लफ्जों की घटाएँ - बेकल उत्साही Lafzon ki Ghatayein - Hindi book by - Bekal Utsahi
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लफ्जों की घटाएँ

बेकल उत्साही

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :159
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4843
आईएसबीएन :81-288-1026-x

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बेकल उत्साही की दिलकश गजलों का श्रेष्ठतम और संग्रहणीय संकलन...

Lafzon ki Ghatayein

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

बेकल उत्साही समकालीन उर्दू शायरी के बेहद लोकप्रिय और चर्चित शायर हैं।
भारतीय संस्कृति में रची-बसी और विशेष रूप से गाँव के आंचलिक परिवेश में ढली उनकी शायरी अपनी भाषा की सादगी के कारण भी आम भारतीय पाठकों और श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करती हुई अपनी ओर आकर्षित करती हैं। शायद इसीलिए हिन्दी काव्य-मंचों पर भी उन्हें उतना ही आदर और सम्मान प्राप्त है, जितना मुशायरों में।
बेकल उत्साही की दिलकश गजलों का श्रेष्ठतम और संग्रहणीय संकलन।

प्राक्कथन

बेकल उत्साही समकालीन उर्दू शायरी के बेहद लोकप्रिय और चर्चित लेखक शायर हैं। काव्य की प्रत्येक विधा में उन्होंने भाषा और छन्दों की दृष्टि से अभिनव और उल्लेखनीय प्रयोग किये हैं। पिछले पाँच दशकों से वे मुशायरों के मुमताज शायर हैं। अपनी आयु की आठ दहाइयाँ पार कर चुके बेकल उत्साही आज भी काव्य रचना में सक्रिय हैं और काव्य-मंचों पर अपनी गरिमामयी उपस्थिति से श्रोताओं के लिए आकर्षण का केन्द्र बने हुए हैं। भारतीय संस्कृति में रची-बसी और विशेष रूप से अवध के आंचलिक परिवेश में ढली उनकी शायरी अपनी भाषा की सादगी के कारण भी आम भारतीय पाठकों और श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करती हुई, अपनी ओर आकर्षित करती है। शायद इसीलिए हिन्दी काव्य-मंचों पर भी उन्हें उतना ही आदर और सम्मान प्राप्त है, जितना मुशायरों में।

उर्दू ग़ज़ल और हिन्दी गीत की विशिष्टताओं को एक दूसरे में समो देने के कारण उनकी ग़ज़ल में या गीत में जो आंचलिकता और नयापन पैदा हुआ है, उससे बेशक उर्दू ग़ज़ल की परम्परागत दिशा में कुछ विचलन आया हो, लेकिन उर्दू शायरी को उनका ये योगदान ही है कि गाँव और लोकजीवन की दैनिक छवियाँ उर्दू शायरी में इस तरह पहले कभी नहीं देखी गयीं। आलोचक कुछ भी कहें, लेकिन बेकलं उत्साही स्वयं अपने इन नये प्रयोगों से संतुष्ट हैं।

गीत में हुस्न-ए-ग़ज़ल, ग़ज़लों में गीतों का मिज़ाज
तुझको बेकल तेरा उस्लूब-ए-सुख़न अच्छा लगा

व्यावसायिकता और बाज़ारवाद के दवाब के कारण मुशायरे और कवि सम्मेलन भी आज जिस स्तरहीनता और फूहड़पन के शिकार हो चुकें हैं, वह निश्चित रूप से साहित्य जगत के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। फिर भी ऐसे विषम वातावरण में बेकल उत्साही जिस लगन और आस्था से मंचों पर साहित्यिकता का दीप प्रज्जवलित किये हुए हैं, वह प्रसंशनीय है। काव्य-मंचों की चकाचौंध ने उन्हें कभी विचलित नहीं होने दिया है। शायरी की विभिन्न विधाओं की लगभग एक दर्जन पुस्तकों का उन्होंने प्रणयन किया है। एक साहित्यिकार की गरिमा को उन्होंने सदैव बचा कर रखा है।
बेकल उत्साही की शायरी में भारतीय जनमानस जिस तरह मूर्तिमान हो उठा है, उसके उदाहरण बहुत कम ही देखने में आते हैं।
अब न गेहूँ न धान बोते हैं
अपनी क़िस्मत किसान बोते हैं

