पद्मनेत्रा - भगवतीशरण मिश्र Padmanetra - Hindi book by - Bhagwati Sharan Mishra
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पद्मनेत्रा

भगवतीशरण मिश्र

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :504
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4916
आईएसबीएन :81-7043-641-9

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प्रख्यात साधक वामाक्षेप के जीवन पर आधारित उपन्यास....

Padmyanetra - A Hindi Book on Vamakshep by Bhagwati Sharan Mishra

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


पद्मनेत्रा प्रख्यात औपन्यासिक शिल्पी डॉ. भगवतीशरण मिश्र की अद्यतन कृति है। यद्यपि यह मुख्यतः ऐतिहासिक सह आध्यात्मिक उपन्यास है और बंगाल के प्रसिद्ध सिद्ध स्थल तारा पीठ और वहाँ की अधिष्ठात्री देवा माँ तारा तथा अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति-लब्ध योगी-तांत्रिक वामाक्षेपा के इर्द-गिर्द बुनी गई है किन्तु इसमें 19वीं सदी के अन्त और 20वीं सदी के आरम्भ के बंगाल की सामाजिक एवं राजनीतिक गतिविधियों तथा विदेशी शासन के प्रति अकुलाहट भी अभिव्यक्ति हुई है।

साथ ही बंग-भूमि की आँचलिक गन्ध भी इसमें पर्याप्तता से प्राप्त है।
पुस्तक डॉ. मिश्र के गहन अन्वेषण और विस्तृत अध्ययन का सुफल है। वामाक्षेपा की जन्मभूमि अटला से लेकर तारापीठ का कई बार भ्रमण कर और उन पर उपलब्ध बंगला और अंग्रेजी की कृतियों के अध्ययन के पश्चात् ही यह उपन्यास प्रस्तुत किया गया है।

इसमें एक ओर तारापीठ के महाश्मशान की भयावहता और योग-तन्त्र से सम्बन्धित विस्मयकारी घटनाएँ हैं तो दूसरी ओर वामाक्षेपा तथा माँ तारा की अकारण करुणा की कहानी भी है।
उपन्यास-विधा की सभी आवश्यकताओं-अनिवार्यताओं की पूर्ति करने वाली एक श्रेष्ठ औपन्यासिक कृति।
डॉ. मिश्र के औपन्यासिक लेखन का एक महत्त्वपूर्ण मीलपत्थर।

यह उपन्यास


पद्मनेत्रा आपके हाथों में है। ऐतिहासिक, आध्यात्मिक, औपन्यासिक लेखन के क्षेत्र में मेरा एक और प्रयास। सामाजिक उपन्यासों के पश्चात् ऐतिहासिक और पौराणिक उपन्यासों के लेखन के दौर से गुजरते हुए मैंने एक नया प्रयोग मात्र ऐतिहासिक-आध्यात्मिक उपन्यासों को लेकर आरम्भ किया। इसकी प्रथम कड़ी थी ‘अरण्या’ (आत्माराम एण्ड सन्स, कश्मीरी गेट, दिल्ली-6) जो ऐतिहासिक इस रूप में थी कि उसमें छत्तीसगढ़ के बस्तर प्रदेश के एक काल-खण्ड का इतिवृत्त सम्मिलित था और आध्यात्मिक इस रूप में कि बस्तर की अधिष्ठात्री देवी दन्तेश्वरी के इर्द-गिर्द वह बुनी गयी थी।
अध्यात्म को लेकर नाक-भौं सिकोड़ने वालों की कमी नहीं। इस बात का उल्लेख मैंने ‘अरण्या’ में भी किया था और यह भी स्पष्ट किया था कि अनास्थावादियों के अस्तित्व के बावजूद आस्था को आलिंगित करने वाले व्यक्तियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है।

अपने उपन्यास ‘पावक+अग्निपुरुष’ (आत्माराम एण्ड सन्स) की भूमिका में मैंने इस तथ्य को विशेष गहराई से रेखांकित किया था—‘गलत है कि अध्यात्म धीरे-धीरे लुप्त हो रहा है। वैश्वीकरण और उन्मुक्त बाजार के प्रभाव ने नई पीढ़ी के कुछ लोगों को दिग्भ्रमित अवश्य किया है किन्तु देखकर आश्चर्य होता है कि मन्दिरों, मस्जिदों, गिरजाघरों और गुरुद्वारों में नवयुवकों-नवयुवतियों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है। उन्हें भी अध्यात्म में आस्था की एक नई किरण दिखाई पड़ने लगी है।’’

