भक्त शिरोमणि प्रह्लाद - लालबहादुर सिंह चौहान Bhakta Shiromani Prahlad - Hindi book by - Lalbahadur Singh Chauhan
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भक्त शिरोमणि प्रह्लाद

लालबहादुर सिंह चौहान

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :94
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4908
आईएसबीएन :81-7043-443-2

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भक्त प्रह्लाद के जीवन पर आधारित पुस्तक

Bhakta Shiromani Prahlad

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

दो शब्द

दैत्य-कुल में उत्पन्न होकर बालक प्रह्लाद ने अपनी अविचल भक्ति के बल से अपने सारे कुल को पवित्र कर दिया और भक्तों के लिए भगवान की भक्ति का मार्ग प्रशस्त कर संसार में अपना नाम अमर कर दिया। उसी का फल है जो हजारों-लाखों वर्षों से धर्म-प्राण भक्तराज प्रह्लाद का पवित्र चरित्र लोग प्रेम और सम्मान के साथ पढ़ते या सुनते आ रहे हैं और भविष्य में भी इसी प्रकार का अनन्त काल तक अविरल उनकी प्रशंसा व अलौकिक महिमा के गीत गाते रहेंगे। इसे ही मनुष्य का जन्म सफल होना कहते हैं। अन्यथा दिन-प्रतिदिन सहस्त्रों प्राणी इस जगत में जन्म लेते हैं और फिर जीवन व्यर्थ ही गंवा परलोकगामी भी हो जाते हैं और उनका आगमन कोई नहीं जान पाता, वैसे ही उनका प्रस्थान भी नहीं जानता। ऐसा जन्म होना और न होना समान ही है।
‘भक्त शिरोमणि प्रह्लाद’ शीर्षक पुस्तक विज्ञ पाठकों के सम्मुख उपस्थित करते हुए मुझे अतीव हर्ष हो रहा है। आशा व पूर्ण-विश्वास है कि प्रबुद्ध पाठकगण भक्ति मार्ग की ओर प्रेरित होकर इस कृति का हृदय से अवश्य स्वागत करेंगे। तभी मैं अपने तुच्छ प्रयास को सफल समझूँगा।

हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु

बहुत पुराने समय की बात है। देव और दानव-वंश के आदि पुरुष कश्यप की दो स्त्रियाँ थीं। उनके नाम थे-1, दिति 2. अदिति। दिति से कश्यप के जो संतान उत्पन्न हुई वह दैत्य और अदिति की कोख से उत्पन्न हुई संतान आदित्य या देव कहलाए।
इन दो माताओं से उत्पन्न बालक और बालिकाओं का स्वभाव एकदम एक-दूसरे के विपरीत था। दैत्य या दानव स्वभाव से ही बड़े लड़ाकू, स्वार्थी, दुराचारी और संकीर्ण विचारों के थे। परन्तु उन्हीं के सौतेले भाई देव बड़े ही शान्त, परोपकारी, सदाचारी और उच्च विचारों के थे आचार-विचारों में इतना अधिक भेद होने कारण इन दोनों दलों में परस्पर बड़ा विरोध रहा करता करता था।
दिति के गर्भ से दो बड़े़ ही बलवान और पराक्रमी पुत्र हुए थे—हिरण्याक्ष और हिरण्याकशिपु। ये दोनों भाई बाल्यकाल से ही बड़े अहंकारी, हिंसक और क्रोधी थे ज्यों-ज्यों उनकी अवस्था बढ़ती गई, त्यों-त्यों उनका बल पराक्रम और उत्पात बढ़ता गया।
वे लोग बराबर अपने बल के घमंड में ऐंठकर चला करते और राह चलते लोगों से भी बेमतलब रार मचाया करते। चाहे कोई कमजोर हो या मजबूत, उससे झगड़ा मोल लेना ही उनका मुख्य कार्य था। जो बल में उनकी बराबरी कर सके। जंगल के जानवर तक उनके उनके भय से बुरी तरह कांपा करते थे। वे दोनों जंगलों में जाकर बाघ और सिंह तक पर चढ़ाई कर बैठते। हाथी और भेड़ को पकड़कर खूब तंग करते । वे जानवर उनके देखते-ही-जंगल छोड़कर भाग खड़े होते।
नदी और झीलों में घुसकर वे लोग घड़ियाल, मछली, मांस और कछुए आदि जल के जीव-जन्तुओं को पकड़ कर ले जाते थे। उनके जल में कूदते ही वे जीव-जन्तु भी अपने प्राण बचाने की चिन्ता में कहीं जाकर छिप जाते। जिस समय ये दोनों भाई आपस में कुश्ती लड़ने लगते, उस समय सारी पृथ्वी हिलने-डुलने लगती। कहने का तात्पर्य यह है कि उनके भय से सारे संसार के लोग, पशु-पक्षी और जीव-जन्तु थर-थर कांपा करते। उनका नाम सुनते ही लोग त्राहि-त्राहि करने लगते।
इस प्रकार कुछ वर्षों में दोनों भाइयों ने तीनों लोकों छान डाला। कहीं कोई वीर या राजा-महाराज ऐसा नहीं बचा, जिसे उन दोनों ने युद्ध में पराजित न किया हो या मारकर सुरपुर न भेज दिया हो। अतएव धीरे-धीरे तीनों लोकों के बड़े भाग पर उन लोगों का राज्य कायम हो गया औरअतुल धनराशि उनके कोष में एकत्र हो गई।

