सत्तावन का सेनानी - वसन्त वरखेडकर Sattavan Ka Senani - Hindi book by - Vasant Varkhandekar
लोगों की राय

ऐतिहासिक >> सत्तावन का सेनानी

सत्तावन का सेनानी

वसन्त वरखेडकर

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :244
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4913
आईएसबीएन :81-7043-625-7

Like this Hindi book 9 पाठकों को प्रिय

125 पाठक हैं

एक ऐतिहासिक उपन्यास....

Sattavan Ka Senani

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


सर्वत्र संताप के उमड़ते हुए भभूके के बीच भी जो स्वतंत्रता के पथ पर मनुष्यता का ध्वज फहराता रहा,
-जिसने शत्रु के हृदय में भी अपने प्रति परम आदर की ज्योति जगाई,
-न्यायासन के सामने जिसके धीर-गम्भीर बर्ताव से और जिसकी धीरोदात्त मृत्यु से अंग्रेज़ स्त्री-पुरुषों के मन भी उमड़ उठे,
-जिसके केश स्मृति-रूप में वे अपनी-अपनी मंजूषा में दीर्घ काल तक सुरक्षित रखे रहे,
उस जग-वंदनीय महापुरुषों को
-जिसे भारत का गरीबाल्डी, नेपोलियन और नेलसन नाम देकर शत्रुओं ने गौरवान्वित किया,
उस अलौकिक प्रतिभा के रणबाँकुरे को-
नव-स्वतंत्रता के आद्य-शिल्पी को-
साधारण जनता में जन्म लेनेवाले जनतंत्र के उस दृष्टा
तांत्या टोपे को भक्तिपूर्वक यह श्रद्धांजलि अर्पित हो !

सत्तावन का सेनानी
1


भोर होने में अब अधिक विलंब न था। भोर होते ही जनरल मीड उसे फाँसी देने की तैयारी करने वाला था।
जीवन और मृत्यु की सीमा-रेखा पर वह महान् ज्ञानी धीर एवं गम्भीर कर्मवीर खड़ा था। नियति के अखंड प्रवाह में पृथक रूप धारण करने वाली जीवात्मा की सीमित भूमिका का अर्थ वह समझ चुका था। जहाँ जन्म है वहाँ मत्यु है ही ! ईश्वर ने जैसे एक माप ही उसके हाथ में दे दिया था और उसे भरकर उसे लौटा देने की आज्ञा दी थी। ईश्वरप्रदत्त इस माप को भरकर वह मुझे पुनः ईश्वर को ही लौटा देना है यह महसूस करके ही वह जीवन जिया था। अपनी एक-एक कृति से वह माप को भर रहा था और अब जैसे ईश्वर ने ही उससे कह दिया था, ‘‘बस !’’ इस समय उस भरे हुए माप को देखता हुआ वह कृतकार्य होने का संतोष प्राप्त कर रहा था।

उसने जीवन में अनेक इच्छाएं और आकांक्षाएँ सँजोयी थीं। उन्हें बार-बार तृप्त करने पर भी वे अतृप्त हो रही थीं और सदा अतृप्त ही रहने वाली थीं। उसे जीवन के कार्य का कहीं अन्त नजर नहीं आ रहा था। जिस आकांक्षा को हृदय में दबाए वह जीवन के मार्ग पर चल रहा है उसकी परिपूर्णता की मंजिल अभी बहुत दूर है इसका उसे पूर्ण ज्ञान था। अपनी जीवन डोर को वह इतनी लंबी नहीं तान सकेगा, यह भी वह जानता था। जब मृत्यु सामने आकर खड़ी हो गई तब उसे एक नया ही साक्षात्कार हो रहा था। अनंत का अन्त करने की वह क्रिया थी। अपूर्णत्व को पूर्णत्व प्राप्त करा देने का वह साधन था। परिपूर्णता का वह रहस्य था।
 
