स्वयंवर - बृजलाल हांडा Swayamwar - Hindi book by - Brajlal Handa
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स्वयंवर

बृजलाल हांडा

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :56
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4931
आईएसबीएन :81-7043-535-8

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एक लघु नाटक...

Swayamwar

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रथम दृश्य

[मंच पर छः कुर्सियाँ रखी हैं। पाँच कुर्सियों पर क्रमशः व्यापारी, नेता, अफसर, पत्रकार तथा जनता बैठे हैं। छठी कुर्सी खाली है। सभी की दृष्टि बार-बार छठी कुर्सी की ओर उठ रही है। शेरवानी तथा अचकन पहने हुए एक व्यक्ति मंच पर प्रवेश करता है।]

आगन्तुक: (गिनती गिनते हुए) एक, दो, तीन, चार और पाँच। सभी के सभी महानुभाव उपस्थित हैं। स्वयंवर की कार्यवाही शुरू ही होने वाली है। आप सभी लोग तैयार हैं न ?
पाँचों: (एक स्वर में) बिल्कुल तैयार हैं।

[आगन्तुक मंच से जाता है। थोड़ी देर उपरांत हाथ में ट्रे लिए नौकरनुमा एक व्यक्ति मंच पर प्रवेश करता है। ट्रे में पानी के चार गिलास रखे हैं।]

नौकर: (गिनती गिनते हुए) एक, दो, तीन, चार और पाँच। (विस्मय से ट्रे में रखे पानी के गिलासों को गिनने के पश्चात्) पर पानी के गिलास तो चार ही हैं। मैं पानी के गिलासों को मेजों पर रख देता हूँ। आपस में तय कर लो कि कौन बाद में पानी पियेगा।
[सभी एक साथ मेज की ओर बढ़कर गिलास उठाकर पानी पीते हैं। जनता खड़ा रह जाता है।]

नौकर: भईया, तुम यहाँ भी पिछड़ गये। वैसे भी हर जगह तुम पीछे ही रहते हो। तुम्हारी यही नियति है। दूसरों को भला दोष कैसे दे सकते हो ? मैं तुम्हारे लिए बाद में पानी ले आऊँगा।
जनता: रहने दीजिए, प्यास नहीं है। मैं घर से पानी पीकर चला था।
नौकर: संतोषी जीव हो, इसी से तुम्हारी सहन-शक्ति गजब की है। (सभी व्यक्ति पुनः अपनी-अपनी कुर्सियों पर आकर बैठ जाते हैं। नौकर खाली गिलास लेकर जाता है।)
नेता: भयंकर गर्मी पड़ रही है। जंगल इसी प्रकार कटते रहे तो सूखा पड़ेगा। चारों ओर त्राहि-त्राहि मचेगी।
पत्रकार: इसी ओर मैं सरकार का कई बार ध्यान आकर्षित कर चुका हूँ। पिछले सप्ताह ही मैंने एक लम्बा-चौड़ा लेख समाचार-पत्रों में प्रकाशित किया था।
व्यापारी: समाचारपत्रों में लेख छापने से क्या जंगल कटने बंद हो जाएँगे ?
अफसर: इस सम्बन्ध में शीघ्र ही सरकार नई नीति की घोषणा करने वाली है।
नेता: सरकार की घोषणाएँ कागजों पर धरी की धरी रह जाती हैं। इस सम्बन्ध में जन-आन्दोलन की आवश्यकता है।
पत्रकार: जनता तो जंगल काटती नहीं, जो जन आन्दोलन की आवश्यकता पड़े। मैं कहता हूँ, सरकार को कड़े उपाय करने चाहिए।

