मुझे घर ले चलो - तसलीमा नसरीन Mujhe Ghar Le Chalo - Hindi book by - Taslima Nasrin
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जीवनी/आत्मकथा >> मुझे घर ले चलो

मुझे घर ले चलो

तसलीमा नसरीन

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :359
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5115
आईएसबीएन :81-8143-666-0

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औरत की आज़ादी में धर्म और पुरुष-सत्ता सबसे बड़ी बाधा बनती है-बेहद साफ़गोई से इसके समर्थन में, बेबाक बयान

Mujhe ghar le chalo-

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

देश तुम कैसे हो ?
कैसे हो तुम देश ?
तुम, देश कैसे हो ?
कैसे हो तुम देश ?
मेरा दिल तड़पता है तुम्हारे लिए, तुम्हारा नहीं ?
मेरा जीवन छीज रहा है तुम्हें याद करते हुए, और तुम्हारा ?
खोई रहती हूँ सपनों में, तुम ?
अपने घाव, दुःख
अपने आँसू
छिपाए रखती हूँ गोपन में।
गोपन में छिपाए रखती हूँ उड़ते बाल, फूल, गहरी सांस।
मैं कुशल नहीं हूँ, तुम सकुशल रहना, प्रिय देश !

तसलीमा नसरीन का जन्म 25 अगस्त, 1962 ! बांग्लादेश के मयनमसिंह में ! डॉक्टर की डिग्री हासिल करने के बाद, सन् 1993 तक डॉ. के तौर पर सरकारी अस्पताल में नौकरी ! सरकारी नौकरी में बने रहने के लिए, लिखना छोड़ना होगा-यह हुक्मनामा पाकर सरकारी नौकरी से इस्तीफ़ा। अपने लेखन के लिए असाधारण लोकप्रियता अर्जित की और काफ़ी चर्चित रहीं।

औरत की आज़ादी में धर्म और पुरुष-सत्ता सबसे बड़ी बाधा बनती है-बेहद साफ़गोई से इस पर विचार करते हुए, धर्म औरत की राह में बाधक कैसे हो सकता है, इसके समर्थन में, बेबाक बयान दिया है। इस साहस के लिए वे सिर्फ़ गंवार-जाहिल कट्टर धर्मवादियों के ही हमले की शिकार नहीं हुईं, बल्कि समूची राष्ट्र-व्यवस्था और पुरुष वर्चस्व प्रधान समाज ने उनके ख़िलाफ़ जंग की घोषणा कर दी। देश के समस्त कट्टरवादियों ने तसलीमा को फांसी देने की माँग करते हुए, आन्दोलन छेड़ दिया। यहाँ तक की उनके सिर का मोल भी घोषित कर दिया। नतीजा यह हुआ कि उन्हें अपने प्रिय स्वदेश से निर्वासित होना पड़ा।

उनके देश में आज भी उनके ख़िलाफ़ फ़तवा झूल रहा है; तसलीमा का ही नहीं बल्कि वाक-स्वाधीनता के विरोधी असंख्य लोगों के द्वारा ठोंके गए मामले झूल रहे हैं ! मानवता की हिमायत में, सत्य तथ्यों पर आधारित उपन्यास, ‘लज्जा’; अपने शैशव की यादें दुहराता हुआ, ‘मेरे बचपन के दिन’; किशोर और तरुणाई की यादों का बयान करता हुआ, ‘उत्ताल हवा’; आत्मकथा का तीसरा और चौथा खण्ड ‘द्विखंडित’ और ‘वे सब अँधेरे’-इन पाँचों पुस्तकों को बाँग्लादेश सरकार ने निषिद्ध घोषित कर दिया है ! पश्चिम बंगाल में विभिन्न संप्रदायों के लोगों में दुश्मनी जाग सकती है, इस आशंका का वास्ता देकर और बाद में किसी एक विशेष संप्रदाय के धार्मिक मूल्यबोध पर आघात किया गया है, इसकी दुहाई देते हुए, उनकी आत्मकथा का तीसरा खंड-‘द्विखंडित’ पश्चिम बंगाल सरकार ने भी निषिद्ध कर दिया। पूरे एक वर्ष, नौ महीने, छब्बीस दिन तक निषिद्ध रहने के बाद, हाईकोर्ट की निर्णय के मुताबिक यह निषेध उठा लिया गया। दोनों बंगाल में इस खंड के ख़िलाफ़ (पश्चिम बंगाल में ‘द्विखंडित’ और बांग्लादेश में ‘क’) उनके समकालीन लेखकों द्वारा कुल इक्कीस करोंड़ रुपए का मामला दायर किया गया है।


ज़ंज़ीर


अपने देश में प्रवासी
और परदेश में भी प्रवासी
तब कहाँ हैं, मेरा देश ?
सुजला, सुफला देश !
मैं जानूँ, देश जाने, मेरे अंतस में है, वह देश !

