सिकुड़ता हुआ ब्रह्मांड - तपन भट्टाचार्य Sikudta Hua Bramhand - Hindi book by - Tapan Bhattacharya
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सिकुड़ता हुआ ब्रह्मांड

तपन भट्टाचार्य

प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :133
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4833
आईएसबीएन :81-237-3862-5

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संचार के विभिन्न माध्यमों का वर्णन....

Sikudta Hua Bramhand

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

संचार के क्षेत्र में आज जिन शब्दों की गूँज है वे हैं कंप्यूटर, आई.टी. और इंटरनेट। लेकिन हमें एक-दूसरे के साथ संचार स्थापित करने की आवश्यकता ही क्या है ? सूचना प्रौद्योगिकी क्या है, इंटरनेट क्या है और हम इसे लेकर इतने रोमांचित क्यों हैं ? क्या इस सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति का सभी लोग समान रूप से स्वागत करते हैं ? क्या इस क्रांति के कारण हमारा ब्रह्मांड वास्तव में सिकुड़ रहा है ? इस सरल-सी पुस्तक में इन्हीं और इनसे मिलते-जुलते प्रश्नों पर चर्चा की गयी है और उनके उत्तर दिए गए हैं। यह पुस्तक ऐसे शिक्षित आम लोगों के लिए लिखी गयी है जिनके पास विज्ञान की अधिक पृष्ठभूमि तो नहीं है परंतु खोजी मस्तिष्क अवश्य है।
डॉ. तपन भट्टाचार्य (जन्म 1936) ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नाकोत्तर (प्रौद्योगिकी) और इलिनायस इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, शिकागो से डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त की है। उन्होंने भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र में विभिन्न ठोस अवस्था इलेक्ट्रॉनिक पदार्थों और युक्तियों का व्यापक अनुभव प्राप्त किया है। शोध-पत्रों और रिपोर्टों के अतिरिक्त उन्होंने सोलर पी.वी.सिस्टम डिजाइन इन इंडिया पर तीन खंडों में एक मोनाग्राफ और हिज मास्टर्स स्लेव तथा स्विच ऑन दि सन नामक विज्ञान की दो लोकप्रिय पुस्तकें लिखी हैं।
पुस्तक के अनुवादक विजय कुमार श्रीवास्तव का हिंदी में विज्ञान-लेखन के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण स्थान है।

1
कोई भी व्यक्ति द्वीप नहीं है

धावक दौड़ रहा है
रात के सन्नाटे में घंटियां घनघना रही हैं।
थैला भरकर खबरों के साथ, धावक दौड़ रहा है
अंधेरे रास्तों पर, सारी बाधाओं को पार करते हुए।
क्षितिज से क्षितिज तक धावक दौड़ रहा है
क्योंकि उस पर जिम्मेदारी है ताजी खबरें पहुंचाने की।

ये ‘दि रनर’ कविता की मुक्त रूप से रूपांतरित कुछ प्रारंभिक पंक्तियां हैं। कुछ दशक पूर्व एक युवा बंगाली कवि सुकांतो भट्टाचार्य ने इन पंक्तियों को रचा था। इस कविता में बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने में गांव के डाकिये या हरकारे (धावक) की जो दशा और दुर्दशा होती थी उसका विविधापूर्ण वर्णन किया गया है। दूसरों तक समय से ताजी सूचनाएं (डाक) उपलब्ध कराना उसका कर्तव्य था।
सामयिक जानकारी एकत्र करके उसका वितरण करना किसी भी मानव समाज का आवश्यक अंग है। भारत जैसे देशों में जहां सब जगह परिवहन के साधन उपलब्ध नहीं थे, वहां बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दिनों में गांव का डाकिया डाक प्रणाली का एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटक था। यहां तक कि आज भी नजदीकी कस्बे से काफी दूर स्थित गांवों और बस्तियों में सप्ताह अथवा कभी-कभी महीने में एक बार डाकिये को चिट्ठियां लेकर आते देखा जा सकता है। हां, आधुनिक डाकिया दौड़ता तो नहीं है, परंतु वह चिर-प्रतीक्षित सूचनाएं और खबरें साइकिल पर अथवा पैदल चलकर लाता है। दूर-दराज के क्षेत्रों में अभी भी बहुत से लोग डाकिये के आगमन की उत्सुकता से प्रतीक्षा करते हैं।

