अद्भुत किन्तु सत्य - अरुण Adbhut Kintu Satya - Hindi book by - Arun
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अद्भुत किन्तु सत्य

अरुण

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :176
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4909
आईएसबीएन :81-7043-549-8

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विश्व में घटित चार सौ से अधिक आश्चर्यजनक सत्य घटनाओं का रोचक वर्णन

Adbhut Kintu Satya

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

पुस्तक के लेखक श्री अरुण एक अध्ययनशील व्यक्ति हैं। वर्षों के अध्ययन के आधार पर आपने अपनी प्रस्तुत पुस्तक में चार सौ से अधिक आश्चर्यजनक और कौतूहलपूर्ण घटनाओं एवं प्रसंगों का रोचक वर्णन किया है। इस विशाल संसार में जिसमें हम रहते हैं, अद्भुत और आश्चर्यजनक बातों का अपूर्व भंडार है। अतीत में बहुत-सी ऐसी बातें घटी हैं और सैंकड़ों ऐसे व्यक्ति हो गये हैं जो आज भी हमारे लिए आश्चर्यजनक हैं। सैंकड़ों प्राकृतिक तत्त्व ऐसे हैं जिनके विषय में सुनने और पढ़ने से सहज में विश्वास नहीं होता है। पर यह ध्रुव सत्य है कि अविश्वसनीय होने पर भी वे अवश्य घटित हुई हैं।
पुस्तक को पढ़कर पाठक का मनोरंजन तो निश्चय ही होगा, पर साथ ही साथ उसे सैकड़ों नयी बातों का भी परिचय प्राप्त होगा, जिससे उसका ज्ञान का भण्डार बढ़ेगा। ज्ञानवर्द्धन की दृष्टि से यह पुस्तक अद्भुतता और रोचकता को लिए सत्य का बोध कराती है।
विश्वास है अरुणजी की अन्य कृतियों की भांति उनकी इस कृति का भी स्वागत होगा।

भुलक्कड़ जीनियस

प्रोफेसर आर्नल्ड टॉयनबी के, जिन्हें अपनी अविस्मरणीय पुस्तक ‘स्टडी ऑफ हिस्ट्री’ लिखने में तीस साल लगे थे, दिमाग में पुराने लोगों के बारे में असंख्य तथ्य याद हैं। लेकिन अपने दिन-प्रति-दिन के व्यवहार में वे बड़े भुलक्कड़ हैं। एक बार उन्हें किसी प्रमुख लंच पर जाना था जहाँ वे अच्छे-से-अच्छे दीखाना चाहते थे। लेकिन जब वह चैथम हाउस में पहुँचे तो पतलून दूसरे सूट की थी और जॉकेट दूसरे सूट की। उनकी पत्नी ने हाथ मलते हुए कहा, ‘‘इनसे मात खाई। मुझे दुबारा इन्हें कपड़े बदलने घर भेजना पड़ा।’’
जब वे चाय बनाते हैं तो उन्हें यह नहीं मालूम कि पहले पानी डालना चाहिए या चाय की पत्तियाँ-और वे भी कितनी। कुछ दिन हुए उनके गुसलखाने के नल की टोंटी टूटकर उनके हाथ में आ गई। गरम उबलता पानी फर-फर गिरता रहा और वे बुद्धू बने ताकते रहे। उनकी समझ में नहीं आया, क्या करूँ।
बहुधा यह हाल सब प्रतिभाशाली व्यक्तियों का होता है। जिस कार्य में वे लगे रहते हैं उस पर उनका ध्यान केन्द्रित होता है। छोटी-छोटी बातें उनकी दृष्टि से भागती रहती हैं।

