ज्ञान पहेलियाँ - मुकेश नादान, निरुपमा Gyan Paheliyan - Hindi book by - Mukesh Nadan, Nirupama
लोगों की राय

बाल एवं युवा साहित्य >> ज्ञान पहेलियाँ

ज्ञान पहेलियाँ

मुकेश नादान, निरुपमा

प्रकाशक : एम. एन. पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :100
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4911
आईएसबीएन :81-7900-007-9

Like this Hindi book 9 पाठकों को प्रिय

225 पाठक हैं

प्रस्तुत है ज्ञान को बढ़ाने वाली पहेलियाँ

Gyan Paheliyan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

...अपनी बात

प्यारे बच्चो !

पहेलियाँ ज्ञान को बढ़ाने का एक सरल साधन है। पहेलियाँ हमारे ज्ञान को ही नहीं बढ़ातीं अपितु हमें मनोरंजन भी कराती हैं। स्कूल में, दोस्तों में, पिकनिक पर अथवा छोटी-छोटी पार्टियों में ये पहिलयाँ ज्ञान को बढ़ाने अथवा समय काटने का सबसे अच्छा साधन होती हैं। इनसे एक प्रकार की दिमागी कसरत भी होती है। बच्चों के ज्ञान के साथ-साथ उनका स्वस्थ मनोरंजन भी हो इसलिए हमने इस पुस्तक में कई मनोरंजक पहेलियों को संकलित किया है। सुन्दर चित्रों एवं सरल भाषा में प्रस्तुत की गईं ये पहेलियाँ अवश्य ही आपके ज्ञान एवं मनोरंजन में सहायक सिद्ध होंगी।


1
रात को नभ में चमका करता जैसे चाँदी की इक थाली
चोर उचक्के लूट न पावें लौटें हरदम खाली

2
तीन अक्षर का नाम सुहाना काम सदा खिलकर मुस्काना
बीच कटे तो कल कहलाऊँ अंत कटे तो कम हो जाऊँ

3
जो जाकर न वापस आये जाता भी वह नजर न आये
सारे जग में उसकी चर्चा वह तो अति बलवान कहाये

4
राजा के बाग में नहीं माली के बाग में नहीं
फोड़ो को गुठली भी नहीं खाओ तो स्वाद नहीं

5
धूप लगे पैदा हो जाये छाँह लगे मर जाये
करे परिश्रम तो भी उपजे हवा लगे मर जाये

6
एक बाग में फूल अनेक उन फूलों का राजा एक
बगिया में जब राजा आये बगिया में चाँदनी छा जाए

7
काली-काली साड़ी पहने मुखड़ा जिसका गोरा
लड़की नहीं न ही गोरी रोज लगाती हूँ मैं फेरा

8
जाड़ों में जब गिरता हूँ मैं छा जाता है घोर अँधेरा
प्रथम हटे तो हरा कहाऊँ बीच हटे तो समझो कोरा

9
ओर छोर न मेरा कोई प्रथम हटे तो समझो काश
अंत कटे मालिक बन जाऊँ मध्य कटे तो आश

10
सूखी सड़ी पड़ी लकड़ी में वर्षा जल में जो उग आये
उसको क्या कहते हैं भाई जो अपने सिर छत्र लगाये

11
काला कलूटा मेरा रूप अच्छी लगती कभी न धूप
दिन ढलने पर मैं आ जाता सारे जग पर मैं छा जाता

12
तीन अक्षर का मेरा नाम पानी देना मेरा काम
प्रथम कटे तो दल कहलाऊँ मध्य कटे तो बाल कहाऊँ

13
गर्मी में जिससे घबराते जाड़े में हम उसको खाते
उससे है हर चीज चमकती दुनिया भी है खूब दमकती

14
खुली रात में पैदा होती हरी घास पर सोती हूँ
मोती जैसी मूरत मेरी बादल की मैं पोती हूँ

15
छिलका न डंठल सफेद कली होय
खाए सारी दुनिया कहीं न पैदा होय

16
चार गरम चार नरम चार बालूशाही
जो बालक मेरी कहानी बताए वही पाए मिठाई

17
कपड़े उतरवाएँ पंखा चलवाए कहती ठंडा पीने को
अभी-अभी तो नहा के आया फिर से कहती नहाने को

18
एक सुबह एक शाम को आए अंधकार को दूर भगाए
दुनिया देखे खुश हो जाए इनके बिना न रौनक आए

19
प्यार करूँ तो घर चमका दूँ वार करूँ तो ले लूँ जान
जंगल में मंगल कर दूँ कभी कर दूँ मैं शहर वीरान

20
तीन अक्षर का नाम मेरा प्रथम कटे तो रज बन जाऊँ
अंत कटे तो कवि बन जाऊँ बोलो बच्चों मेरा नाम

