पॉजिटिव थिंकिंग - जोगिन्दर सिंह Positive Thinking - Hindi book by - Joginder Singh
लोगों की राय

व्यवहारिक मार्गदर्शिका >> पॉजिटिव थिंकिंग

पॉजिटिव थिंकिंग

जोगिन्दर सिंह

प्रकाशक : फ्यूजन बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :255
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4813
आईएसबीएन :81-8419-018-2

Like this Hindi book 6 पाठकों को प्रिय

359 पाठक हैं

सफलता से आगे उत्कर्ष के लिए कोशिश करने और चोटी पर पहुंचने के लिए जिंदगी में हम सभी परिश्रम करते हैं। लेकिन ऐसा क्यों होता है कि कुछ ही टॉप पर पहुंच पाते हैं?

Positive Thinking

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

सोंचे, योजना बनाएं, काम में जुट जाएं और बस पा लें। यही सफलता का राज है। अगर आप विश्वास रखते हैं कि आप अच्छे हो सकते हैं और अच्छे हैं तो आप अच्छे ही होंगे। हममें से प्रत्येक के पास हर सुबह खुशियों व उम्मीदों का पैगाम आता है। हमारा अपने जीवन पर पूरा वश है। यह हमें ही तय करना है कि हम अपने जीवन में कितनी श्रेष्ठता का प्रदर्शन कर सकते हैं। यदि आप सच्चे मन से अच्छा बनना चाहते हैं तो अपने आप से संकल्प लें।

जीवन में कितनी भी कठिनाइयां व संघर्ष क्यों न आएं, एक सकारात्मक पहुँच बनाए रखें। इस पुस्तक में कुछ ऐसे ही मुद्दों पर ध्यान दिया गया है तथा उपाय सुझाए गए हैं, जो आपके लिए फायदेमंद साबित हो सकते हैं। यूं तो जीवन में सफल होने के कई तरीके हो सकते हैं लेकिन केन्द्रित हुए बिना, मेहनत किए बिना, और दृढ़ संकल्प के बिना तो इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती।

सफलता से आगे उत्कर्ष के लिए कोशिश करने और चोटी पर पहुंचने के लिए जिंदगी में हम सभी परिश्रम करते हैं। लेकिन ऐसा क्यों होता है कि कुछ ही टॉप पर पहुंच पाते हैं ? इसका एक सीधा-सा कारण तो यह है कि चोटी पर बहुत ज्यादा जगह नहीं होती। जिंदगी में सफलता हासिल करने के लिए बहुत-से कारकों यानी चीजों की जरूरत होती है जिनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है पॉजीटिव थिंकिंग और असफलताओं को स्वीकार करना।
जिंदगी में सफलता हासिल करने के सभी पहलुओं पर बारीकी से नजर डालती सभी के लिए समान रूप से उपयोगी पु्स्तक।

सफलता का एक खास चरण है, दूसरों में उत्साह व आत्मविश्वास का भाव जगाना व स्वयं भी इसे महसूस करना। आत्मविश्वास लोगों में नया साहस व बल पैदा कर, उन्हें कुछ करने की प्रेरणा देता है। वे कुछ ऐसा कर गुजरने की ठान लेते हैं जो तकरीबन नामुमकिन होता है। इसके लिए उन्हें पुरस्कृत करें या पीठ थपथपाएँ।
जीवन में कितनी भी कठिनाइयाँ व संघर्ष क्यों न आएँ, एक सकारात्मक पहुँच बनाए रखें। इस पुस्तक में कुछ ऐसे ही मुद्दों पर ध्यान दिया गया है तथा उपाय सुझाए गए हैं, जो आपके लिए फायदेमंद हो सकते हैं। यूँ तो जीवन में सफल होने के कई तरीके हो सकते हैं लेकिन केंद्रित हुए बिना, मेहनत किए बिना व दृढ़-संकल्प के बिना तो इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती।

