सुनो कहानी नानक बानी - उषा यादव Suno Kahani Nanak Bani - Hindi book by - Usha Yadav
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सुनो कहानी नानक बानी

उषा यादव

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :64
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4999
आईएसबीएन :81-7043-639-7

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नानक के अनमोल वचन...

Suno Kahani Nanak Bani

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

बात ऐसे बनी

‘‘देखो बच्चो, नानी एक हफ्ते के लिए यहाँ आ रही हैं। उनका कहना मानना, ज्यादा ऊधम मत करना। समझे ?’’ मम्मी ने चिट्ठी पढ़ते हुए कहा। निधि और पावस ने एक-दूसरे की तरफ देखा उनकी आँखें चमक उठीं। दोनों खुशी से चिल्लाए-‘‘अरे वाह, नानी आ रही हैं। मजा आ जाएगा।’’
‘‘लेकिन तुम लोगों ने मेरी बात समझ ली है न ?’’ मम्मी मुस्कराई।
‘‘खूब समझ ली है।’’ निधि उत्साहपूर्वक बोली-‘‘हम लोग नानी का सब कहना मानेंगे...’’
‘‘ज्यादा ऊधम नहीं करेंगे...’’ पावस बीच में टपक पड़ा।
‘‘और ढेर सारी कहानियाँ सुनेंगे।’’ निधि ने झट वाक्य पूरा कर दिया।
मम्मी ने आँखें तरेरीं-‘‘गन्दी बात। नानी को कहानी सुनाने के लिए बिल्कुल परेशान नहीं करोगे तुम लोग।’’
‘‘क्यों मम्मी ?’’ निधि ने सवाल किया।
‘‘क्योंकि वह अपने कॉलेज की तरफ से एक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आ रही हैं। उनके पास फालतू कामों के लिए बिल्कुल समय नहीं है।’’ मम्मी ने समझाया।
‘‘हम लोग दिन में कहानी थोड़े ही सुनेंगे।’’ मम्मी के बुद्धूपन पर पावस मुस्कराया-
‘‘पूरे दिन नानी अपने कार्यक्रम में भाग लें और रात को हमें कहानी सुनाएँ।’’

‘‘उन्हें कोई कहानी-वहानी नहीं आती है।’’ मम्मी ने धमकाया-‘‘अगर तुम लोग अभी से उन्हें तंग करने की योजना बना रहे हो, तो मैं अपनी माँ को यहाँ ठहरने ही नहीं दूँगी। जिस संस्था ने उन्हें बुलाया है, वहीं ठहरेंगी वे।’’
‘‘मम्मी, तुम हमारी खुशी से इतना जलती क्यों हो ?’’ निधि ने मुँह फुलाकर कहा, तो मम्मी को हँसी आ गई। उन्होंने लाड़ से अपनी दुलारी बिटिया का मुँह चूम लिया और बोली-‘‘यह भी खूब रही। मैं तुम लोगों से जलूँगी ?...भला क्यों ?’’
‘‘वजह तो हमें भी नहीं मालूम, पर जलती जरूर हो। तुमने हमें बहुत बार बताया है कि बचपन में अपनी नानी से जहाजी सिन्दबाद, अलादीन का चिराग, अनार शहजादी और अलीबाबा-चालीस चोर की कहानियाँ सुनी थीं। गर्मी की छुट्टियों में पूरे दो महीने के लिए अपनी ननसाल जाती थीं।..बताओ, यह बात सच है कि या नहीं ?’’ निधि ने तपाक से पूछा।
‘‘बात तो सच है।’’ मम्मी को मानना पड़ा।
‘‘और हम लोग पिछले तीन सालों में एक बार भी अपनी नानी के यहाँ नहीं गए हैं। हर बार छुट्टियों में किसी न किसी जरूरी काम की वजह से हमें यहीं रुकना पड़ा है।....बोली, यह बात भी सच है या नहीं ?’’
‘‘बात तो यह भी सच है।’’ मम्मी को फिर मानना पड़ा।
‘‘जैसे-तैसे तो सालों बाद हमें अपनी नानी मिलेंगी। उस पर भी हम उनसे कहानी न सुनें, यह तो हमारे साथ अन्याय है मम्मी।’’ पावस ने शिकायती आवाज़ में कहा।
मम्मी गम्भीर हो उठीं-‘‘ बच्चों, तुम लोग मेरी नानी से अपनी नानी की तुलना मत करो।
उन दिनों नानियों-दादियों के पास समय की कोई कमी नहीं थी। जाड़ों में बच्चों के साथ रजाई में घुसीं नानी और सर-सर-सर दौड़ चली उनकी कहानी। गर्मियों में बच्चों के साथ खुली छत पर चढ़ी नानी और अंत्याक्षरी, चुटकुलों, पहेलियों की होने लगी बारिश सुहानी।’’
‘‘और जब सचमुच झमाझम बरसने लगा पानी, तो बच्चों को कागज की नावें बनाकर थमाने लगीं नानी।...हैं न मम्मी ?’’ निधि चहककर बोली।

