सूखे सुनसान नालों में - श्रीनिधि सिद्धान्तालंकार Sukhe Sunsan Nalon Mein - Hindi book by - Srinidhi Siddhantalankar
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सूखे सुनसान नालों में

श्रीनिधि सिद्धान्तालंकार

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2018
पृष्ठ :200
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4926
आईएसबीएन :81-7043-651-6

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शिकार व जंगल के सच्चे, रोमांचक और रोचक अनुभव....

Sukhe Sunsan Nalon Mein

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

 

शिकार की लोकप्रिय पुस्तकों के प्रसिद्ध लेखक श्रीनिधि सिद्धान्तालंकार का नाम शिकार-साहित्य के प्रेमियों के लिए सुपरिचित है।
प्रस्तुत पुस्तक में वन्य-जीवन का लेखक ने अपने अनुभव के आधार पर ऐसा सरल, रोचक और सरस चित्रण किया है कि पुस्तक को पढ़ना प्रारम्भ करने पर पुस्तक कब खत्म हो जाती है, इसका पता ही नहीं चलता।
हिंस्र पशुओं से होने वाली भीषण मुठभेड़ों का लेखक ने अद्भुत क्षमता से चित्रण किया है।
इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय वन अकादमी के निदेशक श्री विनोद द्वारा बनाए गए चित्र पुस्तक में दिए गए हैं जिनसे पुस्तक का महत्त्व और भी बढ़ गया है।

समर्पण

 

स्नेहमयी माँ को
जिन्होंने भगवान देवी के नाम से इस धरती पर सत्तर वर्ष बिताकर अपनी इस सन्तान को धन्य किया, जिनकी गोद में बैठकर वन्य-प्रेम का प्रथम पाठ पढ़ा, जो स्वयं वन्य-जीवन से अपार स्नेह रखती थीं और मुझे भी सदा उधर प्रवृत्त करती रहती थीं उन्हीं के चरणों में।

आद्य-कथन

 

जहाँ रहता हूँ, वहीं की बात कह रहा हूँ। उन्हीं वनों की। उन्हीं घाटियों की। दूसरे वनों की बात दूसरे लोग जानें।
पच्चीस बरस पहले जब आया करता था यहाँ, झुरमुटों का प्रत्येक अँधेरा, झाड़ियों की प्रत्येक ओट, गुथे हुए वृक्षों का प्रत्येक पृष्ठ भाग, चट्टनों के पीछे का प्रत्येक झिल्ली-झंकारपूर्ण स्थान, किसी भीषण छायामूर्ति के अचानक आ निकलने का सन्देह करा दिया करता था। रात्रियों में जलपान के लिए आने वाले शेरों के पदचिह्नों में अंकित जलाशयों के गीले किनारे हृदय में धड़कन पैदा कर दिया करते थे। सूखे सुनसान नालों की रेत पर या तेंदुए की ताजी पैड दिखाई दिया करती थी।
तब कैसी रोमांचकारी कल्पना से भर उठा करता था हृदय मेरा। गया होगा वह, किसी शिकार का पीछा करता हुआ, रात के गुप अँधेरे में इधर से निकल कर। तब कैसा भयजनक बन बैठा होगा वातावरण यहाँ का। छा गया होगा अभेद्य सन्नाटा चारों ओर। बैठ गये होंगे शव्य भोजी साँस खेंचकर झाड़ियों की ओट में। और पूछता जा रहा होगा वह सतर्क चलता हुआ अपनी छोटी-छोटी दहाड़ों से निरन्तर ‘कौन है उधर ? सामने आओ। कहाँ जा छिपे हो ?’
और जब चाँदनी रातों में बैठा करता था वृक्षों पर बँधी मचानों पर, न जाने कितने संत्रस्त वन्य पशु निकल जाया करते थे नीचे से चुपचाप। तब उनकी भयभरी मन्द पदचाप सुनकर हो आया करता था कैसा एक रोमांच। दूर किसी घाटी से आते शेर की दहाड़ से डर कर मोर किस तरह एक ही साथ कें-कें कर उठा करते थे। और लंगड़-बग्घे का वह दैत्य हास्य। वह भी तो चाँदनी रात की चादर को धीरे-धीरे कम्पित कर दिया करता था।