भूमिका


सोचें योजना बनाएँ काम में जुट जाएँ और बस पा लें। यही सफलता का राज है। अगर आप विश्वास रखते हैं कि आप अच्छे हो सकते हैं और अच्छे हैं तो आप अच्छे ही होंगे। हममें से प्रत्येक के पास हर सुबह खुशियों व उम्मीदों का पैगाम आता है। हमारा अपने जीवन पर पूरा वश है। यह हमें ही तय करना है कि अपने जीवन में कितनी श्रेष्ठता का प्रदर्शन कर सकते हैं। यदि आप सच्चे मन से अच्छा बनना चाहते हैं तो स्वयं से संकल्प लें।
आपको दिन-प्रतिदिन किए जाने वाले कामों के बारे में पता होना चाहिए ताकि दीर्घकालीन उद्देश्यों व लंबे समय तक किए जाने वाले कामों पर भी ध्यान दे सकें। आपको अपना व अपनी संस्था का भविष्य बनाना हो तो वर्तमान पर केंद्रित हो जाएँ। आज आप जो भी करते हैं, उसका आपके कल से गहरा नाता है। आपको अपने काम व जीवन के लिए कुछ मूल्य, नैतिकता, संकल्प व मिशन लेकर आगे बढ़ना होगा।

कोई भी व्यक्ति अकेला कुछ नहीं कर सकता। हम चाहे कहीं भी क्यों न हों, एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं। आपका अपना प्रदर्शन व सफलता भी उस संस्था से संबंध रखते हैं, जिसके लिए आप काम करते हैं या जिसके आप मालिक हैं। जीवन और व्यवसाय की सबसे बड़ी योग्यता यही है कि आप दूसरों से मनचाहा काम करवा सकें उन्हें प्रभावित कर सकें। केवल एक ही बार सफल होना आवश्यक नहीं होता। आपको बार-बार जीतने की और चारों ओर बड़ी घटनाओं से घिरे रहने की आदत डालनी होगी।

आपको भूलना नहीं चाहिए कि किसी भी काम में चाहे टीम के नेता, कर्मचारी या नियोक्ता के रूप में लोग आपके लिए बहुत कीमत रखते हैं। अपने कार्यक्षेत्र को काम करने का उपयुक्त स्थान बनाएँ। दूसरों से वैर पालना, चुगलखोरी करना, अपर्याप्त संप्रेषण व अपशब्द कहना आदि बुरे प्रबंधन के लक्षण हैं जो आपकी बनी-बनाई छवि बिगाड़ सकते हैं। प्रत्येक व्यक्ति के पास सफलता तक जाने के लिए अपना ही तरीका होता है, हो सकता है कि राह में कई मुश्किलें व बाधाएँ आएँ लेकिन केवल वही टीम जीत पाती है जिसके सभी सदस्य कुशल खिलाड़ी होते हैं। बस छोटी सी बात है, सही स्थान पर सही लोगों से काम करवाएँ। दूसरों का नेतृत्व करने के लिए आपको पूरी लगन और मेहनत से काम करना होगा।
सफलता का एक खास चरण है, दूसरों में उत्साह व आत्मविश्वास का भाव जगाना व स्वयं भी इसे महसूस करना। आत्मविश्वास लोगों में नया साहस व बल पैदा कर, उन्हें कुछ करने की प्रेरणा देता है। वे कुछ ऐसा कर गुजरने की ठान लेते हैं जो तकरीबन नामुमकिन होता है। इसके लिए उन्हें पुरस्कृत करें व पीठ थपथपाएँ।

जीवन में कितनी भी कठिनाइयाँ व संघर्ष क्यों न आएँ, एक सकारात्मक पहुँच बनाए रखें। इस पुस्तक में कुछ ऐसे ही मुद्दों पर ध्यान दिया गया है तथा उपाय सुझाए गए हैं, जो आपके लिए फायदेमंद हो सकते हैं। यूं तो जीवन में सफल होने के कई तरीके हो सकते हैं लेकिन केंद्रित हुए बिना, मेहनत किए बिना व दृढ़ संकल्प के बिना तो इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती।
पुस्तक पढ़ें और मुझे इसके बारे में अपने सुझाव भेजें। आपके सुझावों का स्वागत रहेगा....

