द्रौपदी - प्रतिभा राय Draupadi - Hindi book by - Pratibha Rai
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द्रौपदी

प्रतिभा राय

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :263
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4980
आईएसबीएन :9788170282723

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द्रौपदी के जीवन पर आधारित उपन्यास

Drupadi

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

तुम्हारी प्रिय सखी,

इति कर देने के बाद लगता है जैसे कुछ भी नहीं लिख पाई। महाजीवन की लम्बी-सुख-दुःखों से भरी कहानी महाकाल के वक्ष पर खाली पन्ने की तरह पड़ी है। जैसे वह कुछ भी छोड़कर नहीं जाता। बस यह भंगुर काया छोड़ जाता है, वह भी उसकी नहीं। आत्मा उड़ जाती है, वह भला उसकी होती ही कहां है ?

आकाश का न कहीं आदि और न कहीं अंत। सागर का न क्षय होता है और न उसकी कोई वृद्धि। सूर्य का न उदय है और न अस्त। मनोकामना की न पूर्णता होती है और न रिक्तता। हमारे संबंध की भी वैसे ही न कोई संज्ञा है और न कोई अंतिम परिणति। अतः इस मामूली-से पत्र में अंतिम बात क्या लिख पाऊँगी ? जीवन की सारी बातें कह चुकने पर भी अंतिम बात तो रह ही जाती है। सब-कुछ पाने के बावजूद पूर्णता रह जाती है—सब-कुछ इतिश्री होने के बाद शुभारंभ रह जाता है। किसका आरंभ और किसकी इति ? जो सृष्टि है वही तो प्रलय है। जो प्रारम्भ है वही विलय है—वह महाकाल है, अनादि और अनंत है—
जैसे वायु पुष्प से गंध वहन कर लेती है। पता नहीं, किसकी गंध पाकर जीवन यह देह छोड़ जाता है। कहाँ जाता है और कहां से आता है ?

काम, क्रोध लोभ नरक के द्वार हैं। हे ईश्वर ! अंत में क्या नरकवास है ? मृत्यु के शीतल हाथ जीवात्मा को जड़ करने के अंतिम क्षण तक जीवन की अंतिम बात कहने की चेष्टा करने से संशय कभी समाप्त होता है ? हिमालय मेरु गिरि की स्वर्णरेणु पैरों से खिसक रही है। पांवों में और कुछ अनुभव नहीं होता। जिनका पीछा करते सारी उम्र इन कोमल पावों से रक्त झराया, व्यथा भोगी, वे सब लोग पता नहीं, कौन किधर चले गए हैं। एक बार भी ‘आह !’ कह मुड़कर नहीं देखा। उस ‘आह !’ भर कह देने से उनके स्वर्ग पाने में कौन-सी बड़ी बाधा खड़ी हो जाती है ? किसने चाहा था स्वर्ग, किसने चाहा था राज्य ? और किसने चाहा था युद्ध ? सब कारणों के कारणस्वरूप कोई होते हुए भी सारा दोष मेरे माथे ढालकर वे चले गए—मृत्यु-द्वार पर मुझे यों छोड़कर !

भोले शिशु को खिलौना देकर अगले क्षण छीन कर उसे रुलाना ! यह सब कुछ ले जाने का नाटक क्यों रचा ? जो हाथ पसार कर माँगता है, उसके साथ खेलने का मन होता है। पर जो कुछ मांगता ही नहीं, उसके साथ यह खेल ! यह निष्ठुरता नहीं तो और क्या है ! क्षण से जो दूर है, अक्षर से श्रेष्ठ हैं, पुरुषोत्तम हैं, सब-कुछ जिनके पास देय है, परम आनंद के अधिकारी, वे क्यों ऐसा खेल खेलते हैं ? वे किसे देते हैं या किससे लेते हैं।