इस बोझ के आ पड़ने से हिरण्यकशिपु का मन तो थोड़ा शान्त हो गया और वह दिन-रात राजकाज के कर्मों और ऐशोआराम में मस्त रहने लगा।
किन्तु हिरण्याक्ष का मन फिर भी लड़ाई-झगड़े और मारपीट से न भरा। वह और भी विकराल रूप धाऱण कर स्वर्ग, मर्त्य और पाताल तीनों लोकों में विचरण करने लगा और मनमाना उत्पात मचाने लगा। तीनों लोकों के निवासी उसके अत्याचार से बुरा तरह घबरा उठे। उनका खाना-पीना और सोना तक हराम हो गया।
उन दोनों राक्षसों की एक विशेषता और थी। वे दोनों शिवजी के बड़े भक्त थे। वे इतने कट्टर शैव थे कि दूसरे देवताओं को कोई चीज नहीं समझते थे। उन्हें अन्य देवी-देवताओं से इतनी अधिक चिढ़ थी कि यदि वे किसी को शिवजी के अतिरिक्त किसी दूसरे देवता की पूजा करते हुए देखते तो उसे बड़ा कठोर दंड देते। अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां व मन्दिर आदि तुड़वा देते और उनके उपासकों का घर-द्वार बुरी बुरी तरह लूट लेते। उनके इस धार्मिक उत्पात के कारण भी प्रजा में घोर अशान्ति व्याप्त थी।
एक तो उनके मन में दूसरे देवताओं के प्रति इतना विद्वेष था, दूसरे वे लोगों के मुंह से बराबर ही विष्णु भगवान की महिमा और बल आदि का बखान सुना करते। एक दिन तो किसी विद्वान ने उनसे यहाँ तक कह डाला ‘‘विष्णु ही चराचर के एकमात्र पालन करने वाले हैं। बल में, विद्या में और बुद्धि में कोई भी उनका मुकाबला नहीं कर सकता। आज तक उनके समान प्रतापी कोई भी आदमी पैदा नहीं हुआ।’’
यह बात सुनते ही दोनों दानवों का खून खौलने लगा। वे लोग अभिमान में इतने चूर रहते थे कि अपने सामने किसी को कुछ समझते ही नहीं थे। उनका ख्याल था कि अब त्रिलोक में उनके समान बलवान और शक्तिशाली अन्य कोई नहीं है।
अस्तु, विष्णु भगवान की प्रशंसा सुनते ही दोनों भाई उनको युद्ध में परास्त करने के लिए बेचैन हो उठे। हिरण्याक्ष तो एकदम पागल हो उठा और विष्णु भगवान को तुरन्त चबा जाने के लिए बड़ी उछल-कूद मचाने लगा। उसने उसी क्षण संकल्प किया कि तीनों लोकों में जहां विष्णु मिलेंगे उन्हें ढूँढ़कर उनसे लड़ाई करूंगा और उन्हें नीचा दिखाकर अपनी प्यास बुझाऊंगा।

