बड़े बड़ों के उत्पात - सुरेन्द्र शर्मा Bade Badon Ke Utpaat - Hindi book by - Surendra Sharma
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बड़े बड़ों के उत्पात

सुरेन्द्र शर्मा

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :173
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4873
आईएसबीएन :81-288-1008-1

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समाज में फैली बुराइयों की सच्चाई का खुलासा

Bade Badon Ke Utpat

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रस्तुत पुस्तक ‘बड़े बड़ों के उत्पात’ नामक शीर्षक से ही पाठकगण को इसकी कड़वी सच्चाई का अंदाजा लग सकता है। कुछ लेखक हाथ घुमा-फिराकर नाक पकड़ते हैं, जबकि श्री सुरेन्द्र शर्मा ने लेखनी रूपी हाथ से समाज में फैली बुराइयों की सच्चाई की नाक सीधे पकड़ने की कोशिश की है।
वर्तमान में घट रही घटनाओं को पैनी नजरों से देखकर जो विचार उनके मन में आए हैं, उन्हीं विचारों का यह अनोखा संकलन है। इन्होंने समाज सुधारने की बात इस प्रकार कही है-‘‘इस कोहरे में मंदिर मार्ग वाले संसद मार्ग पर जाएं या संसद मार्ग वाले मंदिर मार्ग पर चले जाएं, भटके हुए दोनों ही हैं। मैं इस देश की जनता से कहना चाहता हूं कि इन भटके हुए लोगों के बहकावे में न आएं, न संसद मार्ग पर जाएं, न मंदिर मार्ग पर जाएं, जाएं तो सिर्फ जनपथ मार्ग पर जाएं।’’
इस प्रकार यह पुस्तक अपने आप में हँसी के व्यंग्यों से भरपूर जीवन के तथ्यों-सत्यों व सामाजिक स्थितियों को हू-ब-हू लिखकर लेखक ने पाठकों को नई जानकारियों से अवगत कराया है।

आशीर्वचन

सुरेन्द्र शर्मा की इस पुस्तक में संकलित निबंधों को पढ़ा। मुझे बहुत अच्छे लगे। ये निबंध हास्य के नहीं व्यंग्य के हैं क्योंकि विविध प्रतिष्ठानों या प्रतिष्ठित पुरुषों में निर्मम प्रहार करते हैं। इनमें विनोद नहीं क्षोभ है और क्षोभ विचार-पुष्ट है। मुझे यह देखकर प्रसन्नता हुई कि सुरेन्द्र शर्मा वस्तुतः प्रगतिशील विचारों के लेखक हैं। इन निबंधों से उनका आंतरिक व्यक्तित्व उभरता है। वे साहसपूर्वक ऐसी बात कर सके हैं, जिसे आज का घोर प्रगतिशील भी कहने में हिचकेगा। सद्दाम पर हिन्दी में बहुत कम लिखा गया है। ज्यादातर हम अपनी राय साम्राज्यवादी प्रचारतंत्र से प्रभावित होकर ही बनाते हैं। शर्मा लिखते हैं-आखिर मांसाहारी लोग कब तक शाकाहार के समर्थन में प्रवचन देते रहेंगे ? कब तक मांस नोचने वाले गिद्ध दाना चुगने वाले कबूतरों के खिलाफ बयानबाजी करते रहेंगे ? राजनीति में फंस जाने के लिए। इस निबंध का शीर्षक बेलाग है ‘बेच दो अपने आपको पर माफ कर दो बाप को।’

ईमानदारी का ही गुण होता है कुरूपता, असभ्यता पर आक्रमण करना। किन्तु विक्षोभ का आधार सौन्दर्य एवं गुण ग्राहकता ही होता है। सुरेन्द्र शर्मा का वास्तविक रूप बुश और अमिताभ पर आक्रमंण करने में नहीं रमानाथ अवस्थी की भाव-तरल स्मृति स्तुति में है। रमानाथ अवस्थी हिन्दी के उत्कृष्ट, लोकप्रिय कवि थे। स्वाभिमानी थे, इसलिए सफलता की ऊंची सीढ़ियों पर नहीं चढ़ सके। सुरेन्द्र शर्मा ने उन्हें जो उच्छवासित स्मृति अंजलि समर्पित की है वह अनूठी है। कवि की पंक्तियों को ही उद्धत करके कवि को विभिन्न रूपों में श्रद्धांजलि दी गई है।

