कबीर वाणी अमृत संदेश - लाल चन्द दूहन जिज्ञासू Kabir Vani Amrut Sandesh - Hindi book by - Lal Chand Duhan Jigyasu
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कबीर वाणी अमृत संदेश

लाल चन्द दूहन जिज्ञासू

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :256
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4805
आईएसबीएन :9788181337054

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कबीर के द्वारा लिखे गये अमृत संदेशों का रुचिपूर्ण वर्णन...

KABIR VANI.

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

कबीर के शब्द-शब्द में क्रांति है। जीवन के किसी भी पहलू में उन्होंने पाखंड को स्वीकार नहीं किया। इसीलिए उनके शब्दों में कहीं-कहीं बहुत तीखी धार है, जो बिना किसी का पक्ष लिये दिखावे को परत-दर-परत चीरती जाती है। संत कबीर का अनुभव वैसे तो पद्य की कई विधाओं में सहज रूप से प्रवाहित हुआ लेकिन साखियों के रूप में उसने जन-मन को गहरे तक प्रभावित किया। इस पुस्तक में हमने ऐसी अमृतमयी साखियों को चुना है, जो मुर्दे में भी जीवन का संचार कर देती हैं।

ग्रंथन माहीं अर्थ है, अर्थ माहिं है भूल।
लौ लागी निरभय भया, मिटि गया संसै सूल।।

हंसा बगुला एक सा, मानसरोवर माहिं।
बगा ढिंढौरे माछरी, हंसा मोती खांहि।।

सब आये उस एक में, डार पात फल फूल।
अब कहो पाछै क्या रह्या, गहि पकड़ा जब मूल।।

कबीर सभी के हैं। उनकी न कोई
जाति है, न कोई धर्म है। इसलिए सब
कबीर सब के हैं। कबीर ने हमेशा ‘सच’ का पक्ष लिया। सत्य ही उनकी नजर में सर्वश्रेष्ठ है- सर्वश्रेष्ठ साधन भी, परमसाध्य भी। इसी मायने में कबीर को मानने का अर्थ है सच को मानना।
जो सत्य की राह छोड़ पाखंड का सहारा लेता है, कबीर उसे फटकार देते हैं- कोई लिहाज नहीं करते। वह कोई भी क्यों न हो।

अपनी मस्ती में कबीर ऐसी वाणी भी बोलते हैं, जो है तो बिल्कुल साधारण लेकिन बनावटी आदमी की समझ में नहीं आती। क्योंकि वह संत की वाणी है। संसारी को वह अटपटी लगती है। उसे समझ पाता है, जो अध्यात्म की झलक ले पाता है, जो अध्यात्म की झलक ले चुका है।
सर्वसाधारण के हैं कबीर और विशेष के भी। तभी तो कबीर को जाग्रत गुरु कहा गया है।

कबीर वाणी अमृतसन्देश


सत्यपुरुष कबीर साहेब के साखी ग्रंथ से संग्रहित
अमृतमयी साखियों का अलौकिक संकलन


‘कबीर’ नाम उस पवित्रता एवं सत्यता का जिसकी शरण-सीमा में आने वाला हर जिज्ञासु ‘साधु’ हो जाता है।
यह नाम हिन्दी साहित्य में ही नहीं, प्रत्युत समूचे संत-साहित्य एवं कर्तृत्व दोनों ही महान हैं। विपरीत काल-परिस्थियों की परवाह न कर, जिस प्रकार उन्होंने सामाजिक कुरीतियों तथा आडम्बर-पाखंडों का निर्भीकता से विरोध किया, वह स्तुत्य है। आपसी मतभेद को मिटाकर सर्व-समानता के मानव को-धर्म को कबीर साहब ने पुष्ट किया। अज्ञान-जनित भ्रम का विध्वंस करने वाले और असत्य को रौंदकर घट-घट में सत्य का दिग्दर्शन कराने वाले उन सदगुरु, कबीर साहेब को उनके श्रद्धालु संत-भक्तों ने ‘सत्यपुरुष’ कहा।

मुमुक्षु-जनों के कल्याणर्थ ही कबीर साहेब का प्राकट्य हुआ। जल-कीचड़ से निर्लित कमल-पत्र की भांति, उनका जीवन संसारिक विषय-कामनाओं से मुक्त था। जीवन रूपी चादर को उन्होंने विवेक, वैराग्य रूपी यत्न से ओढ़कर अन्त तक मलिन नहीं होने दिया। प्रमाण के लिए उन्हीं के शब्दों में-‘‘ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया’’। इस चादर को छोड़ने पर उसके स्थान पर फूल ही मिले जो सबने आपस में बांट लिए।