‘‘कमाल है। यहाँ तो पूरी कविता ही बन गई।’’ पावस रीझ उठा।
पर मम्मी कुछ सोचने लगी थीं। चुप थीं। एक ठंडी साँस लेकर जल्दी ही अपनी बात उन्होंने आगे बढ़ाई-‘‘आजकल बात दूसरी है। आजादी के बाद लड़कियों को पढ़ाने की जो जागृति आई, उसका अच्छा नतीजा आज सबके सामने है। आज की नानियाँ-दादियाँ मामूली घरेलू औरतें न रहकर टीचर, डाक्टर और अफसर हैं। उन पर ढेरों जिम्मेदारियाँ हैं, काम का भारी बोझ है। ऐसे में किस्से-कहानियाँ भला कैसे याद कह सकती हैं उन्हें ?’’
‘‘चलो, यही बात तय रही।’’ पावस जोश में आ गया-‘‘नानी को अगर कोई कहानी नहीं आती होगी, तो हम लोग उन्हें तंग नहीं करेंगे। पर मुझे पूरा यकीन है कि वह हमें कहानी जरूर सुनाएँगी।’’
‘‘खास बात तो हमें पता ही नहीं चली।’’ चुलबुली निधि उछलते हुए बोली-‘‘बताओ न मम्मी, नानी आएँगी कब ?’’
‘‘कल सुबह नौ बजे।’’ मम्मी मुस्कराई-‘‘लेकिन सामान रखकर, नहाना-धोना करके अपने काम पर निकल जाएँगी। तुम लोगों की शाम को ही उनसे मुलाकात होगी।’’
पूरा घर ‘‘नानीमय’ हो गया था। पापा अभी दफ्तर से नहीं आए थे।
‘‘नानी, आपके ऊपर काम का भारी बोझ रहता है क्या ?’’ अगली रात खाना-पीना हो जाने के बाद पावस ने पूछा।
‘‘और जिम्मेदारियाँ भी बहुत उठानी पड़ती हैं क्या ?’’ निधि भी सवाल पूछने में पीछे न रही।
‘‘बात क्या है ? अपना मतलब बताओ तुम लोग।’’ नानी मुस्कराईं।
‘बता देंगे जी, जल्दी क्या है ?’’ निधि शरारत से हँसी-‘‘अच्छा, सिर्फ यह बताइये कि क्या आप काम की वजह से सब कुछ भूल चुकी हैं ?’’

‘‘मतलब-कहानी, पहेलियाँ, चुटकुले वगैरह।’’ पावस ने बात को साफ-साफ समझाया।
‘‘मैं तुम्हारी बात का मतलब समझी नहीं।’’ नानी ने उलझन-भरी आवाज में कहा।
और तब निधि ने रहस्य खोल दिया-‘‘असल में हम लोग आपसे बढ़िया-सी कहानी सुनना चाहते हैं, पर मम्मी कहती हैं कि काम और जिम्मेदारियों की वजह से आप सब कुछ भूल चुकी हैं।’’
‘‘क्या सचमुच आपको कुछ भी याद नहीं रहा, नानी ?’’ पावस भी जानने के लिए बेचैन था।
‘‘कुछ कहानियाँ अभी भी याद हैं मुझे। और वे ऐसी कहानियाँ हैं, जो जीवन-भर मेरे मन में बसी रहेंगी, कभी भुलाई नहीं जा सकेंगी।’’ नानी बोलीं।
‘‘कौन-सी कहानियाँ हैं वे ?...परियों की ?’’ पावस ललचा उठा।
‘‘नहीं, महापुरुषों की। हमारे देश की मिट्टी में जन्म लेने वाले ऐसे लोक नायकों की, जिनके नाम इतिहास के पन्नों में अमर हैं, जिनकी गौरव-गाथाएँ युग-युग के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं।’’
बच्चे चौंककर नानी का चेहरा देखने लगे।
‘‘बोलो, किसी लोकनायक की कहानी सुनना चाहते हो तुम लोग ?’’ नानी मुसकराईं।
‘‘जी हाँ।’’ निधि और पावस ने फौरन एक साथ हामी भरी।
‘‘तो पहले मेरे कुछ सवालों का जवाब देना होगा।’’
‘‘पूछिए।’’ दोनों बच्चे तनकर बैठ गए।
‘‘कार्तिक पूर्णिमा को तुम्हारे स्कूल में छुट्टी होती है ?’’
‘‘जी हाँ। अभी दस-पन्द्रह दिन पहले ही तो कार्तिक पूर्णिमा थी।’’ निधि बोली।
‘‘उस दिन कौन-सा पर्व था ?’’
‘‘गुरुनानक जयन्ती।’’ पावस भी जवाब देने में पीछे न रहा।