संचार स्थापित करना सीखना

हालांकि भारत जैसे अनेक देशों में पोस्ट आफिस (डाकघर) अभी भी सूचना वितरण प्रणाली का एक महत्वपूर्ण और आवश्यक अंग है, परंतु सूचना का प्रसार पोस्ट आफिस से प्रारंभ नहीं हुआ था। लोग आपस में अपने प्रेम, दुख, क्रोध, खुशी और प्रसन्नता की अभिव्यक्ति तथा कई अन्य रूपों में सूचनाओं का आदान-प्रदान करना चाहते हैं। बोले जाने वाले शब्दों अथवा भाषा के उपयोग से पूर्व प्रागैतिहासिक काल के लोग धुएं के संकेतों से अथवा नगाड़े बजाकर एक-दूसरे के साथ संचार स्थापित करते थे। जब वे एक-दूसरे से मिलते थे तब सांकेतिक भाषा में एक-दूसरे से संचार स्थापित करते थे। इतिहास में प्रमाण मौजूद हैं कि ईसा मसीह के जन्म से 3500 से भी अधिक वर्ष पूर्व लोगों ने एक प्रकार की भाषा का उपयोग करके एक-दूसरे के साथ संचार स्थापित करना प्रारंभ कर दिया था। इस भाषा में वे अपने मुंह से अनेक प्रकार की ध्वनियां उत्पन्न करते थे, जिसमें सुनने वाले के लिए विशिष्ट संदेश होते थे। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि ईसा से 5000 वर्ष पूर्व भी समझ में आने वाली भाषा का उपयोग होने लगा था। यह स्पष्ट है कि प्रागैतिहासिक काल के लोग केवल बोलचाल की भाषा का प्रयोग करके एक-दूसरे के साथ संचार स्थापित करके संतुष्ट नहीं थे, बल्कि वे अपने वंशजों के लिए इससे कुछ बेहतर चाहते थे। ईसा से 3500 वर्ष पूर्व तक मेसोपोटामिया में लेखन के प्राचीनतम ज्ञात रूप का उपयोग होने लगा था। इसे क्यूनीफार्म के नाम से जाना जाता है।

