अग्नि पुरुष - भगवतीशरण मिश्र Agni Purush - Hindi book by - Bhagwati Sharan Mishra
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अग्नि पुरुष

भगवतीशरण मिश्र

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :411
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4943
आईएसबीएन :81-7043-539-0

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श्रीमद्वल्लभाचार्य के जीवन पर आधृत श्रेष्ठ उपन्यास

Agni-Purush

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

यह पुस्तक लेखक के 20 वर्षों के श्रम का प्रतिफल है। आचार्यों की श्रृंखला के अन्तिम आचार्य श्रीवल्लभाचार्य के जीवन को आधार बनाकर प्रस्तुत यह उपन्यास उनकी अद्भुत जीवन गाथा का एक प्रमाणिक दस्तावेज तो है ही, इसके अतिरिक्त भी यह बहुत कुछ है। इसे दो खंडों में प्रस्तुत किया जा रहा है-‘पावक’ और ‘अग्नि-पुरुष’। दोनों खंड स्वतंत्र हैं। द्वितीय खण्ड को इस तरह लिखा गया है कि इसे पढ़ते समय प्रथम खंड के नहीं पढ़ने से किसी असुविधा का भान नहीं हो।
अपसंस्कृति के इस युग में जहाँ आयातित विदेशी मूल्यों ने समृद्ध भारतीय संस्कृति और परम्परा को आखेट बनाकर देश को विखंडन के कगार पर खड़ा कर दिया है, वहीं यह कृति उच्चतर मानवीय मूल्यों की स्थापना को समर्पित है। दिग्भ्रमित वर्तमान पीढ़ी को यह मानवता, एकता और समृद्ध परम्परा का सशक्त सन्देश देने में अद्वितीय है।

मुख्य बात यह है कि इसमें सम्पूर्ण भारतीय वाङ्मय—वेद, वेदान्त गीता, ब्रह्मसूत्र, भागवत आदि— प्रायः अपनी समग्रता में उपलब्ध हैं। इस उपन्यास का अध्ययन कर कोई भी भारतीय अपनी उदात्त संस्कृति और परम्परा से परिचित हो सकता है।
इस तरह यह कृति आज के देशकाल के लिए अत्यन्त प्रासंगिक है। यह एक ही साथ प्राचीन और अति अर्वाचीन भी है।
अपनी सुमधुर भाषा और प्रभावकारी शिल्प के माध्यम से, प्रख्यात उपन्यासकार ने आधुनिक पाठकों को एक ऐसी अनुपम भेंट दी है जो उसी के वश की बात है।
एक वाक्य में, यह ग्रन्थ इस आर्य-भूमि के साहित्य-संस्कृति तथा अध्यात्म का एक बृहत कोष है जो जीवन को सही अर्थों में जीने के सन्देश से प्राणवन्त है।
इसे नहीं पढ़ने वाला बहुत-कुछ से वंचित रहने को बाध्य होगा। इस कृति को लेकर यही कहने को बाध्य होना पड़ता है—‘न भूतो न भविष्यति।’

इस संस्करण की भूमिका

 

नए संस्करण में कुछ महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं।
यह सब श्रेष्ठ पाठकों की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप है। पुस्तक पर्याप्त लोकप्रिय हुई है, यह पत्रों और ‘फोन’ से मिली प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट है। 800 रुपये मूल्य (पावक+अग्निपुरुष का) होने पर भी एक वर्ष के अन्दर ही इसके एक संस्करण का समाप्त होना, भगवान श्रीकृष्ण और महाप्रभु श्रीमद्वल्लभाचार्य और श्रीनाथ जी (नाथद्वारा, राजस्थान) में बहुतों की अप्रतिम श्रद्धा ही द्योतक है।
इन श्रद्धालुओं के सुझाव नहीं मानना उचित नहीं था। कइयों का मानना था कि महाप्रभु का सर्वप्रिय ग्रन्थ श्रीमद्भागवत था, उस पर और जोर होना चाहिए था। किसी ने कहा पुष्टिमार्ग तथा महाप्रभु के कारण ही घर-घर में बढ़ी श्रीकृष्ण-पूजा को भी और रेखांकित करना था। इस संदर्भ में ‘भारतीय संस्कृति संसद’ कोलकाता के अध्यक्ष श्री अशोक महेश्वरी और सचिव श्री संदीप अग्रवाल, विट्ठलदास मूंधड़ा, कोलकाता; भगवती प्रसाद देवपुरिया, श्री तन्मय पालीवाल, नाथद्वारा के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