किन्तु अब कहाँ वे बातें ? अब तो घाटियों में शेरों के पदचिह्न ही दुर्लभ हो उठे हैं। सांध्य-वेलाओं में जंगल से लौटती गायों का चुपचाप पीछा करने वाले शेर कहाँ किधर चले गए पता नहीं चल रहा। उनकी दहाड़े समाप्त होकर न जाने किन कब्रों में जा सोईं। अब तो जंगल-गर्भ में से प्रतिक्षण निकलने वाले सन्नाटे में भय की कोई बात ही नहीं रही। रात में, दिन में किसी भी घाटी में चले जाओ, कोई विभीषिका हृदय की धड़कन नहीं बढ़ाती।
ऐसी ही हालत हो गई है आज इधर के वनों की। अब भी तो जाया करता हूँ प्रत्येक प्रभात में यह अभिलाषा लेकर कि दीख पड़ जाए कहीं शिकार से तृप्त होकर मस्ती में कदम उठाता कोई शेर अपने विश्रामस्थल की तरफ जाता। जाया करता हूँ सांध्य-वेलाओं में अब भी तो यह आशा लेकर कि दिखाई दे जाए कोई भय-छाया आहार की खोज में भटकती। किंतु कुछ दिखाई नहीं पड़ता।
हाँ, दीख पड़ जाती हैं अर्थोपार्जन में व्यस्त किसी ट्रांसपोर्ट कम्पनी की ट्रकें व्यर्थ की पुकार मचाती, या अर्थ-प्राप्ति की चिन्ता में डूबे हुए श्रमिकों के अधनंगे शरीर बस, दूसरा कुछ नहीं।

अन्य वरदानों के साथ-साथ स्वराज्य प्राप्ति का यह भी एक वरदान हमें मिला है। इस बाइस-तेइस वर्ष में कितने वन्य-पशुओं की थोक हत्या हुई है, कौन जानता है ? विदेशी दूतावासों, निरंकुश वनाधिकारियों और तश्कर शिकारियों के हाथों इन थोड़े-से वर्षों में वन्य-प्राणियों की इतनी हत्याएँ हुई हैं कि सचमुच उनकी जातियाँ ही लुप्तप्राय हो गई हैं जो बची भी हैं वो भी समाप्त होने को हैं। चोरी से मारे गए शेरों-बघेरों की खालों का व्यापार किस तेजी से बढ़ रहा है, हरिण-शेरों के शिकार के कितने नए-नए उपायों का आविष्कार हुआ है, केवल वनाधिकारी ही जानते हैं।
राष्ट्र की इस अमूल्य सम्पत्ति का नाश करने वाली प्रकृति पर रोक-थाम लगाने के अभिप्राय से सन् 1953 से जो उद्योग मैंने प्रारम्भ किया था और ‘शिवालिक की घाटियों में’, ‘मालिनी के वनों में’ और ‘मचान पर उनंचास दिन’ नामक तीन उद्योग नवयुवकों के सामने प्रस्तुत किए थे। ‘सूखे सुनसान नालों में’ नामक यह चौथा उद्योग भी उस श्रृंखला की एक कड़ी है, अधिक कुछ नहीं। जानता हूँ जो उन उद्योगों से स्नेह करते हैं वे इससे भी अवश्य स्नेह करेंगे।

प्रकाशकीय

 

‘शिवालिक की घाटियों में’, ‘मालिनी के वनों में’, और ‘मचान पर उनंचास दिन’ जैसी शिकार की लोकप्रिय पुस्तकों के प्रसिद्ध लेखक श्रीनिधि सिद्धांतालंकार का नाम शिकार—साहित्य के प्रेमियों के लिए सुपरिचित है। इस विषय में वह जाने माने लेखक हैं। जंगली पशुओं के जीवन और वातावरण के अध्ययन में उन्हें बाल्यकाल से ही रुचि रही है और साधरणतः यही कारण है कि शिकारी-जीवन के उनके संस्मरण न केवल सामान्य से अधिक रोचक ही बन पड़े हैं, वरन् शिकार—साहित्य में अपने ढंग के निराले और अनूठे भी हैं। पुराने और प्रबुद्ध साहित्यकार श्रीनिधिजी हिन्दी के ‘जिम कार्बेट’ हैं और जंगली पशुओं का शिकार करने की बजाय, उनसे प्रेम अधिक करते हैं। वह एक सिद्धहस्त शिकारी के रूप में प्रसिद्ध अवश्य हैं, परन्तु जीव-हत्या वह पसन्द नहीं करते। जान हथेली पर रखकर निहत्थे ही घने बीहड़ वनों में चले जाना उनके लिए मामूली बात है। इसका रहस्य यह है कि श्रीनिधि जी दीर्घकालीन से पशुओं के स्वभाव को पढ़ते रहे हैं और पशुओं के क्रिया-कलापों तथा मनोविज्ञान का उन्होंने इतना सूक्ष्म अध्ययन किया है कि पलक झपकते ही पशु की प्रत्येक क्रिया और स्थिति के सम्बन्ध में उन्हें पूर्वाभास हो जाता है। जंगल में कब कहाँ-कौन-सी घटना होने वाली है, इस बात का उत्तर भी श्रीनिधि जी जरा-सी आहट पर या हवा के रूख को देखकर समझ जाते हैं।