अफसर: वर्तमान कानून काफी लचीले हैं जिसका लाभ अभियुक्तों को मिलता है। अदालत में वे बरी हो जाते हैं। इसलिए सरकार कड़े कानून बनाने के विषय में सोच रही है।
पत्रकार: जब तक कड़े कानून बनेंगे तब तक न जाने कितने जंगल कट चुके होंगे। व्यापारी लोगों के मजे ही मजे हैं। चोरी की लकड़ी सस्ते दामों में क्रय करके मँहगे भाव बेचते हैं। घर भर रहे हैं। कोई पूछने वाला ही नहीं है। व्यापारी: व्यापारी तो जंगल काटने नहीं जाता, लकड़ी चोरी नहीं करता। व्यापार लाभ कमाने के लिए ही तो किया जाता है। लकड़ी पर यह लिखा तो नहीं रहता कि यह चोरी की है।
अफसर: हमने आरा मशीनों पर छापे मारे हैं। दोषी व्यक्तियों के विरुद्ध कार्यवाही हो रही है।
नेता: यह हम सभी अच्छी तरह जानते हैं कि सरकारी कार्यवाही कैसे होती है ? छोटे-छोटे लोग बंद कर दिये जाते हैं, उन पर जुर्माना किया जाता है। बड़ी मछली कभी जाल में नहीं फँसती।
अफसर: कानून साक्ष्य माँगता है। बिना साक्ष्य के किसी के भी विरुद्ध कार्यवाही करना सम्भव नहीं है।
पत्रकार: कानून से कुछ नहीं होने वाला है। वास्तविक बात तो चरित्र की है। जब तक जनता चरित्रवान नहीं है, देश में कुछ नहीं होने वाला है।
[जनता चौंककर खड़ा हो जाता है। कुछ कहने को होता है कि...]

अफसर: (जनता की ओर देखकर) आप बैठ जाइए। नई नीति में चरित्र को ही प्रमुखता दी गई है।
नेता: चरित्र कोई पेड़ पर नहीं उगता जो कागजी कार्यवाही से इसके पौधे बढ़ाए जा सकें।
व्यापारी: चरित्र का निर्माण करने वाली कई संस्थाओं को हम दान देते हैं।
पत्रकार: इससे आपको क्या लाभ होता है ?
व्यापारी: हम भी देश के नागरिक हैं। क्या हमारा कुछ कर्तव्य नहीं है ?
पत्रकार: पर आप बिना लाभ के कोई कार्य नहीं करते। चरित्र से आपको क्या लाभ होने वाला है ?
व्यापारी: समाज की लाभ-हानि से सभी जुड़े हैं। आपका समाचार-पत्र बिना पुष्टि किये हुए किसी का भी चरित्र हनन कर देता है। क्या यह नैतिकता है ?
नेता: पीत पत्रकारिता का युग आ गया है। इसी से मैं समाचार-पत्र ही नहीं पढ़ता।
पत्रकार: आपका कच्चा चिट्ठा जो उसमें लिखा होता है। आप भला क्यों पढ़ेंगे ?
व्यापारी: बलात्कार, लूट और चोरी के समाचारों को छोड़कर समाचार-पत्रों में छपता ही क्या है ?
पत्रकार: समाज में जो होता है वही तो छपेगा।

अफसर: जो सही में होता है उसे अगले अंक में छापने को कहते हैं, पर फिर नहीं छपता।
नेता: इस बीच सौदा हो जाता है।
व्यापारी: अखबार निकालना भी तो व्यापार है। व्यापार में सौदेबाजी अनुचित नहीं।
नेता: गलत समाचार प्रकाशित होने से समाज पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
व्यापारी: लाभ का धन्धा तो हम भी करते हैं, परन्तु हमारे लाभ से समाज का अहित नहीं होता।
पत्रकार: गेहूँ और चावल में कंकड़ मिलाकर, हल्दी और मिर्च में भूसा भरकर बेचने से क्या समाज का हित होता है ?
नेता: ऐसे समाचार तो आपके समाचारपत्र में नहीं छपते।
पत्रकार: नहीं छपते तो अब छपेंगे।
व्यापारी: फिर आपको चन्दा कौन देगा ? आपके नखरे कौन सहेगा ?
अफसर: खाद्य सामग्री में मिलावट करना बड़ा गंभीर अपराध है।
नेता: यह तो सभी जानते हैं पर कार्यवाही क्यों नहीं होती ? क्योंकि हर महीने इंस्पेक्टर को चन्दा जो मिलता है।
पत्रकार: मूल समस्या तो वही चरित्र की है।