‘‘यह पर्व तुम्हारे आस-पास किस तरह मनाया गया, कुछ बता सकते हो तुम लोग ? नानी ने अगला सवाल किया।
‘‘क्यों नहीं।’’ निधि मुस्कुराई-‘‘हमारे मुहल्ले में ही उस दिन बहुत रौनक रही थी। पहले मुँह अँधेरे प्रभातफेरी निकली। फिर गुरुद्वारे में गुरुवाणी का पाठ हुआ, प्रसाद बँटा। मीठे-मीठे भजन वहाँ दिन-भर गूँजते रहे। दोपहर में लंगर शुरू हुआ, जो शाम तक चला।’’
‘‘रात में प्रकाशोत्सव मनाया गया था, नानी।’’ पावस भी उत्साह से भरकर बताने लगा-
‘‘ऐसी जगमग रोशनी हो रही थी कि क्या कहूँ। दीवाली ही जैसे दुबारा आ गई थी।’’
‘‘शाबास।...बहुत समझदार हो तुम दोनों।’’ नानी मुस्कराईं।
‘‘आप हमें गुरु नानक की कहानी सुनाएँगी, नानी ?’’ निधि ने चमकते चेहरे से पूछा।
‘‘हाँ, बच्चो। मैं तुम्हें इसी लोकनायक के बारे में बताऊँगी।’’ नानी की आवाज में मिसरी जैसी मिठास घुल गई।-‘‘जैसा कि तुम जानते हो, गुरुनानक जयन्ती हमारा राष्ट्रीय पर्व है। पूरा देश इस दिन बड़े हर्ष-उल्लास के साथ गुरु नानक का जन्मदिन मनाता है। उनकी शिक्षाओं और उपदेशों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लेता है। उन्हें सच्चे मन से याद करता है।’’
निधि और पावस ध्यान से सुन रहे थे।
नानी आगे बोलीं-‘‘एक बात और है बच्चों। अपनी भारतमाता ऐसे महापुरुषों को उत्पन्न करके ही महान बनी है। शंकराचार्य, रामानुज, रामानन्द, कबीर, चैतन्य, नामदेव और नानक के नाम आज भी हम सबके लिए प्रेरणादायी हैं। इन महापुरुषों ने दसवीं से लेकर सोलहवीं शताब्दी तक एक ऐसा भक्ति आन्दोलन चलाया, जिसने पूरे समाज को सोते से जगाया। अज्ञान का अँधेरा मिटाकर ज्ञान की रोशनी फैलाई। गुरु नानक ने अपने शिष्यों से संसार छोड़ने को नहीं कहा। उनका कहना था कि अपने घरों में रहते हुए, रोज का काम-काज करते हुए भी भगवान को याद किया जा सकता है। उनकी ज्यादातर रचनाएँ गुरमुखी में हैं।’’