विगत कई वर्षों से घने वन-प्रदेशों में श्रीनिधि जड़ी-बूटियों की खोज का कार्य करते आ रहे हैं। यद्यपि कुछ दिनों तक वह दिल्ली से प्रकाशित होने वाले तत्कालीन दैनिक ‘विश्वामित्र’ के संपादक विभाग में भी रहे हैं। परन्तु प्राकृतिक सुषमा के प्रेमी-हृदय श्रीनिधि को दिल्ली का कृत्रिम जीवन नहीं रुचा और शिवालक व गढ़वाल की प्राकृतिक शोभा-श्री उन्हें अपनी ओर आकर्षित कर ले गई। उन्हीं हवाओं, पहाड़ियों और हरे-भरे वनप्रांतरों की पगडंडियों पर घूमते-फिरते उन्होंने जीवन का एक दीर्घकाल गुजारा है, जिन पर भयंकर बाघ-बघेरे, शेर-तेंदुए, रीछ-भेड़िए स्वतन्त्र होकर विचरण करते हैं और जहाँ साँझ के छुटपुट से सवेरे की लालिमा तक हरिणों, नीलगायों और मोरों के झुण्ड के झुण्ड भ्रमण करते फिरते थे। अनेक-अनेक रात और दिन भोजन किए बगैर ही श्रीनिधि मचानों पर बिता चुके हैं। ऐसी ही साहसिक खोज-यात्रा के कार्यक्रमों में एक बार उन्होंने कण्वाश्रम के प्राचीन खँडहर खोज निकाले थे। ऐसे अनेक रोचक दृष्टान्त हैं अनेक रोमांचक प्रसंग हैं। वास्तव में श्रीनिधि का जीवन ही जंगल की एक लम्बी और तथ्यों से भरपूर कहानी है। फिर भी श्रीनिधि के सम्बन्ध में यह सत्य है कि वह शुद्ध शाकाहारी हैं और वह जीव-हत्या को पाप समझते हैं।

श्रीनिधि जी का अधिकतर कार्यक्षेत्र गढ़वाल और शिवालिक के इर्द-गिर्द रहा है। इस क्षेत्र के चप्पे-चप्पे से मानों उनका परिचय है। वहाँ के जंगलों और वन-पशुओं का गहन अध्ययन करने के पश्चात पाठकों के लिए उन्होंने जो कुछ सामग्री अपनी लेखिनी द्वारा सँजोई है, वह साहित्य-जगत के लिए अद्वितीय कही जा सकती है। उनकी भाषा शैली सरल और रोचक है और उसमें काव्यात्मकता की मात्रा भी अत्यधिक रहती है।
उनके द्वारा लिखे गए जंगल-जीवन के रोमांचक क्षणों का वर्णन और शिकार-प्रसंगों को पढ़ते-पढ़ते पाठक आत्म-विस्मृत हो जाता है और दम साधे तब तक पढ़ता रहता है। जब तक वह पूरी रचना समाप्त नहीं कर लेता। यह विशेषता उनकी सभी पुस्तकों में विद्यमान है ‘सूखे सुनसान नालों में’ शीर्षक की प्रस्तुत पुस्तक में भी लेखक ने अपनी कवित्वपूर्ण, रोचक और सरल भाषा-शैली में, जंगल जीवन के सच्चे शिकार-प्रसंगों और रोमांचक क्षणों के वृत्तान्त संगृहीत किए हैं। हमें प्रसन्नता है और हमारा सौभाग्य है कि हम इस पुस्तक को पाठकों के सामने प्रस्तुत कर सके हैं।

पंछियों का शाप
1

 

