बड़ी बहू तथा अन्य कहानियाँ - ताराशंकर वन्द्योपाध्याय Badi Bahu Tatha Anya Kahaniyan - Hindi book by - Tarashankar Vandyopadhyaya
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बड़ी बहू तथा अन्य कहानियाँ

ताराशंकर वन्द्योपाध्याय

प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :152
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5121
आईएसबीएन :0000

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भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित ताराशंकर वंद्योपाध्याय की पांच श्रेष्ठ कहानियां -‘राईंकमल’, ‘मरु की माया’, ‘प्रसाद माला’, ‘बड़ी बहू’, और ‘माला चंदन’

Badi Bahu Tatha Anya Kahaniyan a hindi book by Tarashankar Vandyopadhyaya - बड़ी बहू तथा अन्य कहानियाँ - ताराशंकर वन्द्योपाध्याय

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित ताराशंकर वंद्योपाध्याय रवीन्द्रनाथ टैगोर और शरतचन्द्र के बाद बंगाल के प्रमुख लेखकों में से एक हैं। उनका नाम विभूतभूषण वंद्योपाध्याय और माणिक वंध्यापाध्याय के साथ लिया जाता है।
ताराशंकर का समग्र साहित्य स्वाधीनता की लड़ाई की पृष्ठभूमि में मनुष्य का जीवन संगीत मात्र ही नहीं है। कथा-साहित्य के तीन प्रमुख उपादानों स्थान, काल और पात्र की नींव पर जिन अविस्मरणीय कहानियों और उपन्यासों की उन्होंने रचना की है, वह जनता का सार्वकालिक जीवन संगीत है।

रवीन्द्रनाथ ने एक बार कहा था, बहुसंख्यक गांवों से भरपूर जो देश है उस देश को देखने की दृष्टि हमने खो दी है। हमारे साहित्य क्षेत्र में जिन लोगों ने इस संकीर्ण सीमाबद्ध दृष्टि से पूरे देश में व्यापकता से प्रसारित है उनमें ताराशंकर का स्थान सबसे आगे हैं।’

खासकर रवीन्द्रनाथ ने जिन्हें ‘अंत्यज’ मंत्रवर्जित कहा है, उन अवज्ञात लोगो से सुख-दुख, सुगति-दुर्गति को ताराशंकर ने जिस रसदृष्टि से देखा था वैसी दृष्टि बांग्ला साहित्य में विरल ही है। इस दृष्टि से उनके उपन्यासों की तुलना में उनकी कहानियां बांग्ला साहित्य की अविस्मरणीय संपदा है। उनकी कहानियों ने विचित्र रस के उपादन से हमारे कथा-साहित्य को समृद्ध किया है।
बंगाल के गांवों पर लिखते हुए ताराशंकर ने कोई नई जमीन नहीं तोड़ी थी, क्योंकि शरतचन्द्र तथा कुछ अन्य लेखक ग्रामीणजनों के बारे में लिख चुके थे। पर उनके पास ताराशंकर जैसा ज्ञान, विशाल दृष्टि और इतिहास बोध नहीं था।
वस्तुतः बंगाल के ग्रामीण समाज को ऐसा समग्र और सार्वभौम दृष्टि से ताराशंकर से पहले किसी और ने नहीं देखा।

भूमिका

साहित्य में लेखकों के दो प्रकार के वर्ग होते हैं। पहले वर्ग में ऐसे लेखक होते हैं जो आते ही सफलता के सर्वोच्च शिखर पर बैठ जाते हैं। बांग्ला साहित्य में विभूतिभूषण वंद्योपाध्याय ऐसे उदाहरण हैं। उनका पहला उपन्यास ‘पथेर पांचाली’ ही उनके जीवन का श्रेष्ठ उपन्यास साबित हुआ। बाद में उन्होंने ढेरों उच्चकोटि की कहानियां, उपन्यास आदि लिखे लेकिन शायद अपनी बाद की लिखी हुई किसी भी कृति को अपनी सर्वप्रथम कृति से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं बना पाये।