यही हाल डॉक्टर जूलियन और अल्ड्डअस हक्सले के दादा प्रसिद्ध वैज्ञानिक टॉमस हक्सले का था। एक बार वे नाई की दुकान पर बैठे हजामत बनवा रहे थे कि किसी समस्या में वे खो गये। हजामत बनवाने के बाद भी वे कुर्सी पर बैठे रहे। नाई उनका जानने वाला था। उसने सोचा कि वे ऊँघ गए हैं। पाँच मिनट के बाद उसने उनका कंधा थपथपाया और धीरे-से कहा, ‘‘सर, सो गए क्या ?’’
हक्सले ने उत्तर दिया, ‘‘नहीं, बिल्कुल नहीं। बात यह है मुझे दूर का दिखाई नहीं देता। यहाँ जब मैं चश्मा उतारकर कुर्सी पर बैठा तो सामने के शीशे में मुझे अपना प्रतिबिम्ब नहीं दिखाई दिया और मैंने समझा कि मैं अपने घर पर बैठा हूँ।’’
हक्सले बहुधा अपने भेंट के समय और स्थान को भी भूल जाते थे। एक बार वे यूस्टन में रॉयल सोसायटी में जिसके वे प्रसिद्ध फैलो थे भाषण देने के लिए पहुँचे। क्योंकि ट्रेन लेट थी, इसलिए उन्होंने प्लेटफार्म लपककर पार किया और गाड़ी में छलांग लगाते हुए बोले, ‘‘तेजी से चलो।’’
कोचवान ने घोड़े के चाबुक जमाये और बग्घी तेजी से भागने लगी। तभी हक्सले को ध्यान आया कि उन्हें यह तो याद ही नहीं रहा कि उन्हें जाना कहाँ है। उन्होंने चिल्लाकर पूछा, ‘‘कोचवान, मैंने तुम्हें कहाँ चलने के लिए कहा था ?’’
‘‘आपने स्थान मुझे नहीं बताया। बस तेज चलने को कहा था और वह आप देख लीजिए मैं कितना तेज गाड़ी भगा रहा हूँ।’’
परन्तु एडीसन जैसा भुलक्कड़ शायद ही कोई हो। वह केवल अपने काम से मतलब रखता था। यहाँ तक कि 1871 के क्रिसमस दिवस पर मिस स्टिलवैल, जो उसकी एक फैक्टरी में काम करती थी, के साथ अपने विवाह के बाद वह अन्य कार्यक्रमों को छोड़कर चला गया, ‘‘मुझे कुछ मिनटों का काम है, उसे करके आता हूँ।’’

लगभग आधी रात के समय उसका बैस्टमैन उसे ढूँढ़ता हुआ आ पहुँचा और बोला, ‘‘टॉम, अब तुम्हें घर चले जाना चाहिए।’’
‘‘लेकिन मुझे बहुत सारा काम करना पड़ा है,’’ एडीसन ने प्रतिवाद किया।
‘‘आज सवेरे तुम्हारी शादी हुई है,’’ दोस्त ने बिगड़कर कहा, ‘‘और मेरी तुम्हारी बाट देख रही है।’’
एडीसन का चेहरा चमक उठा। मेज पर मुक्का मारते हुए वह बोला, ‘तुमने ठीक याद दिलाया, आज सुबह ही तो मेरी शादी हुई है।’’
यही हाल अमेरिकन ड्वाइट मॉरो का था। एक दिन वह ट्रेन में पढ़ने में ध्यान-मग्न था इतने में टिकट चैकर वहाँ आया और उससे टिकट माँगा। मॉरो ने सारी जेबें उलट-पलटकर डालीं पर टिकट न मिला।
चैकर मॉरो को जानता था। उसने कहा, ‘‘मैं जानता हूँ कि आपके पास टिकट है; जब आपको मिल जाए हमें दे दीजिएगा।’’
‘‘यह तो मैं जानता हूँ,’’ घबराए हुए मॉरो ने कहा, ‘‘लेकिन मैं तो यह जानना चाहता हूँ कि बिना टिकट के मुझे यह कैसे मालूम चलेगा कि मैं कहाँ जा रहा हूँ।’’
अधिकतर विद्वान पुरुष इसी बीमारी के शिकार थे। जर्मन लेखक लैसिंग सड़कों पर घण्टों तक घूमता रहता था कि वह घर से किस काम के लिए चला था। एक अँधेरी रात वह सड़कों पर घूम रहा था दिमाग में अपने काम की उधेड़बुन लिये। सहसा वह अपने घर के द्वार पर आ पहुँचा। उसने चाबी खोजी पर नहीं मिली, तब द्वार खटखटाए।
ऊपर से नए रखे गए नौकर ने नीचे झाँककर देखा और अपने मालिक को न पहचानकर बोला, ‘‘प्रोफेसर साहब घर पर नहीं हैं।’’
‘‘कोई बात नहीं,’’ लैसिंग ने नम्रता से कहा, ‘‘मैं फिर उनसे मिलने आऊँगा।’’