कबीर साहेब की निष्पक्ष एवं न्याय-संगत वाणी उनके सत्यार्गत उनके सत्यज्ञान का मानव-मात्र के हितार्थ’ ‘अमृत सन्देश’ है, जिसके अन्तर्गत उनके सत्यज्ञान का प्रकाश मानवता के सभी पार्श्वों को प्रकाशित करता है। हर वाणी अद्वितीय तथा अनमोल है। अलग-अलग अध्यायों में विभाजित उनकी मंगलमयी साखियों को, मूल एवं सरलार्थ सहित ग्रन्थ रूप में प्रकशित करते हुए अत्यन्त खुशी हो रही है। हमें आशा ही नहीं, अटूट विश्वास है कि आप इससे अवश्य ही लाभान्वित होंगे।

-प्रकाशक

यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान
सीस दिए जो गुरू मिले, तो भी सस्ता जान।।
तीरथ न्हाये एक फल, साधु मिले फल चार।
सतगुरु मिलै अनेक फल, कहैं कबीर विचार।।
तिमिर गया रवि देखत, कुमति गई गुरुज्ञान।
सुमति गई अति लोभ से, भक्ति गई अभिमान।।
कबीर सब जग निरधना, धनवन्ता नहिं कोय।
धनवंता सोई जनिए, राम नाम धन होय।।

समर्पण


परम पूज्य सदगुरू कबीर साहेब के प्राकट्य धाम, लहरतारा धाम, लहरतारा, वाराणसी (उ.प्रदेश) के निर्माता एवं श्री कबीर धर्म स्थान खुरसिया (छत्तीसगढ) के कबीर पंथाचार्य, महाप्राण, विरक्त शिरोमणि, त्याग-मूर्ति, तपोनिष्ठ, आत्मलीन, सत्यलोक वाणी 1008 सदगुरू पं. श्री हजूर उदितनामा साहेब के श्री चरणों में, जिन्होंने जीवन भर दिशा-दिशाओं में कबीर साहेब के दिव्य अमृत सन्देश से जन-जन को संतृप्त किया।

एक परिचय


जन्म-5 जुलाई सन् 1949, ऊंचा गांव, त. कैराना, जिला मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश के एक सामान्य कबीरपंथी परिवार में। शिक्षा-पोषण में विशेष रूप से माँ का दुलार एवं शुभाशीष प्रमुख रहा। पिता श्री गिरिवर सिंह दूहन घरेलू तथा गांधी खादी आश्रम प्रतिष्ठित बुनकर रहे। पिता के विनम्र धार्मिक एवं उदार स्वभाव से प्रभावित होकर, धर्म के प्रति निष्ठा बाल्यकाल से ही बलवती रही।

कबीरपंथ के सुप्रसिद्ध सत्यलोकवासी पूज्य महन्त श्री रघवर दास जी साहेब (सीताराम बाजार दिल्ली एवं छपरौली उत्तर प्रदेश) कुल गुरू रहे। आप परिवार में स्व, पूज्य दादा आसाराम जी के पास प्रायः आते-जाते थे। आपके शुभ संयोग से बचपन में कबीरपंथी संस्कार मिला। इतना ही नहीं आप अपने आश्रम की सेवा में ले जाना चाहते थे, परन्तु दादा-दादी के आग्रह से ऐसा न हो सका। तो भी आपने परम स्नेह एवं आशीर्वचन की अज्ञातशक्ति पथ दर्शाती रही।
स्वयं श्रमिक रहे, अतः श्रमिकों जीवन से विशेष सहानुभूति। डी.सी. एम की स्व. भा. मि. पत्रिका के माननीय सम्पादक श्री रमेन्द्रनाथ बैनर्जी के सान्निध्य में लेखक के भरपूर प्रोत्साहन तथा शुभारम्भ। श्रम के गीत, लेख पत्रिकाओं में प्रकाशित। श्री सरस्वती साहित्य संस्थान के प्रमुख पूज्य श्री रामाश्रय पाठक जी, गुलाबसिंह स्वतंत्र तथा ज्ञानाचन्द्र ज्ञान आदि कवि मित्रों की साहित्यिक गोष्ठियों एवं कवि सम्मेलन में गद्य-पद्य की लगन फलती-फूलती रही। स्वत्रन्त्र विचारों के पक्षधर तथा लेखक में विशेष रुचि दर्शन, इतिहास, साहित्य के प्रेमी। ‘राजधानी कवि समाज’ के सदस्य। प्रकाशित-कबीर वाणी सत्य- ज्ञानामृत, अमृत संदेश।