दूसरे वर्ग के लेखकों की शुरुआती रचनाएं सामान्य ही होती हैं। उनकी प्रतिभा को लोगों को नजरों में आने के लिए दीर्घकालीन कठोर साधना की जरूरत पड़ती है। ताराशंकर इसी वर्ग के लेखक थे। उनकी पहले दौर की लिखी काफी रचनाएं, औसत दर्जे की हैं। लंबे समय तक काफी कुछ देखने परखने, के बाद, व्यर्थता की काफी ग्लानि और निराशा पार करके उन्होंने अपने लेखन की धाक जमायी थी। अपराजिता आत्मविश्वास और ईश्वर-भक्ति ने उन्हें सफलता के शिखर पर पहुंचाया।

अपनी अभिव्यक्ति के उचित माध्यम की तलाश में भी उन्हें कम भटकना नहीं पड़ा। और उपन्यास ही ताराशंकर को अपनी बात कहने के उपयुक्त माध्यम नजर आये।
ताराशंकर का साहित्यिक जीवन आठ वर्ष की उम्र में कविताओं से प्रारंभ हुआ। तदुपरातं उन्होंने नाट्य लेखन में रुचि दिखायी। उनकी नियमित साहित्य साधना 28 वर्ष की उम्र में लामपुर से प्रकाशित ‘पूर्णिमा’ मासिक पत्रिका से शुरू हुई। कविता, कहानी, आलोचना सम्पादकीय के रूप में इस पत्रिका की ज्यादातर सामग्री उन्हीं की लिखी हुई होती थी। पूर्णिमा में ही ताराशंकर की पहली उल्लेखनीय कहानी ‘प्रवाह का तिनका’ प्रकाशित हुई थी।

कुछ दिन बाद ही ताराशंकर ने ‘रसकली’ नामक कहानी लिखी और ‘प्रवासी’ पत्रिका को प्रकाशनार्थ भेज दी। कई महीनों तक बार-बार पत्र लिखने पर भी कोई लाभ नहीं हुआ। आखिरकार ताराशंकर खुद प्रवासी ऑफिस में उपस्थित हुए। जैसा अमूमन होता है, नये लेखक की रचना बिना पढ़े ही सम्पादकीय विभाग ने वापस लौटा दी। उस अस्वीकृत रचना को लेकर ताराशंकर पैदल ही मध्य कलकत्ता से दक्षिण कलकत्ता अपने रिश्तेदार साहित्य साधना की इच्छा को तिलांजलि देकर गंगा नहाकर घर लौट जायें एवं शांत गृहस्थ की तरह अपना जीवन खेती-खलिहानी करते हुए गुजार दें।
साहित्य क्षेत्र में अपने पराजय की बात सोचकर उनकी चित्त व्यथित होने लगता था। सौभाग्य से एक दिन डाकघर में उन्हें एक पत्रिका नजर आ गई। उस पत्रिका का नाम था ‘कल्लोल’। ताराशंकर ने कल्लोल का पता नोट कर लिया और उसी पते पर उन्होंने रसकली कहानी भेज दी। जल्दी ही उन्हें कहानी के स्वीकृत होने की सूचना मिली। उत्साहित करने वाले पवित्र गंगोपाध्याय ने लिखा, ‘आप इतने दिनों तक मौन क्यों बैठे हुए थे ?’ महानगरी के साहित्य क्षेत्र में ताराशंकर की वह पहली स्वीकृत थी।

विचारों का साम्य न होने पर भी नये लेखकों के लिए कल्लो का द्वार हमेशा खुला रहता था आगे के दो वर्षों तक कल्लोल में ताराशंकर की कई कहानियां प्रकाशित हुईं। फिर ‘कालि-कलम’, ‘उपासना’ और ‘उत्तरा’ पत्रिकाओं में भी उन्होंने लिखा। ‘श्मशान के पथ पर’ नाम कहानी ‘उपासना’ पत्रिका में छपी थी।
ताराशंकर ने लिखा है कि उनके साहित्य जीवन का पहला अध्याय अवहेलना और अवज्ञा का काल था। उनकी पुत्री का देहांत आठ वर्ष की उम्र में ही हो गया। कन्या वियोग से शोकाकुल कथाशिल्पी ने इस बार संध्यामणि कहानी लिखी। सजनीकांत द्वारा संपादित ‘बंगश्री’ पत्रिका के पहले अंक में यह कहानी ‘श्मशाम घाट’ नाम से छपी थी। ‘संध्यामणि’ के पहले ताराशंकर अठारह-उन्नीस कहानियां लिख चुके थे, जिनमें ‘रसकली’ ‘राईकमल’ और ‘मालाचंदन’ जैसी कहानियाँ भी थीं। लेकिन ‘संध्यामणि’ ऐसी पहली कहानी थी जिसे बांग्ला साहित्य में सिर्फ ताराशंकर ही लिख सकते थे।
‘संध्यामणि’ छपने के बाद अंतरंग साहित्यकारों के बीच इसकी व्यापक चर्चा हुई। इसके बाद भारतवर्ष में छपी ‘डाईनीर बांषी’ (डाईन की बांसुरी) और बंगश्री में प्रकाशित दूसरी कहानी मेला ने ताराशंकर को कथाकारों की पहली पंक्ति में ला बिठाया।