भुलक्कड़पने से परेशानी

न्यूयार्क पोस्ट का प्रकाशक जे. डेविड स्टर्न अक्सर टाई पहनना भूल जाता था, या घर पर घड़ी भूल जाता था, या बिना जेब में पैसे रखे टैक्सी में बैठ जाता था। एक से अधिक बार वह पुलिस स्टेशन ले जाया गया जहाँ उसका सेक्रेटरी उसकी पहचान के लिए बुलाया जाता था। एक बार वह सड़क पर जा रहा था जब उसका एक मित्र मिल गया। मित्र ने हाथ स्टर्न की बाँह में डालकर कहा, ‘‘आओ स्टर्न, आज मेरे साथ लंच खाओ।’’
‘‘मैं तैयार हूँ पर इस शर्त पर कि पास के किसी स्थान पर चलो। मैं बहुत लेट हो गया हूँ।’’
वे पास के एक रेस्ट्राँ में घुसे और मेज पर बैठ गए। मित्र ने वेटर को इशारा करके बुलाया।
‘‘मुझे पता नहीं मेरे साथ क्या गड़बड़ है,’’ स्टर्न ने कहा, ‘‘मुझे बिल्कुल भूख नहीं लग रही।’’
इसका कारण वेटर के आने पर पता चल गया। वह स्टर्न से बोला, ‘‘माफ करें, श्रीमान् । अभी पाँच मिनट हुए तो आप अपना भोजन निमटाकर गए थे।’’
सेना के व्यक्ति भुलक्कड़ नहीं होते, लेकिन यूनान के जनरल मेटक्सास एक अपवाद थे। भूमध्य सागर में एक नई हवाई पट्टी का निरीक्षण करने के लिए जाते हुए उन्होंने हवाई जहाज स्वयं चलाना आरम्भ किया।
हवाई अड्डा दृष्टिगोचर होते ही चालक ने महसूस किया कि जनरल हवाई जहाज हवाई पट्टी पर उतारने वाले हैं। उसने कहा, ‘‘माफ करें, सर ! हमें सागर में उतरना चाहिए। यह पानी में उतरने वाला हवाई जहाज है।’’
‘‘हाँ, हाँ, क्यों नहीं,’’ मेटक्सास हँस पड़े ‘‘मैं भी कैसा गधा हूँ।’’
उन्होंने जहाज बन्दरगाह की ओर मोड़ दिया और बड़ी निपुणता से उसे पानी पर उतार दिया। वे बड़े प्रसन्न हुए और चालक की ओर मुड़कर बोले, ‘‘कमाण्डर, जिस प्रकार तुमने मेरा ध्यान इस भयंकर गलती की ओर जो मैं करने जा रहा था खींचा, इसकी मैं दाद देता हूँ। मैं तुम्हें कभी नहीं भूलूँगा।’’
इतना कहकर उन्होंने द्वार खोला और सागर में पग बढ़ाया।