-जोगिन्दर सिंह
(आई.पी.एस.)
(सेवानिवृत्त)
(सी.बी.आई. के पूर्व निदेशक)

1
समय व लक्ष्य की परख


अगर हम जीवन से जरूरत से ज्यादा पाना चाहते हैं तो हमें अपने समय के बारे में थोड़ा सजग और सावधान होना होगा। हमें यह भी पता लगाना होगा कि जो काम हम कर रहे हैं, क्या उससे हमारे जीवन का मूल्य बढ़ता है या हमारी ऊर्जा ही नष्ट होती है ? काम करते समय हम जो गतिविधियाँ अपनाते हैं, वे भी हमारे लिए काफी मायने रखती हैं। हम सावधान रहें कि हम अपना खाली समय कैसे बिताते हैं। किस तरह के लोगों के साथ समय बिताते हैं, सामाजिक या व्यावसायिक कार्यक्रमों में कैसी बातें करते हैं या कैसी मीटिंगों में भाग लेते हैं।

हमें अपनी तकनीकों के प्रवाह को लगातार चलाए रखने के तरीके निकालने होंगे ताकि अनुत्पादक गतिविधियों, नकारात्मक बातचीत व बाधाओं पर रोक लग सके। पूरी सजगता से अपने समय का मूल्यांकन करके हम अपने अनुत्पादक गतिविधियों पर काबू पा सकते हैं। इसके बदले में हम ऐसे काम कर सकते हैं जिससे हमें आनंद मिलता है या निजी तथा व्यावसायिक रूप से विकास होता है।
सबसे खात बात तो यह है कि हम दूसरों को अपने समय पर शासन करने दें और अपनी जीवन दिशा स्वयं तय करें। बस इसी तरह हम निजी संतुष्टि व उपलब्धियों को बड़ी ऊँचाइयों तक पहुंच सकते हैं। मिसाल के तौरपर, मैं पिछले सप्ताह एक पंचतारा होटल में डिनर के लिए गया, इसकी मेजबानी एक निजी एयरलाइन कर रही थी। पूरी पार्टी में केवल पूर्व होम सैकेट्री ही मेरे जानकार थे। वे भी मेरी जैसी अवस्था में थे इसलिए हम दोनों साथ हो लिए और पार्टी में पैंतालीस मिनट तक साथ रहे। अनजाने चेहरों के बीच समय बिताना बड़ा मुश्किल हो जाता है। आपको चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान लानी पड़ती है जिनसे जबड़े दुखने लगते हैं।

पैंतालीस मिनट बाद मैं माफी माँग कर उठ गया और डिनर के लिए नहीं रुका। डिनर के लिए रुकने का मतलब था दो घंटे का लंबा इंतजार। वास्तव में, मैं सबसे देर से पहुँचा था और सबसे पहले वापिस जा रहा था।
इस तरह मुझे रात को सोने से एक घंटा पहले किताब पढ़ने का अवसर मिल गया। मैं जो भी कहता हूँ या करना चाहता हूँ, उससे पहले अंदाजा लगा लेता हूँ कि क्या मैं अपनी ऊर्जा, कुशलता व समय का बेहतर सदुपयोग कर सकता हूँ। यदि कोई काम इस पैमाने पर खरा नहीं उतरता तो मैं उसे नहीं करता या किसी दूसरे उपयोगी काम के साथ जोड़ लेता हूं। अपने व संस्था के उद्देश्य पाने के लिए आवश्यक है कि आप कुछ खास कामों पर केंद्रित रहें।