मैंने ‘अरण्या’ की भूमिका में प्रमुख समाचार पत्र-पत्रिकाओं से उद्धरण देकर यह सिद्ध किया था कि सत्संग में केवल बूढ़े-बूढ़ियाँ सम्मिलित नहीं होते बल्कि नई पीढ़ी के युवक-युवतियाँ भी आध्यात्मिक सत्संगों में निस्संकोच भाग लेते हैं। यहाँ 28 मई 2003 के ‘इंडिया टुडे’ में प्रकाशित ‘शेफाली वासदेव’ के एक निबन्ध का उद्धरण दिया गया था। शेफाली के इस सम्बन्ध का शीर्षक भी आध्यात्मिक ही था—‘है प्रभु से मिलने की प्यास’। इस निबन्ध से जो उद्घरण मैंने दिया था उसे पुनः प्रस्तुत करना चाहूँगा—‘‘सत्संग-हॉलों में हर हफ्ते सम्मिलित होने वाले हजारों लोगों में रंग-बिरंगे बालों, चमकती नेलपॉलिश और छोटे गोटेदार बैगवाली युवतियाँ आसानी से देखी जा सकती हैं। कुछ तो नई डिजाइन की कुर्तियाँ और कुछ जीन्स पहनकर आती हैं। इसी तरह बहुत-से युवा व्यवस्थित ढंग से कुर्ता पाजामा पहने, मोबाइल बन्द करके हॉल में बैठे मिलते हैं, जिससे ईश्वर के साथ उनके इस साप्ताहिक मिलन में किसी तरह का व्यवधान न आए। ये युवा अन्य जगहों के मुकाबले यहाँ अत्यन्त विनम्रता जताते हैं। नई पीढ़ी की पहचान माने जाने वाली अकड़ और छिछोरापन उनमें यहाँ कतई नहीं दिखता।’’

मेरे कहने का तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि हमारी नई पीढ़ी पूरी तरह अध्यात्म और आस्था की ओर ही अग्रसर हो रही है। ऐसे युवाओं और युवतियों की भी कमी नहीं है जो अनीश्वरवादी और अनास्थावादी हैं लेकिन इनमें से कुछ को कम-से-कम अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए—विश्वविद्यालयीय परीक्षाओं, प्रतियोगिता परीक्षाओं में उत्तीर्णता आदि के लिए मन्दिरों, मस्जिदों और गिरजाघरों की ओर मुँह करना पड़ता है।
ले-देकर बात यहाँ तक आ पहुँची कि आस्था अनावश्यक कभी नहीं थी और आज उसकी आवश्यकता निरन्तरता बढ़ती जा रही है। अतः, औपन्यासिक कृतियाँ पूर्णतः अध्यात्म आधारित भी हों तो उनसे किसी को परहेज करने की आवश्यकता नहीं।

यों तो मेरी प्रायः सभी ऐतिहासिक, पौराणिक कृतियों में अध्यात्म और आस्था कुछ मात्रा में विद्यमान थे ही। चाहे वह पहला सूरज हो अथवा पवन पुत्र, प्रथम पुरुष, पुरुषोत्तमा, पीताम्बरा, काके लागूँ पाँव, गोविन्द गाथा, पावक या अग्निपुरुष, सबमें आस्था की पुट अवश्य थी।
‘अरण्या’ में अध्यात्म को स्थान अधिक मिला। इतिहास और पुराण कुछ गौण हुए।
अध्यात्म अधिक इसलिए कि इसमें दन्तेश्वरी की प्राथमिकता थी। बस्तर की यह अधिष्ठात्री देवी वहाँ की पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक सभी गतिविधियों का केन्द्र हैं, अतः उपन्यास में स्वभावतः उन्हें अधिक स्थान मिला।
‘अरण्या’ एक तरह से ऐतिहासिक—आध्यात्मिक उपन्यास-लेखन में एक प्रयोग था। यह प्रयोग सफल हुआ क्योंकि ‘अरण्या’ का पर्याप्त स्वागत हुआ और उसका प्रथम संस्करण देखते-देखते बिक गया।
इस प्रयोग से उत्साहित होकर ही ‘पद्मनेत्रा’ का सृजन हुआ है। इसकी कथा बंगाल के प्रसिद्ध सिद्ध स्थल तारापीठ और वहाँ की अधिष्ठात्री देवी माँ तारा और उनके प्रमुख शिष्य एवं योग के क्षेत्र में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति-प्राप्त वामाक्षेपा पर आधारित है।

तारापीठ की आदि का पता नहीं। पुराणों की मानें तो वहाँ महर्षि वशिष्ठ ने भी तपस्या की थी। तारा अतः आद्या शक्ति हैं।
वामाक्षेपा निस्संदेह एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं। 19वीं सदी के अन्त और 20वीं सदी का आरम्भ इनका काल है। इस तरह यह उपन्यास भी ऐतिहासिक सह आध्यात्मिक है। मानना पड़ेगा कि ‘अरण्या’ की लोकप्रियता ‘पद्मनेत्रा’ की सफलता के प्रति आश्वस्त करती है।
कुछ बातें स्पष्ट करनी पड़ेंगी। कुछ लोगों को चमत्कारों से विरक्ति होती है किन्तु मेरी मान्यता है कि जहाँ अध्यात्म है वहाँ चमत्कार भी है। ठीक उसी तरह जैसे जहाँ विज्ञान है वहाँ चमत्कार भी है।