वह उसी दम भगवान विष्णु की खोज में घर निकल पड़ा और चलते समय अपने भाई से कहता गया कि अपने राज्य में जितने विष्णु के मन्दिर मिलें, सबको नष्ट करा दो और जितने सारे वैष्णव मिलें उन्हें फांसी पर लटका दो।
हिरण्यकशिपु स्वयं भी तो जला-भुना था; उधर बड़े भाई की आज्ञा भी मिल गई। फिर क्या था, सारे राज्य-भर में उसने अत्याचार करना प्रारम्भ कर दिया। जहां कहीं वैष्णवों के मन्दिर वगैरह मिले, बुरी तरह ढहवा दिए गए और हरिनाम जपने वाले आदमी खोज-खोजकर जान से मार डाले गए। वृद्धों, बालकों तथा स्त्रियों तक को नहीं छोड़ा गया। सारी प्रजा उस नृशंस अत्याचार से तबाह हो गई और सर्वत्र त्राहि-त्राहि मच गई। इसका परिणाम यह हुआ कि भय से लोगों ने विष्णु भगवान की पूजा तो दूर रही, उनका नाम तक लेना छोड़ दिया। एक प्रकार से त्रिभुवन से वैष्णव धर्म लुप्त हो गया।
उधर भगवान विष्णु की खोज में हिरण्याक्ष देश-विदेश रौंदने लगा। पागल हाथी की तरह जो उसको रास्ते में मिलता, उसे ही वह कुचलता जाता। विष्णु भगवान को मारने का मानो उस पर भूत सवार हो गया। वह उस धुन में खाना, पीना और सोना आदि तक भूल गया। ज्यों-ज्यों विष्णु भगवान के मिलने में देर होती थी, त्यों-त्यों उसके हृदय में उनके प्रति द्वेष और अधिक बढ़ता जाता था और उसकी क्रोधाग्नि भभकती जाती थी।

हिरण्याक्ष का वध

एक दिन हिरण्याक्ष उछलता-कूदता बड़े वेग से स्वर्ग जा पहुंचा। उसने सामने से देवराज इन्द्र को ऐरावत हाथी पर सवार होकर जाते देखा। उनको देखते ही उस राक्षस ने सिंह के समान दहाड़ते हुए इन्द्र को युद्ध के लिए ललकारा। इन्द्र को उसके पराक्रम की बात मालूम ही थी। उन्होंने किसी प्रकार इस आफत को टालने के लिए उससे कहा, ‘‘भाई, तुम यह क्या कह रहे हो ? तुम तो मेरे सौतेले भाई ठहरे ! भाई-भाई में भी कहीं युद्ध होता है ?’’
हिरण्याक्ष को भला उचित-अनुचित से क्या मतलब ? उसे तो किसी से युद्ध करना था। उसने गर्जते हुए कहा--‘‘भाई-भाई में तो युद्ध इसलिए नहीं होता कि लोग करते ही नहीं। भला, बल आजमाने में दोष ही क्या है ?’’ इतना कहकर राक्षस इन्द्र पर टूट पड़ा।
इन्द्र उसका विकट रूप देखकर कांप गए। उन्होंने देखा, उसका सिर मानो आकाश छू रहा है। उसकी दोनों आंखें मानो चन्द्र-सूर्य की भांति जल रही हैं, उसका अंग-प्रत्यंग क्रोध के मारे कांप रहा है।
राक्षस का भयंकर शब्द सुनकर उनका ऐरावत हाथी भयभीत हो गया और सूंड़ उठाकर सिंघाड़ता हुआ भाग चला। जब स्वयं देवराज इन्द्र की यह दशा थी तब अन्य देवताओं की तो बात ही क्या ? राक्षस का गर्जन-तर्जन सुनकर जो जहां था और जिस रूप में था, उसी रूप में जान लेकर भाग खड़ा हुआ।
हिरण्याक्ष को देवताओं की यह कायरता देखकर बड़ी हंसी आई। उसने बड़े कड़े शब्दों में उनकी भर्त्सना करते हुए युद्ध के लिए ललकारा। परंतु जान के आगे ललकार कौन सुनता ? ज्यों-ज्यों वह ललकारता त्यों-त्यों वे और भी इस डर से अधिक जोर से भागते कि कहीं वह पकड़ न ले। उस समय अमरावती की दशा बहुत बुरी हो गई। देखते-देखते सारा स्वर्ग सूना हो गया और हिरण्याक्ष ने जिसे पाया चूर-चूर कर डाला। नन्दनवन एकदम उजाड़ डाला और कितने ही सुन्दर-सुन्दर भवनों को तहस-नहस कर डाला। देखते-देखते अत्यन्त सुन्दर अमरपुरी श्मशान की तरह धांय-धांय करने लगी।
इस प्रकार बहुत देर तक उत्पात मचाने के पश्चात् जब हिरण्याक्ष ने देखा कि अब सामने कोई दिखाई नहीं देता तो वह जल-विहार करने के लिए समुद्र में कूद पड़ा। उसके वहां पहुंचते ही सारे समुद्र में खलबली मच गई।
समुद्र में रहने वाले बड़े-बड़े जीव-जन्तु भी समुद्र छोड़कर भागने लगे। कितने ही छोटे-बड़े जलचर उसकी सांस की गर्मी से जलकर मर गए। कितने ही इधर-से उधर कूंदते-फांदते समय उसके पैरों से कुचल गए। उसके लगातार समुद्र-मंथन के कारण समूचा भूमण्डल डगमगाने लगा।