पांवों-तले से प्राण निकलते जा रहे हैं। जो साथ-साथ थे, वे स्वर्ण-पथ में आगे बढ़ गए हैं। महाशून्य में सब-कुछ सूना-सूना लग रहा है। फिर भी जीवन भर का संचित मान-गुमान आज मृत्यु-पथ में मोम की तरह पिघलकर झर रहा है—प्रश्न पर प्रश्न हृदय-तट से टकरा रहे हैं। फिर भी अंतिम बात कही नहीं जा सकी। चिट्ठी की इतिश्री हो चुकी है। मृत्यु-पथ में पल-पल आगे सरकती जा रही हूँ—फिर पढ़ने लगी उस चिट्ठी को। अनंत, अथाह जीवन-जिज्ञासा शायद इस सृष्टि का रहस्य है ! अतः जीवन की विस्तृत अनुभूति के बावजूद सदा सुख-दुःख, संपद-विपद, मिलन-विरह, जन्म-मरण के रहस्य में ही रह जाता है। अपने रक्त से लिखी यह चिट्ठी ही आज मृत्यु-पथ की सहचरी है। अपनी चिट्ठी पढ़ते-पढ़ते अगर मेरी आत्मा शरीर को छोड़ जाए तो समझना, इसके प्राप्तकर्ता तुम ही हो

प्रिय सखा!
गोविंद!


हे पुरुषश्रेष्ठ कृष्ण ! हे मधुसूदन ! कृष्णा का प्रणाम !
जीवन का सारा मान और अभियोग आज अन्तिम क्षणों में रखे दे रही हूं। जीवन में अफसोस ही रह जाएगा।
धर्म की रक्षा के लिए जीवन भर कितनी यातनाएँ नहीं सहीं ! सोचा था पातिव्रत के कारण और अपने धर्माचरण के बल पर पति संग स्वर्ग जा सकूंगी। पर गिरि राज हिमालय के पाद-देश की स्वर्णरेणु छूते-छूते ही पांव फिसल गए, मैं गिर पड़ी ! पांचों पतियों ने मुड़कर भी नहीं देखा। वरन् धर्मराज युधिष्ठिर ने भीम से कहा—‘‘मुड़कर न देखो ! आगे आ जाओ !’’
उनकी यही बात मेरे हृदय को टूक-टूक कर गई। सोचा-कितना झूठा है यह पति-पत्नी का संबंध ! स्नेह, प्रेम, त्याग और उत्सर्ग ! अपने कर्म अगर आदमी स्वयं भोगता है, तो फिर युधिष्ठिर के धर्म की रक्षा के लिए पांच पतियों के चरणों में अर्पित होकर सारी दुनिया का उपहास, व्यंग-विद्रूप और निंदा-अपवाद ढोती क्यों फिरी ?

द्वापर युग शेष होने जा रहा है, अभिमन्यु-पुत्र परीक्षित का जिस दिन हस्तिनापुर की गद्दी पर अभिषेक हुआ, उसी दिन से कलियुग का प्रारंभ होता है। कहते हैं मेरा नाम पंच सती में गिना जाएगा। उसे देख कर कलियुग के नर-नारी विद्रूप कर हंसेंगे। कहेंगे—पंचपति वरण कर द्रौपदी अगर सती हो सकी, तो फिर एक पतिव्रतपालन की क्या आवश्यकता ? बहुपति वरण कर वे कलियुग में सती क्यों नहीं होंगी ? यौन विकारग्रस्त कलियुग के उच्छृंखल नर-नारियों के बीच द्रौपदी होगी व्यंग-परिहास का उपादान। पांच पतियों की पत्नी द्रौपदी को सतीत्व के लिए तिल तिल जलना पड़ा होगा, इसे ये लोग भला कैसे समझेंगे ? तब तो हस्तिनापुर की नायिका द्रौपदी एक निंदित आत्मा, कलंकभरी कहानी की नायिका बन जाएगी ! हे कृष्ण ! हे वासुदेव, तुम तो इच्छामय हो ! तुम्हारी इच्छा से तो द्रौपदी ने जन्म से अब तक सारा रास्ता तय किया। तुम्हारी इच्छा पर द्रौपदी की पलकें खुली हैं, झपकी हैं, सांस आती-जाती रही है—तो उसकी निंदा-प्रशंसा में क्या तुम्हारा कुछ भी भाग नहीं !
आज हृदय से झरते रक्त से पवित्र हिमालय के पत्थरों पर द्रौपदी लिख रही है अपने जीवन की कहानी। कभी तुम विपन्न धरती का उद्धार करने हिमालय की राह से पृथ्वी पर अवतरित होओगे। उस दिन अमिट अक्षरों में लिखी रक्तसनी आत्मकथा पढ़ोगे। ‘आहा !’ शब्द द्रौपदी के लिए निकलेगा। बस इतना ही मुझे चाहिए।
तुम अंतर्यामी हो। तुम्हें क्या पता नहीं ? फिर भी मुँह खोलकर कुछ कहे बिना तुम तक आर्त्त स्वर नहीं पहुँचता। अतः तुम्हारे आगे सब कुछ देख रही हूँ। जो तुम्हें ज्ञात है, जिसके तुम कर्ता हो, वे ही बातें तुम्हारे आगे रख रही हूँ।