कबीर प्राकट्य धाम लहरतारा (वाराणसी उत्तरप्रदेश) के निर्माता एवं श्री कबीर धर्म स्थान खरसिया (छत्तीसगढ) के कबीर पन्थाचार्य पं. श्री हजूर उदितनामा साहेब जी के शिष्य। परमात्मा-ज्ञान के जिज्ञासू। गुरू आदेशानुसार सेवा, सत्संग, भक्ति–भाव में रहते हुए ‘सत्यनाम’-ज्ञान’ के प्रचार में समर्पित। समता, सत्य, अहिंसा में विश्वास। मानव धर्म को नत–मस्तक।

--सत्यनाम--

सदगुरू कबीर साहेब के उपदेशों में ‘साखी’ का महत्त् अतुलनीय है। अन्धाकार जब गहन होता है, तो चिराग की आवश्यकता बढ़ जाती है। मनुष्य को भी जब यह आभास होता है कि मेरे जीवन पथ में भी गहन अंधेरा है, तो उसे पग-पग पर प्रकाश की जरूरत पड़ती है। यही वह मोड़ है, जहां हमें सदगुरू कबीर साहेब की वाणी से वह तेज प्रस्फुटित होता दिखाई पड़ता है।

साखी आंखि ज्ञान की, समुझ देख मन मांहि।
बिन साखी संसार का, झगड़ा छूटत नांहि।।

सदगुरु की वाणी ज्ञान की आँख है, यह आत्मसात करके ही जाना (समझा) जा सकता है। हमारे जीवन में संसार का ही झगड़ा नहीं, अपना भी झगड़ा हमें उलझाए रखता है, जिससे मुक्ति तभी संभव है जब ज्ञान रूपी दृष्टि की सृष्टि हो। विभिन्न उद्धरणों के माध्ययम से सद्गुरू कबीर साहेब मनुष्य को निर्मल एवं पवित्र बनने का उपदेश देते हैं।

ई जग जरते देखिया, अपनी-अपनी आग।
ऐसा कोई ना मिला, जासो रहिए लाग।।

यह साखी हमारे (वर्तमान) समाज में, व्यक्ति के रूपों को उजागर करती है। निरन्तर मनुष्य का गिरता हुआ स्वर अत्यधिक विचारणीय है। कंचन अपनी उपयोगिता सभी काल में सिद्ध करता है। सद्गुरु कबीर साहेब की वाणी भी हमारे जीवन में हर मोड़ पर सहारा देती है।

का रे बड़े कुल उपजे, जो रे बड़ी बुधि नाहि।
जैसा फूल उजारि का, मिथ्या लगि सरि जांहि।।

कभी-कभी मनुष्य मिथ्या अहंकार से अपने पतन को आमंत्रित करता है सभी दृष्टि से बड़ा हूं। धन से, पद से रूप से। ज्ञान के अभाव से यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होता।

कबीर गर्व न कीजिए, रंक न हंसिए कोय।
अजहुं नाव समुद्र में, ना जाने क्या होय।।

मनुष्य अपने अन्दर अनेक रूपों का जन्म होता देखता है। अच्छा है, मनुष्य इसका हकदार भी है, क्योंकि मानव जीवन एक अवसर है, किन्तु पूर्ण ज्ञानोदय के अभाव में वह अपने छोटे-छोटे दृश्यों मे ही उलझ जाता है और उसे ही अपना धन समझ बैठता है। सतगुरू कबीर साहेब आगे का रास्ता बताते हैं-

यह मन तो शीतल भया, जब उपजा ब्रह्म ज्ञान।
जेहि बसंदर जग जरे, सो पुनि उदक समान।।

इस प्रकार भारतीय जनमानस अनेक तत्त्ववेत्ताओं, मार्गदर्शक एवं सद्गुरुओं को, पढ़ता एवं सुनाता आया है। सदगुरू कबीर साहेब सबसे विलक्षण एवं अद्वितीय हैं। क्यों है इसका निर्णय सुधी पाठक स्वयं करेंगे ! सद्गुरू कबीर साहेब की एक प्रसिद्ध साखी आपके लिए उद्धत करके अपनी बातें इसी शुभ कामना के साथ समाप्त करता हूँ कि, सदगुरु कबीर साहेब को पढ़ने-सुनने एवं आत्मसात करने से पूर्व, हम अपने सभी बंधनो, से मुक्त हों, जो हमारे लिए सदगुरु की वाणी को अपनाने में बाधक हैं।