इस घटना के कुछ दिन पश्चात् समुद्र के राजा वरुण महाराज की नगरी में हिरण्याक्ष पहुँच गया और वहां लगातार कई वर्षों तक रहकर ऊधम मचाता रहा। वरुण ने बहुत कहा, प्रार्थना की परंतु उस राक्षस ने एक न सुनी। अन्त में एक दिन तो उसने उन्हें ही युद्ध के लिए ललकारा और कहा, ‘‘सुना है, आप तो बड़े ही वीर तथा पराक्रमी हैं। आपने एक बार दानवों को जीतकर राजसूय यज्ञ भी किया था। इसलिए आ जाइए, आज थोड़ी देर आपके साथ भी अपनी ताकत आजमा लूं और देख लूं कि आप कितने बहादुर हैं। और युद्ध विद्या में आपकी कहां तक पैठ है। आप तो जानते ही हैं कि बहादुर लोग लड़ाई के मैदान में अपनी कला दिखाया करते हैं, अपने मुंह से अपनी बड़ाई नहीं बखानते। अतएव, उतर पड़िए मैदान में, देखूं, देवताओं में भी कुछ जान है या नहीं।’’
वरुण महाराज को राक्षस के ये वाक्य तीर के समान चुभते हुए मालूम हुए, किन्तु वे लाचार थे। उससे बैर मोल लेना आग के साथ खेलने के समान था। उन्होंने उस अपमान को कड़वी दवा की घूंट के समान पी जाना ही उचित समझा और उस आफत से अपनी जान बचाने के लिए बड़े ही नम्र शब्दों में कहा, ‘‘सुनो, असुरपति ! अब मैं लड़ाई-झगड़े के झंझट से बिल्कुल अलग रहना ही पसन्द करता हूँ। जब मुझे भी अपनी जवानी का घमण्ड था और शारीरिक बल का नशा था, तब चारों ओर घूमकर वीरों को ढूंढ़ा करता था और उनसे बल आजमाया करता था। किन्तु अब वह बात नहीं रही। शरीर में वह बल भी नहीं रहा।
‘‘आजकल तो बस सारे विश्व में आप ही इस विषय में सर्वोपरि हैं। आपकी बराबरी का न तो कोई वीर है और न कोई रणकुशल। हां, तीनों लोकों में यदि कोई आपके मुकाबले ठहर सकता है तो वह हैं विष्णु। आप उनके पास जाइए। शायद वह आपकी लड़ाई की साध पूरी कर दें।’’
इतना सुनकर हिरण्याक्ष विष्णु के प्रति गुर्राने लगा। उनके प्रति द्वेष तो उसे पहले से ही था और वह उनकी खोज में भी था। आज वरुण के मुख से उनकी प्रशंसा सुनकर उसका घाव पुनः ताजा हो गया। वह मन ही मन क्रोध के मारे जल-भुनकर खाक हो गया।
ठीक इसी समय अवसर देख नारद महाराज आ पहुंचे और उन्होंने हिरण्याक्ष के पास जाकर उससे हितैषी की भांति बातें करते हुए उसे विष्णु (भगवान) का समुद्र वाला पता बतला दिया।
फिर क्या था, अभिमान में अन्धा हुआ हिरण्याक्ष बड़े वेग से समुद्र चीरता हुआ पाताल की ओर चल पड़ा। वह पागलों की भाँति अंधाधुंध चला जा रहा था और रास्ते में जिनते जीव-जन्तु मिलते थे, सबको सुरधाम भेजता जाता था। बिना विष्णु को देखे ही वह उन्हें नाना प्रकार से गाली सुनाने लगा। उसके चिल्लाने या उछलने-कूदने से जो शोर हुआ उससे सारा आकाश-मण्डल गूंज उठा।