कार्तिक लगते ही बदरी-कुंज के पड़ाव में एक बार फिर चहल-पहल दिखाई पड़ने लगी। नई झोपड़ियाँ बन गईं और उनमें भाभड़ और बाँस काटने वाले श्रमिक आ-आकर बसने लगे। पड़ाव सुन्दर है, यह तो ठीक है, किन्तु भयंकर भी कम नहीं हैं। उसके चारों तरफ खड़े हुए हरे पहाड़ों और उनके बीच में फैले हुए घने वनों के कारण वहाँ यद्यपि सौन्दर्य तो हर समय बना रहता है किंतु उनमें बसने वाले शेर-हाथियों के कारण भय भी उतना ही बना रहता है। कभी भी, कोई खूनी जानवर पड़ाव में आ निकल सकता है। इसलिए हर झोंपड़ी के द्वार पर रात-भर आग जलती रहती है, जो खूनी जानवरों से तो बचाती ही है, इन सर्दियों में झोंपड़ियों को गर्म बनाए रखती है। शकूर वनजारा इसी पड़ाव में रहता है। वैसे, रहने वाला तो वह मुरादाबाद जिले के किसी गाँव का है, किन्तु प्रतिवर्ष ही अपने पन्द्रह-बीस बैलों के साथ इस पड़ाव में आया करता है और सर्दियों के पाँच-छः महीने इधर बिताता है। ये बैल उसकी कमाई के साधन हैं। जंगल के उन दुर्गम स्थानों में-जहाँ बैलगाड़ी या ट्रक नहीं पहुँच सकते—ये बैल-वैल आराम से पहुँच जाते हैं और अपनी पीठ पर बाँस लादकर पड़ाव में पहुँचा देते हैं। यही उसकी आजीविका है।

किन्तु इतने से वह सन्तुष्ट नहीं है। अतः उसने कमाई के और भी एक-दो छोटे-मोटे ढंग निकाले हुए हैं। उसे प्रतिदिन नये-नये जंगलों के भीतरी भीतरी भागों में आते-जाते रहना पड़ता है, जिससे उन जंगलों के बहुत से गुप्त-भेद वह जान गया है और उनमें पैदा होने वाले अनेक प्रकार के फलों और मधु-छत्तों का भी उसे पता रहता है उन्हें बेचकर वह और भी आमदनी कर लेता है। जैसे मूल की अपेक्षा सूद पर कुछ अधिक मोह रहता है, उसका भी इस ऊपर की आमदनी पर अधिक मोह है। मेरी जंगल-कोठी उसके पड़ाव से थोड़ी दूर है। इसलिए उसने मुझे भी अपना ग्राहक बना लिया है और जब-तब मेरे पास भी अपने जंगली फल और मधु बेच जाता है।
जिन दिनों की बात कह रहा हूँ, तब चैत बीत कर बैसाख लग चुका था और जंगल बन्द हो जाने से भाभड़ और बाँस काटने वाले श्रमिक पड़ाव से विदा हो चुके थे। मैंने समझा था कि शकूर भी अपने गाँव लौट गया होगा। उस सूने पड़ाव में पड़कर वह करेगा भी क्या ? किंतु जब एक दिन हाथ में एक छोटी-सी कंडिया सँभाले उसे अपनी तरफ आते हुए देखा तो मुझे कुछ आश्चर्य हुआ।
‘‘तुम अब तक गए नहीं, शकूर ? पड़ाव तो खाली हो चुका होगा।’’
‘‘जी, खाली हो चुका है। बस मैं ही रह गया हूँ।’’
‘‘कब जाने का विचार है ?’’
‘‘अभी तो प्यालों के मौसम तक ठहरूँगा।’’

‘‘तब तो ठीक है। तुम्हारे हाथ से प्याल भी खाने को मिलेंगे। लेकिन, इस कंडिया में क्या है ? कुछ मधु-वधु है क्या ?’’
‘‘मधु तो नहीं है। थोड़ी-सी खजूरें हैं। आपके लिए ही लाया हूँ।’’—कहकर उसने कंडिया मेरे सामने रख दी।
मगर खजूरों का नाम सुनकर मैं सहसा चौंक उठा। कई वर्ष पहले की वह बात मुझे याद आ गई। जब उसी बदरी कुंज में एक बाबा रहा करते थे, जिन्हें उधर की एक घाटी में खजूर के आठ-दस वृक्ष लगाकर बड़े यत्न से उनका संवर्धन किया था मुझे खूब याद है, जिस दिन उन पर प्रथम बार फल आए थे, उन्होंने पास के जलाशय-तट पर बैठकर आठ दिन का यज्ञ परायण किया था और पूर्णाहुति के बाद उन वृक्षों और उनके फलों को उस घाटी के पंछियों के नाम संकल्प कर दिया था। यद्यपि बाबा अब नहीं रहे, किंतु उनका संकल्प आज भी वैसा ही अटल है। कोई भी पथिक उन खजूरों को नहीं तोड़ता। वे केवल उस घाटी के पंक्षियों की ही सम्पत्ति मानी जाती है। उस कंडिया को देखकर मुझे संदेह हुआ, कहीं उसमें उन्हीं वृक्षों की खजूरें तो नहीं हैं ?