वैज्ञानिक उपलब्धियाँ क्या चमत्कार की श्रेणी में नहीं आतीं ? जो कुछ भी नया और आस्वाभाविक होता है, लोगों को चमत्कार प्रतीत होता है। कुछ लोगों को तो आध्यात्मिक-धार्मिक चमत्कार अन्धविश्वास लगते हैं। किन्तु जब वैज्ञानिक चमत्कार अन्धविश्वास नहीं हैं तो आध्यात्मिक चमत्कारों को अन्धविश्वासों की श्रेणी में रखने का क्या आधार है ?
आध्यात्मिक चमत्कारों का सर्वाधिक प्रामाणिक और ऐतिहासिक विवरण क्राइस्ट के जीवन में उपलब्ध होता है। क्राइस्ट के साथ इसाई धर्म को उत्कर्ष मिला और उन्हीं के नाम पर वर्तमान सन् चल रहा है जिसका यह 2005वाँ साल है।
क्राइस्ट अपने चमत्कारों के लिए ही प्रसिद्ध थे। उनकी रोगनिवारक शक्ति (हिलिंग पावर) ने उन्हें अधिक पूज्य और प्रतिष्ठित बनाया है। उन्हें ईश-पुत्र माना गया। क्राइस्ट अन्धों को आँखें और कोढ़ियों को काया देने के लिए प्रसिद्ध थे।
उनकी इस शक्ति पर प्रश्न-चिह्न कभी नहीं लगा यद्यपि पाश्चात्य संस्कृति सब बातों में कम ही विश्वास करती है।
क्राइस्ट की तरह ही अगर वामाक्षेपा में रोगनिवारण-शक्ति थी तो उन्हें जादूगर या चमत्कारी कहकर उपेक्षित करने का कोई औचित्य नहीं बनता। होना तो यह चाहिए था कि क्राइस्ट के समानान्तर ही इस भारतीय योगी तान्त्रिक की उपेक्षा हम भारत में नहीं कर सकते जो कहने के लिए विश्व का आध्यात्मिक गुरु रहा है लेकिन वास्तविकता में यहाँ के अर्द्धज्ञानी; वामाक्षेपा के सदृश व्यक्तियों की उपलब्धियों को समझ नहीं पाते और केवल उन्हें ही नहीं दक्षिणेश्वर के सन्त रामकृष्ण परमहंस तक को पागल कहने में पीछे नहीं रहते।

इस उपन्यास में मात्र चमत्कार और अध्यात्म ही नहीं है। तत्कालीन बंगाल की स्थिति, वहाँ का घोर दारिद्र्य, जमींदारों एवं विदेशी शासकों का शोषण, भुखमरी और कुपोषण तथा आधि-व्याधियों का नग्न-नृत्य, समय-असमय आने वाले अकाल, निरक्षरता आदि सब यथा-स्थान इस पुस्तक में उपलब्ध हैं।
इसके अतिरिक्त बंग-प्रदेश की संस्कृति और कहीं-कहीं वहाँ की आँचलिकता ने भी इस पुस्तक को पठनीय बनाने में योगदान दिया है।
अतः इसे मात्र एक ऐतिहासिक, आध्यात्मिक कृति कहना उचित नहीं होगा। इसमें प्रायः वह सब कुछ है जिसे एक वृहत् औपन्यासिक कृति में होना चाहिए।
इसमें अगर दुःख-दर्द और पीड़ा के निवारण की बात है तो पीड़ा की विस्तृत अभिव्यक्ति भी होने से नहीं बची है।
उपन्यास में अनेक चरित्र हैं। मूल-चरित्र सर्वथा ऐतिहासिक हैं। उनके व्यक्तित्व यहाँ तक कि कृतित्व में भी परिवर्तन करने का कोई प्रयास नहीं किया गया।

कुछ पात्र काल्पनिक अवश्य हैं जिनकी आवश्यकता कथा में तारतम्य-हेतु प्रतीत हुई है किन्तु उनको पहचानना आसान है और उनकी भूमिका गौण है।
मेरे अन्य पौराणिक उपन्यासों की तरह इसमें भी संस्कृत के कुछ उद्धरण उपलब्ध हैं। ऐसे उद्धरणों को लेकर पूर्व में कुछ समीक्षकों ने लिखा था कि ऐसा करना आधुनिक नहीं है। मुझे नहीं लगता कि अपनी विरासत के प्रति ऐसी विरक्ति क्यों प्रदर्शित की जाती है। जब अंग्रेजी के आधुनिक उपन्यासकार, ग्रीक और लैटिन के उद्धरण देने से नहीं चूकते तो हम यदि संस्कृत का उद्धरण देते हैं तो हम उत्तर आधुनिक भले नहीं हो, आधुनिक होने से कैसे रह जाते ? लोक-गीतों के उद्धरण से तो किसी को परहेज नहीं है किन्तु संस्कृत की एक उक्ति भी उन्हें काटने दौड़ती है। दरअसल यह आधुनिकता की अनुपस्थिति नहीं अपितु समीश्रकों की अपनी सीमाएँ हैं। फिर भी उनकी और पाठकों की सुविधा के लिए संस्कृत के उद्धरणों का हिन्दी अनुवाद देना मैं कभी नहीं भूलता। अगर हमारे पास एक समृद्ध परम्परा है तो इसे तरीके से परोसने में कोई परहेज करने की आवश्यकता नहीं।