अफसर: इस सम्बन्ध में हम शीघ्र जगह-जगह सेमिनार करने वाले हैं।
नेता: सेमिनारों से भला कभी चरित्र-निर्माण हुआ है ? आवश्यकता है जन-जागरण की।
पत्रकार: क्या नेताओं के भाषणों से चरित्र-निर्माण होगा ?
व्यापारी: यह तो हर व्यक्ति की अपनी-अपनी समस्या है। इन्सान भेड़-बकरियों का समूह तो नहीं है जो एक ही लाठी से हाँका जाए।
अफसर: जनता के चरित्र-निर्माण में सभी के सहयोग की आवश्यकता है। पत्रकार लेखों द्वारा, नेता भाषणों द्वारा तथा सरकार कानूनों द्वारा यह कार्य कर सकती है।
पत्रकार: और व्यापारी...?
व्यापारी: हमारे चन्दे से ही मीटिंगें आयोजित होती हैं, पत्रकारों के चाय-नाश्ते का इन्तजाम होता है, अफसरों की खातिरदारी होती है...।
पत्रकार: पर उसका भरपूर लाभ भी तो आप उठाते हैं। नेता और अफसर आपकी मुट्ठी में रहते हैं।
नेता: हम लोग तो जनहित में आन्दोलन कर जेल भी जाते हैं, लाठियाँ भी खाते हैं पर पत्रकार कमरे में बैठे-बैठे लम्बी-चौड़ी हाँकते हैं।

[पुनः नौकरनुमा उस व्यक्ति का हाथ में ट्रे लिए मंच पर प्रवेश। ट्रे में चार ही गिलास हैं।]

नौकर: ले भईया, फिर पानी के गिलास चार और बन्दे पाँच। हम तो मेज पर रख देते हैं। आपस में तय कर लो।

[ जनता उठता है और पानी का गिलास उठाकर बारी-बारी से नेता, पत्रकार, व्यापारी और अफसर के सामने करता है। कोई भी गिलास नहीं लेता, वह पानी पी लेता है।]

पत्रकार: लगता है, गर्मी कुछ कम हो गई है।
नौकर: भईया, गर्मी तो कम होगी ही। जनता ने जो पानी पी लिया है। पानी के भरे तीन गिलास वैसे के वैसे धरे हैं। व्यापारी, पत्रकार, नेता और अफसर की प्यास बुझने के बाद अब जनता की प्यास भी बुझ गई है। अब सूखा नहीं पड़ेगा।

[सभी उसकी ओर आग्नेय दृष्टि से देखते हैं। ट्रे में गिलासों को रखकर वह मंच से चला जाता है।]
[वह थोड़ी देर उपरांत शेरवानी तथा अचकन पहने हुए व्यक्ति का मंच पर प्रवेश]

आगन्तुक: स्वयंवर की तैयारी करीब-करीब पूरी हो चुकी है। इससे पहले कि स्वयंवर प्रारम्भ हो, मैं यह बता देना चाहता हूँ कि यह स्वयंवर परम्परागत ढंग से सम्पन्न नहीं होगा। यहाँ पर गुण-दोष के आधार पर ही चयन किया जाएगा। इस सम्बन्ध में विचार करने हेतु आप लोगों को कुछ और समय देता हूँ।

[यह कहकर आगन्तुक मंच से चला जाता है। उसके जाते ही नौकर हाथ में ट्रे लिए आता है। ट्रे में चार प्लेटों में एक-एक समोसा रखा है।]

नौकर: फिर वही की वही समस्या। चार प्लेट और आदमी पाँच। पिछली बार जनता पिछड़ गया था इसलिए प्लेट मैं उसे ही देता हूँ।
[मेज पर तीन प्लेट रख देता है। नेता, अफसर और व्यापारी तेजी से झपटकर प्लेटें उठा लेते हैं। पत्रकार पिछड़ जाता है।]

पत्रकार: चाहे पानी हो या समोसा, बाँटने की यह प्रक्रिया गलत है।
व्यापारी: क्या प्रक्रिया इसलिए गलत है कि तुमको समोसा की प्लेट नहीं मिली। (और प्लेट से उठाकर समोसा खाने लगता है।)
अफसर: (समोसा खाते हुए) अच्छे खस्ते बने हैं, खाने में मजा आ गया।
नेता: वास्तव में समोसे अच्छे बने हैं। अब चाय और मिल जाए तो दिमाग चलने लगेगा।
पत्रकार: चाय बाँटने में फिर वही हेरा-फेरी होगी।
नेता: किस प्रकार की हेरा-फेरी ?
पत्रकार: जनता के हाथ में समोसे की प्लेट पहले ही क्यों पकड़ा दी गई ?
व्यापारी: नौकर जनता वर्ग से सम्बन्धित है। अपनों का ख्याल रखना कोई नई बात नहीं है।
पत्रकार: नई चाहे नहीं हो परन्तु फिर भी गलत है। मेज पर चारों प्लेटें ही रखी जानी चाहिए थीं।
अफसर: चारों प्लेट रख भी जातीं तो भी तुम्हारा वही हाल होता। मेज तुम्हारी कुर्सी से तुलनात्मक तौर पर सबसे समीप है। फिर भी दूसरों की अपेक्षा पिछड़ गए तो प्रक्रिया को दोष देकर अपनी कमजोरी क्यों छिपाते हो ?
पत्रकार: गलत, गलत ही रहेगा। मैं एक बार नहीं, लाख बार यही कहूँगा।