आप जो भी करें, आपके लक्ष्य की ओर ले जाने वाला होना चाहिए। मुझे मान लेना चाहिए कि पहले मैं ऐसे जाने-माने लोगों से मेल-जोल में काफी समय गंवाता था। जीवन में मुझे उन लोगों से दोबारा मिलने का अवसर तक नहीं मिला।
अपनी मंजिल तक पहुँचने के लिए आपको मंजिल और रास्ते का पता होना जरूरी है। आपकी नीतियाँ ऐसी हों जो आपको लक्ष्यों तक ले जाने में सहायक हो सकें। यदि आपकी कोई टीम है तो उसके सदस्यों को भी उत्पादक गतिविधियों में समय बिताना चाहिए। समय-समय पर अपनी कार्यक्षमता की जांच करते रहना चाहिए। कर्नाटक राज्य के बादर जिले के पुलिस चीफ या जिला सुपरिटेंडेंट के रूप में मैंने समय-समय पर अपने लिए काम करने वाले पुलिस अधिकारियों के ‘अपराध नियंत्रण प्रदर्शन’ के अभ्यास के मूल्यांकन का नियम बना रखा था। मैं प्रतिमाह एक सभा में उनके काम की जांच करता था। सी.बी.आई.डायरेक्टर में रूप में भी मैंने अपना यही अभ्यास जारी रखा। इससे मुझे पता चल जाता था कि संस्था में क्या चल रहा है और प्रत्येक व्यक्ति अपने काम व जिम्मेदारी के प्रति सजग है या नहीं ?

आज जो भी पाने की इच्छा रखते हों, निजी क्षमता की जांच भी महत्व रखती है। उद्देश्य प्राप्ति के लिए आपको अपनी दिनचर्या में फील गुड फैक्टर होना चाहिए यानी आपका हर दिन अच्छा व सार्थक होना चाहिए। समय-समय पर इसकी भी जांच करते रहें।
यदि अब भी आप अपनी इच्छा पूरी करने के लिए संघर्षरत हैं तो आपको अपने आपसे पूछना चाहिए कि क्या आपको अतिरिक्त जानकारी की जरूरत है, क्या आपके पास वांछित कौशल नहीं है या आपको अपनी समस्या को अलग नजरिए से देखना होगा ? संघर्ष से उबरें और रुकावटों की असली वजह पता लगाएँ ताकि आप भी आगे बढ़ सकें। जो भी लक्ष्य पाने के लिए जरूरी न हो, उससे छुटकारा पा लें, जो काम दूसरों को बांटे जा सकते हैं उन्हें कुशलतापूर्वक बांट दें और उसकी जिम्मेवारी से जुड़े रहें। केवल उन्हीं बातों पर स्वयं को केंद्रित करें जो केवल आप कर सकते हैं या जो आपके निजी या व्यावसायिक विकास में सहायक हों।

गलत बातों पर समय बिताने का अर्थ होगा कि आप उतना ही समय सही बातों पर लगाएँ ताकि मनचाहे नतीजे पा सकें। याद रखने के लिए आप खोए हुए समय को दोबारा नहीं पा सकते। आपको अपने समय का पूरा इस्तेमाल करना सीखना होगा।
कोई भी प्रत्येक क्षेत्र का विशेषज्ञ नहीं हो सकता। हर चीज में सिद्धहस्त होना कठिन है। इस तरह आप किसी भी काम में पूरा हुनर नहीं पा सकते। अपने समय का पूरा उपयोग करें। काम बाँटने की कला भी अच्छी नेतृत्व क्षमता व निजी क्षमता पर निर्भर करती है। काम सौंप देने के बाद उनपर नजर रखें, लेकिन हर समय की टोकाटाकी से दोनों पक्षों का ही समय नष्ट होता है।

अपने काम में श्रेष्ठता पाने के लिए आपको वर्तमान पर ही केंद्रित करना सीखना होगा। वर्तमान ही तो वास्तिवकता है। यहीं आप पहचान सकते हैं कि क्या आप अपने समय का पूरा उपयोग कर पा रहे हैं ? कल, परसों या अगले महीने क्या होगा, ऐसा विचार करने का अर्थ है, भविष्य की चिंता करना। याद रखें कि चिंता कभी आपका भला नहीं करती, यह आपके लिए तनाव की वजह बन जाती है।
यह आपको वर्तमान से हटाकर धुंधले भविष्य की ओर ले जाती है। इस तरह न तो भविष्य हाथ आता है और न वर्तमान। चिंता से बचने का एकमात्र तरीका है ‘व्यस्त रहें’। इस तरह चिंता के लिए समय ही नहीं मिलता। किसी भी क्षेत्र में योग्यता पाना चाहते हो तो आपको समय पर काबू करके वर्तमान में जीना होगा। यह हम पर ही निर्भर करता है कि हम समय को कैसे बिताते हैं या कैसे इसका निवेश करते हैं ?