प्राकृतिक चित्रण मेरी दुर्बलता है। अपनी हर औपन्यासिक कृति में जहाँ भी अवसर मिलता है मैं प्राकृतिक चित्रण से विमुख नहीं हुआ हूँ। इस कृति में भी यह विशिष्टता उपलब्ध होगी।
यह उपन्यास पूर्ववर्ती उपन्यासों से शैली के स्तर पर थोड़ा भिन्न अवश्य है क्योंकि जहाँ पहले के उपन्यासों के हर अध्याय के आरम्भ में मेरा कुछ व्यक्तिगत दार्शनिक चिन्तन उपलब्ध है वहीं उसका यहाँ प्रायः अभाव-सा है। अगर कोई अध्याय चिन्तन से आरम्भ भी होता है तो उसकी अभिव्यक्ति उपन्यास के प्रमुख पात्र द्वारा ही होती है। प्रमुखतः ऐतिहासिक-आध्यात्मिक उपन्यास होने के कारण इसकी पठनीयता में बाधा आ सकती थी किन्तु प्राकृतिक चित्रणों और प्रासंगिक आवन्तर कथाओं ने इस बाधा को सर्वथा दूर कर दिया है।

भाषा के प्रति मेरा आग्रह सर्वविदित है। मैं तत्सम और सुललित शब्दों का आग्रही रहा हूँ। भाषा की प्रांजलता में मेरा विश्वास है। मैं इस उपन्यास में भी अपनी लीक से हटा नहीं हूँ।
‘अरण्या’ की भूमिका में मैंने लिखा था कि मन्दिरों को लेकर उपन्यास लिखने की परम्परा कोई नई नहीं है। इस सम्बन्ध में सोमनाथ ज्योतिर्लिंग पर लिखे दो विशिष्ट उपन्यासों को मैंने आरम्भिक कृति मानी थी। उनके पश्चात् असम की कामाख्या के ऊपर लिखे गए उपन्यासों की चर्चा की थी।
इस श्रेणी में मेरी ‘अरण्या’ तीसरा और यह ‘पद्मनेत्रा’ चौथा उपन्यास है।
इस उपन्यास के लेखन में भी रचना-प्रक्रिया पहले की तरह ही रही है। सर्वप्रथम मैं विषय से सम्बन्धित स्थानों का परिभ्रमण करता हूँ। फिर उससे सम्बन्धित जितनी सामग्री एकत्रित करता हूँ उसको आत्मसात् करने के पश्चात् ही लेखन आरम्भ करता हूँ। ‘पद्मनेत्रा’ के लेखन के पहले कई बार और लेखन के ठीक पूर्व दो बार तारा पीठ और अटला का परिभ्रमण किया। तारापीठ और कलकत्ता के बाजारों में मैंने वामाक्षेमा और तारापीठ से सम्बन्धित सामग्री प्राप्त कर ली। अधिकांश सामग्री बँगला में मिली। मैंने बहुत पूर्व पर्याप्त श्रमपूर्वक बंगला का आध्ययन किया था, यह उपन्यास लिखते समय मुझे लगा कि मेरा प्रयास सार्थक हो गया। अगर बँगला भाषा का ज्ञान मुझे नहीं होता तो यह उपन्यास भी नहीं आता।

इससे अधिक कुछ नहीं कहकर अब इस पुस्तक को अपने पाठकों के हाथ में समर्पित करता हूँ। मैं इससे अनभिज्ञ नहीं हूँ कि मेरी कृति पाठकों का एक वर्ग है जो मेरी हर औपन्यासिक कृति की आकुलता से प्रतीक्षा करता है। मैं इस विज्ञ पाठक-वर्ग का आभार मानता हूँ। जिस किसी का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहयोग इस कृति के लेखन में मिला है उसका मैं कृतज्ञ हूँ। विदुषी और कई विषयों की ज्ञाता डॉ. किरन ने पर्याप्त सामग्री दी। उनका ऋणी हूँ।
आत्माराम एण्ड सन्स के श्री सुशील पुरी और उनके पुत्र श्री सुधीर पुरी एवं उनके भतीजे श्री जोगेश्वर पुरी का विशेष आभार मानता हूँ जिन्होंने इस पुस्तक को यथाशीघ्र इतने आकर्षक रूप में प्रकाशित किया।
इस संस्थान के ही श्री सुभाष तनेजा का भी विशेष आभार मानता हूँ जो मेरी पाण्डुलिपियों को प्रस्तुत करने में पर्याप्त रुचि रखते हैं।