ताराशंकर ने अपनी साहित्य जीवन की बातों में जिस अपमान की घटना का जिक्र किया है। वह ‘देश’ पत्रिका के दफ्तर में घटा था। यह सन् 1934 की बात है। उसके पहले देश केशारदीय विशेषांक में उनकी बहुचर्चित कहानी ‘नारी और नागिनी’ छप चुकी थी। देश के प्रभात गांगुली ने ‘नारी और नागिनी’ की बेहद प्रशंसा की थी। गांगुली महाशय बड़े मूड़ी आदमी थी। मिजाज ठीक रहता तो बेहद दिलदरिया थे और अगर मिजाज बिगड़ता तो चीखते-चिल्लाते हुए इस तरह इन्कार करते थे कि लेखक को बहुत अपमानजनक लगता। ताराशंकर की ‘मुसाफिरखाना’ जैसी कहानी उन्हें पंसद नहीं आयी। वे उसे लौटाते हुए बोले, ‘यह (अर्थात् देश पत्रिका कोई डस्टबिन नहीं है।’

ताराशंकर की स्थिति धीरे-धीरे ऐसी बन गयी थी कि कोई उन्हें खारिज नहीं कर सकता था। यदा-कदा आलोचना करते हुए कोई कहता, ‘कहानियां अच्छी लिखते हैं, शैली भी अच्छी होती है। लेखिक कहानियां, बड़ी स्थूल होती हैं। उनमें सूक्ष्मता का अभाव हैं।’ जिज्ञासु ताराशंकर ने इस पर कविगुरु रवीन्द्रनाथ की राय जाननी चाही। उत्तर में रवीन्द्रनाथ ने लिखा, ‘‘तुम्हारी रचनाओं को स्थूल दृष्टि कहकर जिसने बदनाम किया, मैं नहीं जानता, लेकिन मुझे लगता है कि तुम्हारी रचनाओं में बड़ा सूक्ष्म स्पर्श होता है और तूम्हारी कलम से वास्तविकता सच बनकर नजर आती है, जिसमें यथार्थ को कोई नुकसान नहीं पहुंचता। कहानी लिखते वक्त कहानी ने लिखने को ही जो लोग बहादुरी समझते हैं तुम ऐसे लोगों के दल में शामिल नहीं हो, यह देखकर मैं बहुत खुश हूँ। रचना में यथार्थ की रक्षा करना ही सबसे कठिन होता है।’

