ऐ समन्दर कभी उतर मुझमें - अनिल जैन A Samander Kabhi Utar Mujhamin - Hindi book by - Anil Jain
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ऐ समन्दर कभी उतर मुझमें

अनिल जैन

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :174
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4895
आईएसबीएन :81-288-1484-2

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प्रस्तुत है खूबसूरज शायरी का नजराना...

A Samander Kabhi Utar Mujhamin

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

गुज़िश्ता दिनों उर्दू अदब में एक ऐसा संजीदा तबक़ा उभर कर सामने आया है जो अदब में हर तरह के सेहतमन्द रवैये को कुबूल करने को तैयार है। वो हैय्यत में भी तकनीकी तौर से और बयान में भी नए-नए तज़रबात को पसन्द करता है। मगर तज़रबा बराए बज़रबा और जदीदियत बराए जदीदियत के सख़्त ख़िलाफ है। यह तबक़ा आज़ाद फ़ज़ा में सांस लेने का क़ायल है मगर क़दीम असालीब को असासी तौर पर तसलीम करता है। मेरे नज़दीक यही तबक़ा सही मानों में जदीद कहलाने का मुसतहिक़ है। शाहिद मीर का तआलुक़ इसी तबक़े से है।
शाहिद मीर को रिसाइल और जराइद में पढ़ता कभी-कभी रेडियो से सुनता तो मैं चौंक जाता और देर तक सोचता के यह अनूठा शायर अलग-थलग अपनी डगर का राही मालूम होता है। इत्तिफ़ाक़ कहिए जयपुर की एक शैरी नशिस्त में शाहिद मीर को क़रीब से सुना और देखा भी। शाहिद मीर ने कुछ अछूते दोहे और एक ताज़ाकार ग़ज़ल सुनाई। मैंने जमकर दाद दी। बाद में शाहिद मीर ने जो एक ख़ुश रू, ख़ुश ख़ू और ख़ुश गो शख़्स है, बड़े पुर तिपाक अन्दाज़ से शुक्रिया अदा किया और कहा मेरी बड़ी हौंसला आफ़ज़ाई की आप ने। मैं समझा यह जदीद लहजे का शायर अकड़ूं होगा। तमकिनत से मिलेगा मगर वो जिस ख़ुलूस और अक़ीदत से मिला, हमेशा के लिए मेरा दोस्त हो गया।
‘‘हज़रत जिगर मुरादाबादी की ख़िदमत में रहता था तो वो बार-बार हिदायत करते ‘‘बेटे, बहुत अच्छे इंसान बनो फिर बहुत अच्छे असआर कहोगे’’ सच है कि अच्छा इन्सान ही अच्छी सोच से अच्छी बातें करता है।
शाहिद मीर ने राजस्थान के तपते सहरा, म.प्र. की ऊबड़ खाबड़ ज़मीन पर रहकर किस क़दर बुलन्दियों को छुआ है जहां किसी फ़नकार और क़लमकार को पहुंचने के लिए एक उम्र सऊबतें झेलकर भी पहुंचना मुश्किल है। शाहिद मीर ने उर्दू शायरी को अपने ताज़ा अफ़कार से एक माकूल ख़ज़ीना दिया है जो आने वाली नसलों के लिए एक अज़ीम नयमत का दर्जा रखता है।
आइए अब हम शाहिद मीर की शायरी की बात करें। हमारे अहद के मेहबूब मोजुआत ज़मानए-हाज़िर के नागुफताबह हालात, इक़तिदार की रस्सा कशी, सियासी पैंतरे बाज़ियां, समाजी और मआशरती टूटते बिख़रते रिश्तों का अलिमिया, अहसास-ए-तन्हाई, मायूसी, अजनबीयत, ख़ौफ़ और दहशत हैं। शाहिद मीर के यहाँ भी यह मोजुआत मिलेंगे।

धड़कने डूब गईं सब्र का सन्नाटा है
ज़िन्दगानी थी जहाँ कब्र का सन्नाटा है
शोर बरपा है सुनाई नहीं देता कुछ भी
शोर भी गोया मेरे अस्र का सन्नाटा है
घुंघरुओं की वो सदाऐं तो कहीं डूब गईं
दिल में एक उजड़े हुए क़स्र का सन्नाटा है
लोग दुबके हुए बैठे हैं घरों में ‘‘शाहिद’’
आने वाले यह किसी हश्र का सन्नाटा है।

