धर्मयुद्ध - महेन्द्र मित्तल Dharmyuddh - Hindi book by - Mahendra Mittal
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धर्मयुद्ध

महेन्द्र मित्तल

प्रकाशक : ग्लोबल एक्सचेंज पब्लिशर्स प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :176
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5110
आईएसबीएन :978-81-904837-0

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अशोक कालीन एक ऐतिहासिक उपन्यास...

Dharmyudh

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मेरा साक्ष्य

कलिंग के महाविनाशक युद्ध के उपरान्त, भीषण नर-संहार से त्रस्त और दुःखी होकर सम्राट् अशोक का हृदय द्रवीभूत होकर युद्ध से विमुख हो गया था। इतिहासकार उसे सम्राट् अशोक का हृदय-परिवर्तन मानते हैं। बौद्ध ग्रन्थों में भी सम्राट् अशोक के हृदय परिवर्तन के प्रसंग का खुलकर उल्लेख हुआ है। ऐसा भी कहा जाता है कि इस युद्ध के उपरान्त ही सम्राट् अशोक ने अपना समस्त जीवन बौद्ध-धर्म के प्रचार-प्रसार में लगा दिया था। उन्होंने मैत्री-सन्देश, बौद्ध-धर्म के सिद्धान्तों की मंजूषा में भरकर ही देश-विदेश में भेजे थे। इसके लिए उन्होंने अपने पुत्र और पुत्रियों को भी बौद्ध धर्म में दीक्षित करके विदेशों में भेजा। जामाता देवपाल और पुत्री चारुमती को नेपाल, पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा तथा जामाता व भागिनेय अग्निब्रह्म को ताम्रपर्णी (श्रीलंका) भेजा गया था। सम्राट् अशोक के ज्येष्ठ पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा तथा भागिनेय व जामाता अग्निब्रह्म की ताम्रपर्णी यात्रा से पूर्व मगध-साम्राज्य में, धर्म के नाम पर होने वाली गतिविधियाँ ही, ‘धर्मयुद्ध’ उपन्यास का प्रतिपाद्य विषय है।

सम्राट् अशोक ने अपने धर्म प्रयासों को ‘धर्म विजय’ का नाम दिया है, जबकि मेरी दृष्टि में यह एक ऐसा धर्मयुद्ध था, जिसमें भले ही रक्त की नदियाँ न बहाई गई हों, किन्तु धर्म-प्रचार के नाम पर सम्राट् अशोक ने अपने निजी परिजनों की भावनाओं और अस्मिता की उपेक्षा अवश्य की थी। भरपूर यौवन काल में संघमित्रा का अपने सुखमय गार्हस्थ्य-जीवन का परित्याग, उसकी विवशता को ही प्रकट करता है।

इस सन्दर्भ में यह तथ्य दृष्टव्य है कि सम्राट् अशोक ने अपने जीवनकाल में कभी भी बौद्ध धर्म स्वीकार नहीं किया था। अपनी राजनीतिक महत्त्वकांक्षाओं की पूर्ति हेतु उसने यदि बौद्ध-धर्म का संरक्षक बनना स्वीकार किया था, तो दूसरी ओर बौद्ध-धर्म को भी अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के लिए, राज्य संरक्षण की आवश्यकता थी। इसलिए दोनों ही एक-दूसरे से अपनी स्वार्थ-सिद्धि हेतु लाभ उठा रहे थे।

भगवान गौतम बुद्ध के निर्वाण-प्राप्ति के लगभग सौ वर्ष पश्चात् बौद्ध-धर्म में दो विरोधी विचारधाराएँ पनपने लगी थीं और बौद्ध संघ अनाचर तथा विलासिता के गढ़ बनते चले जा रहे थे। बुद्ध की शिक्षाएँ और उनके पवित्र सिद्धान्त, भिक्षुओं के मध्य नाममात्र को रह गए थे। धर्म संघ निजी स्वार्थों की पूर्ति के केन्द्र बन गए थे। सभी की दृष्टि संघ की शक्तियों के उपभोग की ओर लगी हुई थी। इन बौद्ध संघों में उत्तरी बौद्ध संघ के भिक्षु स्थविर कहलाते थे और बुद्धत्व की प्राप्ति के लिए उद्योग तथा साधना को प्रमुख स्थान देते थे, जबकि दक्षिणी बौद्ध संघ के भिक्षु ‘महासांघिक’ कहलाते थे और बुद्धत्व की प्राप्ति के लिए जन्म को ही आधार मानते थे। इसके ग्रन्थ क्रमशः महायान और हीनयान के नाम से प्रसिद्ध हुए।