यथार्थ लेखन के इस दुरूह मार्ग पर ताराशंकर की जययात्रा बिना किसी रोक-टोक के निरंतर आगे बढ़ती ही गयी।
ताराशंकर के रचनाकार के केन्द्रीय वृत्तभूमि में देहात का ब्राह्मण समाज था। लेकिन उनके जीवन बोध ने धीरे-धीरे फैलते हुए सामान्यजन को अपने दायरे में ले लिया रवीन्द्रनाथ ने सबसे पहले अपनी कहानियों में गांव देहात के क्षुद्र मनुष्य को स्थान दिया था। लघु प्राण, मामूली कथा छोटी-छोटी दुख की बातें, जो बेहद सहज और सरल हैं। जिनका जीवन है, उन्हीं को लेकर कविगुरु ने अपनी छोटी कहानियों की मंजूषा सजाकर बांग्ला साहित्य में कहानियों की प्राण प्रतिष्ठा की। शरत् साहित्य में मुख्यतः देहातों के मध्यवित्त समाज को ही प्राथमिकता दी गयी है। ताराशंकर ने समाज के दीन-हीन अछूत स्तर के लोगों को अपनी रचनाओं का विषय बनाया। उन्होंने समाज के सभी वर्गों के लोगों को अपनाकर अपने रचनालोक को पूर्णता प्रदान की। इस दृष्टि से ताराशंकर सम्पूर्ण समाज के जीवन बोध के सर्वप्रथम कलाकार हैं। उनकी कहानियों में अपने समय का परिवेश उजागर हुआ है। माटी से बने मानव जीवन को ही उन्होंने आविष्कृत किया। इसी दृष्टि से उनके साहित्य को आंचलिक कहा जाता है। अंचल विशेष की प्रकृति और उसी के प्रभाव से नियंत्रित मनुष्य के सुख-दुख की यथार्थता को कहानियों को विचित्र करने से जाहिर है उनमें आंचलिक विशेषताएं नजर आयेंगी ही। इस दृष्टि से यथार्थ जीवन पर जो भी लिखा जाए वही आंचलिक हो जाता है। लेकिन अपने समय और परिवेश की विशेषताओं को आंचलिक कहकर उसे संकीण बनाना उचित नहीं होगा। ताराशंकर के साहित्य का व्यक्ति अपनी आदिम प्रवृत्ति, युगों से संचित संस्कार और वंशानुगत आजीविका ढोने वाला परिचित इन्सान है। इसीलिए ताराशंकर बंगाल के सार्वभौमिक जीवन-शिल्पी हैं।

ताराशंकर की कहानियों की मुख्य विशेषता है समाज के अज्ञात कुलशील क्षुद्र समझे जाने वाले लोगों के प्रति उनकी गहरी संवेदना और अंतरंगता। भारतीय मानव समाज के आदि स्तर के जो निर्माता थे, परवर्ती काल के आर्य सभ्यता के प्रसार और प्रतिष्ठा के फलरूपरूप वे लोग समाज की सीमारेखा के बाहर अवज्ञात और सभ्यताभिमानी तथा अपने को ऊंचा समझने वाले लोगों ने जिनकी ओर मुंह उठाकर नहीं देखा, ताराशंकर उन्हीं पतितों अवहेलितों के कथाकार थे।
इस कथा-संग्रह में ताराशंकर की पांच श्रेणी कहानियां शामिल की गई हैं। ‘राईंकमल’, ‘मरु की माया’, ‘प्रसाद माला’, ‘बड़ी बहू’, और ‘माला चंदन’- सभी अपने समय की बहुचर्चित कहानियां रही हैं।

‘राईकलम’ और ‘माला चंदन’ कहानियों में गृहस्थ वैष्णवों की जीवन क्या चित्रित हुई है। बंगाल के ये वैष्णव लोग संन्यासियों से भिन्न होते थे। समाज के निम्नवर्ग के व्यक्ति होने के बावजूद उनकी गृहस्थी के तौर तरीके सामाजिक अनुशासनों से नियंत्रित होते थे। गांव में वैष्णवों की स्थिति के बारे में ताराशंकर ने लिखी है, खेतिहर किसानों के गावों सभी लोग माला-तिलक धारण करते हैं, हाथ जोड़कर बातें करते हैं, प्रभु कहकर सम्बोधन बजाते हैं, वैष्ण- वैष्णवियां एकतारा-खंजनी लेकर गाना-गाती हैं; बाउल लोग अकेले ही एकतारा बजाकर गाना गाते हैं। माला-चंदन कहानी में गृहस्थ वैष्णवों के प्रसंग में ताराशंकर ने कहा है, ‘वैष्णव संप्रदाय के लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी गृहस्थों की तरह शादी-ब्याह करके सद्गृहस्थों के आचार-व्यवहार को अमल में लाते हुए अपना जीवन बिताते हैं।’
इन कहानियों की दूसरी विशेषता उनकी मानवीयता है। सिर्फ वैष्णव भक्त होने के नाते ही नहीं बल्कि वैष्णवी धर्मावलम्बी व्यक्ति के रूप में उनके सुख-दुख की बातों का ताराशंकर ने अपनी कहानियों में उल्लेख किया है।