ये सभी सम्मत्तियाँ आदर योग्य हैं। इन्हें आदर मिला और फलस्वरूप द्वितीय खंड ‘अग्नि-पुरुष’ के बीच में 127 पृष्ठ जोड़ने पड़े। पाठक इन पृष्ठों को पढ़ने के पश्चात श्रीमद्भागवत और पुष्टिमार्ग के सम्बन्ध में पहले से अधिक तो जानेंगे ही, महाप्रभु के व्यक्तित्व के कुछ नए आयामों से भी परिचित होंगे।
इन नए पृष्ठों में सम्पूर्ण भागवत को कोई नहीं ढूंढ़े। नहीं, यह सोचे कि ये दसम अथवा एकादश स्कन्ध जिनमें श्रीकृष्ण-सम्बन्धी तथ्य अधिक हैं पर केंद्रित हैं। श्रीकृष्ण पर मेरे उपन्यास (प्रथमपुरुष+पुरुषोत्तम) में इन अध्यायों का पर्याप्त दोहन हो चुका है। नए पृष्ठों में जो भागवत है वह महाप्रभु के व्यक्तित्व को और स्पष्टतर करने से ही सम्बद्ध है। पाठक स्वयं देखेंगे। प्रथम खंड ‘पावक’ में भी भागवत है जो दशम स्कन्ध पर आधृत है। अतः पुनरावृत्ति से भी इस खंड में बचा गया है।
‘पावक’ में जहाँ-तहाँ अल्प परिवर्तन किया गया है। कुछ प्रूफ की भूलें थीं, कुछ मेरी भी। पर यह परिवर्तन नगण्य है।
एक बात और। ‘अग्नि-पुरुष’ पर महाप्रभु का चित्र होने से लोग उस पर अधिक जोर देते हैं, यह समझ कर कि उनकी असली और पूर्ण कथा यहीं मिल जाएगी। यह भूल है। ‘पावक’ में ही महाप्रभु के व्यक्तित्व और चिंतन केंद्रित है। ‘अग्निपुरुष’ तक आते-आते, गिरिराज, श्रीनाथ जी, सूरदास आदि प्रमुख हो उठते हैं। ‘पावक’ मूल है, ‘अग्निपुरुष शाखा। मूल को छोड़ सकते हैं क्या ? अस्तु।

यह पुस्तक

 

इस पुस्तक को क्या नाम देंगे ? यह पूर्णतया ऐतिहासिक तो है ही, आध्यात्मिक भी है। इतिहास और अध्यात्म दोनों शुष्क विषय हैं—सामान्य पाठक के लिए। इस बाधा को दूर करने के लिए इसे औपन्यासिक शैली में प्रस्तुत किया गया है। भाषा, शैली और विशेष औपन्यासिक शिल्पों का सहारा लेकर इसमें पठनीयता भरने का मैंने प्रचुर प्रयास किया है। अतः, सामान्य पाठक भी इसे नीरस और दुरूह नहीं पाएँगे।
गलत है कि अध्यात्म धीरे-धीरे लुप्त हो रहा है। वैश्वीकरण और उन्मुक्त बाजार के प्रभाव में नई पीढ़ी के कुछ लोगों को दिग्भ्रमित अवश्य किया है। किन्तु देखकर आश्चर्य होता है मन्दिरों, मस्जिदों, गिरजाघरों और गुरुद्वारों में नवयुवकों, नवयुवतियों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है। उन्हें भी अध्यात्म में आस्था की एक नई किरण दिखाई पड़ने लगी है। बुजुर्ग तो स्वभावतः आस्थावान होते ही जाते हैं, अतः यह पुस्तक पुरानी और नयी पीढ़ी को समान रूप से समर्पित है। दोनों की आस्थाएँ और प्रगाढ़ होंगी इसी दृष्टिकोण से यह वृहत्काय पुस्तक प्रस्तुत की जा रही है।

सही नहीं है कि मोटी पुस्तकों का युग बीत गया। मेरे प्राय: सभी उपन्यास विशालकाय हैं। पर उनकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही जा रही है। 15-20 वर्ष पूर्व प्रकाशित पुस्तकों के भी अभी तक नए संस्करण निकालने पड़ रहे हैं। टी.वी और इंटर्नेट1 लिखित शब्दों की हत्या करने में सफल नहीं हुए अपितु पुस्तकों के प्रचार-प्रसार में इनका योगदान सराहनीय सिद्ध हो रहा है। वल्लभाचार्य एक अवतारी पुरुष थे। हिन्दी वाले उन्हें कम ही जानते हैं पर इतना वे अवश्य जानते हैं कि वे हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ कवि सूरदास के गुरु थे। इस पुस्तक को पढ़ने से ज्ञात होगा कि श्रीमद्वल्लभाचार्य नहीं होते तो सूरदास भी नहीं होते और न होता उनका ‘सूर सागर’। वल्लभाचार्य, आचार्यों की परम्परा के अन्तिम आचार्य थे। यदि शंकराचार्य, मध्वाचार्य, निम्बार्काचार्य और रामानुजाचार्य के सदृश्य आचार्यों के मध्य वह एक देदीप्यमान नक्षत्र की तरह शोभित हैं। आदि शंकराचार्य को छोड़ दें, यद्यपि उनके अद्वैत मत के विरुद्ध ही उन्होंने अपने शुद्धाद्वैत मत का प्रचार कर और उनके अनुयायियों
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1. अभी-अभी लेखक की पुस्तक ‘शान्तिदूत’ (राजपाल एंड सन्ज़ कशमीरी गेट, दिल्ली-6) चेन्नई के ‘पेंटामीडिया’ द्वारा पूरी की पूरी ‘इंटरनेट’ पर धारावाहिक प्रसारित हुई है।
को परास्त कर अपना विजय-ध्वज फहराया, तो शेष आचार्यों में वे सर्वश्रेष्ठ हैं। कृष्ण-भक्ति के तो वे एक मात्र आचार्य हैं। कृष्ण-भक्ति का ऐसा आचार्य न उनके पूर्व हुआ न आगे उसके होने की संभावना है। सवा पाँच सौ वर्ष बीत गए उनके जन्मधारण को पर इन सैकड़ों वर्षों में उनको पराभूत करे ऐसा तो कोई नहीं पैदा हुआ। गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, आन्ध्र आदि में उनके अनुयायियों की संख्या अनन्त है। वाराणसी के गोपाल मन्दिर में उनका एक प्रसिद्ध पीठ है। जिसके फलस्वरूप उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में उनके मतावलम्बी विद्यमान हैं। तमिलनाडु, बिहार और केरल के सदृश्य कुछ दुर्भाग्यग्रस्त राज्य हैं जो उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के विभिन्न आयामों से पूर्णतया परिचित नहीं हो सके, यद्यपि इन स्थानों में उनको जानने वालों की कमी नहीं।
यह पुस्तक आचार्य-श्री के अद्भुत व्यक्तित्व और चमत्कारिक कृतित्व से सम्पूर्ण राष्ट्र को परिचित कराने के लिए ही यथासम्भव ललित एवं प्रवहमान भाषा में प्रस्तुत की गई है।