उस काल में उत्तरी बौद्ध संघ का अध्यक्ष-पद सम्राट् अशोक के ज्येष्ठ पुत्र आचार्य महेन्द्र के पास था और दक्षिणी बौद्ध संघ का अध्यक्ष पद महाधर्म रक्षित मौग्गलिपुत्त तिस्स के पास था। मगध-साम्राज्य में तथा आस-पास के क्षेत्रों में सभी धर्मों पर दक्षिणी बौद्ध संघ के महासांघिक बौद्धों का सर्वाधिक अधिकार और वर्चस्व था। जबकि सम्राट् अशोक सबसे अधिक इसके आचार्य तिस्स को ही अपने निकट मानता था। यद्यपि उस समय सम्राट् की मंत्री परिषद् चन्द्रगुप्त सभा में ब्राह्मणों का वर्चस्व था। परन्तु उन पर अंकुश रखने के लिए सम्राट् अशोक को इन महासांघिक बौद्धों की विशाल धर्म-शक्ति की सर्वाधिक आवश्यकता थी। इसलिए वह अपने सारे निर्णय आचार्य तिस्स की सलाह पर ही लेता था। साथ ही वह अपने स्वतन्त्र अस्तित्व को भी अत्यधिक चतुराई से बनाए रखता था।

उसका निरंकुश राजतन्त्र ‘चन्द्रगुप्त-सभा’ और ‘बौद्ध संघ’ दोनों पर अपना अंकुश रखता था। वह संघ के साथ सदैव एक राजा के अधिकार भाव से ही बर्ताव करता था, न कि समर्पण के दैन्य भाव से। सम्राट् अशोक ने बौद्ध-धर्म के प्रचार-प्रसार के नाम पर जो शिलालेख उत्कीर्ण कराए थे, उनमें बौद्ध-धर्म के सिद्धान्त न होकर, परम्परा से चली आ रही भारतीय संस्कृति की आचार-संहिता मात्र है। जिनमें सभी धर्मों का सार तत्त्व विद्यमान है। वह कहता है-‘‘माता-पिता गुरुजन, आचार्य,, संन्यासी, दास, निर्धन, दुःखी आदि...सभी के प्रति आदर और स्नेह का भाव रखना चाहिए। हिंसा में संयम बरतना चाहिए और गृहस्थ-जीवन को शुद्ध और पवित्र रखना चाहिए।’’

यह एक अच्छी शिक्षा थी जो कि परम्परा से भारतीय-संस्कृति का अंग रही है। परन्तु मुझे लगता है कि राजनीति और धर्म की तत्काल नीतियों के मध्य, धार्मिक परितुष्टि की आड़ में, सम्राट् अशोक की राज्य सत्ता द्वारा संघमित्रा की भावनाओं के साथ गहरा छल किया गया है, जिसके कारण ही मैंने इस धर्मविजय को धर्मयुद्ध का नाम दिया है। इस धर्मयुद्ध में हिंसा नहीं है, पर हिंसात्मक वृत्तियाँ आवश्य कहीं-न-कहीं उजागर हुई हैं। यह मेरी अपनी परिकल्पना है। आपको यह कहां तक उचित लगी, इससे मुझे अवश्य अवगत कराएँ। आभारी हूँगा।

डॉ. महेन्द्र मित्तल

एक

पाटलिपुत्रवासियों के लिए आज का दिन किसी महोत्सव से कम नहीं था। पूरा नगर तोरणद्वारों और फूलों से सजाया गया था। जगह-जगह इत्र का छिड़काव किया गया था और लोगों के लिए राजपथ पर जल से भरे कलश भी रखवाए गए थे। पूरे राजपथ को दोनों ओर से बाँसों की बाड़ से घेरा गया था। जगह-जगह सशस्त्र सैनिक सतर्क खड़े किए गए थे। सुनने में आ रहा था कि अहोगंग पर्वत से कोई विशिष्ट अतिथि नगर में आने वाला है, जिसे स्वयं सम्राट् महेन्द्रू घाट पर लेने जाएँगे।
दोपहर होते ही सारा राजपथ नगरवासियों से भर उठा। लोगों के हाथों में फूलों से भरी डालियाँ और मालाएँ थीं। सभी के चेहरों पर एक अजीब सा उत्साह और कौतूहल दिखाई दे रहा था। बच्चों की किलकारियाँ और स्त्री-पुरुषों का वार्तालाप वातावरण में गूंज रहा था।