-अनुवादक



राईकमल



वह छोटा-सा आश्रम पौधों की बाड़ से घेर दिया गया था। उसमें कुछ आम, अमरूद, नीम और सहजन के पेड़ थे पीछे की तरह कुछ बांस के झांड़ भी थे। दूर से लगता था कोई छोटा बगीचा हो। उसी के बीच दो तरफ दो कमरे बने हुए थे औ लाल मिट्टी से पुता हुआ एक साफ-सुथरा आंगन था। उसका फर्श इतना चमकता था कि लोग कहते थे अगर उस पर सिंदूर भी गिर जाए तो उसे आसानी से उठाया जा सकता था। आंगन के बीच में माधवी और मालती की दो लताएं आपस में मिल-जुलकर बांस के मचान पर फैली हुई थीं जो साल भर पानी-पारी से फूलती रहती थीं।
आश्रम में मां और बेटी-कामिनी और कमलिनी रहती थीं। लोग कहते-मां बिटिया। मां कामिनी खंजनी बजाकर, गाकर भीख मांगती थी, घर-बार। संभालती थी और बेटी कमलिनी गाना सीखती थी, मालती माधवी की लताओं में पानी देती थी और लाल मिट्टी से घर-द्वार लीपती थी। वह बड़ी हंसमुख थी। सारे समय हंसती ही रहती।

रसिकदास अधबूड़ा बाउल था। सारस की तरह जैसी उसकी लम्बी गर्दन थी, वैसे ही उसके हाथ-पांव थे। उसका पूरा शरीर ही सारस की तरह लगता था। उसकी दाढ़ी इतनी लम्बी थी कि उसमें वह चोटी बनाता था। बड़े-बड़े बालों का जूड़ा बना लेता। वही कमलिनी को गाना सिखाता था। उसका आश्रम बगल में ही था मगर वह इसी आश्रम के आस-पास मंडराता रहता था।
उसने कमलिनी का नाम रखा था-राईकमल !
कमलिनी उसे कहती थी-बकबक बाबाजी !
यह सुनकर रसिकदास हंसता था। मां कमलिनी को गाली देती, ‘मर मुंह झौसी, चौदह साल की हो गयी, मगर...’
रसिक हंसते हुए उसे टोककर कहता, नहीं, नहीं उसे डांटो मत ! वह आनंदमयी है, राईकमल...।’
वह कमलिनी बढ़ावा पाकर अपनी बात पर जोर देकर कहती, ‘मैं तो बक बाबा जी ही कहूंगी।’ यह कहकर वह आंचल से अपना मुंह दबाकर हंसती।

मां झाड़ू लगाते-लगाते झाडू तानकर कहती, ‘दुबारा कहा तो छोड़ूगी नहीं।’
बाहर से मोड़ल परिवार का रंजन बुलाता, ‘कमली।’
कमलिनी दौड़ने की मुद्रा में कहती, अब इसे तू खुद अपने मुंह पर मार ले। भाड़ में जाए तुम्हारा गाना सिखाना, मैं तो बेर खाने चली।’
मां कहती, ‘निकल यहां से, हमेशा के लिए निकल जा।’
बेटी इस बात पर ध्यान ही नहीं देती। वहां से चली जाती। मां उसके पीछे-पीछे दरवाजे तक आकर कहती, ‘अरे ओ बेर की लोभी, बेर खाने की जरूरत नहीं है, मैं कहती हूं वापस लौट आ। अरे, लोग क्या कहेंगे, तुझे कुछ इसका भी ख्याल है ?’
रसिकदास हसंता रहता। उसको इस तरह हंसते हुए देखकर कामिनी के तन बदन में आग लग जाती। वह कहती, ‘तुम भी क्या हो महंत बेमतलब हंसते रहते हो।’

रसिकदास कोई जवाब नहीं देता। कामिनी अपने मन में बड़बड़ाती जाती और बुहारी करती जाती।
गाना सीखने वाली छात्री के गायब होने पर महंत अपने ही मन में गुनगुनाता हुआ आश्रम से बाहर निकल आया-
‘फुटल राई कमलिनी, कमल कृष्ण भ्रमर एसे
बलि, कथाय तादेर कि जाय आसे।
कूल तो कमल चायना वृन्दे, माझ जलेई से हासे-भासे।’
(राधा रूपी कमलिनी के खिलते ही कृष्ण रूपी भ्रमर वहां रसपान करने आ पहुंचा दूसरे क्या कहते हैं, इन्हें इसकी कोई परवाह नहीं थी। वृन्दे, किनारे को तो कमल की चाह नहीं होती, कमलिनी जल में मुस्कराती हुई खिली रहती है।)
रंजन, हरि मोड़ल का लड़का था। वह कमलिनी से दो-तीन साल बड़ा था। कमलिनी का वह खेल का दुल्हा था। वह कमलिनी की छेड़छाड़ का गुसाईं था।