विशाल स्वातंत्र्य-संग्राम में उसने अनेक लड़ाइयाँ जीती थीं। जब वह लड़ाई जीता तब विजयानंद से उन्मत्त हुए अपने सैनिकों से उसने कहा था- ‘‘वीरो ! खुशी से इस तरह पागल मत बनो। इस एक ही जीत से यदि खुशी से पागल हो जायोगे तो किसी हार के समय तुम निरुत्साहित भी हो जाओगे। यह स्वातंत्र्य-संग्राम सिर्फ, एक ही जीत से समाप्त नहीं होगा और न एक ही पराजय से उसका विनाश हो सकता है। अन्तिम ध्येय प्राप्त करने के लिए जय और पराजय के घमासान में गुजरते हुए ही तुम्हें अभी लम्बा सफर तय करना है।’’ और यही तत्त्वज्ञान उसने अपने जीवन में उतारा था। जिस समय उसने विंडहम को जमीन सुँघाई थी। उस समय जिन-जिन लोगों ने उसकी युद्ध-कुशलता के अनेक चमत्कार देखे थे वे सब दंग रह गए थे और उनकी अँगुलियाँ दाँतों तले दब गई थीं। उसके समर-कौशल्य की प्रतिभा की चमक देखकर इंगलैण्ड भेजे गये अनेक पत्रों में, ‘साक्षात नेपोलियन’ ‘प्रत्यक्ष नेलसन’- इस  प्रकार के शब्दों में उसका गुणगान किया गया था। उसे सभी अंग्रेज़ हिन्दुस्तान का ‘गैरीबाल्डी’ कहकर सम्बोधित करने लगे थे। गोरों द्वारा कालों का ऐसा गुणगान होते देख भारतीय सैनिकों के हृदय आनन्द से उमड़ उठे थे। लेकिन उस समय भी सफलता के प्रति उसकी वृत्ति तटस्थ ही रही थी। सिर्फ इस जीत से ही यह स्वातंत्र्य-संग्राम समाप्त नहीं हो जाता है यह बात वह स्वयं भी नहीं भूला था और न ही दूसरों को ही भूलने दी थी।

यही तत्त्वज्ञान पराजय के समान अनेक सैनिकों को स्फूर्ति देने में समर्थ हुआ था।

झाँसी के बुर्ज़ ढहकर गिर पड़े और गोरे सैनिकों ने झाँसी में कुहराम मचा दिया, तब शहीद होने के लिए अधीर हुई ब्रह्मावर्त की छबीली- उसकी लाड़ली मनू- झाँसी की स्वामिनी लक्ष्मीबाई आत्म-समर्पण कर देती। परंतु उस समय उसका तत्त्वज्ञान उस तक भी  पहुँचा-‘‘ईश्वर ने मत्यु का चैक ही लिखकर हर मनुष्य के हाथ में दिया है ! वह एक-न-एक दिन भुनेगा ही। फिर उसे भुनाने के लिए इतनी उतावली क्यों हो रही हो ?’’ और उस तेजस्विनी को यह महसूस हो गया कि स्वातंत्र्य-समर का एक बड़ा भारी मार्ग अभी भी हमारे सामने है। वह नब्बे मील की घुड़दौड़ करके काल्पी जाकर उससे मिली थी। विनाश की अमंगल छाया आँखों को निरंतर डरा रही थी। फिर भी बिजली की तरह कौंध कर उसने अन्धकार को चीर दिया था और उसके आगे का मार्ग भी जगमगा दिया था।

जब काल्पी को ह्यूरोज़ के हवाले करने का अवसर आया तब उसने सब लोगों से कहा था।-‘‘यह अन्तिम किला भी हमें शत्रु के हवाले करना पड़ रहा है, इसलिए तुम इतने हताश क्यों होते हो ?’’ क्रोध  में उन्मत्त होकर उसके साथी उससे कहने लगे कि हम यहीं लड़ते-लड़ते काम आ जाएँगे। तब उसने उत्तर दिया था- ‘‘नहीं ! इतने पर ही यह कार्य समाप्त नहीं हो जाता ! अभी तो नये किले जीतने हैं ! अभी आत्म-समर्मण करने की बातें मत करो !’’