21
मुँह खुला और छूट गया उसका अपना देश
क्या कुछ न बनना पड़ा बदल-बदल कर भेष

22
एक गाँव ऐसा बच्चों चारों तरफ है पानी
सोच समझकर उत्तर देना कहलाओगे तुम ज्ञानी

23
अन्त कटे तो अंधा हो जाये फिर भी करे प्रकाश
आदि कटे तो रज बन जाए गंगा नहीं निवास

24
देखी एक अनोखी बेल रखती जो पेड़ों से मेल
पात-फूल-फल नहीं है मूल कैसी की ईश्वर ने भूल

25
ठंडी हवा संदेशा लाती तब मैं हूँ धरती पर आती
बच्चों के मन को अतिभाती किसानों को भी खूब सुहाती

26
सबसे बड़ी शिकारी चिड़िया है दुनिया में कौन
नाम बताए हम भी जानें जरा तोड़िये मौन

27
घास-पात जो भी मिल जाये खा-खा कर मैं जीती
पानी पीते ही मर जाती पानी कभी न पीती

28
साथ तुम्हारे रहूँ मैं जीवन मेरा है उजियारा
पर क्षण में ही मैं मर जाती देख तनिक-सा भी अँधियारा

29
चोंच न डूबे घड़ा न डूबे चिड़िया प्यासी जाए
एक अचम्भा हमने देखा हाथी खड़ नहाए

30
बाजार से आया था काला इस्तेमाल में हो गया लाल
फेंकने गये तो सफेद हो गया हमने देखा ऐसा कमाल

31
एक बगिया में दो बनजारे, हम सबको वह बहुत प्यार
जैसे आँखों के दो तारे, आसमान के वासी जैसे तारे

32
बनी रहे वह सबकी साथी, चाहे मनुष्य हो चाहे हाथी
कभी सवा गज कभी हो पौन, बतलाओ है वह कौन

33
खाती है न पीती है, उजाले के साथ हमारे रहती है
छाया और अँधेरे में, यह मर जाया करती है

34
पानी मेरा बाप, पानी ही मेरा बेटा
मुँह ऊपर करके देखो, मैं सबके ऊपर लेटा

35
है इसका पानी का चोला, लगता आलू को गोला
उल्टा कर यदि इसको पाओ, लाओ-लाओ कहते जाओ

36
प्रथम कटे या मध्य कटे, यह तो रहता हरदम गन
नीले रंग की इस काया को, नाप न पाएँ इसको हम

37
जिसके पास न पत्ता है, न जड़ और न फूल
हरदम हरी रहती और बढ़ती, रहती दूजों के सिर झूल

38
अन्त कटे तो थोड़ा होता, मध्य कटे तो होता कल
प्रथम कटे को मल हो जाता, उसका है जीवन में जल

39
एक नारी का मैला रंग, लगी रहे वह पी के संग
उजियारे में पी के संग रहती, अँधेरे में गायब हो जाती

40
प्रथम कटे तो बनती कड़ी, मध्य कटे तो रहती झड़ी
जंगल में वह पैदा होती, घुन लग जाये मैदा होती

41
एक फल के चौबीस फाँके, रंग श्वेत और श्याम
आगे-पीछे दोनों आते, नर-नारी है नाम

42
हठी और गुस्सैल बचपना, भरी जवानी रोये
देर से आये जल्दी जाये, बड़ी देर तक सोये

43
हमने देखा एक बताशा, पानी में इतराता जाता
होता है अजीब तमाशा, हवा लगे तो नजर न आता

44
हरे-भरे से बाग में, मोती गिरे अनेक
माली गया बीनने, बाकी बचा न एक

45
पानी का-सा बुलबुला, बाजार में बिकता नहीं
छीलो तो छिलता नहीं, खाने में है स्वाद नहीं

46
खुली रात में पैदा होती, हरी घास पर सोती हूँ
मोती जैसी मूरत मोरी, बादल की मैं पोती हूँ

47
है बिखेर देती वसुन्धरा, मोती सबके सोने पर
रवि बटोर लेता है उनको, सदा सबेरा होने पर

48
मैं सबसे कड़वा कहलाऊँ, फिर भी प्यार सभी का पाऊँ
कई रोगों का एक निदान, नाम बताए चतुर सुजान

49
एक जगह पर खड़ा हुआ हूँ, पर हित पथ पर अड़ा हुआ हूँ,
मेरी पूजा करते मानव, मुझे काटते अनपढ़ दानव

50
कभी ओढ़नी पूरी ओढ़े, कभी ओढ़े वह आधी
कभी खोल कर, पूरा चेहरा सूत कातती दादी

51
एक चीज है बड़ी अनोखी, हमने तुमने सबने देखी
जिन्दा में से निकले मुर्दा, और मुर्दा से जिन्दा

52
एक बुढ़िया शैतान की खाला, बाल सफेद लेकिन मुँह काला
बच्चे पीछे-पीछे भागें, लेकिन बुढ़िया उनसे आगे

53
झिलमिल-झिलमिल ऐसे चमके, जैसे चमके कोई मोती
नंगे पाँव चले जो उस पर, उसकी तेज रोशनी होती।