बैंकॉक हवाई अड्डे पर उतरते ही, मैंने सिर का आँचल खींचकर हटा दिया। आँचल काफी वजनी होकर मेरे सिर से चिपक गया था। आँचल हटते ही मैंने खुद को बेहद हल्की महसूस किया। अर्से बाद, मैं जैसे फिर ‘मैं’ हो आयी। एक अश्लील आवरण से मुझे ढँक रखा गया था। उसे हटाते ही, सच्ची मैं दुनिया की रोशनी, हवा में बाहर निकल आयी। मैंने मुक्ति की साँस ली। मैं जो, बचपन से ही बुरका पहनने या सिर पर दुपट्टा डालकर, पर्दा करने की घोर विरोधी थी, वहीं मैं, दिन पर लंबे वक़्त तक अपने को ढँक रखने को लाचार कर दी गयी। इससे ज़्यादा शर्म की बात और क्या है ? हाँ, एक तसल्ली ज़रूर थी कि वह अपने को ढके रखने के पीछे कोई धार्मिक वजह नहीं थी, यह तो मौत से बचने के लिए था। सिर ढकने का फैसला मेरे दिमाग़ में नहीं आया था, दूसरों के दिमाग़ में आया था। सिर्फ़ अपने को ही बचाने को नहीं, जो लोग मुझे बचाने को आगे बढ़ आए थे, उन लोगों को भी बचाने की ज़िम्मेदारी मेरे ही कन्धों पर थी। वैसे यह ज़िम्मेदारी मेरे कंधों पर नहीं, सिर पर ही कहना बेहतर होगा। सिर ढककर, सिर्फ़ मैंने अपने ही सिर को नहीं, बहुतों के सिर की रक्षा की।

सिर पर से आँचल हटाते ही, किसी अनजान सज्जन ने मेरी तरफ हाथ बढ़ा दिया। लार्स एंडरसन या ऐसा ही कोई नाम था। उन्होंने बताया कि वे स्वीडन के विदेश मंत्रालय से आए हैं। कोई एक अन्य अनजान सज्जन भी उनकी बगल में खड़े थे। उन्होंने भी मेरी तरफ हाथ बढ़ा दिया। उनका नाम वुल्फ या ऐसा ही कुछ था। स्वीडन के पुलिस महकमें के प्रधान ! दोनों ही सफेद चमड़ी, दोनों के ही सुनहरे बाल। एक साथ दोनों ही खौफ़ और फ़िक्र से बदहवास ! उसे परेशानी कहना ही बेहतर है। दोनों के कंधों पर या सिर पर बड़ा दायित्व आ पड़ा था, यह उन दोनों की निगाहों से साफ़ जाहिर था ! उन दोनों सज्जनों ने ङ से हाथ मिलाते-मिलाते उनको अपना परिचय दे डाला, लेकिन उनकी आवाज़ बेहद धीमी थी। ङ इधर-उधर निगाह दौड़ाते रहे। होंठों पर मंद-मंद मुस्कान ! आँखों में आशंका भी और ऐश भी ! लार्स और वुल्फ हमें आड़ में ले गए। हवाई अड्डे के अन्दर ही, उन्होंने पहले से ही दो कमरे किराए पर ले रखे थे। हम दोनों को उन्हीं कमरों में धकेल दिया, जो जहाज़ एशिया से यूरोप जाने वाला था, उसमें सवार होने में अभी काफी देर थी।

