556 हितोपदेश मित्रलाभ - अनन्त पई 556 Hitopadesh Mitralabha - Hindi book by - Anant Pai
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556 हितोपदेश मित्रलाभ

अनन्त पई

प्रकाशक : इंडिया बुक हाउस प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :32
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4976
आईएसबीएन :81-7508-498-7

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मित्र से होने वाले लाभों का वर्णन....

Hitopadesh A Hindi Book by Anant Pai - हितोपदेश मित्रलाभ - अनन्त पई

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

 

हितोपदेश के रचनाकार, नारायण ने अपनी अधिकांश सामाग्री पंडित विष्णु शर्मा के पंचतंत्र से ली है। पंचतंत्र की रचना ईसा-पूर्व 2री और 3री शताब्दियों के बीच हुई थी। नारायण ने तीन ‘‘तंत्रों’’ की पुनर्रचना की और लगभग 15 नयी कथाएँ उसमें जोड़ी। अन्यथा दोनों ग्रंथों की कथा वस्तु एक जैसी है।

भारत का एक राजा बहुत दुखी था कि उसके तीन पुत्रों में से कोई भी कुछ सीखता-पढ़ता नहीं। राजा ने अपने मंत्रियों की सलाह से उन्हें विष्णु शर्मा के पास भेज दिया। विष्णु शर्मा जितना विद्वान था उतना ही कुशल शिक्षक भी। छः महीनों के अल्प-काल में ही उसने राजकुमारों को चिड़ियों, पशुओं और मनुष्यों की कहानियाँ सुना कर राजनीति तथा आचारशास्त्र में पारंगत कर दिया। उसकी कहानियों का हर पात्र परोक्ष या अपरोक्ष रूप में कोई न कोई शिक्षा देता है।

पंचतंत्र में ये कथाएँ पाँच भागों में हैं। नारायण की रचना में चार ही भाग हैं—मित्रलाभ, सुहृदभेद, विग्रह और संधि। यह अमर चित्र कथा पहले भाग अर्थात् मित्रलाभ पर आधारित है।

 

मित्रलाभ

 

एक दिन एक कौवा गोदावरी नदी के निकट पेड़ पर बैठा था। जरा दिन चढ़ते ही उसने देखा कि एक बहेलिया चला आ रहा है।
हे भगवान् ! साक्षात् यम चला आ रहा है ! न जाने क्या करेगा यह !
बहेलिये ने अपना जाल बिछाया....
जमींन पर चावल के कुछ दाने बिखेरे....

और पास ही एक खोखले पेड़ में छिपकर बैठ गया।
थोड़ी देर में कबूतरों का राजा अपने साथियों के साथ उड़ता हुआ उधर आया।
देखो बहुत सा चावल यहाँ बिखरा पड़ा है !
राजा जी, हम उतर कर जरा पेट-पूजा कर लें।
नहीं ! इसमें कोई धोखा है ! चावल यहाँ कैसे आया ?
बुद्धिमान है।



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