 इसके भी बाद जब जीते हुए ग्वालियर के किले को छोड़कर जाने का अवसर आया उस समय भी उसने कहा था- ‘‘अभी बहुत किले बाकी हैं ! प्रत्येक गाँव किला है ! उन्हें जीतने का अन्त नहीं !’’
सारी अंग्रेज़ सेना उस अकेले पर टूट पड़ी थी। इसके बाद बावजूद सैकड़ों गाँवों में उसने चैतन्यता की मोहिनी फूँकी और उस सेना का डटकर सामना किया, क्योंकि सामने लम्बा मार्ग है यह वह देख रहा था।

शरीर छिन्न-विच्छिन्न हो रहा था। ज़ख्मों से लहू रहा था। पर उस समय भी वेदना ने उसके मन का स्पर्श न किया था। निराशा नाम की चीज़ ही उसके भाव-विश्व में न थी। पारन के जंगल में तेज़ बुखार की हालत में भी वह देश को आजाद करने का एक नया स्वप्न देख रहा था।

जो कार्य अभी तक समाप्त नहीं हुआ-यह यकीन करता हुआ कि वह अभी तक समाप्त नहीं हुआ, वह रोज आगे-आगे ही बढ़ रहा था, उसकी समाप्ति क्षितिज की तरह दूर हो रही थी। फिर भी अब जहाँ तक उसका संबंध था वहाँ तक वह कार्य अवश्य समाप्त हो गया था।
और इसलिए जीवन और मरण की सीमा पर खड़ा हुआ वह निर्लिप्त मन से विगत काल की ओर देख सकता था।

मृत्यु से वह कभी न डरता था। मनू की धधकती हुई चिता के समीप आँसू बहाते खड़े राव साहब से उससे कहा था-‘‘आँसू क्यों बहा रहे हो, राव साहब ? अमर पद प्राप्त करने के लिए यह होड़ लगी है। इस होड़ में यह लड़की–हमारे ब्रह्मावर्त की लाड़ली छबीली आगे निकल गई इसके लिए क्या आँसू बहाना चाहिए ? देखो उन धधकती ज्वालाओं को। खिलखिलाकर हँसती हुई मनू को देखोगे तुम उनमें ! वह कह रही है- ‘मैं ही पहले पहुँच गयी !’’ राव साहब जहाँ वह पहुँची है वहीं और उसी तरह आप भी पहुँचने वाले हैं !’’

वही स्थान ! वही पहुँचना है यह निश्चित है। अब जनरल मीड निकलते ही उसी स्थान पर कुशलतापूर्वक पहुँचा देने के लिए तैयार करने वाला था !
आत्मा को पीछे खींचने की कोशिश करने वाला प्रत्येक भवपाश कितना मज़बूत हैं, यह आज़माकर देखने लगा।
कानपुर से जब वह ब्राह्मावर्त को लौटा, उस समय ब्रह्मावर्त जल रहा था। उसका निजी मकान भी जल रहा था।
उसने अपने आप से कहा था—‘घर का खिंचाव बहुत आगे नहीं बढ़ने देता था। ईश्वर ने मुझे अब मुक्त कर दिया है। अब समूचा भारत मेरा घर है। अब घर लौटने के लिए पीछे मुड़ने का मौका मुझ पर कभी नहीं आएगा।’

लौटने के लिए अब उसका कोई घर नहीं था। स्त्री और बच्चे कहाँ थे कुछ पता न था। उसने उनके प्रति अपनी ममता को कभी का लपेटकर रख दिया था और अपने प्रति सारी ममता को समाप्त कर देने के लिए उन्हें भी बाध्य कर दिया था। वह लौटकर उनमें जाकर नहीं रहेगा यह तो बहुत पहले ही तय हो चुका था। सारे भवपाश गल गए थे और उसे छुटकारा मिल गया था।
नाना साहब कहाँ थे ? राव साहब कहाँ थे ?
किसे मालूम ?
जनरल मीड से उसने फटकार कर कह दिया था—‘‘मैंने पेशवा का अन्न खाया है, पेशवा ही मेरे स्वामी हैं। पेशवा से अगर मैं द्रोह करूँ तो तभी वह स्वामिद्रोह हो सकता है। अंग्रेजों से द्रोह स्वामिद्रोह नहीं है।’’
उसके उस स्वामी का भी अब कोई ठौर-ठिकाना न था। सिर्फ अमर पद में ही मिलने का संकेत करके वह विभक्त हुए थे।
परिपूर्णता का ही अब अनुभव हो रहा था। अनंत का वह केवल एक परिच्छेद था और पूर्ण विराम देकर मृत्यु उसे पूर्ण करने वाली थी।