समझना गलत होगा कि आचार्य मात्र कृष्णोपासक और कृष्ण-भक्ति के प्रचारक थे। राष्ट्रीय एकता और अखंडता भी इनकी मुख्य चिन्ता के विषय थे। मनुष्य-मात्र को उनके आत्मबल और विश्वास से परिचित कराना इनका प्रमुख उद्देश्य था। यवनों से पददलित और देशी राजाओं के पारस्परिक विद्वेष के कारण राष्ट्र तो टूटन और बिखराव की कगार पर पहुँच ही चुका था, सामान्य जन बलात् धर्म-परिवर्तन और विदेशियों के निरंतर वृद्धशील आतंक से अवसाद-ग्रस्त हो, जीवन के प्रति उदासीन हो चले थे। ऐसी स्थिति में भक्ति ही एक मात्र सहारा थी। श्रीमद्वल्लभाचार्य ने इस सूत्र को पकड़ा और उसके सहारे न केवल देश को, और विघटन और विखंडन से बचाया अपितु सामान्य जनता को अवसाद और भय से मुक्ति दे उसके अन्दर जिजीविषा भरने का भी प्रयास किया।
श्रीमद्वल्लभाचार्य पहले आचार्य थे जिन्होंने सम्पूर्ण देश का तीन बार परिभ्रमण किया। उनके इन राष्ट्र परिभ्रमणों से भी विदेशियों के प्रति उनकी गहरी संवेदनशीलता का परिचय मिलता है।

परिभ्रमण और प्रवचन से बचा उनका समय ग्रन्थ-लेखन और उनके इष्टदेव श्रीनाथ जी के स्वरूप की सेवा-सुश्रुषा में व्यतीत होता था। श्रीनाथ जी (भगवान कृष्ण का गोवर्धनधारी-रूप) को इन्होंने गिरिराज (गोवर्धन) पर प्रतिष्ठित किया था। उनके जीवन काल तक श्रीनाथ जी इसी मन्दिर में रहे। श्रीमद्वल्लभाचार्य भी घूम-फिरकर वहाँ आते रहे। सूरदास को भी उन्होंने श्रीनाथ जी के कारण अपने साथ जोड़ा। यह सब इस पुस्तक में विस्तार से मिलेगा।
आज जो गोवर्धन के समीप परसौली नामक ग्राम के समीप चन्द्र-सरोवर के पास महाप्रभु श्रीमद्वल्लभाचार्य की बैठक सुरक्षित है। उसी के पार्श्व में सूरदास की समाधि भी है। सूर-पंचशती के अवसर पर वहाँ से थोड़ा हट कर सूरद्वार तो सूर की स्मृति में निर्मित हुआ पर सूर के गुरु आचार्य श्री की सुधि लेने के लिए हिन्दी वालों को कोई चिन्ता नहीं रही।
राजस्थान में नाथ द्वारा एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ है। तिरुपति के पश्चात उसी का स्थान है। सैकड़ों-हजारों दर्शक वहाँ प्रतिदिन जाते हैं पर यह कितनों को पता है कि इस मन्दिर का विग्रह वही है जो श्रीमद्वल्लभाचार्य को गोवर्धन पर प्राप्त हुआ था और जिसकी पूजा अर्चना उन्होंने गोवर्द्धन-स्थित मन्दिर में आजीवन की थी ?