ठीक इसी समय अथाह जल-राशि में बड़ी भयंकर खलबली मच गई। समुद्र को मथता हुआ और भीषण रूप से गुर्राता हुआ एक महाकाय सुअर समुद्र से निकलता हुआदृष्टिगोचर हुआ। उस गुर्राहट को सुनकर तीनों लोकों के प्राणी बुरी तरह कांपने लगे। ऐसा भय सबके अन्दर समा गया कि अब प्रलय समीप आ गई। परंतु असीम बलशाली हिरण्याक्ष अचल बना रहा। उसे इसकी तनिक भी परवाह नहीं थी। वह तो युद्ध का भूखा था। जब उसने एक ऐसे प्राणी को आते हुए देखा तो वह प्रसन्नता के मारे फूल उठा।
जब मनुष्य अभिमान में चूर हो जाता है तब उसकी बुद्धि मारी जाती है और वह अपनी भलाई-बुराई समझने में असमर्थ हो जाता है, तब उसकी ऐसी ही दशा हो जाती है। यही कारण था कि काल के मुँह में भी जाते हुए अभमानी राक्षस हिरण्याक्ष को प्रसन्नता ही महसूस हुई।
जब बाराह भगवान समीप आए तो हिरण्याक्ष ने पहले से कई गुनी तेज आवाज में चिल्लाते हुए कहा, ‘‘अरे कापुरुष ! मेरे बाहुबल की महिमा सुनकर तू यहां छिपा बैठा है। तुझे मालूम नहीं कि मैंने सारे ब्रह्माण्ड को रोंद डाला है और तेरे जैसे नीचों का मैं वध किया करता हूं। फिर तू कब तक अपनी जान बचा सकता है ? मैंने सुना है कि अपनी माया के बल पर तूने कितने ही असुरों को मार डाला है। देखूं, तेरी माया कैसी है और तुझमें कितनी ताकत है खूब संभलकर आना। आज तेरा अन्तिम दिन है। आज त्रिभुवन को कंपाने वाली इस गदा से तेरी देह चूर-चूर करके अपनी प्यास बुझाऊंगा। तुझसे असुरों के मारने का बदला चुकाऊंगा।’’
इस प्रकार अनाप-शनाप प्रलाप करता हुआ वह भूखे सिंह की भांति भगवान की ओर दौड़ पड़ा। इस समय उसने बड़ा ही विकराल रूप धारण कर लिया था।
वाराह भगवान ने तुरन्त उत्तर दिया, ‘‘अरे अभद्र हिरण्याक्ष, सन्निपात के रोगी की तरह क्या व्यर्थ प्रलाप कर रहा है ! मैं निश्चय ही एक जल-जन्तु हूं, परंतु तेरे जैसे पामर लोगों को ढूँढ़-ढूँढ़कर दंड देना ही मेरा काम है। मेरी महिमा भला कौन गा सकता है ? तेरे जैसे नीच और अन्यायी व्यक्ति की प्रशंसा कोई वीर नहीं कर सकता। चला आ, शीघ्र आकर मुझे मार डाल, जिससे तेरी प्रतिहिंसा की अग्नि में धधकती हुई तेरी छाती ठंडी हो जाए।’’
वाराह भगवान का उत्तर सुनते ही हिरण्याक्ष का सारा शरीर कांपने लगा और वह खूब लम्बी-लम्बी सांसे लेने लगा। अपने चिरशत्रु विष्णु के मुख से, वह भी जब कि वे एक वाराह के रूप में थे, वह भला अपना तिरस्कार कैसे सहन कर सकता था।
वह तुरन्त वाराह के पास पहुंच गया और अपनी गदा से उसने बड़े जोर का प्रहार किया। भगवान ने जरा किनारा काटकर उसका वार विफल कर दिया और अपनी गदा उस पर चलाई। इस प्रकार बहुत देर तक दोनों में गदा युद्ध होता रहा। इस घोर संग्राम में दोनों वीरों के शरीर क्षत-विक्षत हो गए। शरीर से रक्त बहने के कारण कोसों दूर तक समुद्र का पानी लाल हो गया।