गाँव की खेतियाँ उजाड़ के हम
शहर जाकर मकान बोते हैं

उर्दू के जाने-माने समीक्षक प्रो.अबुल कलाम कासमी ने ठीक ही कहा है-‘‘बेकल साहब ने अपनी ग़ज़लों में जिस तरह सिन्फ़-ए-ग़ज़ल की रायज़ लफ़्जियात के बजाय अवामी कहावतों और लोक रवायतों से लफ़्ज़ियात और तर्कीब कशीद की हैं, उनको बेकल साहब की इन्फ़रादियत के तौर पर भी देखा जा सकता है और ख़ुद ग़ज़ल के नये लहजे की पहचान के तौर पर भी’’
‘लफ़्ज़ों की घटाएँ’ बेकल उत्साही की ग़ज़लों का हिन्दी में ऐसा पहला और प्रतिनिधि संकलन है, जो उनकी काव्य-यात्रा की न सिर्फ़ शनाख़्त करता है बल्कि उर्दू ग़ज़ल के उनके नये लहजे से भी पाठकों को परिचित करने की सामर्थ्य रखता है। बहरहाल प्रयास कितना सफल हुआ है, इसका अंतिम निर्णय तो पाठकों को ही करना है।
सुरेश कुमार

(1)

जब दिल ने तड़पना छोड़ दिया
जलवों ने मचलना छोड़ दिया

पोशाक बहारों ने बदली
फूलों ने महकना छोड़ दिया

पिंजरे की सम्त1 चले पंछी
शाख़ों ने लचकना छोड़ दिया

कुछ अबके हुई बरसात ऐसी
खेतों ने लहकना छोड़ दिया

जब से वो समन्दर पार गया
गोरी ने सँवरना छोड़ दिया

बाहर की कमाई ने बेकल
अब गाँव में बसना छोड़ दिया

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1.ओर।

(2)

ज़िन्दगी जब भी कभी ग़म के बसेरों में मिली
रोशनी और भी गम्भीर अँधेरों में मिली

लोग लुट-लुट के भी मानूस-ए-तबाही न हुए
इक इसी बात की तशवीश1 लुटेरों में मिली

वो जो ज़िंदाँ2 में मिला करती थी बेबाकी से
वो हवा आज पशेमाँ-सी3 बसेरों में मिली

राह जो जाती थी मुख़्तारों के महलों की तरफ़
वही मजबूरों के उजड़े हुए डेरों में मिली

पासबानो4 ! ये नवाज़िश5 ये करम खूब मगर
वो तवाज़ो’ जो सर-ए-राह लुटेरों में मिली

रोज़ मिलती थी अजल6 तर्क-ए-तअल्लुक़7 के तफ़ील
रब्त के बाद ये ज़ालिम कई फेरों में मिली

मिल गया वक़्त को क़त्ल-ए-शब-ए-हिजराँ8 का सुराग़
शाम-ए-ग़म जब भी मसर्रत9 के सवेरों में मिली

नागिनें लफ़्ज-ओ-तरन्नुम10 की उसे डस ही गयी
नग़्मगी11 जो मेरे गीतों के सपेरों में मिली

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1.चिन्ता। 2.कारागार। 3.लज्जित-सी। 4.द्वारपालों। 5.कृपा। 6.मृत्यु। 7.सम्बन्ध विच्छेद। 8.वियोग की रात्रि का वध। 9.आनन्द। 10.शब्द और गेयता। 11.गीतात्मकता।

(3)