इन निबंधों में एक निबंध मधुमिता शुक्ला पर है। मीडिया विशेषतः इलैक्ट्रॉनिक मीडिया हमारे सांस्कतिक क्षेत्र में क्या-क्या गुल खिला रहा है। यह भी आश्चर्यजनक है कि मधुमिता को कवि कहा जाता था। मधुमिता के बारे में यह निबंध आंखें खोल देने वाले हैं। हम मीडिया की स्वतंत्रता के कायल हैं। किन्तु इस स्वतंत्रता का कैसा उपयोग मूल्यांध शक्तियां कर रही हैं-यह भी विचार योग्य है। यह छद्म स्वतंत्रता हमें परतंत्र बना रही है। इस निबंध संकलन का प्रत्येक निबंध पठनीय है। विचारवान प्राणी ही अच्छा गद्य लिख सकता है। इस संकलन के प्रत्येक निबंध से सुरेन्द्र शर्मा की देश भक्ति का विवेक-पुष्ट स्वर उभरता है। छोटे-छोटे वाक्यों में गठी हुई भाषा पाठक को सीधे प्रभावित करती है-बे मतलब उलझाती नहीं। उनका गद्य पाठक को प्रभाविक करता है, चमत्कृत नहीं करता और यह सुसंस्कृत, शिष्ट व्यक्तित्व की पहचान है। मुझे ये निबंध बहुत अच्छे लगे हैं, आपको भी अच्छे लगेंगे।
डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी
(विख्यात कवि एक आलोचक)

अच्छाई पर बुराई का कोहरा

नव वर्ष की हार्दिक बधाई ! हैप्पी न्यू ईयर ! नए साल की मुबारकरबाद ! इन शब्दों से हमने एक-दूसरे को बधाइयों का आदान-प्रदान किया। नए साल की बधाई ने गए साल की धुनाई भुला दी। और होता भी है कि परिवार में कितनी भी मौतें हो जाएं, सबका दुःख एक शिशु के आगमन से लगभग समाप्त हो जाता है, और परिवार में उत्साह और उत्सव का माहौल बन जाता है, पर देश की राजधानी दिल्ली के भाग्य में पहली जनवरी का सूर्योदय देखना नहीं लिखा था। पूरे उत्तर भारत में, कश्मीर से लेकर कनॉट प्लेस तक, किसी को दूर तो क्या, पास का भी नहीं दिखता था कोहरे की वजह से। कोहरा इतना घना था कि युवा कवि वेद प्रकाश ‘वेद’ की पंक्तियाँ कि ‘‘आजकल इतना कोहरा है-इतना कोहरा है ! प्रकाश सिंह बादल खड़ा था, मुझे लगा गुरुचरण सिंह टोहरा है।’’ सार्थर नजर आ रही थीं, ये पंक्तियाँ लगती तो हँसी की हैं, पर इनके गहन अर्थ में जाओ तो ये लगता है, ये कोहरा कितना अच्छा है, जिसमें बादल टोहरा नजर आए, टोहरा, बादल नजर आए, सोनिया गांधी सुषमा स्वराज-सी लगे, सुषमा स्वराज सोनिया गाँधी-सी लगे ! वाजपेयी और मुलायम सिंह का पता नहीं लगे कि कौन खड़ा है ? यानी एक ऐसी आकृति दिखाई दे जिसे सिर्फ और सिर्फ मनुष्य कहा जा सके।

उजाले का एक ही तो फायदा है, इसमें दूर-दूर तक, अच्छा-बुरा दिखाई दे जाता है। हमारे यहाँ सालों से दूर-दूर तक कोई अच्छा काम हुआ ही नहीं, इसलिए हमें नववर्ष पर बधाई इस कोहरे को देनी चाहिए, जिसने हमें बुरा देखने से बचा लिया। इस कोहरे में हमें सिर्फ हम दिए और हमारे साथ हमेशा अच्छा होता है, क्योंकि संत कवि सुरेन्द्र शर्मा ने कहा है कि-
भला जो देखन मैं चला भला न मिलया कोय।
जो दिल खोजो आपनो, मुझसे भला न कोय।।