उनके मृत्युपरान्त, औरंगजेब के मूर्ति-भंजन-अभियान से घबराकर उनके यशस्वी पुत्र विट्ठलनाथ इस विग्रह को गोवर्द्धन से हटाकर राजस्थान ले गए। वहाँ श्रीनाथ जी के पहुँचने से ही ‘श्रीनाथद्वारा’ नगर बस आया। श्रीनाथजी और महाप्रभु में अभेद था। दोनों महाप्रभु की भक्ति के कारण दो स्वरूप पर एक प्राण हो गए थे। जो नाथद्वारा में श्रीकृष्ण विग्रह के दर्शन करते हैं, वे स्वतः महाप्रभु के भी दर्शन प्राप्त कर लेते हैं पर इस तथ्य से कितने भिज्ञ हैं ?
नहीं समझा जाए कि यह पुस्तक मात्र एक-दो वर्षों के श्रम की देन है। प्रायः हर वर्ष मेरी एक पुस्तक आ जाती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि यह मात्र एक वर्ष में लिखी गई। मैं कई पुस्तकों पर एक साथ काम करता हूँ। इस पुस्तक ने तो कम-से कम बीस वर्षों का समय लिया। ऐतिहासिक पौराणिक पुस्तकों की मेरी रचना प्रक्रिया यह है कि मैं विषय से सम्बन्धित सम्पूर्ण सामग्री एकत्रित कर लेता हूँ और उसका अध्ययन कर उसको आत्मसात करने के पश्चात ही पुस्तक में हाथ लगाता हूँ। इसके अतिरिक्त मैं ऐतिहासिक या पौराणिक पात्रों से सम्बन्धित सभी महत्त्वपूर्ण स्थानों का भ्रमण करता हूँ। इससे सामग्री मिले या नहीं; कहीं-कहीं मिल भी जाती है पर विषय की प्रामणिकता अवश्य सिद्ध हो जाती है। अतः मेरी हर कृति, अध्ययन, अन्वेषण और पूर्ण गवेषणा पर आधारित है।
इस कृति को पूर्ण होने में बीस वर्ष लगे यह अतिशयोक्ति नहीं। इसके आधार हैं।

नाथद्वारा पहले-पहल मैं 1979 में गया था। बीस नहीं अपितु इक्कीस वर्ष पूर्व। वहाँ जाने पर ही पता लगा कि वहाँ का विग्रह श्रीमद्वल्लभाचार्य द्वारा पूजित है। नाथद्वारा मैं पुनः कम से कम चार बार गया। लोगों से वार्तालाप हुआ, सामग्री भी मिली।
जब मैं रेल-मन्त्रालय में संयुक्त निदेशक (राजभाषा) था तो मुझे चम्पारण्य के आस-पास एक रेल-कार्यालय का निरीक्षण करने जाना पड़ा। मेरे हिन्दी-अधिकारी ने कहा कि कुछ दूर चम्पारण्य में श्रीमद्वल्लभाचार्य जी की जन्मस्थली है, आप देखना चाहेंगे ? मैं सहर्ष प्रस्तुत हो गया। झाड़-झंखाड़ों से निपटता हुआ मैं उस स्थान पर पहुँच ही गया जहाँ घोर जंगल में महाप्रभु का जन्म हुआ था। वहाँ एक स्मारक निर्माणाधीन था। वह तो अब भव्य रूप ले चुका होगा। इससे बाहर आया तो कुछ मकान-‘स्टॉल’ नए-नए बने मिले। वहाँ श्रीमद्वल्लभाचार्य से सम्बन्धित सामग्री और उनके द्वारा लिखित ग्रन्थ उपलब्ध थे। यह सन 1882 की बात है। अब तो वहाँ बहुत कुछ बन गया होगा।
मैंने वाराणसी में हनुमान-घाट के भी दर्शन किए जहाँ महाप्रभु का लालन-पालन हुआ था। वाराणसी के उन स्थानों को देखा जो महाप्रभु से सम्बन्धित हैं।
गोवर्धन—(गिरिराज) जिस पर अब भी श्रीनाथ जी का प्राचीन भव्य मंदिर अवस्थित है—के दर्शन मैंने कई बार किए। गोवर्द्धन की कई परिक्रमाएँ भी कीं जिनका वर्णन उचित नहीं। तिरुपति तो जाना हुआ ही, विंध्याचल, अयोध्या, हरिद्वार आदि भी गया।

महाप्रभु ने जहाँ-जहाँ रुककर भागवत-पाठ किया वहाँ-वहाँ उनकी बैठक बन गई। बैठक स्थान एक स्मारक ही बन गया।
देश में ऐसी चौंसठ बैठकें वर्तमान हैं। सबको देखना संभव नहीं और आवश्यक भी नहीं। कई स्थानों पर एक या दो कमरे के जर्जर या मरम्मत किए हुए छोटे भवन के सिवा कुछ नहीं मिलता। सामग्री आदि की तो बात ही नहीं। कुछ स्थानों को अवश्य अभी तक पूर्णतया सुरक्षित रखा गया है।
कांकरौली-स्थान, नाथद्वारा के बाद सर्वाधिक जाग्रत स्थल है।
गोकुल की बैठक भी आकर्षक रूप से सुरक्षित है। ब्रज अकादमी वृन्दावन (अब प्रायः बन्द) में रहते हुए एक गोकुलवासी मित्र के साथ मैं गोकुल भी गया। वहां समय-समय से उत्सव होते रहते हैं, और वल्लभाचार्य के भक्त वहाँ भरे पड़े हैं। लोगों से वार्तालाप करने से ज्ञात हुआ कि उन्हें आज भी इस बात पर गर्व है कि महाप्रभु के चरण वहाँ पड़े थे और उन्होंने पर्याप्त समय वहाँ व्यतीत किया था। वृन्दावन और मथुरा में भी मैं महाप्रभु से सम्बन्धित स्थलों के दर्शन किए।
वाराणसी का गोपाल मन्दिर वल्लभ-प्रेमियों का प्रसिद्ध पीठ है। मैं 1997 में वहाँ अपने मित्र श्री एस. सी. शर्मा के साथ गया। मेरा सौभाग्य कि वहाँ वल्लभ-वंश की अन्तिम वृद्ध महिला मठ की दूसरी ओर के मन्दिर में रहती थी। प्रबन्धक से सूचना मिली तो मैंने उनके पास, दर्शन-हेतु निवेदन भिजवाया। अब तक मैं पुस्तक पर पर्याप्त काम कर चुका था।
उन्होंने स्पष्ट मना कर दिया, ‘‘मैं अब किसी को ‘‘इंटरव्यू’’ आदि नहीं देती।