उसी समय कुछ सशस्त्र घुड़सवार राजपथ पर दौड़ते हुए आए और आगे निकल गए। भीड़ में खड़े दो प्रतिवेदक (गुप्तचर) प्रभंजक और तक्षक ने उन्हें देखा और सतर्क हो गए। उनकी भाँति न जाने कितने अन्य प्रतिवेदक भी नगरवासियों की वेशभूषा में, भीड़ के मध्य विचरण कर रहे थे।
‘‘लगता है महाराज की सवारी आने वाली है।’’ प्रभंजक ने धीरे से तक्षक से कहा।
‘‘हूँ ! संकेत तो यही कह रहे हैं।’’ तक्षक बोला।
उसी समय दूर से महाराज की जय का तुमुल घोष सुनाई दिया, जो शनैः-शनैः पास आने लगा।
‘‘अरे यह क्या ?’’ सहसा प्रभंजक के मुख से निकला।

चौंककर तक्षक ने भी उस ओर देखा, जिधर वह देख रहा था। उसने देखा, राजपथ पर महामात्य (प्रधानमन्त्री) महाबलाधिकृत सेनापति और सशस्त्र अंगरक्षकों से घिरे सम्राट अशोक पैदल ही राजपथ पर चले आ रहे हैं। लोग उन पर फूल बरसा रहे हैं और जय-जयकार कर रहे हैं। सम्राट् विनम्रता से अपने दोनों हाथों को जोड़कर, उन्हें ऊपर उठाते हुए उनका अभिवादन स्वीकार कर रहे हैं। प्रौढ़ावस्था में भी उनके श्यामल चेहरे पर एक अजीब सी तेजस्विता विराजमान है। उनकी मन्द-मन्द मुस्कान और गजराज की भाँति मदमस्त चाल, उनके अद्भुत और शक्तिशाली स्वरूप को प्रकट कर रही है।
सशस्त्र अंगरक्षकों की टुकड़ी के पीछे घुड़सवार अंगरक्षकों की एक टुकड़ी से घिरा स्वर्ण खचित एक रथ, सशक्त श्वेत धवल अश्वों द्वारा मन्थर गति से हाँका जा रहा है।
‘‘रथ के होते हुए भी महाराज पैदल ?’’ सहसा तक्षक के मुख से निकला।

तभी भीड़ में से किसी ने कहा-‘‘धन्य है वह अतिथि, जिसके स्वागत के लिए मगध सम्राट् अशोक आज पैदल ही जा रहे हैं।’’
‘‘कौन है वह अतिथि ?’’ तभी एक दूसरे व्यक्ति ने उससे पूछा।
‘‘मुझे नहीं मालूम। कोई बड़ा आदमी ही होगा।’ उस पहले वाले व्यक्ति ने उत्तर दिया।
‘‘कितने मूर्ख हैं ये लोग !’’ उसी क्षण धीरे से प्रभंजक फुसफुसाया-‘‘डौंड़ी पिटवाने के बाद भी ये नहीं जान सके कि महासांघिकों के महान नेता महाधर्मरक्षित मौग्गलिपुत्त तिस्स आज राजधानी में पधार रहे हैं।’’
तक्षक ने धीरे से प्रभंजक को टोहका मारा और कहा-‘‘धीरे बोलो प्रभंजक ! पाटलिपुत्र की अधिकांश जनता पर अभी भी ब्राह्मणों और उनके प्रमुख नेताओं के बारे में, ये कुछ नहीं जानते।’’