काल मुझे ‘देवी द्रौपदी’ के रूप में परिणत कर सकता है। मैं, लेकिन धरती पर यह देह लेकर मानव-रूप में आई थी। मेरे पंच पति मर्त्यलोक के एक-एक मानव हैं। हमारे कर्ता महामुनि कृष्ण द्वैपायन ने मुझे देवी के आसन पर बिठाया है। उनकी दृष्टि में मैं दिव्यदर्शनी हूं। पंचपति-वरण के मूल में उन्होंने शिव के किसी वरदान की बात कही है। पर मैं देवी नहीं, जातिस्मर नहीं। अतः आज मृत्यु-पथ पर बढ़ते-बढ़ते, जो कहूंगी, सच कहूंगी। मेरे जीवन की कथा मर्त्यलोक के किसी मानव के जीवन-चरित के अलावा कुछ नहीं। इस पत्र के ये अमिट अक्षर पढ़ेंगे। मेरे जीवन में घटी एक-एक लोमहर्षक घटना को देखकर कलियुग के लोग विचार कर सकेंगे, द्रौपदी की लांछना कभी किसी युग की नारी ने सही है ! भविष्य में ऐसा लांछन, ईश्वर करे, कभी किसी को न भोगना पड़े।
सखे ! जिस दिन मैं कुरुसभा में लांछित हो रही थी, पंचपति से भरोसा उठ चुका था, उस दिन लज्जा छोड़ हाथ उठाकर तुम्हें ही तो बुलाया। तुम्हारे आगे ही समर्पण किया। और आज फिर पंचपति मुझे निःसहाय छोड़कर जा चुके हैं, मैं तुम्हारे आगे ही स्वयं को अर्पित कर रही हूं। अपना सारा दुःख-दर्द, हाहाकार, लांछन सब-कुछ तुम्हें दे रही हूं। मैं अगर अपनी ही नहीं रही, तो फिर मेरा दुःख मेरा क्यों रहेगा ?

हे अंतर्यामी कृष्ण ! तुम्हारे लिए क्या अगोचर है ? फिर भी, लिख रही हूं अपनी कहानी। हृदय खोलकर कहे से ही दुःख घटता है। और जब हृदय खोल रही हूं, सब कुछ अपने दोष, दुर्बलता, भ्रम सब बाहर आयेंगे। दुनिया इसके लिए मुझे दोष दे, तो मैं क्या कह सकती हूं ! भूल-भटकनादि से ऊपर नहीं उठ सकी, इसलिए शायद स्वर्ग-पथ मेरे लिए रुद्ध हो गया।
समय छीजता जा रहा है। देह क्षत-विक्षत। हृदय टूक-टूक। रक्त झर रहा है—और इसी रक्त से सनी है मेरी कहानी। मरते समय आदमी जो कुछ कहता है या करता है, सब उसके अधीन से बाहर होता है। अतः इतने दिन की संचित मनोवेदना आज अनायत्त होकर तुम्हारे चरणों में अर्घ्य बनकर बह जाये। दुनिया चाहे देख ले। हे गोविंद ! मेरी कहानी पूरी करने तक मेरी भावना और चिंतन को जड़ मत करना। मेरी स्मरणशक्ति तोड़ न देना, मृत्यु के हाथों अर्पित न कर देना। बस अपनी कहानी कह लूं—मृत्यु के द्वार देश पर खड़ी इतनी ही प्रार्थना कर रही हूं।
कहां से शुरू करूं ? अपने जन्म से ? जन्म तो मेरा एक व्यक्तिक्रम है। मैं युवती के रूप में ही पैदा हुई। जनमी नहीं—यज्ञदेवी ही मेरी मां है। याज्ञसेन मेरे पिता हैं। अतः मैं हूं याज्ञसेनी।
याज्ञसेनी !
पांचाल राजकन्या, द्रुपद-नंदिनी, द्रौपदी !