मैं निराश हुआ पर मैंने हिम्मत नहीं हारी। फिर सूचना भिजवाई की मैं उनका इंटरव्यू नहीं लूँगा। एक प्रश्न भी नहीं पूछूँगा, अपितु मुख भी नहीं खोलूँगा। मैं महाप्रभु पर एक पुस्तक लिख रहा हूं। उनके वंश की इस अन्तिम देवी के केवल दर्शन-मात्र से मेरी पुस्तक सार्थक हो जाएगी।
इस बार उनका हृदय पिघला। उन्होंने मुझे कहलाया कि मैं अगले दिन दस बजे आऊँ और जब वे मन्दिर से लौटने लगें तो मार्ग के किनारे खड़े होकर उनके दर्शन कर लूँ।
मैं दूसरे दिन पुनः वहाँ गया। यथास्थान खड़ा हो गया। एक स्वयंसेवक भी मेरे साथ था। वह मन्दिर से लौटने लगीं तो स्वयंसेवक ने पहचनवाया। श्वेतवस्त्रा वह वृद्धा, सरस्वती-स्वरूपा ही लग रही थीं। पास आईं तो मैंने धरती का स्पर्श कर उन्हें प्रणाम निवेदित किया। वे क्षण-भर को रुकीं। मेरा साहस बढ़ा। मेरा बन्द मुँह खुल पड़ा और मैंने संक्षेप में निवेदन किया, ‘‘मैं श्रीमद्वल्लभाचार्य पर एक उपन्यास लिख रहा हूँ। मुझे आपसे कुछ नहीं पूछना। आप केवल अपना आशीर्वाद दे दीजिए, मेरी पुस्तक धन्य हो जाएगी।’’
उनकी मुझ पर कुछ विशेष कृपा ही हो गई। उन्होंने कहा, ‘‘तीन बजे आइए तो मैं आपको कुछ सामग्री दूँगी।’’
मैं पुनः तीन बजे गया, वे स्वयं तो नहीं आईं पर तीन दासियों के माध्यम से ढेर-सारी सामग्री भिजवा दी—कई स्मारिकाएँ, कई मूल ग्रन्थ, कई संकलन। इतनी सामग्री मुझ अकेले के उठाए क्या उठे ? अन्ततः मैंने सेविकाओं से ही अनुरोध किया कि बाहर प्रबन्धक के कमरे तक वे उन्हें पहुँचा दें।

इस तरह इस पुस्तक पर महाप्रभु की वंशजा का आशीर्वाद भी अंकित है। यह मेरा अतिरिक्त सौभाग्य है।
गोपाल-मन्दिर के ही तत्कालीन पीठाधीश ने कोई दो घंटे तक महाप्रभु और शुद्धाद्वैत तथा पुष्टि मार्ग पर संक्षेप पर सार्थक रूप में प्रकाश डाला। मैं उनका ऋणी हूँ।
कठिन थी श्रीमद्वल्लभाचार्य-रचित ग्रन्थों की उपलब्धि। यद्यपि उपन्यास में उनके संस्कृत ग्रन्थों का उद्धरण देना उचित नहीं था फिर भी उनके साहित्य, उनकी भाषा, उनके शिल्प, उनकी तर्क-शक्ति से भिज्ञता आवश्यक थी।
ब्रज-अकादमी वृन्दावन के संस्थापक-अध्यक्ष श्री 1008 श्री पाद बाबा (अब स्वर्गीय) ने न केवल मुझे अपने पुस्तकालय से महाप्रभु की बहुत-सी पुस्तकें उपलब्ध करा दीं अपितु मेरे प्रायः दो सप्ताह के वहाँ निवास के समय मेरी पूर्ण सुविधा का भी ध्यान रखा। प्रभु उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करें।