‘‘जानते नहीं तो जय-जयकार क्यों कर रहे हैं ?’’ प्रभंजक ने त्योरियाँ बदलीं-‘‘उनके स्वागत में यहां एकत्र क्यों हुए हैं ?’’
‘‘स्वागत-सत्कार और जय-जयकार मगध सम्राट् का हो रहा है।’’ तक्षक ने धीरे से कहा-‘‘जो अभी सामने है, दर्शन करने की उत्कण्ठा उसी के लिए है। जो आने वाला है, उसे अभी किसी ने देखा नहीं है, जाना भी नहीं है। यह सारी उत्सुकता सम्राट् को लेकर ही है कि वह कौन है, जिसके लिए सम्राट् पैदल ही चल पड़े हैं। प्रभंजक ! प्रजा अपने राजा को जानती है। वह जिसके प्रति श्रद्धा रखता है, अन्तोगत्वा, प्रजा भी उसे ही चाहने लगती है, उसका सम्मान करने लगती है।’’
‘‘क्या सभी ?’’
‘‘नहीं ! सब नहीं। भीड़ में ऐसे भी लोग होंगे, जिन्हें राजा की श्रद्धा से कोई सरोकार नहीं होगा। वे कुछ गड़बड़ न कर बैठें, इसीलिए तो हम यहाँ हैं।’’
‘‘ठीक कहते हो तक्षक ! इतनी-सी बात मेरी समझ में क्यों नहीं आई। चलो, आगे चलते हैं। महाराज काफी आगे निकल गए हैं।’’
दोनों तेजी से भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़ने लगे।


भीड़ इतनी अधिक थी कि उन्हें आगे बढ़ने में कठिनाई होने लगी। इसलिए तेजी से आगे बढ़ने के लिए उन्होंने भीड़ का ऊपरी सिरा पकड़ा और आगे बढ़े। वहाँ भीड़ कुछ कम थी। अधिकांश लोग राजपथ पर लगी बाँसों की बाड़ की ओर ही दबाव बनाए हुए थे।
प्रभंजक ने तक्षक को रोकते हुए पूछा-‘‘तक्षक ! सुना है कि आज प्रातः बेला में जिस द्वारिक ने महाराज को आचार्य तिस्स के आगमन की सूचना दी, उसे महाराज ने अपने अलंकरण उतारकर दे दिए ?’’
‘‘ठीक सुना है तुमने !’’ तक्षक ने उत्तर दिया-‘‘मैंने भी अपने जामाता से यह सन्देश सुना था। वह भी राजा का विशेष द्वारिक है। रातभर अपना कर्त्तव्य निबाहकर जब प्रातः वह राजभवन से लौटा, तभी उसने मुझे बताया। पीछे से राष्ट्रिक (वरिष्ठ राज्याधिकारी) द्वारा मुझे राजपथ पर तत्काल पहुँचने का आदेश प्राप्त हुआ।’’

‘‘तक्षक ! महाराज ने आचार्य तिस्स को किसलिए बुलाया होगा ?’’
‘‘क्या पता किसलिए ? तुम देख नहीं रहे, इन दिनों राजनीति का चक्र, धर्म की धुरी पर घूम रहा है। धर्म-महामात्यों का वर्चस्व बढ़ गया है। आचार्य तिस्स को मगध की राजधानी में बुलाने के पीछे, उनकी क्या सोच है, इसे हम कैसे जान सकते हैं ? जो घटित होगा, सामने आ जाएगा।’’
‘‘तुम ठीक कहते हो।’’ प्रभंजक बोला-‘‘किन्तु जिस प्रकार गुप्त रूप से महाराज ने आचार्य तिस्स को यहाँ बुलाया है, उसकी सूचना हम प्रतिवेदकों को प्राप्त नहीं हो सकी, यह अपने में आश्चर्य की बात नहीं है क्या ?’’
‘‘इसमें आश्चर्य क्या है ? प्रतिवेदकों में भी कई श्रेणियाँ हैं। कुछ महाराज के अधिक निकट हैं और कुछ उनके विशेष दस्ते में रहते हुए भी, उनसे दूर हैं।’’