मकान बदल लिया

कुछ वर्ष हुए लन्दन की एक अदालत में जज ने प्रतिवादी से पूछा, ‘‘तुम्हारा कहना यह है कि तुमने भूल से पत्नी को खिड़की से बाहर फेंक दिया।’’
‘‘यॉर ऑनर, हाँ,’’ प्रतिवादी ने माना। ‘‘पहले हम निचली मंजिल पर रहा करते थे। और मैं बिल्कुल भूल गया कि हम दूसरे मकान में चले आए हैं।’’

पाइप सुलगाया

सर जेम्स बैरी की जेबें खाली लिफाफों से भरी रहती थीं। जिन्हें वे रद्दी की टोकरी में फेंकना भूल जाते थे। एक दिन वे घर में आग के सामने बैठे थे। उन्होंने जेब से कागज निकाला, एक कोने को आग दिखाई और अपना पाइप सुलगाने लगे।
उनके पास बैठे मित्र ने पुकारा, ‘‘हे भगवान ! बैरी, तुम क्या कर रहे हो ? यह तो चैक है।’’
वह ठीक था। कागज 100 पौंड का चेक था।

अद्भुत मेधा-शक्ति

इसका यह अर्थ नहीं कि लेखकों और महापुरुषों की स्मरण-शक्ति खराब होती है। वे जिस कार्य में लगे रहते हैं उसमें उनकी स्मृति देखिए। फिर सब प्रकार के व्यक्ति पाए जाते हैं। कुछ ऐसे हैं जिन्हें अपना जन्मदिवस बताने के लिए दो बार सोचना पड़ता है और कुछ ऐसे होते हैं कि टनों तथ्य स्मृति में सँजोय रखते हैं। वे दूसरी दुनिया के आदमी मालूम पड़ते हैं। इसका एक उदाहरण अंग्रेज, लेसली वैल्च, है जिसने खेलकूद का विशेष अध्ययन किया है। वह ग्रेट ब्रिटेन में पिछले 150 वर्षों में हुई किसी भी खेल-कूद की घटना का वर्णन कर सकता है और वह सर्वदा सत्य निकलता है।
जब लेसली 22 वर्ष का नवयुवक था तब उसकी स्मरण-शक्ति बहुत दुर्बल थी। उसने स्मरण-शक्ति ठीक करने का प्रयत्न किया और नतीजा यह है कि आज वह ब्रिटेन के रेडियो-श्रोताओं तथा टेलीविजन-दर्शकों को अपनी अद्भुत स्मरण-शक्ति से चकित करता रहता है। फुटबाल, क्रिकेट, घुड़दौड़, टेनिस, तैराकी आदि समस्त खेलों के किसी भी मैच का वह वर्णन कर सकता है। इसी कारण उसे खेलकूद का चलता-फिरता गजट कहा जाता है।
ऐसी स्मृति होने के लिए एक विशेष बात है और वह यह कि किसी चीज में विशेष रुचि रखना। जिस तथ्य में रुचि होगी वह स्मृति में घुस बैठता है। जिस ओर ध्यान नहीं दिया जाता वह चाहे कितनी ही विलक्षण मेधा हो कभी याद नहीं रह सकता।
प्रसिद्ध संगीतज्ञ मोजार्ट में यह विशेषता थी। जब वह रोम में था तब वह प्रसिद्ध सिस्टीन चैपेल में अलेग्री का ‘मिजरेर’ सुनने गया। वैटीकन अधिकारियों ने किसी को भी इसकी प्रतिलिपि करने से मना कर रखा था। लेकिन मोजार्ट ने होटल वापस जाकर स्मृति से इस ओपेरा की पूरी स्वरलिपि कागज पर उतार ली हालाँकि उसने पहली बार उसे सुना था।
इसे कहते हैं स्मरण-शक्ति
आश्चर्यजनक स्मृति वाले एक अन्य व्यक्ति थे दक्षिण अफ्रीका के फील्ड मार्शल स्मट्स। उनके पास निजी पुस्तकालय में पाँच हजार पुस्तकें थीं और उस पूरे संग्रह का उन्हें एक-एक शब्द याद था। जब चाहते वे कोई भी वाक्य प्रस्तुत कर देते थे, साथ में पुस्तक का नाम, पृष्ट-संख्या और पंक्ति-संख्या। ये सब पुस्तकें क्लासिकल साहित्य पर थीं और उसमें विशेष रुचि होने के कारण स्मट्स को सब कण्ठस्थ थीं।