लेकिन आप क्या करना चाहते हैं, इसके बारे में स्पष्टतः पता न होने पर आप अपने लक्ष्यों व उपलक्ष्यों को भूल सकते हैं। मैंने महसूस किया है कि जिन बातों को मैं लिख नहीं पाता, वे या तो भूल जाती हैं या नजरअंदाज हो जाती हैं। मेरी पत्नी ने मुझे पिछले सप्ताह कहा कि वह एक नई टेलीफोन डायरी शुरू करना चाहती है। मैंने कहा कि मैं बाजार से ला दूँगा। मैंने उसे लिस्ट में यह सोचकर शामिल नहीं किया कि मुझे याद रहेगा। मैंने एक स्टेशनरी की दुकान से एक फैक्स मशीन के लिए फैक्स रोल खऱीदा लेकिन मुझे डायरी खरीदना याद नहीं रहा। व्यावसायिक योजना की तरह रोजमर्रा के कामों की लिस्ट बनाना भी मायने रखता है। यह समय की बरबादी नहीं है। इससे काफी समय बचता है। जब आप इन बातों को कागज पर लिख देते हैं तो दूसरे जरूरी कामों के लिए दिमाग में काफी जगह बच जाती है। इस तरह आप जो भी करना चाहें, करना आसान हो जाता है फिर चाहे वह कोई भी निजी काम हो अथवा व्यावसायिक।

मैंने यह भी देखा कि यदि आप कुछ करने का फैसला कर लें तो काम करने के सहायक लोग, तरीके व साधन अपने-आपही सामने आ जाते हैं और आपको लक्ष्य तक पहुंचने में आसानी हो जाती है, यह जादुई तो लगता है लेकिन सच है। मेरे आठ साल पुलाने टेपरिकॉर्डर में कुछ खराबी आ गई। मैं नया खरीदना चाहता था लेकिन मुझे भरोसा नहीं था कि कुछ बेहतर मिल पाएगा या नहीं ? मेरे पास एक व्यक्ति अपनी परेशानी लेकर आया। बातों-बातों में उसने बताया कि वह एक टेप ऑडियो कंपनी में काम करता है। मैंने उससे पूछा कि मुझे कैसे पता चलेगा कि मैं बढ़िया चीज खरीद रहा हूं या नहीं ? वह मुझे एक ऐसे डीलर के पास ले गया जिसने मुझे बढ़िया सैट दिया।

अगर मैंने इस काम को अपनी लिस्ट में न लिखा होता तो मैं इसे भूल जाता और उस व्यक्ति से इस बारे में बात ही न कर पाता। इस तरह आप स्वयं से पूछ सकते हैं कि आपने आज कौन-कौन से काम करने हैं। इससे यह भी पता चल जाता है कि आपने बदलती जरूरतों के हिसाब से क्या योजना बनाई हैं ? यही नियम आपकी संस्थागत गतिविधियों, वित्तीय गतिविधियों, लक्ष्यों, संभावित, प्रतिभा, दैनिक व्यवसाय, निजी नीतियों व कार्यक्रमों पर भी लागू होता है।