इस तरह बातें करते हुए दोनों महेन्द्रू घाट के निकट जा पहुँचे। घाट पर जैसे पूरा पाटलिपुत्र ही उमड़ पड़ा था। सभी सम्राट् अशोक और आगन्तुक अतिथि की एक झलक पाने के लिए आतुर दिखाई पड़ रहे थे। घाट तक पहुँचना असम्भव था। क्योंकि रक्षकों ने घाट को पूरी तरह से घेरा हुआ था। सम्राट् अशोक स्वयं महामात्य राधागुप्त, महाबलाधिकृत हिमवन्त और चन्द्रगुप्त-सभा के कुछ विशिष्ट मन्त्रियों के साथ एक ऊँचे स्थान पर खड़े हुए, गंगा के विशाल वक्षस्थल की ओर एकटक देख रहे थे। उनके चेहरे पर छाई आतुरता स्पष्ट दिखाई पड़ रही थी।
अभी कुछ पल ही बीते थे कि दूर जलधारा में एक काला धब्बा-सा दिखाई दिया, जो धीरे-धीरे नावों के एक बेड़े के रूप में परिवर्तित हो गया।
‘‘वो आ रहे हैं।’’ एकाएक सम्राट् के मुख से निकला और उसका हाथ उस बेड़े की ओर उठ गया।
तब तक भीड़ की दृष्टि भी उस बेड़े पर पड़ गई थी। उस बेड़े में सबसे आगे एक बड़ी नौका थी, जिसके पाल तने हुए थे और सबसे ऊपर मगध साम्राज्य की राज्य-चिह्नित पताका फहरा रही थी। कुछ लोग नौका के उग्र भाग में खड़े घाट की ओर देख रहे थे। सभी के शरीरों पर केसरिया चीवर थे और सिर घुटे हुए थे। ज्यों-ज्यों नौकाएँ पास आने लगीं, चेहरे स्पष्ट होने लगे। भिक्षुओं की टोली के मध्य, एक भव्य मुखाकृति वाला बौद्ध भिक्षु विराजमान था। उसकी दृष्टि घाट पर खड़े सम्राज्य की ओर ही लगी थी।

तभी भीड़ ने आचार्य तिस्स की तुमुल जय-जयकार की। नौका जैसे-जैसे पास आती गई, जय-जयकार का तुमुल घोष गगनभेदी होता चला गया।
सम्राट् अशोक क्षिप्रगति से घाट की ओर उतरे। नौका के निकट आते ही एक बड़ा तख्ता और नौका के मध्य लगा दिया गया। सबसे पहले वही भव्य आकृति वाला बौद्ध भिक्षु तख्ते पर चलकर किनारे पर आया। सम्राट अशोक ने आगे बढ़कर अपने दाहने हाथ का सहारा देकर भिक्षु को उतारा।
‘‘मगध राज्य का सम्राट् अशोक आपका अभिवादन करता है महाधर्मरक्षित आचार्य तिस्स ! आपका स्वागत है। हमारा आतिथ्य स्वीकार करें।’’

‘‘कल्याण हो राजन्।’’ आचार्य तिस्स ने अभय मुद्रा में हाथ उठाकर सम्राट् को आशीर्वाद दिया।
उसी समय एक बार फिर भीड़ ने सम्राट् अशोक और आचार्य तिस्स की जय-जयकार की। जयकारे की वह ध्वनि वहाँ से उठकर दूर राजपथ तक फैलती चली गई। उस जय-जयकार में उनके मध्य आगे क्या बातें हुईं, कोई सुन नहीं सका।
सम्राट् अशोक के संकेत पर फूलों से सजा एक रथ सामने आया। सम्राट् ने सहारा देकर आचार्य तिस्स को रथ में सवार कराया और मुड़कर महाबलाधिकृत हिमवन्त से कहा-‘‘हिमवन्त ! तुम आचार्य के साथ आए भिक्षुओं को संघाराम में ठहराने और उनके समुचित आदर सत्कार की व्यवस्था करके राजभवन पहुँचो। हम महामात्य के साथ आचार्य को साथ लेकर राजभवन जा रहे हैं। ध्यान रहे, उन्हें किसी प्रकार की भी असुविधा न हो।’’
‘‘जो आज्ञा महाराज !’’ महाबलाधिकृत हिमवन्त ने सिर झुकाकर कहा-‘‘आप उनकी ओर से निश्चिन्त रहें। आपकी आज्ञा का अक्षरशः पालन होगा।’’