वस्तुतः यह पुस्तक माता तारा की कृपा से ही प्रस्तुत हुई है। उनकी अन्तर्प्रेरणा और पथ-प्रदर्शन के बिना यह पुस्तक इस रूप में नहीं आ सकती थी। मैं इस जगद्धात्री के प्रति अपना विनम्र निवेदन निवेदित करता हूँ और आशा करता हूँ कि अपने वरद पुत्र वामाक्षेपा के स्वर्गारोहण के पश्चात् जिस तरह वह अपने भक्तों को ही अपना पुत्रवत् स्नेह देकर उनकी आपत्तियों को दूर करती रही हैं और मनोवांक्षाओं की पूर्ति करती रही हैं, उसी तरह वह आगे भी अनन्तकाल तक ऐसा करती रहेंगी क्योंकि वह आद्या तो हैं ही अनन्ता भी हैं।
शेष बहुत कुछ उनके सम्बन्ध में इस पुस्तक में उपलब्ध हैं।
अस्तु

डॉ. भगवतीशरण मिश्र

एक

बंगाल की शस्य-श्यामला उर्वरा भूमि। माँ तारा के आँचल की तरह ही लहराते, खेतों में धान और अलसी के हरे पौधे। कदली-वनों की चित्ताकर्षक हरीतिमा। रिमझिम बरसात के पश्चात् जल के आकंठ-पूरित पोखरों में अठखेलियाँ करतीं विविध-आयामी मछलियाँ—कुछ छोटी, कुछ बड़ी। उन्हीं पोखरों में स्नान-रत प्रख्यात बंग-सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति श्यामल-गौर किशोरियाँ; दीर्घकेशी और मीनाक्षी।

इन पोखरों बल्कि ‘पुकरो’1 के पास से गुजरते ठिठकते पथिक। मत्स्यों के नर्तन से कम इन कोमलांगियों के वस्त्र-लिपटे स्नात गात-देह-यष्टि—की ओर अधिक आकृष्ट होते हैं। फिर मर्यादा का विचार कर आगे बढ़ जाते। ऐसे भी इधर से आने वाले अधिकतक तीर्थयात्री ही होते जो यहाँ से प्रायः डेढ़ कोस की कम दूरी पर ही स्थित तारापीठ की सिद्धिदायिनी माँ तारा के दर्शन को जाते होते। देवी-दर्शन के आकांक्षियों को मानवीय, मांसल आकर्षण में अपनी आँखों को आबद्ध करना उचित नहीं था। वे ‘जोय तारा’ कहकर उस पाप का प्रायश्चित करते और देवी की मनभावन मूर्ति के चरणों में मन-ही-मन नमन निवेदित कर आगे बढ़ा जाते।
तारा-पीठ के अन्य दिशाओं से भी मार्ग थे पर पूर्व की ओर जाने वाले इस मार्ग का अधिक महत्व था। इसका महत्व इधर अधिक वृद्धशील हो आया था क्योंकि इसी पर ‘अटला’ नामक नन्हा-सा गाँव था।

इसी गाँव के परिवेश के वर्णन से यह गाथा आरम्भ हुई है। पर यह परिनिवेश 19वीं शताब्दी के प्रारम्भिक चरणों की थी।
उसी अटला में 1832 ई. (वि.सं.1899) में एक अद्भुत बालक का जन्म हुआ जिसके पिता का नाम सर्वानन्द चट्टोपाध्याय था। ये दो भाई थे। छोटे का नाम था रामचरण और उसका वामाचरण।
वामाचरण अन्ततः वामाक्षेपा के नाम से प्रसिद्ध हुए और ‘अटला’ ग्राम इनके साथ ही अमरत्व को प्राप्त कर गया। अब भी इस पथ पर पथिक आते-जाते रहते हैं।
जो उस पथ से नहीं जाते वे भी तारापीठ में भगवती तारा के आस-पास ही स्थापित, उनके अनन्य उपासक और सिद्ध तान्त्रिक तथा उनके वरद पुत्र वामाक्षेपा की मूर्ति को देख और उनके सम्बन्ध में बहुत कुछ सुन-पढ़कर, ‘अटला’ आकर उनकी जन्मभूमि पर एक कच्चे घर में स्थापित उनकी मूर्ति और ‘अटला’ की मिट्टी को नमन नितदिन करना नहीं भूलते।
आधुनिक ‘अटला’ की एक विडम्बना भी है। अब यहाँ मात्र एक घर वामाक्षेपा की जन्मभूमि का प्रतिनिधित्व नहीं करता। दो-तीन घर, दिवंगत वामा के जन्म-स्थल के रूप में उभर आए हैं। पृथक्, एक छोटा-सा मन्दिर भी वामाक्षेपा के विग्रह से शोभायमान है। इस मन्दिर और दो-तीन घरों में प्रतिपल खींच-तान बनी रहती है। सभी; दर्शकों, तीर्थयात्रियों को स्वयं को असली और मौलिक बताते हैं और शेष को नकली और कृत्रिम।