‘‘गुरु नानक की रचनाओं के बारे में कुछ बताइए नानी। हमें इस विषय में कुछ पता नहीं है।’’ निधि झिझकते हुए बोली।
‘‘गुरु नानक का स्वयं अपने हाथ से लिखा हुआ कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है।’’ नानी ने बताया-‘‘यद्यपि वे पढ़-लिखे थे, पर उनके मुँह से निकलने वाली वाणी को लिपिकों ने ही कागज पर उतारा था। उनकी सिद्धान्तपरक रचनाएँ हैं-जपु और सिघ गोसटि। उनकी लिपि परक रचनाएँ हैं-औंकार और पट्टी। उनकी काल परक रचनाएँ हैं-बारहमाहा और थिति। कुछ रचनाएँ छोटी आकार की हैं। कुछ फुटकर पद्य हैं। इनके अलावा तीन वार काव्य भी हैं-माझ, आसा तथा मलार।’’
‘‘आपको कितनी चीजें याद हैं, नानी।’’ पावस बहुत प्रभावित हुआ।
‘‘गुरु नानक की रचनाएँ ही नहीं, उनके जीवन की घटनाएँ भी बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। उन्होंने गुरु परम्परा शुरू की, जिसमें एक के बाद दूसरे गुरु को गद्दी मिलती रही। इस प्रकार दस निष्ठावान गुरूओं की छत्रछाया में समाज की उन्नति हुई।’’ नानी बोलीं।
‘‘नानी थकी हुई हैं। उन्हें अब आराम करने दो, बच्चों।’’ मम्मी ने कमरे में आकर अचानक अपना नादिरशाही हुक्म सुना दिया।
‘‘ऊँह, पहले कहानी।’’ निधि ठुनकी।
‘‘तुम यहाँ से जाओ न मम्मी।’’ पावस भी मचलते हुए बोला।
‘‘ठीक है, मैं जाती हूँ। लेकिन समय का ध्यान रखना।’’ कहती हुई मम्मी लौट गईं।
‘‘बच्चों, यह एक लम्बी कहानी है। मैं धीरे-धीरे कई दिनों में इसे पूरी करूँगी।’’
‘‘ठीक है नानी। आप इसे शुरू कर दीजिए। जितनी चाहे आज सुनाइए बाकी बाद में सुन लेंगे।’’ निधि समझदार बनकर बोली।
जैसे ही नानी ने कहानी शुरू की, निधि और पावस को लगा-अहा ! बात बन गई।

खरा सौदा


‘‘पाँच सौ साल से अधिक हुए, लाहौर (अब पाकिस्तान में) के पास तलवंडी नामक गाँव में बैसाख सुदी 3 संवत् 1526 यानी 15 अप्रैल 1469 को एक बच्चे ने जन्म लिया। उसके पिता का नाम मेहता कालू और माता का नाम तृप्ता था। पिता गाँव के पटवारी थे।’’
नानी की कहानी शुरू होते ही पावस कुछ परेशान दिखाई दिया।
‘‘क्या बात है बेटे ?’’ उसकी उलझने देखकर नानी ने पूछा।
‘‘हम सभी जानते हैं कि गुरु नानक का जन्म कार्तिक पूर्णिमा को हुआ था। फिर पन्द्रह अप्रैल की तिथि सही कैसे हो सकती है ?’’ पावस बोला।
‘‘सच कहते हो तुम’’ निधि भी चंचल हो उठी-‘‘आखिर गुरुनानक किसी एक दिन ही पैदा हुए होंगे।’’ ‘‘सचमुच गुरु किसी एक ही दिन इस धरती पर जन्मे होंगे।’’ नानी बोलीं-‘‘ लेकिन अपने भक्तों के हृदय में वे हर पल प्रकट होते हैं। इसीलिए कार्तिक पूर्णिमा के साथ गुरु नानक का जन्मदिन जोड़कर इस देश का जन-मानस यह अनुभव करता है कि उसके हृदय के आसमान में वे चाँद की तरह उगे और चारों ओर अपनी उजली रोशनी बिखेर दी। जन-मन के मन में गुरु नानक के समान कोई छोटी बात नहीं है बच्चों ! यह उनके प्रति हर व्यक्ति की श्रद्धा का सूचक है। इधर एक ज्योति-पुंज की भाँति गुरु नानक का जन-मानस में उदय और उधर कार्तिक की पूर्णिमा को चमकीले चाँद का नीले आसमान में उदय, कितना मधुर संयोग है। कोटि-कोटि मानव एक साथ गुरु को याद करके पुलक उठते हैं। किसी और तिथि में यह बात कैसे आ सकती थी ? इसीलिए सैकड़ों सालों से कार्तिक पूर्णिमा को ही गुरुनानक का जन्मदिन मनाने की लोक परम्परा चली आ रही है।’’
निधि और पावस पुलक उठे। उन्हें लगा-सच, कितनी अच्छी बात मालूम पड़ी है आज उन्हें।
नानी की कहानी आगे बढ़ी-