2
उर्वर मस्तिष्क



अगर आपको अपने काम से प्यार होगा तो यह कभी भी आपको बोझ नहीं लगेगा और न ही आप ऐसा महसूस करेंगे कि आप काम कर रहे हैं।
औरनोल्ड टोनीबी कहते हैं-
‘‘काम और खेल के बीच एक अस्पष्ट रेखा खींचना ही सबसे बड़ा काम है।’’
निम्न सुझावों का पालन करके आप इस लक्ष्य को हकीकत में बदल सकते हैं।
सुबह समय पर उठकर काम पर जाने की आदत का पूरा आनंद लें। अगर आपको लगता है कि आप फालतू मेहनत नहीं कर पा रहे तो अपनी ऊर्जा का स्तर व रवैया जांच लें। उन चीजों की सूची बना लें जिनसे आपको थकावट होती है और ऊर्जा मिलती है। क्या यह कोई काम करने का ढंग है, क्या यह कोई व्यक्ति है या कोई ऐसी घटना है जिससे इस तरह की भावना पैदा होती है। अगर आप अपने जीवन से संतुष्ट नहीं है तो उसका आधार निश्चित करें। क्या यह अप्रसन्नता, खराब नौकरी, बुरे बॉस, सहकर्मी, अधीनस्थ या किसी और वजह से हैं ?

भारत में अब भी नियोक्ता की चलती है। ज्यादातर लोगों को वही काम करना पड़ता है, जो उन्हें दिया जाता है इसलिए उन्हें बुरे से बुरे हालात में भी सुधार लाना पड़ता है। साथ ही आपको यह भी जांचना चाहिए कि क्या आपकी योग्यता या निपुणता, नए जमानों की तकनीकों से मेल खाती है अथवा नहीं ? मिसाल के तौर पर जब भारत में कंप्यूटर आए तो मैंने काफी समय तक अपने आपको इससे दूर ही रखा। एक कारण तो यही था कि उन दिनों कंप्यूटर बहुत बड़े और जटिल थे, उन्हें चलाना भी आसान नहीं था। फाइलें खोलने में भी काफी समय लगता था लेकिन एक बार कंप्यूटर चलाना सीखने के बाद मैं उनका पक्का हिमायती बन गया।
मुझे इसी बात का पछतावा रहा कि मैं काम करने के इतने निपुण तरीके से तीन वर्षों तक दूर क्यों रहा ? लेकिन अब मैं स्वयं को यह कहकर तसल्ली दे लेता हूँ-
‘‘देर आए दुरुस्त आए’’

कंप्यूटर में रुचि होने के बाद मैंने सी.बी.आई.और अपने से जुड़ी अन्य संस्थाओं को भी कंप्यूटराइज करने का मन बना लिया। कई बार किसी नए काम को सीखना थोड़ा मुश्किल हो सकता है लेकिन आपको अपना धैर्य बनाए रखना चाहिए। यह आपके हुनर को निखारने के लिए बहुत मायने रखता है। एक योग्य व कुशल व्यक्ति कभी बेरोजगार नहीं रह सकता। वह अपनी सेवाओं के बदले उचित धनराशि की माँग कर सकता है।
विश्लेषण करें कि आपकी ताकत व कमजोरी आपकी रुचियों को प्रभावित कर रही हैं ? अपनी शक्ति को उच्चतम सीमा तक ले जाते हुए अपनी संस्था को बेहतर सेवाएँ देने की कोशिश करें। इससे आपके आत्म सम्मान में भी वृद्धि होगी। आप अपनी योग्यताओं के साथ अगले ऊंचे पद के लिए सक्षम हो जाएँगे।

आप जीवन में जो भी चाहते हों उसके लिए स्पष्ट लक्ष्य तय करें और उस क्षेत्र से जुड़ी जानकारी व निपुणता प्राप्त करें। इसके साथ ही आपको अपना सामाजिक और व्यावसायिक दायरा भी बढ़ाना होगा। केवल आप ही अपने कैरियर की जिम्मेवारी ले सकते हैं। सभी विकल्पों को जांचने के बाद उनमें से बेहतर को चुनें।
तय करें कि आपको क्या चाहिए, फिर उसके लिए प्रयत्नशील हो जाएँ। निश्चित कर लें कि आपका रवैया आपके कैरियर के अनुरूप ही हो। प्रत्येक दिन को जीवन यात्रा का अगला कदम मानना चाहिए। अवसर हमेशा आपके दरवाजे पर आते हैं। बस उन्हें पहचान कर अपनाना पड़ता है।