लेकिन शाहिद मीर का सबसे बड़ा वस्फ़ बयान की नुदरत है
यह रमज़िया इज़हार, इसतआरों, पैकरों और अलामतों में नज़र आता है :
‘चिलमन सी मोतियों की अन्धेरों पे डाल कर
गुज़री है रात ओस सवेरों पे डाल कर’
‘आख़िर तमाम सांप बिलों में समा गए
बद हालियों का ज़हर सपेरों पे डाल कर’’
‘उस अब्र ने लिखा लिया दरिया दिलों में नाम
क़तरे सुलगती रेत के ढैरों पे डाल कर’

या

‘उजले मोती हमने मांगे थे किसी से थाल भर
और उसने दे दिए आंसू हमें रुमाल भर’

‘बदकारियों के शहर में अपनी अना का हाल
एक बदहवाश शेर मचानों के दरमियां’

शाहिद जब रमज़ी अन्दाज़ तर्क करके खुले-खुले अल्फाज़ में अपनी बात कहते हैं, उस वक़्त भी उनके ज़हने में आम डगर से हटकर चलने की बात रहती है।
‘रोशनी सी कर गई कुरबत किसी के जिस्म की
रूह में खुलता हुआ मशरिक़ का दरवाज़ा लगा’
‘‘एक पल ठहरा न उड़ते बादलों का क़ाफ़िला
तिशना लब जंगल खड़े थे हाथ फैलाए हुए’’
‘जब से मौसम ने रंग बदला है
जी उठा है कोई शजर मुझमें’
‘ज़ख़्मे-जां खिल के आफ़ताब हुआ
दूर तक हो गई सहर मुझ में’

रूह में मशरिक़ का दरवाजा खुलना, तिशना लब जंगल का हाथ फैलाना, शजर का जी उठना और दूर तक शहर होना, लफ़ज़ों का अनोखा तसरूफ़ नहीं तो क्या है ? यही सब बातें तो शाहिद मीर को दूसरों से अलग और मुमताज़ करती हैं। जहाँ भी शाहिद ने घिसा पिटा मज़मून उठाया है और वहां भी अपनी नुदरते बयान से उसे नया कर दिया है। मसलन यह शे’र देखिए :
‘उसकी आंखों का बयां इसके सिवा क्या कीजिए
वुसअतें आकाश सी गहराईयां पाताल भर’

शाहिद के यहां अहसासे तन्हाई, ख़ौफ-ओ-दहशत के बावुजूद वो ज़िन्दगी से अच्छी तवैक़्क़ात भी रखते हैं। वो शकिस्ता पा ज़ुरुर हैं मगर शकिस्ता दिल नहीं।
‘सख़्त ना हमवार रस्तों पर मुसलमान चल रहा हूं
टेढ़ी-मेढ़ी इन लकीरों में मुक़द्दर ढूंढ़ना है।’

मेरा जी तो चाहता था के और बहुत कुछ लिखूं, मगर अपनी घरेलू, समाजी, तालीमी, सियासी, अदबी, मसरूफ़ियात हाइल हैं। बहरहाल शाहिद मीर के यहां उससे कहीं ज़्यादा है जितना मैंने लिखा है। नैक ख़्वाहिशात और दुआए कसीर के साथ-