बचपन में बटलता के खेल के मैदान में रंजन धूल धूसरित देह से बरगद के पेड़ के ऊंचे जड़ पर, जो उसका तख्तपोश था, बैठकर किसी वयस्क किसान की तरह कहता, उफ धूल कितनी तेज हो गयी है। पूरे शरीर में जैसे पसीने की बाढ़ आ गयी है। बहू, ओ बहू, जरा चिलम देना तो, और जरा पंखा भी..।’
दूसरी तरफ से चपला कमली प्रबला वधू की तरह झुंझलाकर कहती, ‘बलिहारि जाऊं, मैं पूछती हूं अपनी गरज मुझ पर क्यों झाड़ते हो, अभी करने को कितना काम पड़ा हुआ है। वह सब छोड़कर मैं अब तुम्हारी चिलम भरने जाऊं, तुम्हे पंखा झलूं। मैं कहती हूं, तुम खुद ही चिलम बना लो।’
रंजन नाराज होकर कहता, इस बात को समझ ले, धूप में पसीने-पसीने हुआ किसान और आग में तपायी हुई फाल दोनों समान होते हैं। जरा जुबान सम्हालकर बात कर, नहीं तो तेरा जो जांगर नहीं चलता उसे मैं अभी ठीक कर दूंगा।’
कमली आगे बढ़कर रंजन के सामने अपनी पीठ करके कहती, ‘जरा हाथ तो चला, देखूं एक बार। मेरा संसार ठीक करने वाला, अरे तू मेरा होता कौन है रे ?’’

रंजन कमलिनी की चोटियों में गुंथे गये जूड़े की एक चोटी अपनी नन्हीं मुट्ठी में पकड़कर दनादन दो-चार घूंसे जड़ देता।
कमलिनी झटके से अपनी चोटी रंजन के हाथ से छुड़ा लेती। इस तरह उसके कई बाल भी उखड़ जाते थे। वह रंजन के चेहरे पर धूल की बौछार करते हुए रोते-रोते कहती, ‘क्यों तू मुझे क्यों मारेगा ? तू मुझे मारने वाला कौन होता है ?’
रंजन कुछ कह नहीं पोता। उसकी इच्छा होती वह कमलिनी का हाथ पकड़कर उसे मना ले, लेकिन न जाने उसे कैसी शर्म आती।
उसके मुहल्ले का भोला कमली की ओर से कहता, ‘‘खेलते वक्त मारपीट करता है रंजन ?’
रंजन से फिर बदार्श्त नहीं होता। वह गुस्से में कहता, ‘‘क्यों नही मारूंगा ? औरत की चार बातें सुनकर चुप रह जाने वाला भी भला मर्द होता है ?’
कमलिनी भी उसी तेवर में चिढ़ते हुए कहती, ‘अरे वाह रे मेरा मर्द ! वह कहावत है न-भात देने की क्षमता नहीं और हाथ चलाते वक्त पति जा, अब से मैं तेरी औरत नहीं बनूंगी। तेरे साथ कुट्टी-कुट्टी कुट्टी !’
इसी तरह उस दिन का खेल खत्म हो जाता। दूसरे दिन खेल शुरू होने के पहले ही आकर भोला उससे कहता, चल आज हम-तुम दोनों....’
कमली नजर फेरकर देखती तो रंजन को उदास खड़ा पाती। बनियों की लड़की परितोष रंजन से कहती, ‘चल आज तू मेरे साथ खेल।’