फिर भी पारखी आँखें पहचान ही लेती हैं। वामाक्षेपा की जन्मस्थली अपनी प्राचीनता और कच्चे निर्माण के कारण शेष सभी से पृथक प्रतीत होती है। मन्दिर का पुजारी, आराधक कम महन्त अधिक दिखता है और वह अपने शारीरिक बल के बूते यात्रियों पर धौंस जमाकर अपनी ओर खींचना चाहता है। स्थान के असली अधिकार क्षेपा के ही मातृ-कुल के पीनाकी नाथ वंद्योपाध्याय मोशाई मन्दिर और दो अन्य प्रतियोगियों के मध्य दो पाटों के दाने की तरह पिसते रहते हैं। विरोध का कुपरिणाम भोग चुके होंगे, अतः विवाद से दूर ही रहते हैं। कठिनाई दर्शकों को ही इस छीना-झपटी से अधिक होती है। वे सभी स्थानों पर खींच लिये जाते हैं। सभी असली ही बनाए जाते हैं। पर सभी के दर्शन के बाद निष्कर्ष निकालना भी सहज हो जाता है। कितना भी छिपाओ असली-नकली का भेद प्रकट होकर रहता है और अन्ततः अधिक चढ़ावा वंद्योपाध्याय स्थान को ही चढ़ता है।

तो यह सारा खींच-तान, द्वेष-विद्वेष, भय-आतंक का कारण चढ़ावे के चन्द रुपये हैं। वामाक्षेपा जिन्होंने अपने जीवन-काल में दृव्य को सदा दूषित और अस्पृश्य माना, उनके ही गाँव, उनकी ही जन्मस्थली पर रुपयों के लिए यह कलह, उनकी आत्मा को कष्ट नहीं पहुँचाती होगी क्या ? होगी तो बला से ! ‘अटला’ के कुछ लोगों की जीविका के साधन वे जीवित रहकर नहीं बन सके तो मरकर उन्हें बनना ही पड़ेगा ! शव पर सौदा शायद इसी को कहते हैं।
छोड़िए वर्तमान को, वह ऐसा ही रहेगा; लोभ-लिप्सा के भँवर में फँसकर वह बद से बदतर ही होगा। लौटते हैं पीछे। क्षेपा के काल में। पर इस परामर्श के साथ कि भिड़ने दीजिए भौतिकवादियों को चढ़ावों के चन्द सिक्कों पर आप तारापीठ आएँ तो ‘अटला’ की पुण्यभूमि पर आकर उसकी माटी को मस्तक से लगाना न भूलें।

न भूलें यह भी कि वह दिवंगत सिद्ध, माँ तारा का दुलारा किसी एक घर, किसी एक मन्दिर में कैद होकर नहीं बैठा है, ‘अटला’ की धूल के हर कण में वह विराजमान है। विराजमान तो वह तारापीठ में भी हर तरफ है—माँ तारा के मन्दिर में, उसके परिवेश में, द्वारका-नदी के किनारे के महाश्मशान में, तारापीठ की कुछेक चौड़ी सड़कों और अनेकानेक तंग गलियों में; कहें तो यहाँ-वहाँ सर्वत्र। पर ‘अटला’ तो उसकी जन्मभूमि है न। और आपने भी तो सुना ही होगा—‘जननी जन्म भूमिश्चस्वर्गादपि गरीयसी।’
हम वामाक्षेपा की जन्मभूमि के पश्चात् उनकी जननी पर भी आएँगे क्योंकि इस कथा में उनकी प्रासंगिकता माँ तारा से कम भले हो पर उनके जीवन और मरण की घटनाएँ वामाक्षेपा की अलौकिक शक्तियों की साक्षी हैं—तारा के समर्पित उपासक की दिव्यता और उसकी आस्था तथा दृढ़ इछा-शक्ति की साक्ष्य। जननी के पश्चात् जगत्-जननी (माँ तारा) भी आँएगी पर पहले जनक। वामाचरण के पिता। सर्वानन्द चट्टोपाध्याय।