द्वापर युग में कुरु और पांचालों के अधीन जो इलाक़ा था, वही आर्यावर्त का प्राणकेन्द्र था। भरत के वंशधर कुरुओं ने गंगा-तट पर हस्तिनापुर को राजधानी बनाया। इस समय यह देश के गर्व-गौरव का प्रतीक था। पांचाल राज्य के वंशधर श्री कुरु-वंशियों से कम न थे। वास्तव में इन दोनों के बीच एक तरह की प्रतिद्वंद्विता चल रही थी।
मेरे पिता के बचपन के सखा थे द्रोण। और पांडवों के वे गुरु। कभी द्रुपदराज के पास सहायता के लिए आये थे। पिता ने उपहास में कह दिया—‘‘भिक्षुक ब्राह्मण और राजा का मित्र ! मित्रता तो समस्कंधवालों में ही होती है।’’
द्रोण अपमानित होकर लौट आए। कुरुसभा में उन्हें नियुक्ति मिल गई। वह अपमान उनके हृदय में सुलगता रहा। पांडवों की अस्त्रशिक्षा समाप्त होने के बाद द्रोण ने दक्षिणा मांगी—‘‘द्रुपदराज को बांधकर मेरे कदमों में डालो !’’
तृतीय पांडव अर्जुन द्रोण के अतिप्रिय शिष्य थे—धनुर्विद्या में पारंगत। राधेय कर्ण को छोड़कर आर्यावर्त्त में कौन था, जो उनका मुकाबला करे !
पांडवों के लिए वह कोई बड़ी बात न थी। अर्जुन बांध लाये मेरे पिता द्रुपद को और द्रोण के चरणों में डाल दिया।
द्रोण ने अपमान लौटाकर कहा—‘‘राजा ही सिर्फ राजा का मित्र हो सकता है। लेकिन आज तुम्हारे पास राज्य नहीं। आज से पांचाल का उत्तरी भाग मेरा है। गंगा नदी के दक्षिण पार्श्व के अधीश्वर तुम हो। अब हम दोनों समस्कंध हैं। अब हमारी मित्रता में कोई बंधक है ?’’

द्रुपद ने आधा राज्य खोकर कपट-मित्रता का हाथ बढ़ाया। पांचाल का उत्तरी पार्श्व वाला राज्य ही अधिक समृद्ध था। द्रोण ने अपने लिए रखा था उसे।
क्षत्रिय कभी अपमान नहीं भूल सकता। भाग्य को स्वीकार कर लिया। लेकिन क्षात्र-धर्म कुछ और ही होता है।
द्रोण की हत्या बिना अपमान शांत नहीं होगा। द्रोण की तरफ हैं भीष्म, कर्ण, शल्य, जयद्रथ, दुर्योधन और उनके सौ भाई—फिर हस्तिनापुर की विशाल सेना ! पांचाल में ऐसा कौन था जो द्रोण को मार सके ?
द्रोणान्तक पुत्र पाने के लिए राजा द्रुपद ने कश्यप ऋषी के वंशज उपयाज को संतुष्ट किया। पुत्र-प्राप्ति के लिए उपयाज एवं याज ऋषी से यज्ञ करवाया।
यज्ञ की होमाग्नि से तेजोवंत पुत्र मेरे भाई दृष्टद्युम्न और यज्ञवेदी के दो भागों से नील पद्मकांत मणि-सी मैं जन्मी-याज्ञसेनी !
मुझे लोगों ने कहा—अतीव सुंदरी ! अद्भुत ! नीलकमल की पंखुड़ियों-सी मेरी कांति ! सागर की लहरों-से घने केश और नीलपद्म-सी उज्ज्वल बुद्धिदीपा चमकती मनमोहक आयत्त आंखें ! विश्व के श्रेष्ठ शिल्पकार के हाथों गढ़ी प्रतिमा जैसी अनिंद्य मुखशोभा, उचित अंगसौष्ठव। दीर्घ देह, उन्नत पुष्ट वक्ष, क्षीण कटि, रंभातरु-सा सुगोल घन उरु। चंपाकली-सी हाथ-पांव की उंगलियां, रक्तिम शतदल-सा करतल, पाद।