नेता: इस प्रक्रिया से अगर समोसे की प्लेट तुम्हारे हाथ सबसे पहले थमा दी जाती तो फिर क्या गलत कहते ?
व्यापारी: राम-राम, फिर क्यों गलत कहते ? हाथी के दाँत खाने के और तथा दिखाने के और होते हैं। इन अखबार वालों को मैं अच्छी तरह जानता हूँ।
पत्रकार: तुम क्या अच्छी तरह जानते हो ? तुम्हारे सब घोलाटों को मैं उजागर करूँगा।
नेता: सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली।
व्यापारी: अब तो अखबार चलाना भी मुनाफे का धन्धा बन गया है। कोई भरोसे का आदमी मिल जाए तो मैं भी धन्धा शुरू कर दूँ।
अफसर: (पत्रकार की ओर इशारा करते हुए) सामने ही तो भरोसे का आदमी है। कहते हैं बगल में छोरा और जगत में ढिंढोरा।
पत्रकार: मुझे अखबार निकालने का पर्याप्त अनुभव है।
नेता: वह तो साफ जाहिर है। अनुभव नहीं होता तो आज इस स्वयंवर में हमारी बराबरी पर नहीं बैठे होते।
व्यापारी: खाली अनुभव से ही क्या होता है। गाँठ में माया भी तो होनी चाहिए।
पत्रकार: हम तो सरस्वती के पुत्र हैं।
अफसर: किसी भी प्रतियोगिता में चयन का आधार केवल धन ही नहीं हो सकता।
नेता: आप ठीक कह रहे हैं। बिना दो नम्बर की कमाई किए आप धन कमा ही नहीं सकते।
व्यापारी: कौन धन्धे में दो नम्बरी कमाई नहीं है ? बिना घूस के फाईल नहीं चलती, बिना रिश्वत के नेता सिफारिश नहीं करते।
पत्रकार: इसी प्रकार एक दूसरे की पोल-पट्टी खोलते रहे तो किसी के भी गले में वरमाला नहीं पड़ेगी। यहाँ हम सभी एक ही नाव पर सवार हैं।
व्यापारी: बात तो पते की करता है, आदमी काम का है।

[हाथ में पकड़ी समोसे की प्लेट लेकर जनता पत्रकार के पासा जाता है।]

जनता: आपको भूख लगी होगी, यह समोसा ले लीजिए। मैं घर से खाना खाकर चला था।

[पत्रकार अपने साथियों की ओर देखता है।]

व्यापारी: अगर भला आदमी स्वेच्छा से उपकार करना चाहता है तो इन्कार नहीं करना चाहिए।
नेता: पर किसी की सहृदयता का गलत लाभ भी नहीं उठाना चाहिए।
अफसर: हमारे देश में जनवादी समाजवाद है। हमें मिल-जुलकर हर काम करना चाहिए। जनता तथा पत्रकार फिफ्टी-फिफ्टी बाँट लें।
व्यापारी: समोसा आधा खाओ या पूरा, पेट भरना सम्भव नहीं है।
अफसर: हम लोग पेट भरने के लिए तो समोसा नहीं खा रहे हैं।

[जनता पत्रकार के हाथ में समोसे की प्लेट पकड़ाकर अपनी कुर्सी पर आकर बैठ जाता है।]

पत्रकार: (समोसा खाते हुए) खस्ता बने हैं। मेरे पेट में तो चूहे दौड़ रहे थे।
नेता: तुम दावत के निमंत्रण पर तो यहाँ आए नहीं थे। स्वयंवर में हिस्सा लेने आए हो और बात पेट भरने की कर रहे हो।
व्यापारी: मुफ्त में खाने की आदत जो पड़ गई है।
पत्रकार: यहाँ सभी बराबर हैं। क्या तुम लोगों ने पैसे देकर समोसा खाया है ?