मैं सोचता हूं कि ऐसा कोहरा कब छाएगा, जिसमें पाकिस्तान भारत दिखाई दे; भारत पाकिस्तान दिखाई दे, यानी कुल मिलाकर दोनों को पुराना हिन्दुस्तान दिखाई दे ! नाश हो ऐसे उजियारे का जिसमें हिंदू सिर्फ दिखाई दे और मुसलमान सिर्फ मुसलमान, दोनों को अपने अंदर इंसान दिखाई दे और दूसरे के अंदर हैवान दिखाई दे। पर कोहरा इतना घना भी नहीं होना चाहिए कि खुद को खुद भी न दिखाई दे। फिर वो कोहरा नहीं रहता, अँधियारा हो जाता है हमारे सभी राजनैतिक दल, मुझे लगता है, ऐसे ही कोहरे की गिरफ्त में हैं। देश को आजाद हुए लगभग पचपन साल पूरे होने जा रहे हैं, पर हमारे ने्ताओं का बचपन नहीं गया। जो कुर्सी के लिए ऐसे मचलते हैं जैसे बच्चा खिलौनों के लिए मचलता है और इस तरह मचलता है बच्चा खिलौनों के लिए कि दूसरे बच्चों को तो छोड़ो, अपने सगे भाई तक को वो देने को तैयार नहीं होता सगा भाई भी क्या ! माँ-बाप तक को ठेंगा दिखा देता है। अच्छा ! कोई बच्चा ये हरकत करे तो उसे ‘‘ठुमक चले नंदलाल, बाजे पैंजनिया’’ की संज्ञा दे सकते हैं, लेकिन कोई मुखिया कुर्सी के लिए मचले तो उसे, बचकानेपन की नहीं बल्कि पागल पन की ही संज्ञा दी जा सकती है। पता नहीं इस कुर्सी में क्या चीज है, मिल जाए तो आदमी अपने आप को मसीहा समझने लगता है, और न मिले तो मिर्गी के दौरे पड़ने शुरू हो जाते हैं। मैं अक्सर प्रार्थना करता हूँ कि ईश्वर ऐसा कोहरा दे, जिसमें नेताओं को कुर्सी न दिखाई दे, दिखाई दे तो सिर्फ देश दिखाई दे ! अच्छा देखना चाहूँ तो कोहरा देश दिखाई दे मैं बुरा देखना चाहूँ तो कोहारा छा जाए और अच्छा देखना चाहूँ तो कोहरा छँट जाए ! न हिंदू दिखाई दे, न मुस्लिम दिखाई दे, न सिख और न ईसाई दिखाई दे ! दिखाई दे तो हर कोई अपना दिखाई दे ! देखने की बात नहीं है, इस नववर्ष में सस्जिद में अजान के स्वर गूँजें तो मुझे घंटी सुनाई दे, आरती की आवाज अजान-सी लगे। गीता, बाइबिल, कुरान, गुरुग्रंथ हर घर में दिखाई दे। जाति, धर्म, देश लाख अलग-अलग हों, पर इंसानियत पर हमला हो तो सब में इकाई दिखाई दे।
6 जनवरी, 2002

आँखों पर छाया डर का धुँधलका

17 जनवरी को एक वाक्या हुआ। पेट्रोलियम मंत्रालय द्वारा ‘तेल बचाओ पखवाड़ा’ के अन्तर्गत एक हास्य कवि सम्मेलन दिल्ली के फिक्की ऑडिटोरियम में रखा गया, जिसमें पेट्रोलियम मंत्री राम नाईक स्वयं मुख्य अतिथि के तौर पर आए। पहला कवि पढ़कर बैठा ही था और मैंने दूसरे कवि को बुलाया ही था कि कोई जरूरी समाचार मंत्री महोदय के कान में पड़ा, और वे यह कहकर चले गए कि अभी आते हैं। मैं संचालन कर रहा था। मुझे किसी ने स्टेज के पीछे से बुलाया। कि हॉल में बम की खबर है, लिहाजा हॉल तुरंत खाली करवा दिया जाए। मैंने बगैर इस खबर को बताए, लोगों से बाहर जाने का निवेदन किया और वे चल दिए। अनुमान शायद सबको हो गया था, लेकिन हॉल से एक भी व्यक्ति नहीं भागा। भगदड़ जैसी कोई चीज नहीं थी। दहशत तो दूर की बात है, लोग बम की खबर से दहशत में नहीं थे, बल्कि इस पीड़ा में थे कि वे हास्य रस का कवि-सम्मेलन नहीं सुन सके। पुलिस की छानबीन में देर हुई तो लोगों ने कहा कि साहब, आप क्या हॉल के बाहर खुली जगह में बिना माइसॉक के कविताएँ सुनवा सकते हैं ? मैं जैसे इस क्षण की ही प्रतीक्षा कर रहा था। मैंने सबसे कहा कि बैठो एक जगह, हम बिना माइक के ही कविताएँ पढ़ेंगे। नाईक से तो पहले ही वंचित हो गए थे, अब माइक से भी वंचित हो गए और एयर कंडीशनर की गद्देदार कुर्सियों पर बैंठे लोग, कड़कड़ाती ठंड के बावजूद बाहर मैदान में जमीन पर ही बैठ गए। अब यह काम उनसे उनकी हिम्मत ने करया, कविता की ललक ने कराया या हास्य की प्यास ने, यह मैं नहीं जानता लेकिन मैं मानता हूँ कि यह काम उनके हौंसले ने कराया। और बिना माइक के भी वहाँ इतने ठहाके गूँजे, जितने हॉल में भी नहीं गूँजे थे। मुझे लगा कि निडरता ने आतंकवाद को हरा दिया। अगर उस समय बम-धमाका भी होता तो हास्य के ठहाकों के बीच दब जाता।