मुक्तावली-सी दंतपंक्ति। विद्युत को भी शरमानेवाली हास-रेखा। चंद्र-से नख। देह की पद्म की भीनी-भीनी महक से भ्रमर को भी मतिभ्रम हो जाता। मेरे केशों के कुटिल सौंदर्य में पवन भी बंधकर थिर हो जाता। कवियों ने यतिमति-हरण करनेवाला बताया मेरे सौंदर्य को।
शुभ्रवसना, शुभ्रमुकुटमंडिता मैं श्वेत कमल धारण किए जब विकच नीलोत्पल-सी यज्ञवेदी पर आविर्भूत हुई, पूर्ण यौवन भार से मेरा अंग-अंग झलमला रहा था। मुझे देखकर यज्ञवेदी के चारों ओर बैठे जितेंद्रिय मुनिगण भी स्तब्ध रह गए। मंत्रोच्चार करते अधर कांप उठे। कंठस्वर जड़ हो गया। कुछ युवक संन्यासी चेतना खो बैठे। पेड़ों के पत्ते भी कुछ क्षण थम गए। अग्निशिखा निर्वाक्-निष्कंप हो गई। शायद महाकाल उस क्षण स्थिर हो गया था।
अपने रूप का वर्णन मैं नहीं कर रही—लोगों ने कहा था। पिता की राजसभा के कवि कह रहे थे—‘‘श्यामा !’’ इसके रूप का वर्णन जितना ही करो, बहुत-कुछ बाकी रह जाता है। जीवन भर काव्य लिखने पर भी इस अनुपम सौंदर्य के लायक़ उपमा नहीं मिलेगी। अतः कृष्णा स्वयं ही अपनी उपमा है !’’

मेरे जन्म के समय आकाशवाणी हुई थी—‘‘यह कन्या तुम्हारे अपमान का बदला लेने ही जन्मी है। प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए आविर्भूत हुई है। इससे पृथ्वी पर धर्म की रक्षा होगी। क्षत्रिय़ों का नाश होगा। यह कौरवनाशिनी होगी।’’
ईश्वर ने मुझे अपूर्व लावण्यमय देह दी थी। प्रीतिपूर्ण हृदय प्रदान किया था। इन सुंदर नैनों को खोल जब मैं इस मोहक सृष्टि को देख रही थी, मुझे यज्ञ करनेवाले ऋषी-मुनियों का वाणी सुनाई पड़ी—‘‘मेरा जन्म पिता के औरस से नहीं हुआ। प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए रचे यज्ञ की वेदी से।’’ जन्म से पहले ही पिता के अपमान का प्रतिशोध लेने को बाध्य ! इस पृथ्वी पर धर्मरक्षा और दुष्टनाशन का मैं अस्त्र होने जा रही हूं। इसीलिए पृथ्वी पर आई हूं। क्या युग-युग में धर्मरक्षा और दुष्टसंहार के लिए नारी को ही माध्यम होना पड़ेगा ? नारी ही क्या सृष्टि और विनाश का कारण है ? कभी लंकाविनाश और राम-राज्य की प्रतिष्ठा के लिए सती सीता को माध्यम बनना पड़ा। इसके लिए अपने जीवन का सारा सुख छोड़कर उन्हें वनवासी बनना पड़ा। फिर रावण की लालसा ने उन्हें अशोक वन में बंदी बनाया। लांछित किया, दुःख दिया। अंत में पृथ्वी पर धर्म की प्रतिष्ठा हुई। प्रभु राम के जन्म का उद्देश्य पूरा हुआ। पर आखिर सीता को मिला क्या ? राम से निर्वासन का दंड ! सबके सामने सतीत्व की परीक्षा ! धरती उनके लांछन से फट गई, सीता अपना दुःख, लज्जा, अपमान छुपाने के लिए धरती की गोद में चली गई।