जैसा कि आम तौर पर हमारे घरों में होता है, बच्चे के जन्म पर खूब उत्सव मनाया जाता है, मंगलगान गाए जाते हैं, मेहता कालू के पुत्र जन्म पर भी घर में कई दिनों तक खुशियाँ मनाई गईं। माँ तो अपने बेटे का चाँद-सा मुखड़ा देखकर निहाल थीं। बड़ी बहन नानकी भी घर में छोटा भाई आया देखकर खुशी से मगन थी। उसे यह नाम ननिहाल में जन्म लेने के कारण दिया गया था। इसी से मिलता-जुलता नाम उसके भाई का रख दिया गया-नानक।
‘‘बच्चे के जन्म पर पुरोहित ने भविष्यवाणी की कि यह बड़ा होकर पूरे संसार में नाम कमाएगा। वास्तव में नानक दूसरे बच्चों से बिल्कुल अलग थे। कभी रोते नहीं। सदा मुस्कराते रहते। अपने आप खेलते रहते। थोड़ा बड़े हुए तो अपनी चीजें गरीबों और जरूरतमंद प्राणियों में बाँटने लगे। उनके इस विचित्र स्वभाव को देखकर पिता को बड़ा आश्चर्य होता। अक्सर वह डाँटते कि यह लड़का तो मेरी खून-पसीने की कमाई को यों ही उड़ा देगा। पर माँ और बहन नानक का पक्ष लेतीं और पिता के गुस्से से उन्हें बचातीं। ग्राम प्रधान रामबुलार भी नानक के प्रति बहुत स्नेह रखता था। छोटे से बच्चे के मुँह से कभी-कभी अकाल पुरुष (सर्व शक्तिमान ईश्वर) की बातें सुनकर पिता और ज्यादा चकरा जाते। उनकी समझ में नहीं आता कि यह बालक बड़ा होकर क्या करेगा ?
‘‘जब नानक सात साल के हुए तो उन्हें पढ़ने के लिए स्कूल भेजा गया। पढ़ाने वाले पंडित जी का नाम गोपाल था। पर अपने नए शिष्य के मुँह से ज्ञान की बातें सुनकर गोपाल पंडित हक्का-बक्का रह गए। हाथ जोड़कर बोले कि इस बच्चे को कुछ सिखाने की सामर्थ्य उनमें नहीं है। यही स्थिति संस्कृत सिखाने वाले गुरु ब्रजलाल की हुई। बाद में बच्चे को फारसी पढ़ने के लिए एक मौलवी के पास भी भेजा गया, पर वह भी अपने शिष्य के ज्ञान से चकित रह गए।
‘‘सचमुच नानक ने स्कूल से ज्यादा साधुओं और फकीरों की संगति में रहकर ज्ञानार्जन किया। वह तलवंडी के आस-पास के जंगलों में घूमते और जो भी तपस्वी एवं साधु मिलता, उससे कुछ न कुछ सीखते। पर बच्चे का यह अजीब आचरण पिता को पसंद न था। छोटे से नानक का कई-कई दिनों तक जंगलों में भटकना पिता कैसे सहन कर सकते थे ? लोगों की सलाह पर उन्होंने उसे पशुओं को चराने का काम सौंप दिया। नानक का चेहरा खुशी से चमक उठा। पशुओं से उन्हें बड़ा प्यार था। उस जंगल का खुला वातावरण भी उन्हें बहुत पसन्द था। वह मन लगाकर पशुओं को चराने लगे।