जो पूर्णाकृति वह देख रहा था। वह संतोषजनक थी। जो भरा हुआ माप वह देख रहा था, वह उसके कृतार्थ होने का
 परिचायक था।

***                                                                ***                                                                 ***

धीरे-धीरे विहग-वृंद अपने कलरव से अरुणोदय का संदेश देने लगे।
गिरफ्तार करने के बाद जनरल मीड ने उससे कहा था—‘‘चलो, मैं तुम्हें समूचा भारत फिर से दिखा देता हूँ। हमारे जिस साम्राज्य में सूर्य कभी अस्त नहीं होता, उस साम्राज्य के एक अंश को निगलने का प्रयत्न करके देख लिया और फलस्वरूप तुमने अपने ही प्राणों को संकट में डाल दिया। व्यर्थ ही तुमने इतने कष्ट झेले ! गदर से पहले भारत पर अंग्रेजों का जितना प्रभुत्व था उतना ही आज भी है। नहीं, उससे भी अधिक है ! विद्रोह करके तुमने जो अशान्ति की आग भड़काई, उसका अनुभव दाहक होने के कारण ही भारतीयों को हमारा राज्य अधिक आवश्यक लगने लगा है। चलो, तुम्हें पूरे भारत की सैर करा लाऊँ। एक नया दर्शन करा दूँ। तुम्हारे देश भाई यही चाहते हैं कि उन पर हम ही शासन करें।’’

यह सुनकर वह सिर्फ मुस्करा दिया। ‘‘भू गर्भ में छिपा हुआ नन्हा बीज कभी-न-कभी पृथ्वी का कवच फोड़कर ऊपर निकल आता है और धीरे-धीरे प्रचंड वृक्ष का आकार धारण करता है, यह जानते हो तुम ?’’ यह प्रश्न पूछने के लिए नियति उसकी सहायिका थी।

‘‘आधी रात के घनघोर अंधकार में भी, प्रातःकाल की प्रभा को बिखेरने वाला सूर्य अपने मार्ग पर चलता ही रहता है, क्या तुमने यह महसूस नहीं किया ?’’
यह प्रश्न नियति पूछ रही थी।

उपहास-भरे स्वर में मीड उससे कह रहा था-‘‘सूर्य उदित हुआ है और वह हमारे साम्राज्य पर अबाधित रूप से चमक रहा है। उस उदित होने वाले सूर्य की वंदना करने के बदले तुम उसका निषेध करने जा रहे हो ? उसे वंदन करो, अब भी तुम्हारा जीवन सुधर सकता है।’’
‘‘कितने पागल हो तुम ?’’ उसने मीड से कहा था, ‘‘जीवन किसे कहना चाहिए, यह भी तुम नहीं समझते और उसे सुधारने की बातें कर रहे हो ?’’

इस पर कुछ उबलकर मीड कह रहा था, ‘‘तुम्हारा यह उद्दंड स्वभाव ही तुम्हारे प्राण ले रहा है।’’
‘‘तो इसमें क्या हुआ ?’’
‘‘क्या हुआ ? प्राण बड़े मूल्यवान होते हैं और तुम्हारे बारे में वे दो कौड़ी के हो रहे हैं। तुम्हारी मृत्यु से अशान्ति की अन्तिम बूँद पुछ जाएगी और भारतवासी तुम्हारी मृत्यु को कभी याद भी न करेंगे। अन् आनर्ड अन् संग यू विल डाई !’’
‘‘इसकी तुम कोई चिन्ता न करो।’’ उसने मीड से कहा था।
और मीड ने कहा था, ‘‘ऐसा न समझना कि तुम्हारी मूर्तियाँ यहाँ प्रस्थापित होंगी।’’ कुछ दिनों के बाद लोग तुम्हारा नाम तक भूल जाएँगे।’’