यह सब सोचकर ही हृदय कांप उठता है। धर्म-रक्षा और कौरवों का विनाश—मेरे जन्म का लक्ष्य ! सुख की कल्पना में डूबते-डूबते मेरा मन किसी अनजान आशंका से सिहर उठता है। हाथ जोड़कर फिर आँख मूंद प्रार्थना की—‘‘हे भगवान ! पृथ्वी पर धर्म-रक्षा के लिए ही अगर मेरा जन्म हुआ है—तो जितनी लांछना, अपमान देना है दो, पर यह सब सहने की शक्ति भी दो।’’
मुझे ध्यान में डूबी देख पिता बहुत प्रसन्न हुए। सिर पर आशीर्वाद का हाथ रखकर कहा—‘‘याज्ञसेनी ! तुम्हीं पितृ-अपमान का प्रतिशोध लोगी ! इसीलिए तुम दोंनों की होम की अग्नि से उत्पत्ति हुई है। मेरा यज्ञ सार्थक हुआ।’’
पिता के चरण छूकर कहा, ‘‘आपकी इच्छा पूरी करना ही मेरा धर्म है। बस, आपका आशीर्वाद मेरे सिर पर रहे।’’
पिता ने कुछ नहीं कहा। आंखें ढर रही थीं। द्रोण के अपमान की ज्वाला से अभी भी उनका हृदय धधक रहा था। मैंने प्रण किया—‘‘ज़रूरत पड़ी तो इस अग्नि को अपने जीवन के अश्रुबिंदुओं से निर्वापित करूंगी।’’
हम दोनों का नामकरण उत्सव हुआ। भाई जन्म से ही कवच-कुंडल लिए जन्म थे। तेजस्वी गुण स्पष्ट दिख रहे थे। उपयाज ऋषि ने कहा—‘‘यह पुत्र अग्नि से उत्पन्न हुआ है। यही यशस्वी पुत्र द्रोण का वध करेगा। इसका नाम दृष्टद्युम्न रखें।’’
मेरी ओर स्नेहपूर्ण नेत्रों से कहा—‘‘द्रपुद-दुहिता इस श्यामांगी का जन्म-नाम ‘कृष्णा’ रहे।’’
‘‘कृष्णा !....कृष्णा और कृष्णा ! कितना सुंदर !’’

पिता इतना कहकर आकाश की ओर देखते रहे। चेहरा प्रसन्नता से चमक उठा। पिता का आनंद मेरे चेहरे तक भी संचार कर गया। सोचने लगी—‘‘कौन है यह कृष्ण, जिसका नाम ही इतना अमृतमय है !’’
पिता अस्पष्ट स्वर में कह रहे थे—‘‘हे कृष्ण ! अपनी कृष्णा तुम्हारे ही हाथों अर्पित करूंगा। तुम्हीं तो आर्यावर्त में पुरुष-श्रेष्ठ हो ! वीर ! एवं धर्म-स्थापना तुम्हारे जीवन का उद्देश्य है ! तुम्ही गर्वगंजन गोविंद हो ! कृष्णा को तुम्हारे हाथ में देने पर मेरा सम्मान लौट आयेगा। इसीलिए तो कृष्ण का जन्म हुआ है।’’
किसी अननुभूत सिहरन से रोमांच हो आया मुझे। अंग-अंग में पुलक भर गई। आर्यावर्त्त के श्रेष्ठ पुरुष। श्रेष्ठ योद्धा और धर्म-संस्थापक ! किसके काम्य न होंगे !
फिर मेरी अपनी तो अलग से कोई कामना नहीं। अभी-अभी तो पिता के आगे प्रतिज्ञा की है। अतः मैं कृष्ण के आगे समर्पित हूं। ऐसा न होता तो उपयाज ऋषि मेरा नाम ‘कृष्णा’ क्यों रखते ?
कृष्ण और कृष्णा ! स्वर्गीय, पवित्र, मधुर प्रेमधारा में मेरा हृदय डूब उठा। नेत्र अश्रुल। पर मैं नहीं जानती थी कौन हैं ये परम पुरुष कृष्ण !
नितंबिनी मेरी प्यारी सखी है। उस दिन उद्यान में सांध्य समीर का सेवन कर रही थी।
एकांत में उससे पूछा—
‘‘कृष्ण कौन हैं ?’’

मुझे सखी ने तिरछे नेत्रों से देखा। होंठ बिचकाकर हंस दी—‘‘कृष्ण के पास कृष्णा का क्या काम ?’’
मैं हंस पड़ी—‘‘पिता से सुना है, सिर्फ कृष्णा का ही नहीं, कृष्ण के पास सबका प्रयोजन है।’’
‘‘कृष्ण का कोई विशेष प्रयोजन होगा।’’ अभी भी नितंबिनी होंठ दबाए मुस्करा रही थी।
शांत स्वर में कहा—‘‘सुना है कि किसी विशेष प्रयोजन से कृष्ण धरती पर अवतरित हुए हैं।’’
नितंबिनी ने मेरा चिबुक छूकर कहा—‘‘सखी ! कृष्ण को भूल जाओ !’’
घबराकर मैंने पूछा--‘‘क्यों ?’’
‘‘हां, मेरा कहा मानो। यह सच है कि उनमें प्रज्ञा है, शौर्य है। दूरदर्शी, कूटनीतिज्ञ, शक्तिशाली और कर्मवीर हैं। वे खिले कमल-से सुंदर हैं, निर्मल हैं। आर्त का अभीष्ट पूरा करते हैं, स्नेह का प्रतिदान करते हैं। एक हाथ से ग्रहण करते हैं तो सहस्रों हाथ से दान करते हैं। हृदय उनका विशाल है, महान हैं। वे अद्वितीय वीर हैं, परमपुरुष हैं...किन्तु...’’
‘‘किंतु ?’’ चौंककर मैंने पूछा।