मेसोपोटामिया वह स्थान है जहां आजकल ईराक स्थित है। पता चला है कि इसमें लगभग 1300 वर्ष पूर्व सचित्र लेखन का उपयोग होने लगा था, जिसमें प्रत्येक चित्र से एक वस्तु/विषय का वर्णन करने का प्रयास होता था। वर्णमाला का प्रयोग इसके काफी बाद प्रारंभ हुआ। प्राचीन मिस्र के राजाओं और फराओं के पिरामिडों और गुंबदों में लेखन के एक काफी परिपक्व स्वरूप की खोज की गयी है। ईसा से 600 वर्ष पूर्व आज की वर्णमाला का उपयोग करके लिखी जाने वाली लिपि से मिलती-जुलती चित्रलिपि का उपयोग होने की जानकारी प्राप्त हुई है। इसके 500 वर्ष बाद टीरो ने एक प्रकार की आशुलिपि का आविष्कार किया, जिसका रोम में राजाओं, सम्राटों और पुरोहितों के व्याख्यानों को लिपिबद्ध करने में उपयोग किया जाता था। रोम में ही उसे सिखाया भी जाता था। सूचनाओं के प्रसार की ये सभी आरंभिक लिपियां बाद के इतिहासवेत्ताओं तथा अनुसंधानकर्ताओं के लिए काफी बहुमूल्य साबित हुईं।
लेखन के माध्यम के रूप में लिखने के प्रारंभिक रूपों में मुख्य रूप से सूखी और संभवतया पकाई गई मिट्टी की टिकियों का प्रयोग किया जाता था। प्राचीन मिस्र में लेखन के माध्यम के रूप में पपीरस (श्रीपत्र के डंठलों से बना कागज) का उपयोग किया जाता था। ‘पेपर’ (कागज) शब्द की उत्पत्ति पपीरस से हुई है; तथापि लिखने के सबसे आम ज्ञात माध्यम ‘पेपर’ (कागज) का आविष्कार चीन में पहली शताब्दी में हुआ। इसके पश्चात् पहली लिखित पुस्तक के आने में 200 वर्ष और लगे परंतु यह पुस्तक कागज पर नहीं बल्कि पर्चमेंट पर लिखी गई, जिसे आमतौर पर जानवरों की चमड़ी से तैयार किया जाता था। रोमन कैथोलिक ईसाई धर्म के केंद्र वैटिकन के पुस्तकालय में सन् 350 में तुर्की भाषा में हाथ से लिखी गयी अब तक की ज्ञात सबसे प्राचीन बाइबिल रखी है। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वर्तमान समय में हुई क्रांति और कंप्यूटर में प्रयुक्त होने वाली ‘कंपैक्ट डिस्क’ के कारण इस हस्तलिखित बाइबिल के प्रत्येक पृष्ठ को आप कंप्यूटर की स्क्रीन पर देख सकते हैं।
हालांकि अगली सहस्त्राब्दि (हजार वर्ष) तक हस्तलिखित पठन सामग्री, चित्रों तथा अन्य पदार्थों के लिए कागज का उपयोग किया जाता रहा, परंतु कागज पर पहली पुस्तक का मुद्रण अंग्रेजी भाषा में सन् 1476 में हो पाया। इसके केवल 25 वर्ष पूर्व सन् 1450 में इंग्लैंड में कागज का सबसे पहला कारखाना लगाया गया। इन दो विकासों से हैंडबिलों, पैम्फलेटों, पुस्तिकाओं, पुस्तकों तथा सूचना प्रसार के सभी संबद्ध रूपों के माध्यम द्वारा जन संचार माध्यमों में अभूतपूर्व वृद्धि प्रारंभ हुई। जैसा कि हम बाद में चर्चा करेंगे, मुद्रित रूप में प्राचीनतम पुस्तकें-500 वर्ष से भी अधिक पुरानी-अब पूर्ण रूप से कंपैक्ट डिस्कों में उपलब्ध हैं।

सिमटती हुई भौगोलिक दूरी

व्याख्यान, लिखित सामग्री और कागज सहित विभिन्न पदार्थों पर बनाये गये चित्र निस्संदेह रूप से लोगों-से-लोगों के बीच संचार विकसित करने के मौलिक घटक थे। परंतु ये सभी स्वयं में पर्याप्त नहीं थे। दूसरों तक दक्षतापूर्वक तथा तेजी से लोगों के संदेश और सूचनाएं ले जाने के लिए अन्य कार्यक्षम माध्यमों की अत्याधिक आवश्यकता थी। पहले एक-दूसरे से काफी दूर बसे लोगों के लिए सूचनाओं/संदेशों के आदान-प्रदान की कोई आवश्यकता नहीं होती थी, क्योंकि वे एक-दूसरे को जानते ही नहीं थे। परंतु जैसे-जैसे साहसिक लोगों और खोज-यात्राओं पर जाने वाले व्यक्ति दूर-दराज की यात्राएं करने लगे, सुदूर क्षेत्रों में बसे लोगों के बीच संचार स्थापित करने की आवश्यकता उत्पन्न होने लगी। बोलचाल और लेखन से एक-दूसरे के निकट बसे लोग ही आपस में संपर्क रख सकते थे। परंतु अधिक दूर बसे लोगों के बीच इससे संचार स्थापित नहीं हो पाता था।


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