सर्वानन्द का जीवन आनन्दपूर्वक व्यतीत हो रहा था। पिता ने कुछ विशेष सम्पत्ति नहीं छोड़ी हो पर पैतृक की सुरक्षा की थी। कुछ बीघे खेत थे जो पुष्करों के जल से सिंचित हो पेट भरने-भर अन्न अवश्य देते थे वह भी तब जब ब्राह्मणों की परम्परा का निर्वाह करते हुए वह हल की मूठ का स्पर्श भी नहीं कर सकते थे और सब कुछ बटाईदारों के ऊपर था। पर बटाईदार सर्वानन्द की तरह नैष्ठिक ब्राह्मण के साथ बेईमानी करें यह हो नहीं सकता था।

खेतों के अतिरिक्त एक छोटी बाड़ी और इससे सटी एक नन्ही पुष्करिणी भी थी। खेतों से अन्न मिल जाता—मुख्यतः चावल, दाल—तो बाड़ी से केले, पपीते और अन्य फल। मौसमी सब्जियाँ। पुष्कारिणी में स्वयं उत्पन्न होतीं तैरती, बलखाती मछलियाँ भी भोजन में निषिद्ध नहीं थीं। पूरे बंगाल में तब भी, अब भी, उसके पूर्व भी मांस-भक्षण भले ही यत्र-तत्र वर्जित हो, मत्स्य, भोजन अनिवार्य अंग रहा है। पूजा-पाठी, देव-देवी-भक्त, कर्मकांडी ब्राह्मण भी अपने मत्स्य-प्रेम के कारण उपेक्षा का पात्र नहीं हो सकता था। न उसके आराध्य ही इससे कुपित होते थे। उन्हें अर्पण कर ही, इस अनिवार्य खाद्य-पदार्थ का उपयोग किया जाता था। भले ही उसकी गंध देव-देवियों को पसन्द आए या नहीं क्योंकि इन्हें तो मात्र गन्ध से ही सम्बन्ध होता है, सामग्री से नहीं—‘देवाः गन्धमिच्छन्ति पिडमिच्छन्ति देवताः देवता (मात्र) गन्ध की कामना करते हैं, पितर (मृत पारिवारिक जन) पिंड की।

यह पृथक बात है कि तारापीठ की तारा माता वह सब कुछ खाती थीं, जो वामाक्षेपा खाते थे। नहीं खातीं तो मार भी खातीं; अपने हठी पुत्र के हाथों। क्या अन्तर पड़ता था उनको उससे ? वामाक्षेपा के बाँस के डंडे का प्रहार वह गुलाब की पंखुड़ियों की मार मानकर सहर्ष ही झेल जाती होंगी। बालक तो माँ की गोद को गन्दगी से भी भर देता है। कहाँ बुरा मानती है वह उसका ? पर यह सब कुछ बाद में जब वामाचरण, वामाक्षेपा बन जाएँगे, अभी तो ‘अटला’ और इसमें सर्वपूजित उनके पिता सर्वानन्द चट्टोपाध्याय।

सर्वानन्द सात्विक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। सदाचार, धर्माचार उन्हें संस्कार में ही मिले थे। नहीं, उन्होंने मार्ग किनारे की उस पुष्करणी की तरफ दृष्टि भी नहीं उठाई जिसमें बंग-कन्यायें किल्लोल करती थीं। उसी कारण अपनी दो कन्याओं को भी मात्र स्नान सम्पन्न कर लौट आने का उनका कठोर निर्देश था। लौटना भी था तो गीले वस्त्रों में नहीं। तालाब-तट पर ही परिधान परिवर्तित कर लेने थे। वह तो उन्हें वहाँ स्नान-हेतु जाने भी नहीं देते पर अपनी छोटी पुष्करिणी में पलती मछलियों के प्राणों को उनके स्नान से वे संकट में भी नहीं डालना चाहते थे। सर्वानन्द और उनकी पत्नी अपनी पुष्करिणी से दो-चार लोटा जल लेकर स्नान कर लेते थे। वामाचरण और उनका अनुज रामचरण भी ऐसा करते थे। ले-देकर यही चार संतान थी सर्वानन्द को। अच्छा सन्तुलन था दो बालक तो दो बालिकाएँ भी।

बालिकाएँ शान्त थीं। गृह-कार्यों में माता का हाथ बँटातीं। पढ़ने की उम्र निकलती जा रही थी पर ‘अटला’ में बालिकाओं के पढ़ने की व्यवस्था ? वह तो अब भी नहीं है, उस समय कहाँ से होती ? तारापीठ में भी कोई बालिका पाठशाला नहीं थी। पाठशाला तो बालकों के लिए भी नहीं थी। वामाचरण और रामचरण की भी शिक्षा-व्यवस्था कहाँ हो सकी ? कोई संस्कृत विद्यालय तक नहीं था ‘अटला’ में न तत्कालीन तारापीठ में।