परिचय

नाम- शाहिद मीर खां
पिता का नाम- स्वर्गीय एहमद मीर खां ‘मीर इरफ़ानी’
निवास स्थान- सिंरोज, भूतपूर्व रियासत टोंक का परगना हाल, जिला विदिशा, मध्यप्रदेश
जन्मतिथि- 10 फरवरी 1949, सरकारी रिकार्ड में 8 फरवरी 1947
शिक्षा- एम. एससी., पीएच.डी. वनस्पति शास्त्र (औषधीय वनस्पति)
व्यवसाय- विभागाध्यक्ष, वनस्पति शास्त्र शाखा राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय बांसवाड़ा सन् 1972 से फरवरी 1993 तक।
निदेशक, कृषि विज्ञान केन्द्र, सिरोंज (जिला विदिशा), म.प्र. फरवरी 1993 से अक्टूबर 2003 तक।
उप प्राचार्य- राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बाड़मेर (राज.) 11 अक्टूबर, 2003 से आज तक।
शायरी की शुरुआत- सन् 1964-65 से प्रारंभ की जब मैं दसवीं कक्षा का विद्यार्थी था। नाना स्वर्गीय नातिक मालवी और पिता श्री एहमद मीर खां ‘मीर इरफानी’ जैसे उर्दू साहित्य के स्थापित और उच्चकोटी के साहित्यकारों के सानिध्य एवं मार्गदर्शन में चरणबद्ध प्रशिक्षण पूरा किया। नज़्म, ग़ज़ल, रुबाई, दोहा, पद, गीत और कत्आत जैसी समस्त विधाओं में प्रयास किया।
साहित्यिक दृष्टिकोण- विज्ञान का विद्यार्थी होने की वजह से बौद्धिक स्तर पर किसी एक दृष्टिकोण और वाद को सम्पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया क्योंकि आज की सच्चाई आने वाले कल में नए-नए दृष्टिकोण और स्वीकृति का क्रम नये आयामों में स्वतः ही साहित्यिक रचना करवाता है। मेरे नजदीक चारों ओर फैले हुए समाज से लेकर अंतर्राष्ट्रीय अभियानों तक शायर का दृष्टिकोण पहुंचना जरूरी है।
प्रकाशित पुस्तकें- ‘मौसम ज़र्द गुलाबों का’ (ग़ज़लों का संकलन) सन् 1984। ‘कल्पवृक्ष’ (हिन्दी काव्य संग्रह) सन् 1992 साज़ीना (कविता संकलन) सन् 2001।
संपादित पुस्तकें- ‘आवाजें’ (हिन्दी लिपि में) (बांसवाड़ा के शायरों का काव्य संग्रह) सन् 1977 हफ्त् रंग (बांसवाड़ा के शायरों का काव्य संकलन) सन् 1981 ‘सुखन-ए’ मोतबर (काव्य संकलन स्वर्गीय नातिक़ मालवी) सन् 1989 दोहे राजस्थान के (1993), राजस्थान के कवियों का संकलन ‘निकाते दानिष’, स्वर्गीय दानिष मालवी का काव्य संग्रह (1996) ‘नाला-ओं-नग़मा’ स्वर्गीय मीर इरफानी का काव्य संग्रह (2002) पुरस्कार व सम्मान- राजस्थान उर्दूसाहित्य परिषद, बिहार उर्दू साहित्य परिषद् और गालिब साहित्य परिषद् (कर्नाटक) ने ‘‘मौसम ज़र्द गुलाबों का’’ पर सन 1985-86 में साहित्यिक पुरस्कार प्रदान किए। राजस्थान उर्दू साहित्य परिषद् ने सामूहिक साहित्यिक सेवाओं पर सन् 1991-92 के लिए साहित्यिक पुरस्कार प्रदान किए। मुख्यमंत्री राजस्थान श्रीमान भौरोसिंह शेखावत साहब ने प्रमाण पत्र, तीन हजार रुपये का चेक और शाल 2 जनवरी सन् 1992 को आयोजित समारोह में भेंट किए। जिनका आयोजन राजस्थान उर्दू साहित्य परिषद ने रवीन्द्र मंच जयपुर में किया।
म.प्र. उर्दू अकादमी ने समूचित साहित्य सेवाओं के लिए 1998 का ‘सुहा मुज्जदिदी’ सम्मान 15000 रु., शाल और स्मृति चिह्न प्रदान किया। पुरस्कार अली सरदार जाफ़री ने प्रदान किया। बज़्में उर्दू भोपाल ने राजीव गांधी सद्भावना सम्मान 2000 में प्रदान किया।
सदस्यता- राजस्थान उर्दू साहित्य परिषद् में सदस्यता प्राप्त की। (1992 से 2002 तक) म.प्र. उर्दू अकादमी के सदस्य। 1997 से 2000 तथा 2003 से आज तक।
सदस्य- लाइफ साइन्स पेनल, तरक्की उर्दू बोर्ड, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, नई दिल्ली।
-International Society for promotion of Medicinal Plants, (ISMAP) New Delhi (आजीवन सदस्य)
-एडीटोरियल सेक्रेट्री, इंडियन जरनल ऑफ लाइफ साइन्सेज भोपाल
-अध्यक्ष पर्सन- स्पिक मैके, बाड़मेर चैप्टर
प्रचार माध्यम- दिल्ली और जयपुर दूरदर्शन केन्द्रों द्वारा आयोजित काव्य गोष्ठियों में सम्मिलित।
ऑल इंडिया रेडियो, जयपुर, जोधपुर, रामपुर, अहमदा बाद, भोपाल, बांसवाड़ा और उर्दू सर्विस दिल्ली द्वारा काव्य प्रसारण एवं काव्य गोष्ठियों में सम्मिलित।
रिकार्ड एवं कैसेट्स- एच.एम.वी. रिकार्ड ‘ए साउंड अफेयर’ में जगजीत सिंह की आवाज में एवं प्रेम भंडारी की आवाज में ‘द शेडोज’ में ग़ज़लें रिकार्ड हुई।
संगीत से रिश्ता- 1972 में संगीत की बाकायदा तालीम हासिल की। पंडित नारदा नन्द, उस्ताद अहमद हुसैन और उस्ताद इनायत उल्लाखां की सोहबत में रह कर शास्त्रीय संगीत की बारीकियां सीखीं।
ग़ज़लों की कम्पोजिशन खुद की बनाई हुई है।
हारमोनियम, तबला, सितार बजाने का सलीका भी है।
शास्त्रीय संगीत के रागों और लोक धुनों पर केन्द्रित ‘‘नज़्में’’ लिखी जो उर्दू पत्र-पत्रिकाओं में खासी मशहूर हुई। उर्दू के सबसे आलोचक शमसुर-रहमान फारुकी ने यह नज़्में पसंद कीं। उर्दू अकादमी, भोपाल म.प्र. के लिए एक पुस्तक ‘‘ग़ज़ल गायकी और उसका फ़न’’ जैर-ए-तहरीर है।
अन्य- हिन्दुस्तानी संगीत, आज़ाद ग़ज़ल, और वर्तमान शायरों की काव्य कला पर लेख लिखे विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए।