इसलिए हमें कहा गया कि फिलहाल आराम करो। लेकिन, आराम करो कहने से ही क्या आराम किया जा सकता है ? आँखों में नींद कहाँ उतरती ? आँखें तो नींद भूल गयी थीं। तन-बदन की पेशियों-रगों में, खून की बूँद-बूँद में, त्वचा में निश्चितता और अनिश्चितता का तूफ़ानी झूला ! मुझे आराम कौन देता ? अपना कमरा छोड़कर ङ मेरे कमरे में चले आए। उसी वक़्त ङ को भी आराम की कोई ज़रूरत नहीं थी। ज़रूरत थी बातें करने की। हम कहाँ जा रहे हैं क्या हो रहा है, वे दोनों कौन हैं, वे लोग क्यों आए हैं, उन्होंने थोड़ा-थोड़ा मुझे बताया। मैंने गौर किया, किसी भी बात के नाड़ी-नक्षत्र जानने की, मुझमें कोई उत्सुकता नहीं जागी। अचानक मेरे में अद्भुत थकान भर गयी थी, मानो मुझ जीती-जागती को मिट्टी तले गाड़ दिया गया था, मैं पूरा दम लगाकर उस भयंकर अँधेरे से ऊपर उठ आयी हूँ। यह मेरा नया जीवन है। मैं जीवन, जगत की तमाम दुश्चिंताओं से फ़िलहाल आज़ाद हूँ। ख़ैर आज़ाद तो मैं हो ही गयी हूँ, लेकिन एक चिंता, गौरैया पाखी की तरह मेरे मन की खिड़की पर अचानक आ बैठी।

उन दोनों सज्जनों ने हमारे आराम का इंतजाम तो कर दिया, लेकिन अपने आराम के लिए कुछ किया या नहीं, यह जानने की मेरे मन में तीव्र चाह जाग उठी। ना, उन दोनों ने कुछ ऐसा भी नहीं किया था। वे दोनों हमारी पहरेदारी कर रहे थे और चहलदकमी कर रहे थे। पहरेदारी चहलकदमी से परे, फ़िलहाल उन्हें किसी बात का होश नहीं था, लेकिन चलो, मैं शांत-स्थिर बैठी थी, घड़ी के काँटे को तो मेरी तरह बैठे रहने की फुर्सत नहीं थी। बहरहाल, मुझे चाहे जितना भी लग रहा हो कि घड़ी का काँटा एक पैर पर खड़ा का खड़ा है, लेकिन दरअसल ऐसा नहीं था। घड़ी का काँटा तो दौड़ रहा था, अगर दौड़ भी नहीं रहा था, तो कम-से-कम चलता जा रहा था। चलते-चलते अंत में कहीं न कहीं पहुँचेगा ही। जब सचमुच पहुँच गया, तो उन दोनों सज्जनों ने इत्मीनान से मुझे विदेशी जहाज़ के फर्स्ट क्लास की एक या दो नम्बर सीट पर बिठा दिया।

ख़ुद भी एक-दो हाथ के फ़ासले पर बने रहे। जहाज़ एमस्टरडम की तरफ जा रहा था। ढाका से स्वीडन क्या, बैंकॉक और एमस्टरडम घूमकर जाना पड़ता है ? नहीं, ऐसा नहीं होता। लेकिन, सुरक्षा की सोच के नशे में ही अगर रात-दिन डूबे रहो तो ऐसा ही होता है। इस वक़्त मैं क्या करूं, कुछ तय नहीं कर पा रही थी। ङ से बातचीत करूँ खिड़की से बाहर बादलों का उड़ना-भटकना देखूँ ? कुछ पढ़ूँ या आँखें मूँदकर लेटी रहूँ या सो जाऊँ ? बारी बारी से यह सभी कुछ करने का मन हो आया। अगले ही पल कुछ भी करने का मन नहीं हुआ। अंदर ही अंदर स्थिरता और साथ ही एक किस्म की अस्थिरता, बादलों की तरह तैरती रही। इस जहाज़ ने तो जैसे कसम खा रखी थी कि वह अनंतकाल तक चलता ही रहेगा। कभी-कभी यह भी लग रहा था कि जहाज़ बिलकुल स्थिर ठहरा हुआ है; सामने या पीछे इंच-भर भी हिल-डुल नहीं रहा है। कहीं किसी मिट्टी के अहसास के लिए, खिड़की से बार-बार झाँकते हुए मैं नीचे देखती रही। धरती की माटी छूने के लिए पाँव कसमसा उठे। क्या मैं कोई भी, कैसी भी मिट्टी छूना चाहती थी ? शायद कैसी भी मिट्टी !