पूछने पर जब पता चला मेरा सन्देह सच है और ये उन्हीं वृक्षों की खजूरें हैं, तो मेरा मन स्वभावतः ही एक अशुभ कल्पना से भर उठा और अनायास ही मेरे मुख से निकल पड़ा—‘‘इन खजूरों को तोड़कर तुमने अच्छा नहीं किया, शकूर ! ये इस घाटी के वन-देवताओं की सम्पत्ति है।’’
सुनकर वह खिलखिलाकर हँस पड़ा। बोला—‘‘इतने पढ़े-लिखे होकर भी आप इन पुरानी बातों पर विश्वास करते हैं ? जंगली पक्षियों की भी कोई सम्पत्ति होती है, भला ? और जो आप यह कहते हैं कि वे वन-देवता हैं, यह भी केवल एक कल्पना ही तो है, कवियों की कोरी कल्पना। असल में तो वे मामूली पंछी ही हैं, जो हमारी ही तरह भूख-प्यास और जन्म-मरण के बन्धन में बँधे हुए हैं। रहीं ये खजूरें ये भी उनकी कहाँ हैं। वन की सम्पत्ति हैं, जिन्हें जो चाहे तोड़ सकता है, खा सकता है। हाँ, यह ठीक है कि वे पंछी भी उन्हें खा सकते हैं। उन्हें वैसा करने की छूट है लेकिन ये केवल उन्हीं की सम्पत्ति है, दूसरे किसी की नहीं, यह तो मुझे किसी भी तरह समझ नहीं पड़ता।’’
‘‘भले ही न समझ पड़े, किन्तु जो सत्य है वह सत्य ही रहेगा, शकूर ! न समझ पड़ने पर भी वे सदा वन देवता ही बने रहेंगे। वर और शाप दे सकने की शक्ति भी उनमें बनी रहेगी और उन वृक्षों पर भी उनका एकाधिकार बना रहेगा। खैर, इन बातों को छोड़ो। लो ये तीन रुपये। तुम्हारा यहाँ आने का पारिश्रमिक। और इसी समय उस घाटी में लौटकर उन वृक्षों में से किसी एक वृक्ष पर यह कंडिया लटका आओ। मुझे विश्वास है ऐसा करने से अवश्य ही उन वन-देवताओं का कोप शान्त हो जाएगा और वे तुम्हारे सब अपराध क्षमा कर देंगे।’’—कहकर मैंने तीन रुपये उसके हाथ पर रख दिए।

2

 

शिवालिक-पर्वतों में प्याल जेठ में पकते हैं। उन दिनों मैं प्रतिवर्ष अपने कुछ दिन शिवालिक की इन घाटियों में बिताया करता हूँ। उस वर्ष भी गया था और बदरी-कुंज की दक्षिणी सीमा पर खड़े हुए एक पीपल के वृक्ष पर मचान बाँध कर ठहरा हुआ था।
यों तो यहाँ मेरा सारा ही दिन आनन्द में बीतता था, किन्तु वहाँ की प्रभात-वेलाएँ विशेष मधुर होती थीं। भयों से भरी अँधेरी रात जैसे ही बीतती और पंछियों के मीठे गीत और पके हुए वन्यफलों का नैवेद्य लेकर ऊषा-पुजारिणी वन-देवताओं की अर्चना के लिए आकाश से उतरती, मन्दिर के प्रांगण में वन-मयूरों के शंखनाद और तीतरों के कीर्तन-स्वर सुनाई पड़ने लगते। लताएँ देवताओं के चरणों पर नए खिले फूल चढ़ाने लगतीं। हवाएँ सिरस फलियों के मजीरें बजाती हुई नृत्य करने लगतीं। समूचा वन जाग उठता। मेरी नींद भी उनके साथ खुल जाती और मैं अपने बनाए एक जलकुण्ड पर, जो मेरे वृक्ष से लगभग पन्द्रह हाथ दूर था, हाथ-मुँह धो, प्याल खाने का निमन्त्रण देने वाले सामने के पर्वत पर चढ़ जाता और ताजे फल खाकर आठ बजे तक मचान पर लौट आता।