54
पैदा हुई तो बीस फुट, फिर घटी फुट चार
घटकर के घटती गई, कैसी है वह नार

55
सच्चा दोस्त वही है भाई, कष्ट पड़े पर तजे न साथ
खड़े होकर धूप में देखो, देगा कौन तुम्हारा साथ

56
वह नार देखने में हरी, पर अन्दर लहू से भरी
जो कोई उसकी संगत करे, अपने हाथ लहू से भरे

57
हरी-हरी इक सुन्दर नार, सबका करती है श्रृंगार
जब कोई उसको अंग लगाये, शर्म से वह लाल हो जाये

58
एक माँ के हुये दो पूत, दोनों की अलग-अलग करतूत
भाई को भाई से लाग, एक है ठंडा दूसरा आग

59
बारह शाखा पेड़ की, बावन उसके फूल
सात पंखुड़ी फूल की, इसे न जाना भूल

60
नल कुआँ तालाब नदी में, रहता हूँ मैं सागर में
बहुत स्वाद लगता हूँ, मैं जब रहता हूँ सागर में

61
हरे रंग की देखी नार, बात-बात की रखे आर
नर-नारी जो हाथ लगावे, बदन सिकोड़ तुरन्त कुम्हलावे

62
दिखे नहीं पर पहना है
नारी का यह गहना है

63
आगे पीछे साथ चले
लेकिन कभी न हाथ लगे

64
बारह घोड़े तीस गरारी
तीन सौ पैंसठ चढ़ी सवारी

65
हरी पत्तियों का हुआ कमाल
लगने पर हो जायें लाल

66
सरपट दौड़े हाथ न आये
घड़ियाँ उसका नाम बताये

67
एक अलमारी में बारह खाने
हर खाने में तीस हैं दानें

68
सूरज से नित आँख मिलाये
और खुशी से खिल-खिल जाये

69
आँखों में जब बस जाती हूँ
बिस्तर पर ले आती हूँ

70
काला हाथी उड़ता जाए
जंजीरों से न पकड़ा जाए

71
बेशक न हो हाथ में हाथ
जीती है वह आपके साथ

72
तीन टाँग की स्थिर चिड़िया, रोज सबेरे नहाये
दाल चावल का नाम न जाने, कच्ची रोटी खाये

73
एक अनोखा पक्षी देखा, नदी किनारे रहता है
चोंच सुनहरी जगमग करती, दुम से पानी पीता है

74
एक डिबिया में चालीस चोर, सबका मुँह है काला
पूँछ पकड़कर आ लगाई, जगमग हुआ उजाला

75
भीतर चिलमन बाहर चिलमन, बीच का कलेजा धड़के
अमीर खुसरो यूँ कहें, वह दो-दो अंगुल सरके

76
एक पैर है काली धोती, जाड़े में है हरदम सोती
कड़ी धूप में साथ निभाए, वर्षा में है हरदम रोती

77
चौड़ा पेट बना है जिसका, जलती जिसमें ज्वाला
मगर और के पेटों से यह, आग बुझाने वाला

78
एक अचम्भा मैंने देखा, कुएँ में लग गई आग
कीचड़ पानी जल गया, मछली खेले फाग

79
मिट्टी का घोड़ा, लोहे की लगाम
उस पर बैठे, मियाँ पठान

80
एक नारी के दो हैं बालक, दोनों का है एक ही रंग
एक घूमे एक खड़ा रहे, रहते हरदम संग

81
एक मकान में चालीस चोर, सबका मुँह है काला
पूँछ पकड़कर आ लगाई, जगमग हुआ उजाला

82
नाम लिया तो रख दिया, सबने पाई चार
काम किया पैसा न दिया, लेट गये सब यार

83
चार पाँव पर चल न पाऊँ, बिना हिलाये हिल न पाऊँ
फिर भी सबको दूँ आराम, आती हूँ मैं सबके काम

84
तीन हाथ और पेट है गोल, सर-सर करते मेरे बोल
गर्मी में मैं आता काम, मुझ बिन न होता आराम

85
मेरे होते कई आकार, फिर भी होते हैं पैर चार
जो कोई भी आता है, मुझमें आसन पाता है

86
मिट्टी से मैं जीवन पाऊँ, प्यास सभी की दूर भगाऊँ
जाड़ों में करता आराम, गर्मी में मैं आता काम

87
दो हाथों का एक जानवर, फिर भी है बेजान
सारी दुनिया को समझाए, हर पल होत महान्

88
अनगिन डाली पत्ता एक, हुआ अचम्भा उसको देख
सिर पर सजे सलोना रूप, न कुम्हलाए चाहे हो धूप

89
एक औरत के पेट न आँत, ऊपर नीचे दाँत-ही-दाँत
दाँतों से ले जा निकाल, कसकर सिर पर बड़े बवाल

90
जंगल में इसका मायका, गाँव-शहर इसकी ससुराल
जब घर में आ गई दुल्हन, उठ चला सारा वबाल

लोगों की राय

No reviews for this book