जीनियस किन्तु भुलक्कड़

महान् प्यानोवादक रुबिन्सटीन की बड़ी विलक्षण स्मृति थी लेकिन केवल संगीत में। एक बार उसने कहा था कि विश्व के समस्त महान् संगीतज्ञों की अगर स्वरलिपि खो भी जाए तो उसे पूरा भरोसा है कि उन्हें अपनी याद से दोबारा लिख देगा, केवल दो बार संगीत सुनकर। एक बार वह दूसरे प्रसिद्ध प्यानो वादक लीज्ट की नवीनतम कृति सुन रहा था जिसकी स्वरलिपि बहुत कठिन थी। उसे केवल एक बार सुनकर उसने वहीं बैठे-बैठे उसकी पूरी प्रतिलिपि उतार दी। मगर यह काम निबटाकर जब वह लीज्ट के घर से बाहर निकला तो दस्ताने और छाता वहीं भूल गया था।

बैंक जल गया

डेनमार्क के नगर कोपेनहेगन में एक बैंक में आग लग गई। उसमें सोने और चाँदी के सिक्के तो बच गए लेकिन बैंक के सारे रिकार्ड जल गए। अजीब परिस्थिति पैदा हो गई। अगले दिन बैंक में जमा करने वालों की भीड़ लग गई और सब अपनी जमा वापस माँगने लगे। बैंक की सहायता को एक क्लर्क आया जिसका नाम बर्थोल्ड नीब्हूर था। उसने बताया कि उसे बैंक के 2000 ग्राहकों को हिसाब जबानी याद है। डायरेक्टरों को उसकी बात का विश्वास करना पड़ा। सबको धन दिया गया और पता चला कि सबको ठीक मिला है। उसे फौरन बैंक का डायरेक्टर बना दिया गया।

पाण्डुलिपि खो गई

टी. इ. लारेन्स की अमर पुस्तक ‘द सिक्स पिलर्स ऑफ विजडम’ की पूरी पाण्डुलिपि खो गई। लेकिन उसने बैठकर पुस्तक को दुबारा याददाश्त से लिख दिया और समय पर प्रकाशक को दे दिया।

अद्भुत बच्चा

1721 में ल्यूबेक, जर्मनी में एक बच्चा पैदा हुआ जिसका नाम क्रिश्चियन हीनेकर रखा गया और जो पाँच वर्ष की अवस्था में मर गया। इन पाँच वर्षों में ही उसने वह कर दिखाया जो आज तक किसी प्राणी ने नहीं किया। ढाई साल की आयु में गम्भीर विषयों की पुस्तकें पढ़ रहा था और इतिहास तथा भूगोल के किसी भी प्रश्न का उत्तर दे सकता था। वह बाइबिल की कोई भी उक्ति सुना सकता था और लैटिन, फ्रैंच, ग्रीक और जर्मन फटापट बोल सकता था। यदि वह जीवित रहता, तो संसार का एक अजूबा बन जाता। चार वर्ष की अवस्था में वह स्वीडन के दरबार में बुलाया गया और वहाँ उसने सबको आश्चर्यचकित कर दिया।