यहां ई सम्बल करिले, आगे विषई बाट।
स्वर्ग बिसाहन सब चले, जहां बनियां न हाट।।
जिन खोजा तिन पाईयां, गहरे पनी पैठ।
मैं बपुरी डूबन डरी, रही किनारे बैठ।।

श्री लालचन्द दुहन ‘जिज्ञासु’ जी कि पुस्तक ‘कबीर वाणी अमृत सन्देश’
जो कि ‘कबीर साखी ग्रंथ’ से सारगर्भित साखियां ग्रहण की गई हैं, उन साखियों के अर्थ को श्री लालचन्द दूहन ‘जिज्ञासु’ ने पूरे मनोयोग और अपनी अर्थ, चिन्तन-शक्ति के द्वारा सरल, सुबोध और भाव-पूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है। साखियों की अन्तरात्मा-रूप को सरल से सरल भावों का प्रतिपादन करते हुए पाठकों की चिन्तन-धारा से जोड़ दिया जाता है। साखियो के कठिन शब्दों के अर्थ को समझाने में किसी भी प्रकार की कमी नहीं की है। आपका हमेशा यही विचार रहा है कि साखियों के अर्थ को कम-से-कम पढ़ा हुआ पाठक भी सरलता से समझ सकें।

वैसे तो कबीर साहेब की वाणी के अर्थ को समझने में बड़ी कठिनाई होती है और आध्यात्मिक अर्थ को समझने में तो और भी ज्यादा, किन्तु, यदि टीकाकार कबीर साहेब की संकेतात्मक वाणियों को गहराई के साथ समझाता है, सोचता है और चिन्तन करता है, तो कठिन वाणी से नए से नए अर्थ का प्रतिपादन करना उसके लिए बिल्कुल सहज हो जाता है, तो इन साखियों की अन्तरात्मा को समझने में श्री दूहर ‘जिज्ञासु’ जी ने बहुत परिश्रम किया है और अपने भावों को अपनी टीका के साथ जोड़कर बहुत बड़ा उपकार किया है। मुझे आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है कि अपनी टीका का उत्तरोत्तर सम्मान और समादर होगा। पाठकगण अपने उदार हृदय से इस टीका को स्वीकार करते हुए आगे के लिए और भी टीका लिखने को उत्साहित करेंगे।

लोकोपकारता की दृष्टि से और वर्तमान समस्याओं को सरल-रूप से समाधान करने में सद्गुरु कबीर साहेब की वाणी आज भी प्रासंगिक है। आध्यात्मिक जगत में आन्तरिक चेतना को जगाने के लिए सद्गुरू कबीर सहेब ने अपनी साधनाओं का पूरा-पूरा लाभ प्रदान किया है। सदगुरू कबीर साहेब ने मानवीय शक्ति को जगाने के लिए लहरतारा धाम (वाराणसी, उत्तर प्रदेश) के परम पावन लहर तालाब के कमल-पत्र पर मानवीय शरीर को धारण किया क्योंकि मानव समाज को सत्य का परिचय कराना था, इसीलिए उन्होंने शरीर का सहारा लिया। और इस सत्य का परिचय कराने में पूरे कामयाब रहे हैं) इसी लहरतारा सदगुरु कबीर की प्राकट्य भूमि में बहुत बड़ा भव्य एवं दिव्य स्मारक बन चुका है। जो भी दर्शनार्थी दर्शनों का लाभ लेना चाहते है। प्रसन्नता पूर्वक आएं और मानव जीवन को सफल बनाते हुए सदगुरु कबीर साहेब की आध्यात्मिक चेतना के द्वारा उनकी आध्यात्मिक प्रगतिशील वाणियों का चिन्तन, मनन और स्वाध्याय का लाभ लें। इससे आन्तरिक आध्यात्मिक शान्ति के साथ-साथ सारा जीवन मंगलमय हो जाएगा।
पाठकगण ‘दूहन’ जी की टीका का अपने उदार हृदय से स्वाध्याय करें यहीं मंगल कामना है।

मुकुन्दमणि नाम साहेब
10-1-2001
इलाहाबाद कुम्भ मेला


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