शकूर इन प्यालों के लिए ही उस सूने पड़ाव में ठहरा हुआ है। वृक्ष पर चढ़ने में वह इतना निपुण है कि उसकी पतली से पतली शाखा पर पहुँच कर दो ही घंटे में इतने प्याले इकट्ठे कर लेता है कि पास की बस्ती में बेचने पर उसके तीन-चार रुपये मजे में बन जाते हैं। कभी-कभी जब मैं पहाड़ पर घूमने नहीं जाता वह मेरे पास भी अपने प्याल बेच जाता है। एक बार उन खजूरों के बारे में मैंने उससे पूछा था। परन्तु उसने जिस तरह से घुमा-फिराकर मेरे प्रश्नों का उत्तर दिया था उससे मैं इसी परिणाम पर पहुँचा कि उसने मेरी बात नहीं मानी और बस्ती में बेंचकर उन खजूरों के पैसे भी बना लिए। चलो जैसी उसकी इच्छा। मैंने फिर कभी उससे उनकी चर्चा नहीं की और बात आई-गई हो गई।
जिस दिन की बात लिखने लगा हूँ, उस दिन मैं काफी दूर तक पहाड़ों पर घूमा था। कितने ही नए-नए शिखर तथा प्यालों की नई-नई घाटियाँ उस दिन मैंने देखी थीं और इतना ही सब घूम कर आठ बजे तक मचान पर लौट आया था। आकर पहले तो कुछ देर विश्राम किया, फिर स्नान और प्रातराश के बाद ‘उत्तर-चरित’ लेकर मचान पर लेट गया।
अभी शायद पन्द्रह मिनट ही बीते होंगे कि नीचे की झाड़ियों में कुछ सरसराहट—सी हुई और जैसे ही आँख घुमाकर देख एक खूब काला हाथी मचान की तरफ चला आ रहा था। वह हाथी था कि किसी का शाप कुछ समझ में न आ रहा था। उसकी भीगी हुई पीठ को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वह उधर के किसी जलाशय पर पानी पीने आया होगा। मगर मानुष-गंध पाकर मेरी तरफ चला आया है। खूब मक्कार प्रतीत होता था, वह वृक्ष के पास पहुँचकर पहले तो वह सूँड़ ऊपर उठाकर हवा में से गंध लेता रहा, किन्तु जब किसी निश्चय पर न पहुँच सका तो इस तरह पीपल के पत्ते तोड़ कर खाने लगा जैसे वह आया ही इसीलिए था। जब वह पत्ते तोड़कर खाने के लिए नीचे किसी डाल को खींचता, झटके से मेरी मचान भी हिल जाती और ऐसा सन्देह होने लगता कि वह कहीं टूट न जाए। मगर मैं चुपचाप बैठा था और मुझे पूरा विश्वास था कि वह किसी भी तरह मुझे भाँप न सकेगा।

किन्तु तभी विघ्न पड़ गया। अचानक ही पश्चिम दिशा के वन में से घंटियों के शब्द सुनाई देने लगे, जिन्होंने बता दिया कि शकूर का नौकर बैल चराता हुआ आ रहा है। मगर थोड़ी देर बाद जब नौकर की जगह स्वयं शकूर दिखाई पड़ा मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ। आश्चर्य इसलिए, क्योंकि वह इन दिनों प्यालों के पीछे इस तरह हाथ धोकर पड़ा था कि अपने बैलों की तरफ ध्यान देने का उसे अवसर ही न मिलता था। उसका नौकर ही इस कर्तव्य को पूरा करता था। परन्तु आज न जाने क्यों वह स्वयं ही अपने बैल चराने आ पहुँचा था और एक लम्बी लाठी लिए उन्हें हाँकता चला आ रहा था। मुझे लगा, यदि तुरन्त ही कोई उपाय न किया गया तो उसका और उसके बैलों का जीवन अवश्य ही संकट में पड़ जाएगा। वैसे चाहता तो पुकारकर उसे सावधान कर सकता था। परन्तु वैसा करने से मेरा अपना जीवन भी खतरे में पड़ जाता। उस समय तो किसी ऐसे मौन संकेत द्वारा ही उसे सावधान करना ठीक था, जिसे वह समझ ले परन्तु हाथी न समझ सके।

