चतुर बीरबल - अनन्त पई Chatur Birbal - Hindi book by - Anant Pai
लोगों की राय

अमर चित्र कथा हिन्दी >> चतुर बीरबल

चतुर बीरबल

अनन्त पई

प्रकाशक : इंडिया बुक हाउस प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :31
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4788
आईएसबीएन :81-7508-476-6

Like this Hindi book 6 पाठकों को प्रिय

166 पाठक हैं

बीरबल शहंशाह अकबर के दरबार में एक रत्न थे। उन्हीं के विषय में प्रस्तुत है यह पुस्तक

Chatur Birbaal -A Hindi Book by Anant Pai

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

चतुर बीरबल

बीरबल की विनोद-प्रियता और बुद्धिचातुर्य ने न केवल अकबर, बल्कि मुगल साम्राज्य की अधिकांश जनता का मन मोह लिया था। लोकप्रिय तो वीरबल इतने थे कि अकबर के बाद उन्हीं की गणना होती थी। वे उच्च कोटि के प्रशासक, और तलवार के धनी थी। पर शायद जिस गुण के कारण वे अकबर को परम प्रिय थे, वह गुण था उनका उच्च कोटि का विनोदी होना।
बहुत कम लोगों को पता होगा कि बीरबल एक कुशल कवि भी थे। वे ‘ब्रह्म’ उपनाम से लिखते थे। उनकी कविताओं का संग्रह आज भी भरतपुर-संग्रहालय में सुरक्षित है। वैसे तो वीरबल नाम से प्रसिद्ध थे, परन्तु उनका असली नाम महेशदास था। ऐसा विश्वास किया जाता है कि वे यमुना के तट पर बसे त्रिविक्रमपुर (अब तिकवाँपुर के नाम से प्रसिद्ध) एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे। लेकिन अपनी प्रतिभा के बल पर उन्होंने अकबर के दरबार के नवरत्नों में स्थान प्राप्त किया था। उनकी इस अद्भुत सफलता के कारण अनेक दरबारी उनसे ईर्ष्या करते थे, और उनके विरुद्ध षड्यंत्र रचते रहते थे।
बीरबल सेनानायक के रूप में अफगानिस्तान की लड़ाई में मारे गये। कहा जाता है कि उनकी मृत्यु ईर्ष्यालु विरोधियों के षड्यंत्र का परिणाम थी।
बीरबल की मृत्यु के समाचार से अकबर को कितना गहरा आघात पहुँचा था, इसका प्रमाण है उनके मुख से कविता के रूप में निकली ये पंक्तियाँ :
दीन जान सब दीन,
एक दुरायो दुसह दु:ख,
सो अब हम को दीन,
कुछ नहीं राख्यो बीरबल।
अकबर के लिए बीरबल सच्चे सखा, सच्चे संगी थे। अकबर के नए धर्म दीन-ए-इलाही के मुख्य 17 अनुयायियों में यदि कोई हिन्दू था, तो वे थे अकेले बीरबल।



अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book