सम्राट् अशोक महामात्य राधागुप्त के साथ रथ में चढ़े। प्रजा ने उन पर फूलों की वर्षा कर दी। सशस्त्र अंगरक्षकों से घिरा रथ राजपथ पर मन्थर गति से चलने लगा। भीड़ ने गगन भेदी जय-जयकार और पुष्पवर्षा से सम्राट् और आचार्य तिस्स का अभिनन्दन किया।
प्रभंजक और तक्षक भी रख के साथ-साथ वापस लौट पड़े। भीड़ के रेले से अपने-आपको बचाए हुए वे ऊपरी सिरा पकड़कर ही चल रहे थे।
तभी भीड़ में से कोई बोला-‘‘भद्रक ! आचार्य तिस्स के स्वागत समरोह में युवराज महेन्द्र का उपस्थित न होना, क्या तुम्हें खल नहीं रहा है ?’’
मेरे को क्यों खलेगा अथर्व ?’’ भद्रक ने पलटकर उसकी ओर देखा-‘‘सभी जानते हैं, महासांघिक भिक्षुओं और स्थाविर भिक्षुओं में छत्तीस का आँकड़ा है जब से वैशाली की संगति में, विवादित विषयों पर पंच निर्णय स्थाविरों के पक्ष में हुआ है, तभी से महासांघिक भिक्षुओं को वे फूटी आँखों नहीं सुहाते।’’

‘‘उन्हें ही क्यों दोष देते हो भद्रक !’’ अथर्व बोला-‘‘हम लोग भी कहाँ उन्हें अच्छा समझते हैं।’’
प्रभंजक और तक्षक के कान खड़े हो गए। दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा और धीरे से सरकरकर उन दोनों स्थविर भिक्षुओं के पीछे-पीछे चलने लगे। उनके कान उसी ओर लगे थे, जबकि आँखें महाराज जी के रथ की ओर थीं। प्रजा उनके स्वागत में जरा भी कोताही करना नहीं चाहती थी। उनका उत्साह बढ़ता ही जा रहा था।
‘‘इन दिनों सम्राट् अशोक का वरद्हस्थ इन महासांघिकों के शीश पर है।’’ भद्रक ने कुछ अनमने भाव से कहा।
‘‘वो तो दिखाई दे रहा है।’’ अथर्व बोला-‘‘तभी तो सम्राट् स्वयं तीन कोस पैदल चलकर, महासांघिकों के इस सर्वोच्च नेता मौग्गलिपुत्त तिस्स का स्वागत करने महेन्द्रू घाट गए थे।’’
‘‘पाटलिपुत्र में इनका गढ़ प्रबल होता जा रहा है।’’

‘‘होता जा नहीं रहा, हो चुका है। राजा का वरद्हस्थ जिसके सिर पर रहता है, प्रजा भी उसी ओर आकर्षित हो जाती है।’’
‘‘किन्तु मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि महाराज को अचानक आचार्य तिस्स को राजधानी में बुलाने की क्या आवश्यकता पड़ गई है ?’’
‘‘मुझे तो लगता है, सम्राट् अशोक को युवराज महेन्द्र के द्वारा बौद्ध संघ का अध्यक्ष पद हथियाना रास नहीं आया है। जब से युवराज ने वह पद प्राप्त करने में सफलता पाई है, तभी से सम्राट् के मन में कोई शूल-सा पड़ गया है। उस समय इस पद के अधिकारी ये महाधर्मरक्षित आचार्य मौग्गलिपुत्र तिस्स भी थे। परन्तु युवराज महेन्द्र के सामने इन्हें पराजित होना पड़ा और ये बौद्ध महासंघ का उपाध्यक्ष पद छोड़कर अहोगंगास पर्वत पर एकान्त साधना के लिए चले गए। सम्राट् ने उस समय इन्हें बहुत अनुनय विनय करके रोकना चाहा था पर ये उसे तब समझ नहीं सके। इन्हें लगा था कि यह समर्थन ऊपरी था। मन से सम्राट अपने पुत्र को ही अध्यक्ष पद पर देखना चाहते थे।’’

‘‘फिर अब ये पुनः वापस क्यों चले आए ?’’
‘‘क्या पता सम्राट् और इनके मन में क्या है ? किन्तु मुझे आसार अच्छे दिखाई नहीं पड़ रहे हैं।’’
‘‘क्या युवराज महेन्द्र के अध्यक्ष-पद पर आँच आ सकती है ?’’
‘‘क्या कहा जा सकता है ? भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है, किसे मालूम है।’’