एम्सटरडम एयरपोर्ड पर उतरते ही मुझे झटपट वीआईपी लाउंज में ले जाया गया। लाउंज लगभग खाली था। सिर्फ़ दो मुसाफिर बैठे हुए थे। मुझे इस ठंग से बैठने की हिदायत दी गयी, ताकि कोई मुझे देख न ले। कोई पहचान न ले कि मैं कौन हूँ, मेरा नाम-परिचय क्या है। लार्स एंडरसन और वुल्फ बेइरन मुझे इस ढंग से घेरे रहे। मुसीबत के केन्द्र से जितनी दूर होती जा रही थी, उन दोनों सज्जनों का चेहरा उतना ही प्रशांत होता जा रहा था। अचानक डर-भय कट जाने के बाद प्रशांत चेहरे की सिकुड़न जैसे बढ़ गयी। सिर के ऊपर ही ज़ोरदार आवाज़ के साथ टेलीविजन चालू था। लार्स और वुल्फ की डरी हुई विस्मित-विस्फरित निगाहें उसी तरफ लगी हुईं। ङ के इशारे पर मेरी भी निगाहें टेलीविजन, खबर, हेडलाइन पर जा लगीं। पूरी स्क्रीन पर मेरी तश्वीर और बार-बार खबर गूँजती हुई—‘तस्लीमा ने देश छोड़ दिया और स्वीडन की तरफ रवाना हो गयी है।’ मैं कहाँ जा रही हूँ, दुनिया के लिए यह कोई ज़रूरी खबर कतई नहीं है, इस विश्वास के बावजूद मेरे तन-बदन में अजीब-सी सिरहन दौड़ गई।

कालकोठरी के अँधेरे से अपने को बाहर निकालकर अगर मैं यह देखती कि मेरे चारों तरफ रोशनी झिलमिला रही है और मैं तो मरी ही नहीं हूँ बल्कि और ज़्यादा जीवंत हो उठी हूँ, तो मुमकिन है कि मेरे दिल की धड़कने बढ़ जातीं। लेकिन जिन लोगों को सुरक्षा के लिए देश-निकाला दे दिया गया हो, उनकी साँसें खत्म हो जाती हैं और वे लोग आपादमस्तक बर्फ़ हो आते हैं। गैर-देशी वे दोनों सज्जन पसीने-पसीने होते हुए, थर-थर काँपते हुए, मुझे झपट्टा मारते हुए उठा ले गए और हवाई अड्डे के निचले कक्ष में, किसी निर्जन-सुरक्षित कोठरी में उन दोनों ने मुझे बिठा दिया। ङ भावलेशहीन निगाहों से बस देखते रहे। मैं उत्तेजित हो उठी। मैंने उन्हें समझाना चाहा कि यहाँ कोई मेरा खून नहीं करेगा। यहाँ, इस हवाई अड्डे तक बांग्लादेश का कोई मुल्ला दौड़ा नहीं आया। अस्तु, तुम लोग अपनी डोर ढीली करो और मुझे अपनी मन-मर्जी से घूमने-फिरने की आज़ादी दो। लेकिन, नहीं, डोर ढीली करने के लिए वे दोनों किसी हाल भी राजी नहीं हुए। वे हाथ में कसकर लटाई थामे हुए बैठे रहे, मानो अगर वे खुद भी न चाहें तो भी उन्हें साथ रहना होगा।

लेकिन वे दोनों प्रबल भाव से जो चाहते थे, आखिरकार वह घट ही गया। जहाज़ पर चढ़ने का वक़्त आ पहुँचा। एमस्टरडम से स्टॉकहोम की दिशा में हमारा सफ़र शुरू हुआ। सच पूछें तो स्टॉकहोम शहर के बारे में मुझे कुछ भी जानकारी नहीं थी। वह शहर, किसी भी अन्य शहर जैसा था। अगर कोई कहे कि तुम्हें अभी कुसुलुकु या कविकाइरे शहर जाना होगा, मुझे सिर हिलाकर सहमति देनी होगी कि ठीक है, जाऊँगी। अपने लिए कोई देश या शहर पसंद करने की आज़ादी मुझे नहीं दी गई है। अपनी पसंद से ढोंक या दूसरों की पसंद की मूर्खता और भोथरापन निगलने के अलावा मेरे पास और कोई उपाय नहीं है। जान बचाने के लिए ही सारी तैयारी की गयी है। फिलहाल मैं हत्यारों की पहुँच से बाहर, प्राणदायी आश्रय में आ गयी हूँ। यह बात मेरा मन शायद भूल गया था। मैंने मन-ही-मन अपने को धमकाकर याद दिलायी। स्टॉकहोम में स्टॉपेज के बाद मुझे जहाज़ के पेट से सबसे पहले निकाला गया और अलग सीढ़ी से खुले आसमान के नीचे उतार लाया गया। जिस राह आम-मुसाफिर आते-जाते हैं, वह राह मेरे लिए नहीं थी। वजह यह है कि मैं कोई मामूली मुसाफिर नहीं हूँ। इस पल दुनियाँ की सबसे टॉप खबर मैं हूँ ! हेडलाइन मैं हूँ !