‘‘...हां। वे लंपट हैं। सोलह हज़ार गोप नारियां उनकी प्रेमिका हैं। वे नारीहृदय जीतने की कला में इतने पारंगत है कि स्वामी, पुत्र, दुनिया सब छोड़कर गोपांगनाएं उनकी मोहक वंशी सुनकर यमुना-तट पर अभिसार करने पहुंच जाती हैं। हालाँकि ये कैशोर्य की बातें हैं—अब वे प्रजापालक हैं, धर्मज्ञ हैं, द्वारका के अधिपति हैं।
मन ही मन मैं सोच रही थी—जो सभी श्रेष्ठ गुणों के अधिकारी हैं, उनके लिए पति और संसार छोड़कर पागल होना स्वाभाविक ही है। सोलह हज़ार क्या, सौ-सौ हज़ार नारियां भी पागल हों तो उनका क्या दोष ! मन करता था, एक बार ऐसे परम पुरुष को देख पाती ! कैसा रूप ! नितंबिनी से पूछूं तो वह परिहास करेगी। बढ़ा-चढ़ाकर दूसरी सखियों से कहेगी। वे फिर चिढ़ा-चिढ़ाकर प्राण लेंगी। बात को थोड़ घुमाकर पूछा—‘‘कृष्ण की वंशावली जानती हो ?’’
नितंबिनी को हंसी आ गई—‘‘वंश मां-बाप देखते हैं। कन्या तो रूप देखती है। कृष्ण के रूप के बारे में सुनोगी तो होश-हवास खो बैठोगी। कहोगी कि कृष्ण बिना यह जीवन वृथा है। अभी कृष्ण को लाकर दो, वरना प्राण छोड़ दूँगी ! फिर बता, मैं क्या करूंगी ?’’

मैं सपने में खोई थी—कृष्ण का रूप ! वह कल्पना ही तो मेरी सहचरी थी। इस उम्र में कौन कितनी कल्पना नहीं करती ? कल्पना में भी कितना सुख नहीं मिलता ? पर सबकी हर कल्पना तो पूरी नहीं होती। कल्पना छोड़ कोई जी सकता है ?
मैं कृष्ण-कल्पना में खोई रही।
कृष्ण तमाल के लता-कुंज तले दोनों सखी बैठी थीं। नाले आकाश का रंग अस्त सूर्य के रंग में रंगा जा रहा था, मेरे पांवों में अलता की धार-सा खिल रहा था। स्वच्छ सलिल से परिपूर्ण सरसी में नील कुंई की पंखुड़ियां खिली थीं। सांध्य आकाश में कुछ मेघ-खण्ड चंद्रिका का रास्ता रोक नील कुंई के साथ खेल रहे थे। इधर आकाश में मेघों को देख मेरा पाला हुआ मयूर अपने पंख फैलाकर नाचने की तैयारी कर रहा था।

नितंबिनी कृष्ण का रूप गाती जा रही थी। मयूर-चंद्रिका के साथ मेरा हृदय भी ताल दे रहा था।
मैं सोचती जा रही थी—कृष्ण हैं कैसे ? शायद नील तमाल-से या सांवले मेघ से ? नील कुंई-सी आंखें, उनकी दृष्टि ! मयूर-चंद्रिका के उज्ज्वल नीलरंग-से केश। और अधर होंगे अगस्त्य फूल की तरह के बंकिम, सुंदर ! पद्म कोरकों-से हाथ-पाँव, नीले आकाश-सा प्रशस्त वक्षःस्थल ! बसंत की कुहू तान सरीखा मंद्र-मधुर स्वर उनका। हिना के फूल-सी देह-गंध और चंपा तरु-सी श्याम-कोमल अथच दीर्घ काया...



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