‘‘लेकिन यह काम अधिक दिन न चल सका। नानक अपनी धुन में डूबकर परमात्मा के ध्यान में खो जाते थे। एक दिन ऐसा ही हुआ और उनके पशुओं ने एक किसान के खेत में घुसकर फसल बरबाद कर दी। संयोग की बात, अचानक खेत का मालिक आ गया और गुस्से में भरकर उन्हें भला-बुरा कहने लगा। नानक मुस्कराए और बोले कि अगर बेजुबान पशुओं ने फसल की कुछ पत्तियाँ खा ही लीं, तो क्या हुआ। परमात्मा और देगा। पर नानक के माफी माँगने पर भी किसान का गुस्सा ठण्डा नहीं हुआ। शिकायत पिता तक पहुँची तो उन्हें किसान का हरजाना भरना पड़ा। बस, नानक का पशु चराना उसी दिन से बंद हो गया।
‘‘नानक जब नौ वर्ष के हुए, तो पिता ने उन्हें जनेऊ पहनाने की बात सोची। उसके लिए यज्ञोपवीत संस्कार का आयोजन किया गया। सभी रिश्तेदार बुलाए गए। दावत का इंतजाम हुआ। पर जैसे ही मंत्रो के पाठ के बीच पुरोहित ने जनेऊ पहनाना चाहा, नानक ने पहनने से इंकार करते हुए सवालों की बौछार कर दी-यह धागा दूसरे धागों से अलग कहाँ है ? इसमें विशेषता क्या है ? मामूली सूत का बना यह धागा पवित्र कैसे है ? मन में अपवित्र विचार भरे हों, तो केवल जनेऊ पहन लेने से क्या आदमी पवित्र बन जाएगा ? मुझे तो ऐसा जनेऊ पहनाइए, जो दया की कपास से और संतोष के सूत से बना हुआ हो, जो न कभी टूटे, न मैला हो, न जले, न नष्ट हो और जो मरने के बाद आत्मा के साथ जाए।
‘‘ऐसा जनेऊ भला कहाँ मिल सकता था ? बस, नानक ने रस्म निभाने से इंकार कर दिया और वहाँ से उठकर चले गए।
‘‘पशुओं का चराना तो छूट ही चुका था, नानक अब सारा दिन साधुओं और फकीरों की संगति में रहते अथवा घर पर चुपचाप पड़े रहते। पिता के लाख समझाने पर भी वह न खेती करने के लिए तैयार हुए और न व्यापार के लिए। उन्होंने साफ कह दिया कि मैं तो केवल सच्ची खेती करना चाहता हूँ। पिता कुछ समझे नहीं तो उन्होंने बताया कि सच्ची खेती का मतलब है, मन को हल बनाकर शरीर से जोतिए। उनमें जप-तप का पानी डालिए। ईश्वर के नाम का बीज बोइए। तभी प्रेम की फसल उगेगी। यही सच्ची खेती होगी। पिता की समझ में भला ऐसी बातें कहाँ आ सकती थीं ? वह बहुत नाराज हुए।
‘‘जब कोई चारा न रहा तो माता-पिता ने नानक का विवाह कर दिया। इस समय उनकी उम्र चौदह साल थी। उनकी पत्नी का नाम सुलक्खनी था। पर विवाह के बाद भी नानक अपना लक्ष्य नहीं भूले। उनका मन अभी भी ईश्वर के प्रेम में लगा रहता था। जंगलों में भटकते। खाना-पीना छोड़कर कई-कई दिन घर पर पड़े रहते। उनकी यह हालत देखकर माता-पिता को बहुत चिंता हुई। समझा गया कि उन्हें कोई बीमारी हो गई है। वैद्य बुलाया गया। पर जैसे ही वैद्य ने नाड़ी देखनी चाही, नानक ने मुस्कराकर अपना हाथ पीछे खींच लिया और बोले-

वैदु बुलाइया वैदगी पकड़ि ढ़ढोले बाँहि।
भोला वैदु न जाणई करक कलेजे माँहि।

अर्थात् असली दर्द मेरे कलेजे में है और आप नाड़ी देखकर रोग पहचानना चाहते हैं।
‘‘बहुत ऊबकर एक दिन पिता ने नानक को बीस रुपये दिए और प्यार से समझाया-‘बेटा, अब तुम बड़े हुए। तुम्हारी पत्नी है, जिम्मेदारी है। कुछ कमाओगे नहीं, तो कैसे काम चलेगा ?’
‘‘ ‘आप आदेश दें, मैं पालन करूँगा।’ नानक हमेशा की तरह हाथ जोड़कर बोले।
‘‘ ‘बाजार जाकर इन बीस रुपयों से खाने-पीने का सामान खरीद लाओ और तलवंडी में बेचो।’ पिता ने कहा।
‘‘नानक पर भरोसा तो था नहीं, इसलिए पिता ने बाला नामक उनके एक साथी को भी साथ भेज दिया। चलते समय फिर याद दिलाया-‘देखो, खरा सौदा करना।’
‘‘नानक ने सिर हिलाकर स्वीकार कर लिया।
‘‘जंगल के बीच से निकलते हुए उन्हें कुछ भूखे साधु दिखाई दिए। पूछने पर पता चला कि वे किसी से कुछ माँगते नहीं हैं। यदि कोई अपने आप दे दे तो ठीक, नहीं तो भूखे रहकर तपस्या करते हैं।
‘‘नानक ने बाजार जाकर भोजन खरीदा और लाकर साधुओं को भरपेट खाना खिला दिया। इसके बाद बाला को घर भेजकर वह घर से बाहर पेड़ों के नीचे खड़े हो गए। बाला के मुँह से सारी बातें सुनकर मेहता कालू बहुत बिगड़े। नानक के पास आकर उन्हें डाँटने-डपटने लगे। पर नानक शान्त आवाज में सिर्फ यही बोले-‘आपने ही तो खरा सौदा लाने को कहा था। साधुओं की सेवा से बढ़कर खरा सौदा और क्या हो सकता है ?’’ ’

