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मनोरंजक कथाएँ >> खुशियों का गाँव

खुशियों का गाँव

दिनेश चमोला

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 1998
पृष्ठ :32
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5084
आईएसबीएन :81-7043-372-x

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इसमें चार बाल कहानियों का उल्लेख किया गया है....

Khushiyon Ka Ganav-A Hindi Book by Dinesh Chamola

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

खुशियों का गाँव

मैनगाँव में एक बुढ़िया रहती थी। वह बहुत गरीब थी। लेकिन वह बहुत दयालु व परोपकारी थी। बुढ़िया का घर गाँव से अलग था। आस-पास में फल-फूलों के कई पेड़ थे जहाँ कई प्रकार के जीवन-जन्तु व पक्षी बसेरा करते। पशु-पक्षी बुढ़िया से बहुत प्रेम करते। गाँव के बच्चे रोज बुढ़िया से कहानी सुनने आया करते। बुढ़िया उन्हें फलों के पेड़ों के नीचे सुन्दर-सुन्दर कहानियाँ सुनाती। बच्चे बुढ़िया को ‘’कहानी दादी’ कहते। बच्चे हैरान होते जब ‘कहानी दादी’ कहानी सुनाती व बच्चों के साथ पेड़ों पर के पक्षी व सामने पशु आकर खामोशी से बैठ जाते। बस, जीव-जन्तुओं व बच्चों की चहेती थी दादी। अब कभी दादी गाँव से किसी काम से कुछ दिन के लिए बाहर जाती तो बच्चे व पशु-पक्षी उदास हो उठते। वे उसके आने की बाट जोहते रहते। बुढ़िया उन सभी से बहुत प्रेम करती थी। यह खुशियों का गाँव था जहाँ सभी प्रकृति, जन्तु एवं प्राणी खुश रहते थे।

कभी-कभी बुढ़िया यह सोच बहुत दुखी होती कि उसके मरने के बाद उसके इतने बड़े घरबार को कौन देखेगा। वह कितना श्रम करता है फिर भी इतनी गरीब क्यों है ? जब वह मर जाएगी इतनी फूल-प्रकृति, पशु-पक्षी व बच्चों को फिर कहानी कौन सुनाएगा ? यह सोच बुढ़िया बहुत उदास होती। वह कई दिनों तक भूखी रह लेती लेकिन बच्चों व पशु-पक्षियों से बतियाये बिना नहीं रह सकती। एक दिन बुढ़िया बहुत-सी बातें सोचकर उदास थी। उसने शाम का खाना बनाया व दुखी हो सारा खाना फर्श पर पशु-पक्षियों के लिए बिखरा दिया। वह घुटनों पर सिर रखकर कुछ सोच रही थी। तभी एक सुन्दर तोता उड़ता हुआ उसके फूलों वाले पेड़ पर आया और उसने कहा—

‘‘नमस्ते, दादी, आप दुखी क्यों हो ? क्या आप मेरे साथ सोनगुफा चलोगी ? आपने जीवन-भर इतना श्रम किया है लेकिन आप फिर भी बहुत गरीब हैं। वहाँ एक अजीब दुनिया है, इस संसार से अलग। दादी, वहाँ आज सोन देश की महारानी आई हैं। वे आपकी कहानी सुनेंगी तो बहुत प्रभावित होंगी व आपको धन-सम्पति से लाद भी देंगी...तो क्या चलोगी दादी जी ?’’


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