राम कथा - प्रभाशंकर उपाध्याय Ram Katha - Hindi book by - PrabhaShankar Upadhyay
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राम कथा

प्रभाशंकर उपाध्याय

प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :64
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 506
आईएसबीएन :81-237-0509-3

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नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित नेहरू बाल पुस्तकालय की बच्चों के लिए एक सचित्र रोचक पुस्तक

Ram Katha - A hindi Book by - Hansa Mehta राम कथा - हंसा मेहता

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

राम का जन्म और विवाह

बहुत समय पहले की बात है। सरयू नदी के किनारे अयोध्या नाम की एक सुन्दर नगरी थी। नदी के किनारे स्थिति राजमहल, वन, उपवन तथा लहलहाते खेत उसकी लहरों के साथ अटखेलियाँ किया करते थे। दशरथ अयोध्या के राजा थे। उनके तीन रानियाँ थीं, कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी। मँझली रानी कैकेयी राजा की चहेती थी।
महान वैभवशाली और यशस्वी होते हुए भी राजा दशरथ निस्संतान होने के कारण बहुत दुखी थे। उनको बहुत चिंतित देखकर एक दिन वशिष्ठ मुनि ने उनसे कहा, ‘‘राजन्, आप पुत्रेष्टि यज्ञ करें तो आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी।’’
यज्ञ पूरा हुआ और तीनों रानियाँ पुत्रवती हुईं। कौशल्या ने चैत्र की नवमी के दिन राम को जन्म दिया। उसके कुछ समय बाद कैकेयी ने भरत और सुमित्रा के लक्ष्मण और शतुघ्न पैदा हुए। अयोध्या में धूम मच गयी।

चारों ओर खुशी मनायी गयी। राजा दशरथ ने गरीबों को अन्न, वस्त्र और धन दान में दिया।
चारों राजकुमार बाग-बगीचों और राजमंहल में साथ –साथ खेलने-कूदने लगे। उनमें आपस में बहुत प्रेम था और राम को अपना नेता मानते थे। राम और लक्ष्मण सदा साथ रहते थे। और इधर भरत शत्रुघ्न। राजा दशरथ को चारों राजकुमारों में राम सबसे अधिक प्रिय थे।

जब राजकुमार कुछ बड़े हुए तो उन्हें शस्त्रों तथा युद्ध-विद्या का ज्ञान कराया गया।
राजकुमारों की अवस्था लगभग सोलह वर्ष की हुई, तो एक दिन राजा दशरथ के दरबार में मुनि विश्वामित्र का आगमन हुआ। एक समय विश्वामित्र स्वयं बहुत बड़े शक्तिशाली राजा थे, लेकिन राजपाट को तिलांजलि देकर उन्होंने संयास ले लिया था। राजा दशरथ ने विश्वामित्र मुनि का विधिवत आदर-सत्कार किया।
‘‘आपके दर्शन कर मैं कृतार्थ हुआ। आज्ञा दें, आपकी क्या सेवा करूँ ? आपकी इच्छा पूरी करके मैं अपने आप को धन्य समझूँगा।’’

मुनि विश्वामित्र बोले, ‘‘राजन जिसकी मुझे आवश्यकता है उसे देना आपके लिए इतना आसान नहीं होगा।’’
राजा दशरथ ने अभिमान के साथ उत्तर दिया, ‘‘गुरुदेव मैं आपकी इच्छा पूरी करने के प्रयत्न में कुछ भी उठा नहीं रखूँगा। आप आज्ञा दें, मुनिवर।’’ मुनिवर थोड़ा मुस्कराये और बोले, ‘‘मैं तुम्हारे राम को माँगने आया हूँ। मेरी इच्छा है कि वह राक्षसों का विनाश कर दे जो मुझे बहुत कष्ट दे रहे हैं। जिस यज्ञ को पूरा करने का मैंने संकल्प किया है, उसमें विघ्न डालते हैं।’’

राजा दशरथ स्तब्ध रह गये, ‘‘राम ? राम को दे दूँ ? लेकिन राम तो अभी पूरे सोलह साल का भी नहीं, वह कैसे भयंकर राक्षसों से युद्ध कर सकेगा ? इससे तो यही अच्छा होगा मैं स्वयं ही आपके साथ चलूं, या अपनी सेना भेज दूँ। मुनिश्रेष्ठ, मेरे राम को छोड़कर आप जो चाहें माँग लें।

विश्वामित्र भभक उठे, ‘‘आप वचन देकर पीछे हट रहे हैं, राजन्। मैंने कुछ असंभव तो माँगा नहीं। यदि मैंने संन्यास न ले लिया होता तो मैं स्वयं ही सभी दुष्ट राक्षसों का संहार कर सकता था।’’
अनिष्ट की आशंका समझ, गुरु वशिष्ठ ने दशरथ को समझाया, ‘‘राजन् आपको अपना वचन पूरा करना चाहिए, जैसी कि आपके वंश की परंपरा रही है। आप चिंता न करें मुनि विश्वामित्र के होते हुए राम का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। इसके अलावा राम इनसे अनेकों नयी विद्याएं भी सीख सकेंगे।

खिन्न मन से दशरथ को उनकी बात माननी पड़ी, लेकिन उन्होंने विनती की कि राम के साथ लक्ष्मण को भी जाने दिया जाये।
दोनों राजकुमारों ने अपने माता-पिता से विदा ली और विश्वामित्र के साथ बीहड़ और भयानक जंगलों में जाने के लिए निकल पड़े।

‘‘यही वह जंगल है जहां राक्षसी ताड़का रहती है,’’ मुनि विश्वामित्र ने कहा, ‘‘इस दुष्ट ने आस-पास के सभी प्राणियों को मार डाला है और आने जाने वाले यात्रियों पर अचानक आक्रमण कर देती है। इसे जीने का कोई अधिकार नहीं। इसे मार डालो और इस स्थान के निवासियों को भंयमुक्त करो ।’’

ये लोग अभी बातें कर ही रहे थे कि अचानक जंगल से निकल कर ताड़का अट्हास करती हुई उनके ऊपर टूट पड़ी। राम और लक्ष्मण उससे जूझ पड़े और उसका वध कर डाला। विश्वामित्र बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने राम और लक्ष्मण को नये अस्त्र-शस्त्र दिये तथा उनका प्रयोग करने की विधि भी बतलायी। अंत में वे विश्वामित्र के निवास सिद्धाश्रम में पहुँचे।


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