‘‘भद्रक ! मेरे को तो यह सारा विवाद ही बेमानी लग रहा है। बुद्धत्त्व की प्राप्ति जन्म से हो या कर्म साधना से, क्या अन्तर पड़ता है ? मनुष्य के संस्कार ही उसका पथ-प्रशस्त करते हैं। शूद्र कुल में जन्म लेने वालों को भी भगवान तथागत ने अपने हृदय से लगाया था। उन्होंने जिस धर्म का प्रतिपादन किया था, वह निश्चय ही लोकहित के उच्चतम गुणों से युक्त है। हिंसा न करना, चोरी और व्यभिचार से सदैव दूर रहना, असत्य न बोलना और मादक दृव्यों के सेवन से बचना सभी उपदेशों में मनुष्य जीवन की पवित्रता निहित है। यह पवित्रता ही मनुष्य को स्वर्ग का संज्ञान कराती है और भौतिकवादी विचारधारा से अलग करके उसे मोक्ष की ओर ले जाती है। आज हम भगवान तथागत के बताए उपदेशों को भूलकर, परस्पर लड़ रहे हैं। मुझे तो यह सारा संघर्ष अहम् और सत्ता का ही दिखाई दे रहा है।’’

‘‘अथर्व ! अहम् और सत्ता का संघर्ष कब नहीं रहा ?’’ भद्रक मुस्कुराया-‘‘समय के साथ इनके स्वरूप बदलते रहते हैं। ये दोनों मनुष्य की आदिम-वृत्ति के साथ जुड़े हैं। इसीलिए आदिम काल से मनुष्य ने शक्ति की साधना की है। जिसके हाथ में सत्ता है, उसी का अहम् संरक्षित है। मत भूलो कि जिस प्रकार ये अपना स्वरूप बदलते हैं, इसी प्रकार महामानवों के उपदेश भी युग और परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होते रहते हैं। भगवान तथागत को पंच तत्त्व में लीन हुए सौ वर्ष से भी ऊपर हो चुके हैं। उनके उपदेश वर्तमान सन्दर्भों में कहाँ तक सार्थक होते हैं, हमें इस पर विचार करना चाहिए। प्रत्येक युग की राज्य-सत्ता, इसी प्रकार धर्म-अधर्म पर विचार करती रहती है और अपने हितों की रक्षा करती है।’’
‘‘इसका अर्थ तो यही हुआ कि राज्य-सत्ता के लिए अपना हित ही सर्वोपरि होता है ?’’
‘‘हाँ ! यही सत्य है अथर्व ! आचार्य तिस्स का राजधानी में आगमन, सम्भवतः इसी सत्य की रक्षा के लिए हुआ है।’’
तभी भीड़ का एक रेला आया और दोनों भिक्षुओं को आगे खींच ले गया। प्रभंजक और तक्षक ने उनके पास पहुँचने का प्रयास किया, पर सफल नहीं हो सके।

:2:


बौद्ध संघारम के एक विशेष कक्ष में, संघ के अध्यक्ष युवराज महेन्द्र चिन्तित मुद्रा में इधर से उधर टहल रहे थे। पैरों में खड़ऊँ थी। और उनका सारा शरीर एक केसरिया रंग के रेशमी चीवर से ढका था। केश-विहीन उनकी मुखाकृति पर चिन्ताओं की रेखाएँ उनके अनुपम तेज को ग्रहण लगा रही थीं। उनसे कुछ दूरी पर मगध-सामाद्य का महामात्य राधागुप्त महेन्द्र की ओर अपलक देखे जा रहा था। कक्ष में खड़ाऊँ की पदध्वनि के अतिरिक्त पूर्ण शान्ति थी। यहाँ तक कि कक्ष से बाहर होने वाली कोई भी ध्वनि, वहाँ तक नहीं पहुँच रही थी। इसका कारण यही था कि युवराज महेन्द्र का यह कक्ष, संघ की अन्य पर्णकुटियों से सर्वथा अलग था। इसके अलावा संघ के कुछ विशिष्ट भिक्षुओं को ही वहाँ तक पहुँचाने की छूट थी।
जब से महामात्य राधागुप्त युवराज महेन्द्र के पास भेंट के लिए आए हुए थे, तभी से उन सभी भिक्षुओं को कक्ष के बाहर निगरानी के लिए भेज दिया गया था। इस समय वे सभी कक्ष से दूरी बनाए चारों ओर छिटके हुए थे और हर आने-जाने वाले पर दृष्टि रखे हुए थे। यदि कोई कक्ष की ओर जाने का उपक्रम करता भी तो उसे दूर पर ही रोक दिया जाता।
एकाएक महेन्द्र ने रुककर महामात्य की ओर देखा-‘‘महामात्य ! कुछ पता चला कि मथुरा के सौगन्धिक तिस्स का यह पुत्र मौग्गलिपुत्त अब किसलिए यहाँ आया है ?’’