(1)

ऐ खुदा रेत के सेहरा को समन्दर कर दे
या छलकती हुई आँखों को भी पत्थर कर दे

तुझको देखा नहीं मेहसूस किया है मैंने
आ किसी दिन मेरे एहसास1 को पैकर2 कर दे

दिल लुभाते हुए ख़्वाबों से कहीं बेहतर है
एक आँसू के, जो आँखों को मुनव्वर3 कर दे

और कुछ भी मुझे दरकार नहीं है लेकिन
मेरी चादर मेरे पैरों के बराबर कर दे
1. अनुभव 2. आकृति 3. प्रकाशमान

(2)

ख़्वाबों की अन्जुमन में हर एक शै हसीन थी
जागे तो अपने पांव के नीचे ज़मीन थी

मौसम की बर्फ़ गिरने से पहले बिछड़ गए
अहबाब1 की निगाह बड़ी दूरबीन2 थी

अख़बार में वो जो आज बनाती है कार्टून
लड़की जो देखने में बड़ी ही मतीन3 थी
उस एक चीज़ पर भी मेरी दस्तरस4 नहीं
जो मेरा ऐतबार थी मेरा यक़ीन थी

पिघला मदाम ख़ाना-ए-मिज़गां5 में आफ़ताब
मामूर6 रौशनी में तहे आस्तीन थी

‘शाहिद’ खुला फ़रेब के सहराओं में ये राज़
वो शक्ल देखने में सरापा यक़ीन थी
—————————
1. मित्र लोग 2. दूर देखने वाला 3. गंभीर, 4. पहुंच 5. आँखों की पलकें 6. आदेशित

(3)

आँसुओं में ज़रा सी हँसी घोलकर
ज़हर उसने दिया ज़िन्दगी घोल कर

काली रातों को उजाला बनाते हैं हम
आप के रूप की चांदनी घोल कर

अहदे हाज़िर के सच्चे ग़ज़लकार हम
एक लम्हे में लाए सदी घोल कर

सच की कड़वाहटें कुछ तो कम हो गईं
हम समन्दर में लाए नदी घोल कर

उसके चेहरे पर लिखना है कोई ग़ज़ल
सुर में लफ़्ज़ों की जादूगरी घोल कर

एक अख़बार भी ऐसा नहीं
दो ख़बर सुब्ह की रोशनी घोल कर

(4)