इस जरा-सी घटना ने आंतकवाद की ताकत का जो धुँधलका मेरी आंखों में था, उसे दूर कर दिया था। देखा जाए तो आतंकवाद की ताकत उसके हथियार नहीं, हमारा डर है। यह हमारा डर ही तो था, जो करोड़ों की संख्या में होते हुए भी हम हजारों लोगों के सैकड़ों साल तक गुलाम बने रहे। अंग्रेज कभी इस देश में पच्चीस-तीस हजार से ज्यादा नहीं रहे, लेकिन उन्होंने हमारे अंदर डर इस तरह स्थापित कर दिया कि हम वर्षों तक गुलाम बने रहे। एक-एक भारतीय अगर हाथ में, हथियारों की छोड़ो, एक-एक पत्थर भी उठा लेता तो भागते-भागते उनकी हड्डियाँ तक चकनाचूर हो जातीं !
अब दूसरा दृश्य देखिए ! जहाँ करोड़ों लोग हजारों अंग्रेजों से सहमे जा रहे थे, वहीं एक अकेला गांधी निडरता के साथ जब उनके सामने खड़ा हुआ तो इकलौती लाठी ने हाथियारों से लैस तमाम अंग्रेजों को ही नहीं, पूरे अंग्रेज-साम्राज्य को इस देश से भगा दिया। जब हमारी निडरता ने इस देश से अंग्रेज-साम्राज्य को खत्म कर दिया तो क्या आतंकवाद को खत्म नहीं कर सकती। एक ही तो मानसिक बदलाव लाना है खुद में कि मौत से डरने के बजाय, मौत को मारने का हौंसला पैदा कर लो। जैसा कि मैंने कहा है कि आतंकवादी की ताकत उसका हथियार और निडर लोगों की ताकत उनका हौंसला होता है। इतिहास गवाह है कि हथियार कभी भी हौसले से नहीं जीत सका है। अब पंजाब को ही लो, कई वर्षों तक आंतकवाद के साये में रहा. और जब उससे ऊबकर पंजाबी भाई भांगड़ा करने पर उतर आए, तो ढोल की एक-एक थाप आतंकवाद के गाल पर पड़ी। कश्मीर को देख लो, वहाँ एक आतंकवादी संगठन ने घोषणा की कि बुर्का न पहनने वाली महिलाओं के गाल पर तेजाब फेंक दिया जाएगा, लेकिन महिलाओं का साहस देखिए कि फतवे को नकार दिया तो संगठन की टाँय-टाँय फिस्स हो गई। हम जीना चाहते हैं, इसीलिए तो आतंकवादी हमें डरा रहे हैं ! हम मरना सीख जाएँ तो वे डरना शुरू हो जाएँगे। हमारे इस डर ने हमसे कितने बड़े-बड़े अपराध कराए हैं !

आप सोचो तो सही, कुर्सी छिनने के डर से नेताओं ने अपने चेहरे पर तो कालिख पुतवाई ही, देश के मुख पर भी कालिख पोत दी। एक अकेला यह डर अगर नेता छोड़ देता तो इस देश का हर नेता देश के एक-एक नागरिक की निगाह में पूजनीय हो जाता। आज जो हौंसला ‘फिक्की’ के श्रोताओं ने दिखाया, वहीं हौंसला पूरा देश दिखाए तो सही और उसके बाद आतंकवाद कहीं दिख जाए तो मैं अपना नाम बदल लूँगा, क्योंकि कायरता देश को निंदनीय बनाती है और निडरता देश को वंदनीय बनाती है। मैं तो इससे आगे एक बात कहना चाहता हूँ कि ईश्वर पर मेरा विश्वास है, पर देश पर मेरा अंधविश्वास है, जिस पर मैं घमंड करता हूँ।
20 जनवरी, 2002




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