निरक्षर ही रहे वामाचरण। पिता ने घर पर ही कुछ अक्षर-ज्ञान देना चाहा पर वामाचरण की रुचि ही नहीं थी अध्ययन में। वे किसी और मिट्टी के बने थे। देवी के स्त्रोत बोलो तो वह तत्काल कंठस्थ कर लेते थे। बंगला और संस्कृत के कई देवी-प्रार्थनाएँ उन्हें जिह्वाग्र थीं। पिता सर्वानन्द कर्मकांडी थे। पौरोहित्य भी करते थे। अतः अनेक मंत्र और स्त्रोत उन्हें स्मरण थे। उनमें अधिकांश वामाचरण ने स्मरण कर लिये थे। पर उन्हें कर्मकांड और पौरोहित्य में कोई रुचि नहीं थी। किसी बंधन के कायल नहीं थे वामाचरण। पिता गृहस्थी की गाड़ी सुचारु रूप से खींच ही रहे थे, माता समय से सुस्वादु पदार्थ परोश ही देती थी तो मस्तमौला वामाचरण क्यों चिन्ता पालने जाएँ ! रामचरण के पल्ले कुछ नहीं पड़ता था। उन्हे स्त्रोतों और मंत्रों में कोई रुचि नहीं थी। ब्राह्मणों के लड़के उधर नौ-दस वर्ष की उम्र में ही कर्मकांड सँभाल लेते थे। यजमानों के यहाँ तो हवन-जप तो साधारण बात थी, विवाह-कर्म भी वे संपन्न करा देते थे। सप्तपदी के मंत्र उन्हें आते थे। अग्नि-स्थापित करने और उसके फेरे दिलवाने में भी वे निपुण थे सर्वानन्द चट्टोपाध्याय बारह वर्ष की उम्र लगते-न-लगते कितने जोड़ों को वैवाहिक सूत्र में बाँध चुके थे।

कुछ इसी आशा से कर्मकांड के सभी मंत्र, स्त्रोत उन्होंने बड़े और कुशाग्र पुत्र वामाचरण को कंठाग्र कराए थे कि निरक्षर ही सही, उनके नहीं रहने पर वह पौरोहित्य से तो कुछ अर्जित कर लेगा। घर की गाड़ी केवल कृषि के भरोसे नहीं चल सकती थी।
पर पूत के पाँव पालने में ही दीख गए थे। सर्वानन्द एक बार अस्वस्थ थे। मलेरिया के ताप से तप रहे थे। बुखार के पूर्व भीषण ठंडक लगती थी। गात काँपने लगता। फिर अकस्मात शरीर का ताप अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाता। मलेरिया उन दिनों ‘अटला’ ही क्या एक तरह से पूरे बंग-प्रदेश का अभिशाप था।
ज्वर से तपते सर्वानन्द ने एक दिन ज्येष्ठ पुत्र वामाचरण को हाथ के इंगित से पास बुलाया।

‘‘तुम्हें कर्मकांड के सभी मंत्र अभी भी कंठस्थ हैं न ?’’
‘‘मैं कुछ नहीं भूलता। माँ तारा के स्तोत्र भी मुझे कंठस्थ हैं-

‘तोमार इच्छा
तुमि करो हे पूरण
आमार माँ !
तारा माँ !

-तुम्हारी इच्छा; तुम्हीं पूरी करो। मेरी माँ, तारा माँ।’’
‘‘ठीक है’’ पिता ने कहा, ‘‘आज सुकुमार बोस की बेटी का विवाह है। वह अपना यजमान है। यह विवाह-कार्य तुम सम्पन्न करा दो। मैं ज्वर के कारण विवश हूँ।’’
‘‘आमा के क्षमा कोरबेन।’’ (मुझे क्षमा करेंगे)।’’ वामाचरण ने छूटते ही कहा।’’
‘‘आमार आज्ञार उल्लंघन कोरछो ?’’ —मेरी आज्ञा का उल्लंघन कर रहे हो ?’’ पिता ने कुछ कर्कश स्वर में पूछा।
‘‘नेई ! माँ तारार आज्ञार पालन कोरछि।’’—नहीं, माँ तारा की आज्ञा का पालन करता हूँ।
‘एखाने माँ तारार आदेश कोथाय आछे ? कि आदेश दियेन छे उनि तोमा के ?’’—इसमें माँ तारा का आदेश किधर से आता है ? उन्होंने तुम्हें क्या आदेश दे रखा है ?
‘‘किछु नेईं’’—कुछ नहीं।

‘‘तखन मिथ्या कथा केनो कोरछो ?’’-तब झूठ क्यों बोल रहे हो ?
‘‘मिथ्या कथा आमि कखनो कोरि ना। कोरबो ना कखनो।’’ —झूठ मैं कभी बोलता नहीं, भविष्य में भी नहीं बोलूँगा।’’
‘‘तखन एई कि ?’’—तब यह क्या है ?
‘‘कि ? बुझते पारी ना आपनार मन्तव्य ?’’—क्या ? समझ नहीं पाता आप कहना क्या चाहते हैं।



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