पहले तो सब्ज़ बाग़ दिखाया गया मुझे
फिर ख़ुश्क रास्तों पे चलाया गया मुझे

तै हो चुके थे आख़िरी सांसों के मरहले
जब मुज़दए1 हयात सुनाया गया मुझे

पहले तो छीन ली मेरी आँखों की रौशनी
फिर आइने के सामने लाया गया मुझे

रक्खे थे उसने सारे स्विच2 आपने हाथ में
बे वक़्त ही जलाया, बुझाया गया मुझे
इक लम्हा मुस्कुराने की क़ीमत न पूछिये
बे इख़्तियार पहले रुलाया गया मुझे

निकले हुए थे ढूंढ़ने खूंख़्वार जानवर
काँटों की झाड़ियों में छुपाया गया मुझे
चारों तरफ बिछी हैं अंधेरों की चादरें
शाहिद अभी फुज़ूल जगाया गया मुझे
1. ख़ुशखबरी 2. बिजली के बटन (स्विच)

(5)

पढ़ लिख गए तो हम भी कमाने निकल गए
घर लौटने में फिर तो ज़माने निकल गए

सूखे गुलाब, सरसों के मुरझा गए हैं फूल
उनसे मिलने के सारे बहाने निकल गए

पहले तो हम बुझाते रहे अपने घर की आग
फिर बस्तियों में आग लगाने निकल गए

किन साहिलों पे नींद की परियाँ उतर गईं
किन जंगलों में ख़्वाब सुहाने निकल गए

ख़ुद मछलियां पुकार रही हैं कहाँ है जाल
तीरों की आऱजू में निशाने निकल गए

‘शाहिद’ हमारी आँखों का आया उसे ख़्याल
जब सारे मोतियों के ख़ज़ाने निकल गए

(6)

ख़ुश्क लब अफ़सुर्दा1 दिल और आँख तर ले जायेगा
कुछ न कुछ वो मेरी ग़ज़लों का असर ले जायेगा

सारे मन्ज़र मौसमे बेदादगर2 ले जायेगा
तोड़ने आयेगा इक पत्ता, शजर ले जायेगा

थाम कर रखना बदन की किश्तियों के बदबां3
दलदलों के बीच सांसों का भँवर ले जायेगा

जिस्म से उठता धुआँ बेकार जा सकता नहीं
दूर तक इक शहर जलने की ख़बर ले जायेगा
इक-इक गुलशन में भटकूंगा हवाओं की तरह
ख़ुशबूओं का शौक़ मुझको दर-ब-दर ले जायेगा

मुस्कराता फिर रहा है, देखना वो शाम तक
शहर की सारी उदासी अपने घर ले जायेगा
—————————
1. अत्याचारी 2. उत्साहहीन 3. नाव की पाल

(7)

वो एक चुप-चुप सा पैकर1 बोलता है
मेरे शे’रों में ढल कर बोलता है

हर एक क़तरे के अन्दर बोलता है
ख़लाओं3 में समन्दर बोलता है

अजब फ़नकार सूरत है वो चेहरा
कई ख़ानों में बट कर बोलता है

तुम्हारा कुर्ब4 पा कर दिल जो धड़का
यक़ीं आया के, पत्थर बोलता है

सितम पेशा हवाओं की कहानी
मेरा पामाल छप्पर बोलता है

मिलन की साअतें5 नज़दीक आईं
मुंडेरों पर कबूतर बोलता है

घिरें बादल तो उन आँखों में अक्सर
कोई प्यासा समन्दर बोलता है

मकीं6 ओढ़ें हैं चादर ख़ामोशी की
मगर जलता हुआ घर बोलता है

जहाँ हुक्मे ज़बां बन्दी है नाफ़िज़7
वहीं ‘शाहिद’ मुकर्रर बोलता है
—————————
1. आकृति, 2. बूंद, 3. अंतरिक्ष, 4. समीपता, 5. क्षण, 6. निवासी, 7. कानून लागू होना

(8)

एक ग़ज़ल जो पूरी है
दिन भर की मज़दूरी है

पेड़ परिन्दे का जीवन
उड़ना तो मजबूरी है

सारे काम अधूरे हैं
एक तमन्ना पूरी है

जिसके पास हूँ बरसों से
आज भी उससे दूरी है

साए घने बुलाते हैं
चलना मगर ज़रूरी है

जान बचाकर रखिएगा
मुल्क मिरा जम्हूरी1 है
——————
1. लोकतांत्रिक

(9)

