकुल-सी है !

नयावर्ष ! हर्षोत्कर्ष



टा-टा कहकर रिटायर, हुआ नवासी वर्ष
स्वागत 90 का करें, पाएँ हर्षोत्कर्ष।
पाएँ हर्षोत्कर्ष, भेद-भावना भुलाएँ,
रंजोगम को छोड़, ठहाके नित्य लगाएँ।
स्वस्थ, सुखी, अलमस्ती से जिंदगी काटिए,
झुग्गी-झोंपड़ियों को भी मुस्कान बाँटिए।

नए वर्ष में प्राप्त हो, अंग-अंग नवरंग,
रूढ़िवादिता छोड़कर, चलो समय के संग।
चलो समय के संग, हिया से हिया मिलाओ,
छोड़ रार-तकरार, प्यार के दिये जलाओ।
हत्या-हिंसा, घृणा-द्वेष की खाई पाटो,
हाय-हाय तज वाह-वाह के नारे बाँटो।

हँसते-हँसते हो गए, काका तिरासी साल
भौंरा से भन्ना रहे, सिर पर काले बाल।
सिर पर काले बाल, बताएँ घर के भेदी,
काकी जी के बालों पर आ गई सफेदी।
क्या चिंता है, मज़े दे रहीं जुल्फ़ें व्हाइट,
घुप्प अँधेरी नाइट में भी मारें लाइट।

काकी काजल लगाकर, नैन-सैन मटकाए,
पत्थर दिल भी पिघलकर, प्यौर शहद बन जाए।
प्यौर शहद बन जाए, छिपाएँ क्यों हम तुमसे,
नई-नई कल्पना, नित्य मिलती हैं उनसे।
रूठ जाय दिलरूबा, मनौती करें मनाएँ,
बिल्ली के सम्मुख ‘काका’ चूहे बन जाएँ।

टिकटार्थी-प्रार्थी



टिकट झपटने के लिए, उछल रहे श्रीमान,
विजयश्री हो प्राप्त तो, मिले मान-सम्मान।
मिले मान-सम्मान, पार हो जाए नैया,
श्रद्धा से आरती उतारें चमचा भैया।
जिनकी पॉकिट से पलते, लठैत भतखौआ,
उनसे हारें हंस, सफल हो जाएँ कौआ।

कलयुगी द्रौपदी



काकी से की प्रार्थना, नवा-नवाकर शीश,
प्रिये, हमें दे दीजिए रुपे चार सौ बीस।
रूपे चार सौ बीस, आज जूआ खेलेंगे,
यह संख्या बलवान, शर्तिया हम जीतेंगे।
लगा दिए वे रुपये, एक दाव पर सारे,
दुगुने आए लौट, हौसले बढ़े हमारे।
साहस आगे बढ़ा, दाँव-पर-दाँव लगाए,
हार गए सब, घर आए मुँह को लटकाए।

काकी बोलीं- क्या हुआ, कैसे बीती रात,
कितने आए जीतकर, सच-सच बोलो बात ?
सच-सच बोलो बात, सुनाया संकट उनको,
जीत भाड़ में गई, हार बैठे हम तुमको।
सुनकर देवी जी ने मारा एक ठहाका,
मुझे द्रौपदी समझा है क्या तुमने काका ?
घबराओ मत चिंता छोड़ो, पीओ-खाओ
जीत गए जो कौरव, उनके पते बताओ !

तन-मन व्याकुल हो रहा, क्या होगा रघुनाथ,
लेकर बेलन हाथ में, चलीं हमारे साथ।
चलीं हमारे साथ, देख बूढ़ी रणचंडी,
कौरव-दल की सारी जीत हो गई ठंडी।
दु:शासन जी बोले, क्षमा कीजिए हमको,
यह कलयुगी द्रौपदी, रहे मुबारक तुमको।
काकी बोलीं-यों नहिं पीछा छोड़ूँ भइए,
लौटाओ सब इनसे जीते हुए रुपइए।

आरती इक्कीसवीं सदी की



इक्कीसवीं सदी, मेरी मइया इक्कीसवीं सदीऽऽ,
तरस रहे तेरे स्वागत को ताल-तलैया-नदी।

हत्या-हिंसा-नफरत के आँसू बहते जिनमें,
तुम आओ तब, होय प्रवाहित अमृतरस उनमें।

‘काका’ करे आचमन तो भौंरा-से भन्नाए,
होय बुढ़ापा दूर, जवानी सन-सन सन्नाए।

नई जवानी, नई रवानी, नवजीवन पाएँ,
नई उमर की नई फसल की, काकी ले आएँ।

नागिन-सी लट लटकें चमकें हीरा-से झुमके,
काव्य-मंच पर श्रीदेवी-जैसे मारें ठुमके।

तीन ग़ज़ल, दो गीत नए काका से ले लेंगी,
कवयित्री बनकर, लाखों के नोट बटोरेंगी।

नहीं करेंगे हम कोई पैदा बच्चा-बच्ची,
सफल होय परिवार-नियोजन, नींद आए अच्छी
फिर भी बालक चाहें, तो विज्ञान मदद देगा,
कम्प्यूटर का बटन दबाओ, बच्चा निकलेगा।

गाँव-गाँव में स्थापित हों,स्वीस बैंक ऐसे,
चाहो जितने जमा करो, दो नंबर के पैसे।

किसका कितना धन है कोई बता नहीं पाएँ
मार-मारकर सर, सब आई.टी.ओ.थक जाएँ।

यह आरती अगर लक्ष्मी का उल्लू भी गाए,
प्रधानमंत्री का पद उसे फटाफट मिल जाए।

तुम डार-डार, हम पात-पात



महालेखापरीक्षक की रपट है गूढ़ ऐसी
गीता के श्लोक-जैसी।
पकड़कर वाक्य या श्लोक एक
अर्थ निकाल लीजिए अनेक।
राजीव को विपक्षी दोषी मान रहे हैं
पक्षी, पंखों का छाता तान रहे हैं।
बचाव की अहम् भूमिका निभा रहे हैं
कांग्रेसी संत
भगत जी और पंत।
वी.पी.सिंह दहाड़ रहे हैं,
देवीलाल मिसमिसा रहे हैं,
रामाराव विश्वामित्र बनकर
शाप देने आ रहे हैं।
क्या होगा भगवान
व्याकुल है धरती, आकुल है अंबर
जजमैंट देंगे मिस्टर दिसंबर।

पंचायती राज



गाँव-गाँव में होय अब, पंचायत के राज,
काका कवि तो खुश हुए, काकी जी नाराज।
काकी जी नाराज फैसला गलत किया है,
महिलाओं को सिर्फ तीस परसैंट दिया है।
अर्धांगिनि है नारि, उन्हें समझाना होगा,
फिफ्टी-फिफ्टी आरक्षण दिलवाना होगा।
पंचायत स्वर्णिम सपन, जब तक हो साकार,
तब तक जाने कौन-सी आएगी सरकार।
आएगी सरकार, अगर जनता दल आया,
बने बनाए पंचमहल का करें सफाया।
सत्ता को अपना कर्त्तव्य निभाना चाहिए,
है विपक्ष सिद्धांत, उसे लुढ़कना चाहिए।


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