यदि आप बदलाव के लिए भी तैयार हैं तो आप काफी किस्मत वाले हैं क्योंकि इस यात्रा में चुनौतियों व बदलावों का सामना करना पड़ सकता है। हम जीवन में जो कुछ भी करते हैं, वह हमारे व्यक्तित्व को निखारने में सहायक होता है। किसी भी कार्यक्रम में निरंतरता एक खास बिंदु है, फिर चाहे वह जीवन का कोई भी क्षेत्र क्यों न हो।
पूरे 36 साल तक पुलिस वाला होने के नाते मैंने शारीरिक फिटनेस व सेहत का पूरा ध्यान दिया। एक वो भी समय था जब मुझे अपने लिए 5 कि.मी.की जॉगिंग भी कम लगती थी अब मैं बढ़ती उम्र की वजह से चहलकदमी से ही संतुष्ट हो जाता हूँ। लेकिन एक दिन सैर का कार्यक्रम स्थगित करने पर, मुझे अपने लक्ष्य तक पहुंचने में दोबारा तीन दिन लग जाते हैं।
ऐसा ही आपके साथ व्यवसाय में भी होता है। यदि आप अपने काम को कुछ समय के लिए उपेक्षित कर देते हैं तो उसे सही ढर्रे पर आने में सप्ताह व महीनों का समय लग जाता है। यही वजह है कि छोटे व्यवसायी चाह कर भी ज्यादा छुट्टियाँ नहीं ले पाते।

सफलता पाने के लिए कोई भी काम करो, लगातार करो। मेरा एक कजिन भाई, यू.एस.ए. में डॉक्टर है, वह स्वयं ही भारत लौट आया। कारण पूछने पर उसने बताया कि वह कई-कई सप्ताह तक क्लीनिक बंद ही नहीं कर पाता क्योंकि क्लीनिक बंद देखकर ग्राहक टूट कर दूसरी जगह चले जाएँगे और उसकी आय घट जाएगी।
यदि आप शारीरिक रूप से फिट न हों तो लगातार काम करते रहें। मनुष्य होने के नाते हम संपूर्ण नहीं हो सकते। इसलिए हमें कई बार लगने लगता है कि हमें सफलता नहीं मिल रही। एंथोनी रॉविन कहते हैं-
‘‘कई बार हमें लगता है कि हम जिंदगी की बाजी हार रहे हैं, जबकि हम जीत रहे होते हैं, ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम स्कोर पर ध्यान नहीं दे पाते।’’

निरुत्साहित होते ही आप आसानी से भूल सकते हैं कि हमने कहाँ से कौन सी उपलब्धि पाई है ? इसलिए आगे बढ़ते-बढ़ते एक बार पीछे मुड़कर यह भी देख लेना चाहिए कि हमने क्या-क्या हासिल कर लिया है।
जीवन से आप जो भी पा चुके हों, उसे एक कागज पर लिखें, लिखें कि बाधाओं के बावजूद आप क्या-क्या पाने में सफल रहे। हम सबकी ऐसी कोई न कोई उपलब्धि अवश्य होती है जिसकी तुलना सबसे श्रेष्ठ से की जा सकती है।
मेरे स्वर्गीय पिता महंत करतार सिंह मैट्रिक पास थे। उन्होंने सन् 1935 में दसवीं कक्षा पास की थी। वह अपने बच्चों को खूब पढ़ाना-लिखाना चाहते थे ताकि वे जीवन में कुछ बन सकें। यह बहुत मुश्किल था लेकिन मेरे माता-पिता ने फिरोजपुर में मेरी हाई-स्कूल की पढ़ाई के लिए प्रतिमाह बीस रुपये निकाले। ऐसा दो साल तक चला। फिर 1953 से 1955 तक उन्हें मेरी कॉलेज की शिक्षा के लिए प्रतिमाह 125 रुपये निकालने पड़े।







अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book