पुस्तक लेखन का आरम्भ इतने अध्ययन-अन्वेषण के पश्चात् 1994 में ही विधिवत आरम्भ हो गया था। यह प्रगति सन्तोषजनक नहीं थी। इस मध्य मेरी कई पुस्तकें भी आ गईं पर वल्लभाचार्य बहुत कठिन सिद्ध हो रहे थे।
1999 अगस्त तक प्रायः तीन सौ टंकित पृष्ठ तैयार हो गए थे। सोचा था इतने ही प्रायः और लिखने होंगे; 2000 में तो पुस्तक आ ही जाएगी, पर दुर्भाग्य ऐसा कि अगस्त 1999 से जुलाई 2000 तक मैं दिल्ली में इसी कार्य के लिए प्रायः एकाकी रहा। पर लिखने के नाम पर मैं प्रायः एक वर्ष में 50 पृष्ठ भी नहीं लिख पाया। कारण कुछ नहीं पर जिस लेखकीय ‘मूड’ की मैंने बात सुन रखी थी, वही आड़े आ गई। मेरा ‘मूड’ ही नहीं बना। आश्चर्य, ऐसा पहले कभी हुआ ही नहीं था, मैं रचनाओं पर रचनाएँ देता गया हूँ। ‘मूड’ क्या है इससे मेरा परिचय ही नहीं। पर इस बार हो गया। शायद ऐतिहासिक से अधिक आध्यात्मिक प्रकृति के होने के कारण इस पुस्तक को किसी आध्यात्मिक स्थल पर ही समाप्त होना था।
मैं 19 जलाई 2000 को केवल एक सप्ताह के लिए दिल्ली से पटना आया। दिल्ली लौटने के लिए 26 जुलाई के आरक्षण को सहसा रद्द कराना पड़ा। कुछ आवश्यक कार्य आ गया। कार्य कुछ लम्बा ही खिंचता गया। प्रवास-अवधि अनिश्चित हो गई। मैं विवश पटना सिटी के बालकिशन गंज के प्रसिद्ध आश्रम शाक्त साधना केन्द्र के संस्थापक एवं सुप्रसिद्ध तान्त्रिक एवं ज्योतिर्विद् प्रेम बाबा के यहाँ ठहर गया। आश्रम का वातावरण आध्यात्मिक होने के अतिरिक्त रमणीय भी है। पेड़-पौधों लता-वल्लरियों से युक्त यह एक तपोवन-सा ही लगता है। प्रेम बाबा अपने यन्त्र-तन्त्र तथा प्रायः अहर्निश हवन पूजन के द्वारा लोगों का मनस्ताप हरते रहते हैं। उनकी मनोकांक्षाएँ पूर्ण करते रहते हैं। उनकी साध्वी पत्नी पूनम माता आश्रम की व्यवस्था भी चलाती हैं और अपने नियमित पूजा पाठ का ध्यान रखती हैं।

एक दिन पेड़-पौधों से घिरे आश्रम के बरामदे में बैठा मैं सोच रहा था कि बाबा के यहां सैकड़ों लोग नित्य आते हैं, उनकी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। मेरे वल्लभाचार्य का क्या होगा ? वह अधूरे ही पड़े रहने को आरम्भ हुए हैं क्या ? स्थान, सचमुच आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण है। बाबा द्वारा निरन्तर जारी जप और हवन से इसे मनोकामना पूर्ति का स्थल ही बना दिया है।
मेरी रुकी कलम भी दूसरी ही सुबह (6 अगस्त) को चल पड़ी और ऐसी चली कि मैं आश्चर्यचकित रह गया। आध्यात्मिक ऊर्जा ने जैसे शारीरिक मानसिक ऊर्जा भी प्रदान की। सरकारी कार्य तो अपनी गति से हो रहा था पर मैं जो नित्य क्रिया के पश्चात छह बजे सुबह लिखने बैठता तो छह बजे शाम को ही उठता बीच में केवल नाश्ता और भोजन के लिए निकलता। यह क्रम महीनों अबाध गति से चला, फलस्वरूप पुस्तक यहीं रहते-रहते समाप्त हो गई।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि आश्रम की आध्यात्मिकता ने ही इस असम्भव-से प्रतीत होते कार्य को सरल बनाया। मैं प्रेम बाबा और उनकी देवी-स्वरूपा पत्नी पूनम मैया का बहुत कृतज्ञ हूँ।

इस पुस्तक के सम्बन्ध में एक-दो बातों को स्पष्ट करना आवश्यक है।

 

प्रथम तो यह कि मैंने इसमें औपन्यासिक शिल्प को एक नया आयाम दिया है। समीक्षा के वर्तमान मानदंड के अनुसार उपन्यासकार को उपन्यास में पाठक के आमने-सामने नहीं आना चाहिए। मैंने पूरी तरह इसे अमान्य कर दिया है। ऐसे भी उपन्यास में मूलतः उपन्यासकार ही आदि से अन्त तक बोलता है, भले ही वह विभिन्न पात्रों के माध्यम से बोले। उपन्यासकार की इस अप्रत्यक्ष उपस्थिति को मैंने कई स्थानों पर प्रत्यक्ष कर दिया है। उपन्यासकार और पाठक-आमने सामने हुए हैं। इसे अगर समीक्षक उपन्यास-विधा का हनन मानें तो उन्हें इसका अधिकार प्राप्त है। किन्तु किसी भी विधा में एक ही शिल्प, एक ही शैली अथवा ‘टेकनिक’ को शव की तरह अपने स्कन्धों पर ढोए जाने का मैं कायल नहीं हूँ। समीक्षा के मानदण्ड बदलते रहे हैं तो लेखक इतना निरीह क्यों, कि वह औपन्यासिक शिल्प के गढ़े-गढ़ाए ढाँचे में बँधा रहे ? उसे तोड़ना उसका अधिकार है। उसकी मौलिकता। कई अध्यायों के आरम्भ में मेरी व्यक्तिगत टिप्पणी आई है जो मेरे चिन्तन को मुखर करती है और आगे आने वाले घटनाक्रम को भी इंगित करने में सक्षम है। यह पहले भी कई उपन्यासों में हुआ है। पाठकों ने इसे सराहा है तो आलोचकों को बना-बनाया बहाना मिल गया है।