इसके लिए थोड़ी तैयारी करनी पड़ी सबसे पहले एक कागज पर वृक्ष के नीचे खड़े हाथी का रेखाचित्र बनाया। इसलिए की शकूर पढ़ना नहीं जानता था। फिर उस कागज को एक तीर पर लपेट, तीर को धनुष पर चढ़ा लिया और मचान पर खड़ा हो गया शकूर जैसे ही मेरे तीर की मार में पहुँचा, मैंने धनुष कान तक खींच कर छोड़ दिया, जो उसके निकट के एक शीशम के तने में जा घुसा। शकूर तो पहले चौंककर कई गज पीछे हट गया। परन्तु बाद में वृक्ष के पास जाकर उसने जब उसके तने में से तीर निकाला और उस पर लिपटे हुए कागज को खोलकर देखा। वह तुरन्त भागकर वृक्ष पर चढ़ गया और डरी हुई आखों से मेरी तरफ देखने लगा।
किन्तु उसके बैलों का कुछ न किया जा सका। वे तो निरंतर बढ़ते ही आ रहे थे। मान लेना पड़ा कि इन अभागों में से आज अवश्य किसी एक की भाग्यपुस्तक में हाथी के हाथों मरना लिखा है। तभी तो वे इतनी निश्चिन्तता से उसकी तरफ बढ़ते आ रहे हैं। लेकिन जब देखा कि वे तो ठीक उसके पास ही आ पहुँचे और उसके तोड़े हुए पत्तों पर भूखों की तरह टूट पड़े और उसने उनसे कुछ भी नहीं कहा तो विस्मय का ठिकाना न रहा। उससे भी अधिक विस्मय तब हुआ, जब देखा, मारना तो दूर वह उन्हें स्वयं अपनी सूँड़ से तोड़-तोड़ कर ताजे पत्ते दे रहे है और बासी पत्ते छोड़कर वे भी उन्हें मजे से खा रहे हैं।
जीवन में पहली बार यह अद्भुत बात देखी। सुना और देखा तो यह था कि हाथी अपने भोजन में से एक दाना भी किसी को नहीं लेने देता। जो लेता है उसे मार डालता है। किन्तु यहाँ उससे उल्टा ही दृश्य था। वह बड़े स्नेह से अपना भोजन दूसरों को दे रहा था।
ऐसा लग रहा था कि मानों आज उसका जन्म दिन है और उसके उपलक्ष्य में उसने अपने कुछ मित्रों को आमन्त्रित किया है और मेजबान बनकर वह उनका आतिथ्य कर रहा है। वे सफेद बैल मानो उसके आतिथि हैं, जो अर्धव्रत्त बनाकर ‘बुफे-डिनर’ ले रहे हैं। उसने इतने अधिक परिमाण में उनके सामने खाद्य पदार्थों का ढेर लगा दिया है कि उनसे खाया भी नहीं जा रहा है।

किन्तु एक बैल कुछ अधिक लोभी प्रतीत हो रहा है और न जाने क्यों अपने पत्ते छोड़कर दूसरों के भोजन में मुँह मारता फिर रहा है। हाथी को उसकी यह हरकत पसन्द नहीं आ रही थी। उसने तो पहले एक धीमी चिंघाड़ लगाकर उसे वैसा करने से मना किया। फिर एक दो बार उसकी तरफ सूँड़ बढ़ा कर उसे चेतावनी भी दी। किन्तु बैल इतना दुष्ट था कि वह हर बार हाथी की सूँड़ को अपने सींगों से धकेल देता था। लगता है इससे हाथी को क्रोध आ गया और उसने देखते-ही-देखते उसे अपनी सूँड़ में लपेटकर दूर पटक दिया।
घटना अप्रत्याशित थी। बात यहाँ तक बढ़ जाएगी, न मुझे ही आशा थी, न शायद बैलों को ही। अपने साथी की यह दशा देखकर वे इतने डर गए कि एक क्षण का भी विलम्ब न कर हाथी की भोजनशाला से भाग खड़े हुए। हाथी को भी शायद अपने उस कठोरतम व्यवहार पर खेद हुआ। क्योंकि मैंने देखा वह भी वृक्ष के नीचे से हटकर उस अभागे बैल के पास आ पहुँचा और कुछ देर तक उसकी देह पर सूँड़ फेरते रहने के बाद चुपचाप जंगल से निकल गया।
उसके जाने के बाद मैंने शकूर को संकेत से बुलाकर सारी घटना विस्तार से सुनाई। बैल को घातक चोट आई थी और वह जिस तरह कष्ट से साँस ले रहा था, जान पड़ता था अधिक देर तक न जी सकेगा। शकूर उसके पास जाकर बैठ गया और रोने लगा। उसे शायद उसके उन उपकारों की याद आने लगी, जब ढेर-के-ढेर बाँस पड़ाव में पहुँचाकर उसने उसकी निश्छल सेवा की थी। स्वयं केवल सूखे तृण चरकर उसे सुखी और सम्पन्न बनाने का यत्न किया था।
किन्तु कठिनाई यह थी कि हाथी का भय अब भी वैसा ही बना था और वह कब फिर आ निकले पता नहीं था। इसलिए समझा-बुझाकर बड़ी कठिनाई से ही उसे बैल के पास से उठाकर पड़ाव लौट जाने के लिए सहमत किया। अच्छा ही हुआ उसने मेरी बात मान ली।

3

 