जहाज़ के नीचे एक और आदमी खड़ा था, मेरे अभिवादन के लिए ! उस आदमी ने हाथ बढ़ाकर मुझसे हाथ मिलाया और अपना नाम बताया—गैबी ग्लेइसमैन ! स्वीडिस पेन क्लब का प्रेसीडेंट। जहाज के नीचे ही झुंड भर पुलिस की गाड़ियाँ खड़ी थीं। उनमें से ही किसी एक में मुझे उठाकर गाड़ियाँ किसी अनजान ठिकाने की ओर दौड़ पड़ीं। आगे-पीछे ढेरों गाड़ियाँ, उस वक़्त खतरे की घंटी बजा रही थीं—पों-पों ! मैं हतबुद्ध ! इस किस्म का अविभादन तो किसी बड़े विशाल देश के राजा-रानी या राष्ट्रप्रधान अपेक्षा करते हैं। मैं ठहरी नितांत ही मामूली इंसान ! अपने लिए ऐसी तैयारी देखकर मेरे मन में जाने कैसी दहशत फैल गयी। हवाई अड्डे में ही मुझे कहीं उतारा गया ! कहाँ ? यह समझना मेरी क्षमता में नहीं था। वहाँ, मागरिटा डगलस, स्वीडन की विदेश-मंत्री मेरे स्वागत के लिए खड़ी थीं ! करीब ही सैकड़ों पत्रकारों की ठसाठस भीड़ ! फोटो-पत्रकार हाथ में कैमरा उठाए, मेरी तरफ निशाना लगाए हुए थे। इससे पहले कि मुझे लक्ष्य करते हुए कैमरे के फ्लैस चमक उठें, बेहद स्वाभाविक भाव से ही विदेश मंत्री के होंठों पर तृप्ति की मुस्कान तैर गयी। पिछले कई महीनों से विदेश मंत्री महोदया ने मुझे बांग्लादेश से सही-सलामत लाने के लिए काफी मेहनत की थी। आज उनकी मेहनत सार्थक हुई। ङ आगे बढ़ गए और उन्होंने मागरेटा को अपना परिचय दिया। मैंने देखा, कौन मेरा छायासंगी है कौन देश छोड़कर विदेश-सफर पर आया है, क्यों आया है—ये तमाम जानकारी, मागरेटा की उँगली पर है की पोरों पर है ! ख़ैर, जिस हालत में मुझे उठाकर लाया गया है, उसमें किसी न किसी को तो मेरे साथ होना ही था। उस जानकारी पर ङ ने और थोड़ी-सी जानकारी लाद दी।

ङ ने कहा, ‘‘चूँकि अंग्रेजी भाषा पर उसकी खास दखल नहीं है, इसलिए मैं इनके साथ आया हूँ, इनकी मदद के लिए !’’ उन्होंने यह भी बताया, ‘‘मुझे भी भयंकर सतर्कता बरतनी पड़ी। यहाँ तक कि अपनी बीवी को, जो इन दिनों देश के बाहर है, उसे भी बता कर नहीं आया कि मैं इनके साथ जा रहा हूँ।’’

मार्गरेटा के आमने-सामने मैं और ङ बैठे हुए थे, जरा से फासले पर गैबी ग्लेइसमैन ! मंत्री महोदया ने कुल मिलाकर जानना चाहा कि राह में मुझे कोई असुविधा तो नहीं हुई। अब मुझे थकान तो नहीं लग रही है। उनके तमाम सवालों का जवाब, मेरी तरफ से ङ ने दिया। अब, मेरी क्या योजना है, भविष्य के बारे में मैंने क्या सोचा है—इन सब सवालों का भी जवाब, कुछ ङ ने और कुछ गैबी ने दिया। ङ यहाँ कितने दिन रहेंगे ? स्वीडिश पेन क्लब की तरफ से मुझे कुर्ट टूखोलोस्की पुरस्कार किया जाएगा, उसी दिन औपचारिक तौर पर जनता के सामने मुझे प्रस्तुत किया जाएगा। यह तय हुआ कि ङ उन दिनों तक मेरे साथ होंगे। विदेश मंत्री ने मंद-मंद मुस्कान के साथ ङ के फैसले की तारीफ की। अब मार्गरेटा ने सवाल किया कि दिनभर से प्रतीक्षारत पत्रकारों से मैं बातचीत करना चाहूँगी या नहीं। इस बारे में भी फैसला गैबी और ङ की तरफ से सुना दिया गया, ‘‘नहीं, इस पल, वह पत्रकारों के किसी भी सवाल का जवाब नहीं देगी।’’