‘‘कारण अभी तक पता नहीं चला युवराज !’’ राधागुप्त ने उत्तर दिया-‘‘महाराज एकान्त में उससे मंत्रणा कर रहे हैं। यहाँ तक कि मुझे भी मंत्रणा में साथ नहीं रखा गया है।’’
‘‘यह मंत्रणा क्या राजभवन में हो रही है ?’’
‘‘नहीं ! तिस्स के लिए राज्योद्यान के निकट एक विशेष कुक्कुट्टाराम (आचार्य का निवास) तैयार कराया गया है। वहाँ सभी प्रकार की सुख-सुविधाओं की व्यवस्था की गई है।’’
‘‘एक भिक्षु के लिए सुख-सुविधाओं का क्या महत्त्व है महामात्य ?’’ युवराज महेन्द्र के चिन्तित चेहरे पर मुस्कान की एक पतली रेखा खिंच गई।

‘‘वह महाराज का विशिष्ट अतिथि है युवराज !’’ राधागुप्त भी मुस्कराया-‘‘महाराज की उस पर विशेष कृपा है। उसके प्रत्येक शब्द को महाराज आशीर्वचन के रूप में ग्रहण करते हैं।’’
‘‘जानते हैं।’’ महेन्द्र के मुख से एक गहरी साँस निकली-‘‘जब से संघ का अध्यक्ष पद पाने में यह असफल हुआ है, तभी से क्या, उससे भी बहुत पहले से पिताश्री का समर्थन इसे प्राप्त था और वे इसकी हर बात को आदेश के रूप में लेते रहे थे। परन्तु स्थविर भिक्षुओं के द्वारा हमारे प्रबल समर्थन के कारण ही इसकी एक नहीं चली और अध्यक्ष पद पाने में हम सफल हुए ।’’

‘‘इसे कौन नहीं जानता युवराज !’’ राधागुप्त के माथे पर लकीरें खिंच गईं-‘‘परन्तु मैं आज तक यह नहीं समझ सका कि आपके होते हुए महाराज ने इस भिक्षु का समर्थन क्यों किया ?’’
‘‘ऐसा आप कहते हैं और हम तथा हमारे समर्थक कहते हैं। किन्तु स्वयं पिताश्री इस बात को स्वीकार नहीं करते कि उन्होंने संघ के अध्यक्ष पद के चुनाव में मौग्गलिपुत्त तिस्स का साथ दिया था। वे तो आज भी यही कहते हैं कि उनके कारण ही हम इस पद पर हैं। वे जब चाहें इस पद से अपदस्थ कर सकते हैं।’’

‘‘क्या पता युवराज !’’ राधागुप्त ने शंका प्रकट की-‘‘इस भिक्षु के आगमन के पीछे और महाराज के इस कथन में, कौन सा रहस्य छिपा है। उनकी राजनीति को समझना बड़ा कठिन है।’’
‘‘एक महामात्य होकर आप ऐसा कह रहे हैं ?’’ युवराज महेन्द्र हँसे-‘‘हमें तो चन्द्रगुप्त सभा के प्रत्येक महापात्र (मंत्री) की नीति बड़ी कूट-भरी लगती है। पिताश्री और उनमें सदैव घात-प्रतिवाद चलता रहता है।’’
‘‘ऐसा आप समझते हैं युवराज ! हम नहीं।’’ राधागुप्त मुस्काया-‘‘चन्द्रगुप्त सभा का प्रत्येक महापात्र (मंत्री’ सम्राट् के आदेशों का पालन हृदय से करता है।’’
‘‘क्या आप भी ?’’
राधागुप्त युवराज के प्रश्न से सहसा हक्का-बक्का सा रह गया। उसने युवराज के चेहरे पर उभरे स्मित को देखा और सँभलकर बोला-‘‘वैचारिक अन्तर के रहते हुए भी सत्तादेश की अवहेलना कभी नहीं हो सकती युवराज ! यह ठीक है कि मेरी विचारधारा आपके अधिक निकट है, किन्तु राज्यसत्ता का वर्चस्व अभी भी हमारे ऊपर है। हमें दोनों में सामंजस्य करके चलना पड़ता है।’’





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