हम को यूँ ही प्यासा छोड़
सामने चढ़ता दरिया छोड़

जीवन का क्या करना मोल
महँगा ले-ले, सस्ता छोड़

अपने बिखरे रूप समेट
अब टूटा आईना छोड़

चलने वाले रौंद न दें
पीछे डगर में रुकना छोड़

हो जायेगा छोटा क़द
ऊँचाई पर चढ़ना छोड़

हमने चलना सीख लिया
यार हमारा रस्ता छोड़

ग़ज़लें सब आसेबी1 हैं
तनहाई में पढ़ना छोड़

दीवानों का हाल न पूछ
बाहर आजा परदा छोड़

बेकल अपने गाँव में बैठ
शहरों-शहरों बिकना छोड़

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1.प्रेतबाधा युक्त।

(4)

सुनहरी सरज़मीं मेरी, रुपहला आसमाँ मेरा
मगर अब तक नहीं समझा, ठिकाना है कहाँ मेरा

किसी बस्ती को जब जलते हुए देखा तो ये सोचा
मैं खुद ही जल रहा हूँ और फैला है धुआँ मेरा

सुकूँ पाएँ चमन वाले हर इक घर रोशनी पहुँचे
मुझे अच्छा लगेगा तुम जला दो आशियाँ मेरा

बचाकर रख उसे मंज़िल से पहले रूठने वाले
तुझे रस्ता दिखायेगा गुबार-ए-कारवाँ1 मेरा

पड़ेगा वक़्त जब मेरी दुआएँ काम आयेंगी
अभी कुछ तल्ख़ लगता है ये अन्दाज़-ए-बयाँ मेरा

कहीं बारूद फूलों में, कहीं शोले शिगूफ़ों2 में
ख़ुदा महफ़ूज़ रक्खे, है यही जन्नत निशाँ मेरा

मैं जब लौटा तो कोई और ही आबाद था बेकल
मैं इक रमता हुआ जोगी, नहीं कोई मकाँ मेरा

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1.यात्री-दल की धूल। 2.कलियों।

(5)

जब से तुम हर नज़र में सजीले हुए
शहर के सारे मंज़र कटीले हुए

पत्ते-पत्ते चमन के नुकीले हुए
फूल शायद ख़िज़ाँ के वसीले1 हुए

तेरे गदराये होंटों को चूमता था
मेरे गीतों के लहजे रसीले हुए

मैंने वशधर लिखा था क़लम चूमकर
फिर मिरे होंट भी नीले-नीले हुए

तेरी यादों के बादल तो बरसे नहीं
कैसे तनहाई के़ अंग गीले हुए

जितनी नाज़ुकमिज़ाजी तुम्हारी बढ़ी
उतने ही तुम मिज़ाजन2 हटीले हुए

अपने अन्दर सदा टूटते ही रहे
वो जो बाहर से यारो लचीले हुए

शहर का इक बड़ा आदमी कट गया
उसकी बेटी के भी हाथ पीले हुए

मैं ग़रीबी के नश्शे में बेकल हुआ
कैसे हालात घर के नशीले हुए

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1.माध्यम, साधन। 2.स्वभावतः।

(6)

उठ गये दौर-ए-जाम से पहले
तश्नालब1 फ़ैज़-ए-आम2 से पहले

इब्तिदा कर रहा हूँ जीने की
ऐ अजल तेरे नाम से पहले

ज़िन्दगी तल्ख़काम थी कितनी
रक़्स-ए-मीना-ओ-जाम3 से पहले

हर निज़ाम-ए-हयात4 बातिल5 था
मैकदे के निज़ाम से पहले

हश्र का था किसे यक़ीं कितना
हुस्न-ए-महशर-ख़िराम6 से पहले

इतनी रंगी थी कब ग़ज़ल बेकल
असग़र-ए-ख़ुशकलाम7 से पहले

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1.प्यासे लोग। 2.सामान्य कृपा। 3.मदिरा-पात्रों का नृत्य। 4.जीवन-व्यवस्था। 5.असत्य। 6.धीमी चाल वाली महाप्रलय का सौन्दर्य। 7.मधुरभाषी कवि असग़र।

(7)