उसकी ओर से नियति उत्तर दे रही थी, ‘‘इतना घमण्ड मत करो, मीड ! तुम और तुम्हारे भाईबन्द इस महापुरुष के नाम को मिटाकर बिलकुल साफ कर देने के लिए सौ वर्षों तक भी आकाश-पाताल एक करते रहें, इसके बाद भी तुम देखोगे कि उसका नाम कायम है। जिस ईश्वरीय अंश को लेकर वह जीवित रहा, उस पर सैकड़ों वर्षों तक झूठे वर्णनों की कितनी भी तहें तुम चढ़ाते जाओ, उसके बाद भी तुम देखोगे कि वह इसी तरह जगमगा रहा है। यह कोई आवश्यक नहीं कि उसका स्मारक पत्थर या धातु का ही बने। वह तो चैतन्य का रूप धारण करके इस देश की हर संकटकालीन परिस्थिति में उत्कर्ष प्राप्त करेगा।’’
अब दिशाएँ भी प्रकाशित होने लगीं।

उसके चेहरे पर मुस्कराहट चमक रही थी।
पहरा देने वाले सिपाहियों की लगातार आहट आ रही थी। मजबूत देह वाले सिख सिपाही और बंगाल लन्सर्स कंधे पर भरी बंदूक रखे गश्त दे रहे थे। उन्हीं पर गोरों का पूर्ण विश्वास था। और फिर भी गश्त देने वाले इन सिपाहियों पर गोरे अफसर लगातार कड़ी नजर रखे रात-भर जाग रहे थे।
उन्हें डर लग रहा था।
रात को जनरल मीड की आँखों में भी नींद कहाँ ? उसे स्वयं फाँसी पर नहीं चढ़ना है। जिसे उसने गुनहगार बनाया है, उसे ही फाँसी पर चढ़ना है। फिर भी सारी रात उसके मन:चक्षु के सामने यह दृश्य मूर्त हो रहा है कि वह ही गुनहगार के रूप में खड़ा है। उसके सामने आरोप-पत्र सुनाया जा रहा है।

सारा बल समेटकर वह लगातार आत्म-समर्थन कर रहा है-‘‘मैं अपने देश की ही भलाई कर रहा हूँ। जिसने मुझे और मेरे साथियों को पिछले दस महीने में एक दिन भी सुख से नहीं सोने दिया, उसे यदि मैं मृत्युदंड देता हूँ, तो क्या यह संकट-निवारण ही नहीं है ?’’

उसके इस प्रश्न का खंडन करने वाला है कौन ? तुमने जो किया, क्या वह न्याय है, यह पूछने वाला भी कौन है ? पर इसके बावजूद स्वयं ये प्रश्न ही त्रिशंकु की तरह अधर लटके हुए उसके सामने खड़े हैं—
उसने अपराधी पर तीन आरोप लगाये थे—
तुमने राजद्रोह किया ! स्वामिद्रोह किया !

तुमने युद्ध किया !
तुमने अंग्रेज़ स्त्री-बच्चों को कत्ल किया ! मानवता की हत्या की !
तीनों आरोप उसी पर उलट पड़े। उसने जिसे आरोपी बनाया है, वह तेज से चमक रहा है और मीड का चेहरा काला पड़ गया है।
वे नीलवर्ण आँखें उसे रात-भर डरा रही हैं। वह बेचैन हो रहा है।
वह क्रोध से उबलती हुई उसके सामने आकर खड़ी हो गई थी। और उसने मीड से पूछा-‘‘कौन लड़ा है मानवता के लिए ? विद्रोही मानवता के लिए चाहे न लड़े हों, पर क्या तुम भी लड़े हो मानवता के लिए ? यदि कोई मानवता के लिए लड़ा है तो न विद्रोही लड़े हैं और न अंग्रेज़ लड़े हैं। मानवता के लिए लड़ा है केवल यह !’
उस क्रोध को देखकर मीड मुग्ध हो गया था। उन नीलवर्ण नयनों से कितना तेज उमड़ उठा था।
रात-भर बार-बार वह उसके मनःचक्षु के सामने आकर खड़ी हो जाती है। वे तेजस्विनी आँखें—वह नैतिक आवेश उसे निरन्तर मुग्ध कर रहा है।