मेरा ख़याल है कि विदेशमंत्री ने ज़रूर यही अंदाज़ा लगाया होगा कि मैं असहाय-अबला औरत हूँ और मेरे तमाम सोच-विचार और कार्य, मेरे आस-पास के मर्द साथियों द्वारा ही तय किए जाते हैं। वाक्रुद्ध उत्साही पत्रकारों का दल हवाई अड्डे पर ही रह गया था। मार्गरेटा डगलस खुद उन लोगों से मुख़ातिब हुईं। मुझे पिछले रास्ते से बाहर निकाल कर लाया गया, ताकि कोई मेरी छाया तक न छू पाए।

इसके बाद, गाड़ियों का काफिला, मेरी गाड़ी के आगे-आगे दौड़ पड़ा। हार्न बजाकर, समूचे शहर को थर्राते हुए, वे गाड़ियाँ मुझे किस तरफ़ ले जा रही हैं, मुझे कुछ पता नहीं था। मुझे काफी संकोच हो आया। सिर्फ़ मेरे लिए इतने लंबे-चौड़े इंतज़ाम की कोई वजह, मेरी समझ में नहीं आई। मेरी आँखें पैरिस शहर की चकाचौंध देख चुकी थीं। इसलिए स्कॉटहोम शहर देखकर, मुझमें कोई विस्मय न जागा। ङ की कौतूहल भरी आँखें, खिड़की से बाहर, शहर का यथासंभव नज़ारा करती रहीं। मेरे मन में ङ का एक जुमला काँटे की तरह गड़ रहा था—‘‘यहाँ तक कि मैंने अपनी पत्नी को भी नहीं बताया कि मैं इनके साथ यहाँ आया हूँ।’’ ङ ने अपनी बीवी को क्यों नहीं बताया ?

देश से मेरे साथ स्वीडन आने का इंतजाम, उनके लिए किसने किया ? क्यों किया ? जहाँ तक मेरे कानों तक खबर पहुँची थी, उस तरफ़ से स्वीडन के राजदूत ने ही इसका इंतज़ाम किया था। स्वीडिश सरकार की तरफ़ से दो हवाई जहाज़ टिकट भेजे गए थे। यह ज़रूर अहम घटना थी। लेकिन ङ के लिए, अपने परिवार के घनिष्ठ लोगों से यह बात छिपाने की क्या वजह हो सकती है ? ङ ने कहीं यह तो नहीं सोच लिया कि वे मेरे साथ विलास-विहार पर आए हैं ? अगर किसी को मेरे साथ आना ही था, तो मेरे अब्बू मेरे साथ होते। ढाका हवाई अड्डे पर अब्बू की असहाय-निरुपाय, खड़े रह जाने वाली तस्वीर, मेरे मन में हाहाकार करती हुई, धूल भरी आंधी बिखेर गयी थी। अंग्रेज़ी में साहित्य रचने जितना ज्ञान मुझे नहीं था। अंग्रेजी भाषा हमेशा से मेरे लिए विदेशी भाषा रही है। यह भाषा न तो मेरी मातृभाषा थी, न मेरी जुबान या बोली। इस भाषा से मैं भले ही और कोई काम लूँ, लेकिन कल्पना के घोड़े नहीं दौड़ा सकती। वैसे रोजमर्रा के ज़रूरी काम-काज मैं इस भाषा से चला सकती थी, इसमें कोई संदेह नहीं था। अगर बहुत ज़्यादा ज़रूरत पड़ी, तो दुभाषिए की भी व्यवस्था भी हो जाएगी। मैंने देखा, फ्रांस में बहुत कम ही लोग अंग्रेजी बोलते हैं। नामी-गिरामी लोग भी बड़ी शान से घोषणा करते हैं कि वे अंग्रेजी नहीं जानते।



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