देवतागण बड़ी उत्सुकता के साथ यह युद्ध देख रहे थे और मन ही मन कामना कर रहे थे कि जल्द से जल्द यह राक्षस मार डाला जाए। ज्यों-ज्यों यह युद्ध होता था और राक्षस हिरण्याक्ष दबता नजर नहीं आता था, त्यों-त्यों देवता लोग बुरी तरह घबरा उठते थे। मगर यह सब जानते हुए भी भगवान शीघ्र उसका काम तमाम नहीं करना चाहते थे। वह तो उसे मारने के पूर्व बन्दर के सदृश खूब नचाकर परेशान करना चाहते थे।
थोड़ी देर के पश्चात् हिरण्याक्ष ने एक ऐसा वार किया, जिससे भगवान का वार तो व्यर्थ हुआ ही, साथ ही उनकी गदा भी नीचे जा गिरी। वाराह भगवान को निरस्त्र देख देवों ने तो हाहाकार मचाना शुरू कर दिया। यह हिरण्याक्ष के लिए भी मौका अच्छा ही था। मगर युद्ध धर्म के अनुसार वह चुपचाप खड़ा रहा।
तब तक भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र का आह्वान किया। प्रचंड तेज के साथ सुदर्शन चक्र को आते देख हिरण्याक्ष दुगुने क्रोध के साथ टूट पड़ा, किन्तु उसका आक्रमण निष्फल हुआ। फिर उसने गदा चलाई लेकिन भगवान के चक्र ने उसे बीच में ही पकड़ लिया। गदा हाथ से निकल जाने पर वह बड़ा लज्जित हुआ और त्रिशिख नामक त्रिशूल लेकर युद्ध करने लगा। त्रिशूल को भी चक्र ने खंड-खंड कर डाला।
यह दैत्यराज ने तुरंत अपनी माया फैलायी। एकाएक बड़ी प्रचण्ड आंधी चलने लगी और सारे आसमान में धूल छा जाने से घोर अंधकार छा गया। ईंट-पत्थरों की वर्षा होने लगी तथा चारों ओर हाड़, मांस, मल तथा मूत्र की भी बड़ी भीषण वृष्टि होने लगी। बड़ा वीभत्स दृश्य उपस्थित हो गया। परन्तु मायावती भगवान के चक्र ने सारी माया धूल में मिला दी।
अब हिरण्याक्ष ने देखा कि मेरी कोई भी कला काम न आई तो उसके क्रोध का ठिकाना न रहा। वह अपनी सारी ताकत लगाकर वाराह भगवान पर झपटा और चाहा कि अभी मसलकर उनकी इहलीला समाप्त कर दूं। परन्तु भगवान ने भी शीघ्र ही उसकी मंशा ताड़ ली।
उन्होंने देखा कि अब इसे जीवित छोड़ना ठीक नहीं। उधर देवताओं की आधीरता भी चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी। अस्तु, भगवान ने इतने जोर जोर से हिरण्याक्ष के दोनों कानों के पास घूंसा मारा कि उसकी दोनों आँखें एकदम बाहर निकल आईं और वह धड़ाम से कटे हुए वृक्ष की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ा। देखते-ही देखते चोट से व्याकुल प्राण पखेरू सदा के लिए उसके शरीर रुपी पिंजरे को छोड़कर उड़ गये।
हिरण्याक्ष के मरते ही देवताओं ने पुष्प-वृष्टि की और अप्सराओं ने भगवान का गुणगान किया। भगवान के जय-जयकार से सारा आकाश मण्डल-गूंज उठा।



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