उसके वीर-हृदय का आह्वान करने वाला वह रूप है। उसे लगता था कि इस तेजस्विनी रमणी को मैं वीर पुरुष दिखूँ, वीर-पुरुष के रूप में मैं उसे पुष्पाच्छादित उद्यान में ले जाऊँ, किसी लताकुंज के तले एकान्त में उसकी उस उत्तेजित देह को अपने बाहुपाश में कस लूँ, उसके थरथराते हुए होंठों को अपने होंठों से दबा दूँ और उमड़ रहे उन्माद की तरंगों में उसकी आँखों का तेज होंठों से सोख लूँ।
परन्तु वह जेन, रेह्वरेंड ऑस्वल्ड की लड़की और टॉड की विधवा उसे धिक्कारती रही है और सारी रात वह उसे सहन करता रहा है।
‘‘इंग्लिश आनर दि ब्रेव,’’ वह गरजकर कह रही है, ‘‘वीरों का सम्मान करना, यही अंग्रेज़ों की बान है। तुम अंग्रेज़ हो, कम-से-कम इसलिए तो तुम्हें अपने बरताव पर शर्म आनी चाहिए। एक बहादुर की विडम्बना कर रहे हो।’’
रात-भर वह उसके धिक्कार का जवाब देने की कोशिश करता रहा है। जिन बागियों को स्वामिद्रोह करने में कोई शर्म न आई, उन कृतघ्न लोगों का यह नेता है ! जिन्होंने सारी सभ्यता ताक पर रख दी, खजानों पर डाका डाला, लूटमार की, जेलों को तोड़ा और गुनहगारों को साथ लेकर उत्पात मचाया, असहाय अंग्रेज़ स्त्री-बच्चों को बिबीघर में बंद किया और कसाइयों से उनकी बोटी-बोटी कटवा दी, ऐसे नराधर्मों का यह नेता है।

परन्तु ये शब्द तेन के तीव्र कटाक्ष से बुलबुले की तरह फूटकर गल रहे हैं।
पापों का घड़ा वह खाली कर रहा है और उसकी एक बूँद भी आरोपी से नहीं चिपक रही है।
आरोपी जैसे अग्नि से बाहर निकाले गये तप्तवर्ण स्वर्ण की तरह चमक रहा है !
पौ फट गई है, यह जनरल मीड भी देख रहा है। ‘‘कम-से-कम उसका शरीर निष्प्राण होने तक तो मेरा धीरज बना रहे।’’ वह प्रार्थना करता है।
जेन आती है। उसके साथ और भी चार-पाँच अंग्रेज़ स्त्रियाँ हैं।
‘‘तुम क्या चाहती हो ?’’ मीड जेन से पूछता है।
जेन कहती है, ‘‘क्या एक सप्ताह तक यह फाँसी नहीं रुक सकती ?’’

वह कुछ चिढ़कर कहता है, ‘‘तुम कैसी अजीब हो जो इतना भी नहीं समझतीं। जब तक वह जिन्दा है, हमारी जान में जान नहीं। यदि वह हाथ से निकल जाए तो ? है तुम्हें इसकी कोई कल्पना ? वह अंग्रेज़ी साम्राज्य को जगह-जगह पर आग लगाता जाएगा और उसे बुझाते-बुझाते हमारी नाक में दम आ जाएगा। स्वयं अंग्रेज़ होकर तुम यह समझने का भी प्रयत्न नहीं करतीं कि हमारे देश की भलाई किस में है !’’

जेन बहुत बहस कर चुकी है। वह अब अधिक बहस करने की मनःस्थिति में नहीं है। वह गिड़गिड़ाहट के स्वर में कहती है, ‘‘लार्ड केनिंग से फाँसी रद्द कर देने का हुक्म आए बिना न रहेगा।’’
मीड उत्तर देता है, ‘‘यदि आना होता तो अब तक आये बिना न रहता। मैं जानता हूँ कि मेरा कर्तव्य कटु है। पर वह मुझे करना ही होगा।’’