अनोखा संपादक

अठारहवीं शताब्दी के अन्त में लन्दन के एक अखबार के संपादक की स्मरण-शक्ति आश्चर्यजनक थी। पार्लियामेण्ट की प्रतिदिन की कार्यवाही याददाश्त से लिखने के कारण उसका नाम ‘मैमरी’ पड़ गया। उन दिनों हाउस में चल रही बहस के नोट लेने की मनाही थी। कोई संवाददाता नोट नहीं ले सकता था। पर इससे ‘मैमरी’ वुडफुल को कोई अन्तर नहीं पड़ता था। वह पार्लियामेण्ट में कहा प्रत्येक शब्द अपनी स्मरण-शक्ति में रख लेता था और समाप्ति पर दफ्तर में भागकर उसे शब्द-प्रति शब्द उतार लेता था। एक बार उसने किसी विशेष के पन्द्रह कॉलम छाप दिए जिनमें एक भी गलती न थी।

मोटों की दुनिया

यदि कोई पलता आदमी केले के छिलके पर फिसलकर गिर पड़े तो सब आदमी बड़ी सहानुभूति दिखाएँगे और सहारा देकर उठाएँगे। लेकिन यदि कोई मोटा आदमी गिर पड़े तो सहानुभूति दिखाना तो दूर रहा लोग हँसते-हँसते लोटपोट हो जाएँगे। इससे यह नहीं समझना चाहिए कि मोटे आदमियों का दुनिया में निभाव नहीं। मोटे आदमी बहुधा हँसमुख होते हैं और कई खेलकूद में तेज होते हैं तो कई बुद्धि में। 1921 में आस्ट्रेलियन टीम का कप्तान आर्मस्ट्रांग मोटा था। इंग्लैण्ड जाते समय उसने अपने को पतला करने के लिए जहाज में प्रतिदिन एक से दो घंटे तक कोयला झोंका, मगर जब वह इंग्लैंड आकर पहुँचा तो और मोटा हो गया था। इसी प्रकार लंदन में एक मिस्टर लौंग्ले रहते थे। उनका वजन 40 स्टोन से अधिक था और वे मुक्केबाजी में बड़ी रुचि रखते थे। याल्डन शहर में एडविन ब्राइट नाम का सब्जी बेचने वाला रहता था जिसके मशीन पर चढ़ते ही सुई 44 स्टोन पर चढ़ती थी, जबकि उसकी लम्बाई केवल 5’ 9’’ थी। उसका सीना 66’’, तोंद 83’’, जाँघ 33’’ और डौले 26’ थे। उसे घुड़सवारी का बड़ा शौक था (भगवान घोड़े को बचाए !) उसका कोट इतना बड़ा था कि 7 आदमी बड़ी आसानी से उसमें बन्द किये जा सकते थे।
मोटे बुद्धिमानों की भी कमी नहीं। टॉमस एक्विनास इतना गोल था कि मेज में से एक अर्धवृत्ताकार टुकड़ा काट दिया गया था जिससे वह खाना आराम से खा सके। जी.के. चेस्टरटन पर एक दृष्टि डालते ही पता पड़ा जाता था कि वह कितना मस्तमौला है। नेपोलियन की तोंद गोल हो गई थी और मेराबो भी खूब मोटा था। बाल्जक और ड्यूमा गोश्त के पहाड़ थे। विक्टर ह्यूगो भी गोल और भली-भाँति पेटभरा दीखता था। रोजिनी को पतलून में हिप्पोपोटैमस कहा जाता था। डॉक्टर जान्सन तो हर प्रकार से पहाड़ का पहाड़ था।

ट्राय का घोड़ा

शहाबुद्दीन मानिकपुर के राजा को जीतना चाहता था किन्तु उसकी सेना राजा की सेना की तुलना में कुछ भी नहीं थी। उसने चालाकी खेली-स्वयं व्यापारी का भेष बनाया और 2000 ऊँटों का काफिला लेकर राज्य में घुसा। हर ऊँट पर दो सन्दूक लदे थे जिनमें एक-एक सिपाही छिपा था। वह राजा मानिक चन्द्र के दरबार में पेश किया गया जहाँ उसने अपना सामान दिखाने की इजाजत माँगी। राजा की आज्ञा मिलने पर सन्दूक अन्दर लाए गए और उनमें से सिपाहियों ने निकलकर नगर जीत लिया।


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