‘‘कितनी अच्छी कहानी है।’’ निधि खुश होकर बोली।
‘‘आज यहीं तक। बाकी कल।’’ नानी मुस्कराई।
‘‘जी।’’ निधि और पावस ने एक साथ कहा और उठकर अपने-अपने बिस्तर की ओर बढ़ गए।
लेटते समय निधि सोच रही थी-अच्छा, उसने भी कभी कोई ‘खरा सौदा’ किया है ? हाँ, याद आया। उड़ीसा के समुद्र-तट पर पिछले साल कितना भयानक तूफान आया था। सैकड़ों गाँव उसकी लपेट में आ गए थे। उस समय ‘तूफान राहत कोष’ के लिए उसने अपनी गुल्लक खाली कर दी थी। बहुत दिनों से सोच रखा था, इन रुपयों से मोतियों की माला लेगी। पर तूफान पीड़ितों की हालत को टेलीविजन पर देखकर और अखबारों में पढ़कर इतनी द्रवित हुई कि एक-एक पैसा उनके लिए दे दिया था। शायद यह भी एक ‘खरा सौदा’ था। उसके पैसों का सबसे अच्छा उपयोग।
उधर पावस महाशय भी अपने पलंग पर लेटे हुए सोच रहे थे-पिछली बार रेडक्रास दिवस पर कुछ लड़के क्लास में चंदा माँगने आए थे। लड़ाई में हताहत होने वाले सैनिकों के परिवारों के लिए अपनी खुशी से सबको चंदा देना था। उस दिन जेब में दस रुपए का एक नोट रखा होने पर भी वह झूठ बोल गया कि मेरे पास कुछ नहीं है। अपनी चालाकी पर बड़ी खुशी हुई थी। उन्हीं रुपयों से छुट्टी के बाद आइसक्रीम खाई थी उसने। छिः, कितना गन्दा बच्चा है वह। ‘खरा सौदा’ करने का एक मौका हाथ आया था, उसे अपनी मूर्खता से गँवा दिया।...खैर, कोई बात नहीं। अपनी भूल का प्रायश्चित्त करेगा वह। इस बार रेडक्रास दिवस पर अंशदान जरूर देगा। घर से याद करके रुपए ले जाएगा।
सोचते-सोचते पता नहीं, कब दोनों बच्चे सो गए। सपने में भी उन्हें वही दिखता रहा-खरा सौदा !

सच्ची पूजा


अगली रात खाना-पीना हो जाने के बाद पावस ने भोलेपन से पूछा-‘‘क्यों नानी, पिता के दिए बीस रुपयों से जब नानक ने साधुओं को भोजन करा दिया, तो उनको बहुत डाँट पड़ी थी ?’’
नानी समझ गई, दोनों बच्चे लोकनायक नानक की कहानी सुनना चाहते हैं।
‘‘हाँ, पड़ी तो जरूर थी।’’ मुस्कराते हुए उन्होंने बताया।
‘‘फिर क्या हुआ ?’’ निधि बोली।
और नानी की कहानी आगे बढ़ चली-‘‘ मेहता कालू का गुस्सा देखकर यह सोचा गया कि नानक को कहीं दूर भेज दिया जाए। न वह पिता के सामने पड़ेंगे, न उनकी डाँट-डपट की नौबत आएगी। ऐसे में सबको नानकी की याद आई। नानकी, यानी नानक की बड़ी बहन। वह अपने छोटे भाई को प्यार भी तो बहुत करती थी। अब तक उसकी शादी जयराम के साथ हो चुकी थी। जयराम सुलतानपुर के नवाब दौलत खां लोधी के दरबार में दीवान था।
‘‘नानक के पहुँचने पर नानकी सचमुच बहुत खुश हुई। जयराम ने दरबार में ले जाकर उन्हें नवाब से मिलवाया। नवाब ने उन्हें मोदी खाने का भंडारी बना दिया। यहाँ खाद्यान्न के रूप में लगान जमा किया जाता था।
‘‘नानक ने बड़ी मेहनत और ईमानदारी से अपना काम शुरू कर दिया। सुल्तानपुर में उनकी दिनचर्या इस प्रकार थी-वह सूर्योदय से सवा घंटे पहले उठते, बेई नदी में स्नान करते और फिर काफी देर तक ईश्वर के ध्यान में डूबे रहते। इसके बाद मोदीखाने का काम-काज देखते और दोपहर में भोजन के लिए घर जाने के अलावा सारा दिन वहीं रहते। हर रात वह सबद (तत्त्वयुक्त वाणी) बोलते और जो भी दरवाजे पर आता, उसे खाना खिलाते।