जेन हताश हुई दिख रही है। वह कहती है, ‘‘मीड, मेरा एक काम करोगे ? हमें कम-से-कम यह दिखाने का ही मौका दे दो कि अंग्रेज़ लोग वीर का सम्मान करते हैं !’’
मीड उसकी ओर स्तम्भित होकर देखता है। वह कहती है, ‘‘फाँसी देते समय हमें वहां उपस्थित रहने दो। हम प्रार्थना करेंगी। उसका शरीर निष्प्राण होकर जब नीचे गिरेगा तब हम उसके केशों का एक पुंज ले लेंगी और उस वीर की यादगार के रूप में उसे सुरक्षित रखेंगी।’’
मीड उत्तर नहीं देता। जी कड़ा करके खड़ा है।
मीड का शरीर बर्फ-जैसे हो गया है। चेहरे सफेद पड़ गया है। इसे वह अपनी हार मान रहा है।
अपराधी को मृत्यु का तनिक भी डर हो, यह नहीं दिख रहा है। उसके चेहरे पर कारुण्य नहीं है, दुख की सूक्ष्म रेखा भी नहीं। नियति के साक्षात्कार से भवितव्यता के बारे में निश्चिंत होकर संतुष्ट मन से वह कदम बढ़ रहा है।
मीड को निश्चित रूप से लगता है कि यह मेरी हार है और उसकी जीत है।
सम्मान अपराधी का हो रहा है। नियति ने उसे कन्धे पर उठा लिया है और जिसने अपनी सारी बुद्धि खर्च करके उसे अपराधी सिद्ध किया है, वह न्यायाधीश ही नियति के कराल पैरों तले कीड़े की तरह कुचला जा रहा है।
अब दिन निकल आया है। मीड को पूरी तैयारी करने के लिए अभी बहुत समय लगने वाला है। तब तक स्मृति-प्रवाह के साथ शीघ्रता से बहते हुए उसे विस्तीर्ण क्षेत्र पार करना है।
चालीस-बयालीस वर्ष पहले दक्षिण के येवले ग्राम में उसका जन्म हुआ। उसे कुछ याद नहीं आ रहा है। वह स्मृति-प्रवाह का उद्गम-स्थान खोज रहा है—

ब्रह्मावर्त साकार हो रहा है। गंगा कलकल निनाद करती हुई बह रही है—और स्मृति-प्रवाह भी !


 2



लट्टू की तरह घूमने वाले सूरज के जलते हुए गोले से टूटकर पृथक् हुई पृथ्वी हजारों वर्षों तक अपनी कील पर घूमते-घूमते ठंडी हो गई थी। तप्तता के साथ ही उसका तेज भी विलुप्त हो गया था और उसकी नरमाई भी। जैसे-जैसे वह कड़ी होती गई वैसे-वैसे उस पर पर्वत और समुद्र निर्मित होने लगे। वनस्पति, प्राणी, पशु आदि पैदा हुए। एक दिन उत्क्रान्त हो रही सेन्द्रिय सृष्टि से मनुष्य का जन्म हआ। इस विकास के अत्यन्त प्राचीन काल में जब पृथ्वी ठंडी और कड़ी हो रही थी, हिमालय ने गर्दन ऊँची उठा दी। उसके शीतल मस्तक पर बर्फ जम गयी और एक दिन उसके मस्तक से उछलकर गंगा और यमुना समुद्र की ओर दौड़ पड़ीं। दौड़ते-दौड़ते उन्होंने भूमि को धोकर स्वच्छ कर दिया और धुली हुई धूल को ही पुनः भूमि पर फैलाकर नया ऐश्वर्य निर्मित्त किया। मनुष्य को आकार प्राप्त हुआ और एक दिन वह वहाँ पहुँचा। उसने वहाँ बस्ती बसायी। युग के बाद युग बीतते गये। गंगा और यमुना का कलकल नाद करता हुआ बहता रहा। मानव ने नगर बसाये। प्रासाद खड़े किये। कितने ही नगर बसे और विनष्ट हो गये। कितने ही प्रासाद ऐश्वर्य से जगमगाकर पुनः धूल में मिल गये। मानव की पीढ़ियाँ ही नहीं, बल्कि सभ्यता के युग भी देखते-देखते उत्पन्न हुए और नष्ट हो गये। गंगा ने यह सब देखा था। नियति के हाथ में हाथ डाले वह बह रही थी—बह रही थी—बहती रहेगी। नियति का इंगित वह जानती है और इसीलिए उद्गम और विनाश के सारे चमत्कारों को वह स्थितप्रज्ञ की दृष्टि से देखती आई है।