ज़हन में बनने बिगड़ने का अमल मौजूद हैं
करवटें लेती हुई कोई ग़ज़ल मौजूद है
आज रुख़सत हो चुका है सिर्फ़ कल मौजूद है
दूर दलदल में कोई ताज़ा कमल मौजूद है

अहदे-रफ़्ता छोड़िये, इस दौर में मुमकिन नहीं
आपकी इस सादगी में कोई छल मौजूद है

कुछ न कुछ बुनियाद है सैराबियों के ख़्वाब की
रेत की तह में कहीं थोड़ा-सा जल मौजूद है

किसलिए बे- ख़ानमा1 हो मेरा घर होते हुए
झोपड़े की शान वाला ये महल मौज़ूद है

आँसुओं की धार भी है, खून के कतरे भी हैं
कुछ तो लीखिए, रोशनाई का बदल मौजूद है

मुनअक़िद2 जश्ने तआल्लुक खुशदिली से कीजिए
ये भी क्या कम है के ‘शाहिद’ एक पल मौजूद है
———————
1.बेघर 2. आयोजित

(10)

आफ़ताब1 निकलेंगे महताब ढ़लते हैं
देखिये अँधेरों के जिस्म कब पिघलते हैं

ज़ख़्म खाके लोगों में बाँटते, हैं हमदर्दी
हम सियाहियाँ पी कर रौशनी उगलते हैं

कर गईं जिन्हें रौशन साअतें जुदाई की
आज भी सरे मिज़गां वो चराग़ जलते हैं

नींद तो फिराती है सारी रात सड़कों पर
ख़्वाब में बिस्तर पर करवटें बदलते हैं।

ख़ौफनाक रातों पर यूं न तोहमतें2 रखिए
इन घने अँधेरों में आफ़ताब पिघलते हैं

ज़ख़्म आँच देते हैं डूबते ही सूरज के
इक चऱाग बुझता है सौ चऱाग जलते हैं

बे करां सियाही है उनकी पुश्त3 पर ‘शाहिद’
लोग जिन अक़ीदों4 की रौशनी में चलते हैं
—————————————
1, सूर्य 2. झूठा कलंक 3. पृष्ठ भाग 4. श्रद्धा

(11)

मैं तेरे हुस्न की तफ़सीर1 कहां से लाऊं
अपने अल्फ़ाज़ में तासीर कहां से लाऊं

भूल जाना तुझे मुश्किल तो नहीं है लेकिन
ज़ह्न के वास्ते जंज़ीर कहां से लाऊं

जो किसी उजड़े हुए घर का दिया बन जाए
इन अँधेरों में वो तनवीर2 कहां से लाऊं

टूटना और बिखरना है मुक़द्दर मेरा
दोस्तो जज़्बए तामीर3 कहाँ से लाऊं

मैं तो मिटती हुई क़दरों4 का अमीं हूं ‘शाहिद’
वो अदा-ए-सुख़न ए ‘मीर’5 कहाँ से लाऊं

रक़्स करती हुई आई है बहारें ‘शाहिद’
अपने इस ख़्वाब की ताबीर कहाँ से लाऊं
—————————
1. विवरण 2. रोशनी . 3. सृजन 4. मूल्य 5. गवाह

(12)

हम से वो मिल गए, रात अच्छी लगी
रात की फिर हर इक बात अच्छी लगी

मेरी तन्हाई पर ख़ूब फ़िक़रे कसे
दोस्तों की ख़ुराफात अच्छी लगी

चाँद की रोशनी, फूल की पंखुड़ी
उसने भैजी थी सौगात अच्छी लगी

कितनी सदियों का हम ने सफ़र तय किया
एक पल की मुलाकात अच्छी लगी

दिल गवां आए हम, जान भी हार दी
इश्क़ के खेल में मात अच्छी लगी

आँसूओं के दिए हर क़दम पर जले
इस सफ़र की शुरुआत अच्छी लगी

‘शाहिद’ अपने भी आँसू जो इनमें मिले
मुद्दतों बाद बरसात अच्छी लगी

लोगों की राय

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