[पत्रकार धीरे-धीरे चबा-चबाकर समोसा खाने लगता है।]

नेता: (पत्रकार से) क्या तुम्हारे दाँत नहीं हैं ?
पत्रकार: मेरे असली दाँत सही सलामत हैं। तुम्हारी तरह मेरे पास खाने और दिखाने के अलग-अलग दाँत नहीं हैं।
व्यापारी: क्या पते की बात कही, भाई, तुमने। वास्तव में नेता लोग दोहरा आचरण करते हैं।
नेता: व्यापारी कौन दूध के धुले हैं ? बिना मिलावट के ऊँची इमारतें खड़ी नहीं हो सकतीं।
अफसर: बात चरित्र एवं नैतिकता की है।
पत्रकार: तभी तो सारे ठेके अपने चहेतों को देते हैं और कायदे-कानून फाईलों की धूल चाटते रहते हैं।
व्यापारी: प्रकृति ने पाँचों अंगुलियाँ एक समान नहीं बनाई हैं। समाज में भेद-भाव तो रहेगा ही।
अफसर: जनवादी समाजवाद का प्रमुख लक्ष्य इस अन्तर को कम करना है।
नेता: महँगाई पर तो सरकार नियंत्रण कर नहीं पाती। बात जनवादी समाजवाद की करती है।
व्यापारी: जब तक पैदावार नहीं बढ़ती तब तक मँहगाई पर काबू नहीं पाया जा सकता।
पत्रकार: इसी कमी का लाभ तो व्यापारी उठाते हैं। मनमाने दाम वसूल करते हैं और विवश होकर जनता को देने पड़ते हैं।
नेता: जनता को जागरुक होना पड़ेगा...।

[ नौकर हाथ में समोसे की एक प्लेट लेकर आता है और जनता की ओर बढ़ाते हुए कहता है...।]

नौकर: लो भईया, मेरे सामने ही इसे खाओ वरना भूखे रह जाओगे।
पत्रकार: सिद्धान्त के तौर पर मैं इस पक्षपात का विरोधी हूँ।
नेता: जनता का समोसा खाते हुए सिद्धान्त कहाँ रह गए थे ?
अफसर: हमें किसी व्यक्ति विशेष की बात नहीं करनी चाहिए। बिना सिद्धान्त के कोई परिवर्तन सम्भव नहीं है।
नेता: फिर सरकार कुछ लोगों को अतिरिक्त सुविधाएँ क्यों प्रदान करती है ?
अफसर: कमजोर को तो सरकार का संरक्षण मिलना ही चाहिए।
व्यापारी: पर कब तक ?
पत्रकार: किसी को संरक्षण मिले या न मिले; व्यापारी की तो चाँदी ही चाँदी है।
व्यापारी: यह कैसे कहते हो ?
पत्रकार: नगदी नहीं तो उधार चीजें लेनी ही पड़ेंगी। मनमाना ब्याज वसूल तो किया जाएगा।

[समोसा खाते हुए जनता को खाँसी आती है।]

पत्रकार: भईया, धीरे खाओ, समोसा कहीं भाग नहीं रहा है।
नेता: जल्दी इसलिए खा रहा है कि कहीं तुम्हारी निगाह न फिसल जाए। इसका समोसा तो बड़े चाव से खाया था तुमने।
पत्रकार: मैंने कौन-सा माँगा था ?
नेता: पर उसके हिस्से का खाया तो था।
पत्रकार: क्या आप लोगों ने समोसा नहीं खाया था ?
नेता: खाया था पर अपने हिस्से का।
पत्रकार: यहाँ कौन-सी पैतृक सम्पत्ति है जो हिस्से की बात कर रहे हो।
अफसर: हमें आपस में शांति से बातचीत करनी चाहिए।
व्यापारी: पूरी बात सुने बिना ही बीच में किसी का बोलना उचित नहीं।

[खाँसी के कारण जनता बिना खाये ही बचा हुआ समोसा प्लेट में रखकर प्लेट को जमीन पर रख देता है। हाथ में पानी का एक गिलास लेकर नौकर का प्रवेश। जनता के हाथ में गिलास थमाते हुए।]

नौकर: तुमसे एक भी समोसा खाया नहीं गया और लगे खाँसने। लो, पानी लो।

[जनता गटागट पानी पी लेता है।]

व्यापारी: प्यास तो मुझे भी लगी है।
नेता: मुझे भी।
अफसर: गर्मी का मौसम है, प्यास मुझे भी लगी है।
पत्रकार: (अफसर की ओर) हमें समोसा खाने के कारण प्यास लगी है और आपको गर्मी के कारण। क्या कहने आपके मिजाज के!
नौकर: घड़े में पानी खत्म हो गया है। अब नल आने पर ही पीने के लिए पानी मिलेगा।


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