वह गया कि चारों तरफ फिर वही निस्तब्धता छा गई। पास की सूनी तराई में से आती हुई झिल्लियों की झंकार या कभी-कभी किसी के सूखे पत्तों पर चलने की सरसराहट के अतिरिक्त और कोई शब्द नहीं सुन पड़ रहा था। सारा जंगल सन्नाटा खेंचे दुबका पड़ा है। मेरी मचान के नीचे तो ऐसी शून्यता छाई है कि नीचे उतरने का साहस ही नहीं हो रहा। ऐसा लगता है, जैसे कोई अशरीरी विपत्ति चुपचाप नीचे घूमती फिर रही हो।
लेकिन घड़ी की सूई भी घूमती जा रही थी। पहले बारह बजे, फिर एक अन्त में पूरे साढ़ें तीन बज गए। किंतु गर्मियों का लम्बा दिन काटे नहीं कट रहा था जैसे-तैसे संध्या की सूचना मिलने लगी। मेरे जलकुण्ड से लगभग सौ हाथ दूर एक छोटी-सी जल धारा बह रही थी, जिसमें कहीं आध फुट और कहीं इससे भी कम गहरा जल दिखाई पड़ रहा है। धारा की कुल लम्बाई पचास फुट से अधिक नहीं है और कुछ दूर जाकर वह समाप्त हो गई है। मुझे खूब याद है कि साढ़े तीन बजे तक वह सूनी ही पड़ी थी। कोई भी उस पर नहीं था। किन्तु अब उसके तट पर जल पीने वालों के दर्शन होने लगे। सबसे पहले छोटे पंछी आए। नीलकण्ठ, तोता, घुग्घी और तरह-तरह की श्यामाएँ। फिर आए मोर। पहले केवल दो ही आए। बाद में तो ताँता लग गया। खासी भीड़ जमा हो गई। कोई पंख फैलाकर नाच रहा है। कोई मटकता घूम रहा है। कोई-कोई पानी में उतरकर पैर ही ठण्डे कर रहा है पाँच-सात मिनट तक यही तमाशा चलता रहा। बाद में एक काकड़ आता दिखाई पड़ा। बहुत ही दबे पाँव। पत्थरों पर भी चलने की आहट नहीं हो रही। किंतु लगता है, बेचारा प्यास से बहुत ही व्याकुल है। किसी तरह धारा तक सकुशल पहुँच जाए तो चैन पड़े। सकुशल इसलिए क्योंकि उसे पता है कि इस निष्ठुर जंगल-जीवन में कई बार जलाशय तक पहुँचना भी नसीब नहीं होता। बाघ या बघेरे के रूप में मृत्यु के दूत बीच में ही दबोच लेते हैं। ऐसा-ही क्षण-भंगुर होता है, उनका जीवन। किन्तु लगता है उसका भाग्य अच्छा था। वह सकुशल पानी तक पहुँच गया। और पहुँचते ही गर्दन झुकाकर पानी की पाँच-छः घूँट एक साथ पेट में उड़ेल लीं। किंतु भय तो अभी बना ही है। गर्दन उठाकर चारों तरफ देखने लगता है। कोई है तो नहीं बाघ या बघेरा ? हूँ कोई नहीं है। सन्तुष्ट हो जाता है और मुँह झुकाकर जल्दी-जल्दी छह-सात घूँट पी लेता है और गर्दन उठाकर फिर इधर-उधर देखने लगता है।

अचानक पास ही कहीं आहट हुई और एक ही साथ उसकी माँसपेशियाँ छलाँग भरने के लिए तन गईं। तभी किसी ने पीछे से कहा —‘‘डरो मत मित्र, मैं हूँ, इसी वन का मोर।’’
‘‘ओह, तुम ?’’
‘‘हाँ, मैं ही। इस ठण्डे जलाशय पर जरा नाचने की इच्छा हो आई थी। तुम्हारा भी मनोरंजन ही होगा। बुरा क्या है ?’’
‘‘बुरा तो कुछ नहीं। लेकिन मैं तो डर गया इधर अभी एक धीमा-सा शक हुआ था। तुमने भी सुना होगा। मेरा खयाल है, वह तुम्हारा न होकर किसी दूसरे का ही था। जाऊँ जरा देख आऊँ ।’’
धीरे-धीरे पानी के पास से हटकर वह झाड़ियों में लुप्त हो गया और पाँच-सात मिनट बाद फिर दिखाई पड़ा। अब वह कुछ निश्चिन्त था। इसीलिए पानी के पास आकर उसने खूब जी भरकर दस-बारह घूँट पिये और फिर धीरे-धीरे जंगल में ओझल हो गया।


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