लोग समझते हैं कि मैंने पी ली है
आब-ओ-हवा ही घर की मिरे नशीली है

सड़कों पर लौ तेज़ आग के शोलों-सी
घर के भीतर बात-चीत बर्फ़ीली है

क्या बरसेंगे बादल सिर्फ़ गरजते हैं
दानिशवर1 कहते हैं रुत पथरीली है

ये लड़की है राजनीति-सी धरम के साथ
अपनी मनवाये है बड़ी हटीली है

जेब सरकने लगती है बाज़ारों में
नयी ज़रूरत जैसे गाँठ की ढीली है

अमृत जैसे ख़ुशबू वाले लोग कहाँ
पत्ती-पत्ती फूलों की ज़हरीली है

माँ बच्चों को भूख में आख़िर देगी क्या
चूल्हे पर जब ख़ाली एक पतीली है

तीर-तबर2 से बचने वाले अब बचना
कड़वे होंट की भाषा बड़ी रसीली है

शहर में आकर बेक़ल तो बेबाक हुआ
गाँवों की फ़ितरत वैसे तो शर्मीली है

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1.बुद्धिमान। 2.बाण-फरसा।

(8)

सब पे दीवाने की नज़र भी नहीं
सब से दीवाना बेख़बर भी नहीं

जीने वाले तू जितनी समझे है
ज़िन्दगी उतनी मो’तबर1 भी नहीं

मुन्तज़िर2 का अजीब आलम है
अब उसे फ़िक्र-ए-मुन्तज़र3 भी नहीं

मुतमइन हो गये बहार में यूँ
जैसे एहसास-ए-बाल-ओ-पर4 भी नहीं

दास्तान-ए-ग़म-ए-हयात5 न पूछ
मुख़्तसर भी है, मुख़्तसर भी नहीं

मेरी दीवानगी वहाँ पहुँची
जिस जगह कोई हमसफ़र भी नहीं

जिस्म इक घर है रूह का बेकल
देखिए उसका जैसे घर भी नहीं

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1.विश्वस्त। 2.प्रतीक्षक। 3.प्रतीक्ष्य की चिन्ता। 4.डैने और पंखों की अनुभूति। 5.जिन्दगी की पीड़ा की कथा।

(9)

एक लम्हे की जलवाआराई1
कितनी सदियों का जश्न-ए-रा’नाई2

इस मसर्रत3 की क्या पज़ीराई4
जिसकी ग़म से न हो शनासाई5

उसके पैरों तलक ज़मीन कहाँ
आसमाँ तक हो जिसकी अँगड़ाई

इस जहाँ में है आरिजी6 सब कुछ
तेरी शोहरत कि मेरी रुसवाई

है वही महफिलों में चुप बेकल
बात करती हो जिसकी तनहाई

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1.बनाव-सिंगार के साथ उपस्थिति। 2.सुन्दरता का उत्सव। 3.आनन्द। 4.स्वीकृति। 5.परिचय। 6. अस्थायी।

(10)

तू ही मेरी रग-ए-गलू1 में रहा
और मैं तेरी जुस्तजू में रहा

उम्रभर तेरे पास रहकर भी
उम्रभर तेरी आरजू में रहा

तुझको था शौक़-ए-चाक-ए-दामानी2
एक मैं काविश-ए-रफ़ू3 में रहा

लोग पीते रहे समझ के शराब
खून मेरा ही हर सुबू में रहा

तेरे क़दमों को चूम कर निकला
वही पानी मिरे वुजू में रहा

नाज़ हुस्न-ए-बहार4 में ही था
तू ही जब मेरे रंग-ओ-बू में रहा

नाम मेरा तुझे पसन्द नहीं
फिर भी मैं तेरी गुफ़्तगू5 में रहा

यार कल इक गँवार बेकल का
तज़्किरा6 खूब लखनऊ में रहा

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1.कण्ठ की शिरा। 2.ओढ़नी को विदीर्ण करने का व्यसन। 3.सिलाई की चिन्ता। 4.वसंतऋतु का सौन्दर्य। 5.बातचीत। 6.चर्चा।


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