इस उपन्यास में लेखक-पाठक-संवाद कछ अधिक ही दृष्टिगोचर होगा। मुझे पूरा विश्वास है कि पाठक पहले की तरह ही मेरी शैली से प्रसन्न होंगे और समीक्षक भी अपनी आदत के अनुसार अप्रसन्न। मुझे इसकी चिन्ता नहीं। मैंने पुस्तक को अधिक आकर्षक और पठनीय बनाने हेतु ही इस शिल्प को अपनाया है खैर, कई विदेशी लेखक तो इस ‘तकनीक’ का धड़ल्ले से उपयोग कर रहे हैं।

एक बात और, पुस्तक में मूल कथा के साथ कई अन्तर्कथाएँ भी मिलेंगी। जैसा आरम्भ में कहा है, एक ऐतिहासिक-सह-आध्यात्मिक उपन्यास बहुत हद तक सामान्य पाठक के लिए दुरूह हो सकता है। अन्तर्कथाएँ औपन्यासिक कृति को प्राणवन्त और प्रासंगिक बनाती हैं और पाठकों के मनोरंजन में सहायक होती हैं। अतः, उपन्यास के कलेवर के विस्तार के खतरे को झेलते हुए भी मैंने अन्तर्कथाओं से मुँह मोड़ना उचित नहीं समझा। इनमें से कुछ पाठकों की परिचित भी होंगी पर उन्हें परोसने का अंदाज निश्चित ही भिन्न होगा। समीक्षक इनको लेकर कुछ भी कहने को स्वतन्त्र हैं।
यह बात भी उल्लेखनीय है कि इस उपन्यास के प्रणयन में मैं कृपणता से मुक्त रहा हूँ। उपन्यास अपनी गति से चला है और श्रीमद्वल्लभाचार्य के जीवन के छोटे-से-छोटे और बड़े-से-बड़े आयामों को मैंने धैर्यपूर्वक, बिना किसी शीघ्रता से लिखा है। वल्लभ के जन्म लेते-लेते ही मैंने उन्हें श्रीमद्वल्लभाचार्य नहीं बना दिया। इस प्रक्रिया में समय लगना था और वह लगा। यह मात्र उनके आचार्यतत्व की कथा नहीं है अपितु उनके पूर्ण जीवन की समग्र गाथा के रूप में इसे प्रस्तुत किया है। पुस्तक एक संस्कृत आचार्य के जीवन पर आधृत है अतः इसमें संस्कृत के संवादों, उक्तियों, श्लोकों को आने से एक सीमा तक ही रोका जा सकता है। यत्र-तत्र संस्कृत उक्तियाँ, संवाद अथवा श्लोक डालने पड़े हैं किन्तु उनका हिन्दी अनुवाद भी पाठकों की सुविधा के लिए उपलब्ध करा दिया गया है। अतः संस्कृत के उपयोग के लिए भी किसी को नाक-भौं सिकोड़ने की आवश्यकता नहीं है। एक बात और, आजकल सामान्य प्रेस संस्कृत वाक्य अथवा श्लोक कदापि मुद्रित नहीं कर सकते। प्रकाशक के पास इतना समय नहीं होता कि वे लेखक से कम-से-कम अन्तिम प्रूफ भी दिखा लें। अतः संस्कृत उद्धरणों एवं उक्तियों में एवं अन्य स्थानों पर भी प्रूफ की भूलें स्वाभाविक हैं जिसके लिए लेखक क्षमा-याचना के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सकता। पुस्तक को दो खंडों में प्रस्तुत किया गया है। ये दोनों खंड स्वयं में स्वतंत्र हैं। किसी एक को पढ़ने से ऐसा नहीं प्रतीत होता होगा कि कहीं कुछ छूट रहा है। प्रथम खंड का नाम पावक है, दूसरे का अग्नि-पुरुष। श्रीमद्वल्लभाचार्य को अग्नि का अवतार मानते हैं। पुस्तक से स्पष्ट होगा कि वे एक तरह से अग्नि-प्रसूत ही थे, अत: दोनों नाम अग्नि आधारित ही हैं। पावक का अर्थ ही अग्नि होता है और ‘अग्नि-पुरुष’ तो आचार्य के अग्नि स्वरूप व्यक्तित्व को स्पष्टतः ही रेखांकित करता है, अतः दोनों नाम सार्थक हैं। मैं कृतज्ञ हूँ मुरलीधर पांडेय डी. लिट् (वाराणसी) का जिन्होंने भी मुझे आचार्य-श्री से सम्बन्धित सूचनाएँ दीं। मैं कृतज्ञ हूँ श्री ओम प्रकाश मिश्र एडवोकेट का, जो सदा मेरा मनोबल बढ़ाते रहे, उनके छोटे भाई साहित्यकार जयप्रकाश मिश्र का भी। मैं श्री राजेन्द्र अवस्थी, श्री जय प्रकाश भारती, डॉ. श्याम सिंह शशि, डॉ. सतीशराज पुष्करणा सदृश साहित्यकार-मित्रों का भी आभार मानता हूँ जो मुझे सदा इस कृति को पूर्ण करने के लिए प्रेरित करते रहे। वरिष्ठ राजनेता एवं साहित्य व्यसनी श्री विश्वम्भर दत्त शर्मा एवं महाकवि मधुर शास्त्री का उनकी सतत् प्रेरणा और प्रोत्साहन का आभारी हूँ। श्री के.के. श्रीवास्तव महान् हिन्दी प्रेमी एवं भूतपूर्व मुख्य सचिव बिहार तथा अध्यक्ष बिहार लोकसेवा आयोग और उनकी विदुषी धर्म पत्नी ने मेरी एक-एक पुस्तक प्राप्त कर पढ़ी है। उनका हृदय से आभार मानता हूँ।
सुधी समीक्षक डॉ. शिववंश पांडेय, साहित्याकार बंधु सर्वश्री कृष्णनंन्द कृष्ण, कुमार आशुतोष, सुदामा मिश्र का स्मरण आवश्यक है।