‘‘गुरु नानक की पत्नी उनके साथ आकर रहने लगी थी। उनके दो पुत्र हुए-श्रीचन्द्र व लख्मीचन्द। नानक का जीवन बड़ा सुख-शान्ति से बीतने लगा। उधर नवाब का उन पर पूरा भरोसा था, इधर पत्नी घर को भली-भाँति सँभाल रही थी। उन्हें जितना वेतन मिलता, उसमें से कुछ घर खर्च के लिए छोड़कर बाकी वह जरूरतमन्दों में बाँट देते। इस समय तक बचपन का साथी मरदाना भी उनके पास आकर रहने लगा था। यह मरदाना रबाब बड़ा अच्छा बजाता था। नानक जब सबद बोलते, मरदाना रबाब बजाता।
‘‘गुरु नानक का जीवन अब बहुत सुखमय हो गया था। उनकी ईमानदारी देखकर नवाब खुश था। इससे पहले इस पद पर जितने लोग आए, वे सभी बेईमान थे और अपने स्वार्थ के कारण राज्य की हानि करते थे। पर नानक की बढ़ती प्रतिष्ठा देखकर कुछ दरबारियों को जलन हुई। कट्टर धार्मिक विचारों की वजह से भी उन्हें नानक की धर्मप्रियता से चिढ़ थी। इन लोगों ने झूठी शिकायत कर दी कि मोदीखाने से अन्न की चोरी करके भंडारी लोगों को बाँटता है। नवाब ने जाँच का आदेश दिया पर कहीं कोई कमी न निकली। हिसाब किताब बिल्कुल ठीक था। गरीबों और जरूरतमंदों को अनाज बँटता जरूर था, पर नानक अपने वेतन का एक बड़ा हिस्सा ही उनमें बाँटते थे। अतः कहीं कोई कमी न निकलने पर विरोधियों को नीचा देखना पड़ा। गुरु नानक अपने पद पर पहले की भाँति ही सम्मानपूर्वक काम करते रहे।

‘‘लेकिन महामानव सामान्य मनुष्यों की तरह केवल खाने और सोने के लिए इस संसार में नहीं आते हैं। नानक भी बेचैन होने लगे। उन्हें बोध (ज्ञान) हुआ और सतनाम (ईश्वर का नाम) के प्रचार को अपना लक्ष्य बनाकर वह अपने कर्तव्य को पूरा करने में जुट गए। यह ज्ञान उन्हें कैसे प्राप्त हुआ, इसे लेकर अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं।’’
‘‘किंवदंदियाँ किसे कहते हैं, नानी।’’ अचानक पावस पूछ उठा।
‘‘किंवदंती का अर्थ है-अफवाह, लोक में फैली काल्पनिक कहानियाँ।’’ नानी ने बताया।
‘‘जी।’’ दोनों बच्चों ने सिर हिला दिया।
‘‘कुछ लोग कहते हैं कि नानक एक दिन रोज की तरह बेई नदी में नहाने गए और जल में उतरने के बाद काफी समय तक बाहर नहीं आए। उनके साथ गया नौकर जब इंतजार करते करते थक गया तो उसने घर जाकर खबर कर दी कि नानक नदी में डूब गए हैं। घर में रोना-पीटना मच गया। दुश्मनों ने फिर कहना शुरू किया कि मोदीखाने में बेईमानी करने के कारण ही नानक ने आत्महत्या कर ली है। एक बार फिर सामान की जाँच हुई, पर कोई कमी न निकली सब लोग हैरान थे, नानक कहाँ गए ? गोताखोरों ने पानी में बहुत तलाशा, पर उनका कोई पता न चला। हुआ यह था कि पानी में डुबकी लगाते ही परमात्मा के दूत उन्हें अपने साथ ले गए और अकाल पुरुष (ईश्वर) से उनकी भेंट हुई। उन्हें एक प्याला अमृत पीने को दिया गया और कहा गया कि धर्म प्रचार के अपने मिशन को पूरा करो।


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