‘‘सृष्टि की क्रीड़ा का यह सारा इतिहास हमें बताओ न ?’’ कहकर गंगा से अनेक ने प्रार्थना की होगी। उसके किनारे धरना देकर आराधना आरम्भ की होगी।
एक दिन इसी प्रकार गंगा मैया ने सृष्टि के आविर्भाव और विकास की सुरस और चमत्कारपूर्ण कथा एक भोले बालक के कानों में उँडेली थी।
गंगा के किनारे ब्रह्मावर्त नाम का एक तीर्थस्थान है। बारह परम पावन तीर्थस्थानों में से एक—अग्रगण्य ही कहो न !
उस मैया ने भोले बालक से कहा, ‘‘बेटा सुनो ! इस सारी सृष्टि के निर्माण होने से पहले भी यह ब्रह्मावर्त वर्तमान था। यहाँ ब्रह्माजी निवास करते थे। ब्रह्मा यानी विधाता। उनकी प्रतिभा यहीं कार्यान्वित हुई। जिस ब्रह्मांड में यह इतना चमत्कार भरा हुआ है उसकी प्रथम कल्पना ब्रह्माजी के मस्तिष्क में यहीं साकार हुई थी। वह यहीं लेटे रहते थे। आकाश की ओर निहरा करते। शिवजी के डमरू के बोल सुनते। प्रकृति के त्रयगुण उद्दीपन होकर साम्यावस्था को भंग करने को प्रवृत्त हुए देखते। सर्जनशील उर्मियाँ अबाधित रूप से उन्हें महसूस होतीं। पर वह बिलकुल आलसी थे, कलाकार की तरह। वैसे देखा जाय तो वह भी कलाकार ही थे न ?

सर्जनशील उर्मियाँ उमड़ती रहीं और उनके अनुभव लेते हुए वह उसी तरह पड़े रहे। उन सर्जनशील उर्मियों की अभिव्यक्ति करने के लिए उनके पास कागज न था, भोजपत्र भी न थे। कलम न थी, सरकंडा न था। तूलिका न थी, न फलक था। पर ब्रह्माण्ड की शिल्पाकृति बनाने लायक मिट्टी इफरात थी। बिखरेने के लिए मनमाने रंग थे। फिर भी वह आलसी कलाकार केवल लेटा रहा, पत्थर की तरह ! पर वे सर्जनशील उर्मियाँ दबी भी कैसे रह सकती थीं ? उन्होंने ही उपाय निकालना तय किया। ब्रह्मा की नाभि सहज ही फटने लायक थी। वे ज़ाकर वहाँ केन्द्रित हो गईं। परन्तु बाहर निकलने पर आकार कौनसा धारण करें ?
‘‘वह तो सुन्दर होना चाहिए।
‘‘उसका रंग भी मोहक होना चाहिए।

‘‘नाभि के बाहर निकलते-निकलते उन सर्जनशील निराकार उर्मियों ने स्वयंतः कमल का आकार धारण किया। उन कमल की पंखुड़ियाँ खुलीं तो उनके भीतर ब्रह्मांड था।’’
गंगा खिलखिलाकर हँसती हुई चली गई। भोला बालक गंगा मैया द्वारा कही इस कथा को सुनकर आनन्द से पागल हो उठा। उसने गंगा के स्तोत्र गाये। ब्रह्माजी का पूजन किया। नहीं, गंगा के तट पर ब्रह्माजी की अधिष्ठान रखा। ब्रह्मावर्त की महिमा प्रस्थापित की। इतने ही ज्ञान से संतुष्ट होकर वह भोला बालक ऋषि-मुनि के रूप में प्रसिद्ध होकर परलोक सिधार गया। अनामिका संस्कृति के इतिहास में उसका पता नहीं। परन्तु आलसी कलाकार की उर्मियों से आकार धारण करने वाली ब्रह्मांड नामक कलाकृति की एक उद्बोधक और मार्मिक कथा वह पीछे छोड़ गया।

लोगों की राय

No reviews for this book