वयोवृद्ध साहित्यकार एवं ‘नई धारा’ के सम्पादक श्री उदय राज सिंह एवं उनके सह सम्पादक युवा कवि डॉ. शिवनारायण का आभार।
आत्माराम एंड सन्स के श्री सुधीर कुमार की तत्परता का आभारी हूँ जिसके फलस्वरूप पुस्तक इतनी शीघ्र आ सकी।
मैं श्री त्रिपुरारी प्रसाद सिन्हा का भी आभारी हूँ जिन्होंने पाण्डुलिपि पूर्ण करने में व्यक्तिगत दिलचस्पी ली।
अन्ततः यह सब श्रीकृष्ण-कृपा से ही सम्भव हुआ है, अतः वासुदेव श्रीकृष्ण का मैं अन्तर्मन से ऋणी हूँ जिनकी इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, पुस्तक क्या लिखी जाएगी ? अस्तु !

अध्याय 1

 

जो कार्य प्रिय हो उसके सम्पादन में स्वतः मन रम जाता है। इसके लिए रात-दिन रत रहो तब भी वह बोझिल प्रतीत नहीं होता। मनोनुकूल कार्य प्रसन्नता दायक होता है और प्रसन्नता श्रम-जनित कष्ट को पी जाने में समर्थ है।
श्रीनाथ-मन्दिर का निर्माण कृष्णदास के अपने जीवन का सर्वाधिक प्रिय कार्य था। वह पूर्ण मनोयोग से इस कार्य में लग गए। सर्वप्रथम तो उन्होंने मन्दिर का एक स्वरूप इलाके के एक प्रसिद्ध कारीगर से बनवाया। उनमें मुख्य भवन, रसोईगृह, अतिथिशाला, प्रार्थना-स्थली के साथ-साथ श्रीनाथ जी के गर्भगृह और शयन कक्ष आदि की भी व्यवस्था की गई। चित्र को महाप्रभु के समक्ष रखा गया तो उन्होंने थोड़ा-बहुत परिवर्तन कर उसे अपनी स्वीकृति दे दी। कृष्णदास की प्रसन्नता का पारावार नहीं रहा। वह अब पूरे मन से मन्दिर निर्माण के नेतृत्व में लग गए। शिष्टमंडल ने स्वयं-सेवकों का प्रबन्ध कर दिया। इसके अतिरिक्त सैकड़ों लोग आमन्त्रित ही, मन्दिर-निर्माण की सूचना पाकर निर्माण-स्थल पर, मिश्री की डली पर टूटते हुए चींटी-दलों की तरह टूटने लगे। मजदूर तो मजदूर कारीगर भी अपनी निःशुल्क सेवा देने लगे। नित्य इतनी भीड़ एकत्रित होती कि सभी हाथों को कार्य देना भी कठिन हो गया। कोई अपने हाथ से पत्थर का एक टुकड़ा भी किसी कारीगर के हाथ में थमा देता तो अपने को धन्य समझता।

कृष्णदास अपनी पूरी तत्परता से मन्दिर निर्माण के कार्य के निरीक्षण में रत थे। निर्माण सामग्री भक्तों द्वारा दी जा रही थी। शेष का क्रय हो रहा था। उत्कृष्ट साम्रगी ही मन्दिर में लगे, इस बात का उन्हें विशेष ध्यान था। स्वयं-सेवकों और कुछ मजदूरी के आधार पर लगे लोगों और कारीगरों के भोजन का प्रबन्ध अपने में एक प्रबल समस्या थी। सभी ओर दृष्टि रखना एक व्यक्ति के लिए असंभव था, अतः कृष्णदास ने क्षेत्र के प्रभावशाली व्यक्तियों के मध्य कार्यों का वितरण कर दिया। कुछ पाक-गृह को सँभालते तो कुछ सामूहिक भोजन को सुव्यवस्थित करते। कुछ निर्माण सामग्री के संयोजन में समय देते तो कुछ मजदूरों और कारीगरों के कार्य पर ध्यान रखते। कुछ नींव छोड़कर ऊपर बढ़ रहे मन्दिर की सुगढ़ता पर दृष्टि रखते। मन्दिर, आचार्य श्री द्वारा अनुमोदित स्वरूप के अनुसार ही बने, इस पर विशेष ध्यान दिया जाता।


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