वह स्वीकृति के लिए रंजन की ओर देखती लेकिन रंजन सिर हिलाकर कहता, ‘नहीं, मैं अब शादी नहीं करूंगा।’
भोला हंसकर व्यंग्य करते हुए कहता, ‘अरे मेरा गोसाईं ठाकुर।’
कमली अपने हाथों को छुड़ाकर उसकी ओर बढ़ती भोला उसका इरादा समझकर कहता, ‘कमली तू फिर मार खायेगी।’
कमली कहती, ‘अब जो वह करना चाहे करे, जब उसे दूल्हा समझ लिया तो रहना उसे साथ ही पड़ेगा, अब मेरी दो-दो बार शादी तो नहीं होगी।’
यह कहने के बाद वह रंजन के खेलघर में आकर अपनी जगह जमकर बैठते हुए फर्माइश करती, ‘तकदीर से मुझे कैसा मर्द मिला। घर में नून-तेल कुछ भी नहीं है। मैं पूछती हूं, क्या मैं रोजगार करके लाऊंगी ?’ रंजन के चेहरे के सामने अपना हाथ नचाकर वह यह कहती। रंजन यह सुनकर भी कुछ नहीं कहता था बस उदास होकर बैठा रहता।
कमली भोला को बुलाकर कहती, ‘भोला हमारा मर्द तो वाकई गोसाईं बन गया है।’ इसके बाद वह फुसफुसाकर रंजन के कान में कहती, ‘कैसे गोसाईं हो, मुझे घूंसा मारने वाले गोसाईं ? कहकर वह खिलखिलाने लगती।
रंजन भी हंसने लगता।
खेल के बीच में दूसरों की नजर बचाकर रंजन भी फुसफुसाकर कहता, ‘अब नहीं मारूंगा मेरी लक्ष्मी ! काली मैया की कसम !’
कमली फिर हंसने लगती।

वही रंजन आज तरुण किशोर था। उसकी आंखों के कोरों में बसंत के कोंपलों की तरह लालिमा उभर आयी थी। वह कमली भी चौदह साल की कमलिनी बन चुकी थी। उसकी देह अभी भले ही पुष्पित नहीं हुई थी लेकिन उसका सौरभ-उसकी संभली हुई चाल उसके रंग के निखार, झुकी पलकों, गालों की हल्की लाली से फैलने लगा था। फिर भी उसकी चपलता में कमी नहीं आयी थी। उम्र का धर्म उसके मर्म को जीत नहीं पाया था। बस उसकी चपलता में थोड़ी कमी आ गयी थी।
इसीलिए मां के डर दिखाने के बावजूद वह रंजन के साथ बेर तोड़ने भाग गयी। रंजन पेड़ पर चढ़कर बेर तोड़ता, नीचे खड़ी कमलिनी उन बेरों को फटाफट बटोरती जाती।

एक पका हुआ बेर जमीन पर टपक गया। कमली उसे उठाकर खाते हुए बोली, ‘वाह कितना मीठा बेर है।’
पेड़ से रंजन कूदते हुए बोला, ‘अरी, आधी बेर मुझे भी खिला।’
कमलिनी ने अपनी झूठी आधी बेर रंजन के मुंह में ठूंस दी। रंजन उसके खट्टमिट्पने का चटखारा लेते हुए बोला, ‘वाह ! ’’
कमलिनी खिलखिलाकर हंसते हुए बोली, ‘‘कैसा लग रहा है।’
रंजन उसी तरह चटखारा लेकर बोला, ‘बहुत मीठा, तेरा जूठा है न !’
कमली ताल बजाकर बोली, ‘बोल हरि बोल, मेरे मुंह में शक्कर है क्या ?’
रंजन ने कहा, ‘हाँ, तू ही मेरी मिठास है।’
कमलिनी हंसते-हंसते लोट-पोट हो गयी। बोली, ‘पता है, तेरा झूठा मुझे कैसा लगता है ?’
‘कैसा ?’

‘तीता, तू मेरी मिर्च है।’
रंजन बोला, ‘जिसका जैसा प्यार।’
कमली बीच में बोली, ‘खैर, यह तो हुआ, मगर मेरा झूठा खाकर तेरी तो जात चली गयी।’
रंजन ने झट से कमलिनी के दोनों हाथों को पकड़कर कहा, ‘मुझसे शादी करने का वादा कर तो मैं अपनी जात खोने को तैयार हूं।’
कमली बोली, ‘हट मुझे छोड़।’
रंजन बोला, ‘बताओ, नहीं तो छोड़ूगा नहीं।’ उसने उसे और कसकर पकड़ लिया।
कमली को दर्द होने लगा। बोली, ‘ओह, अरी मैया री !’
रंजन ने घबराकर छोड़ दिया। कमली हंसते हुए भाग गयी।
जाते-जाते बोली-

‘चाषार बुद्धिर धार के मन
-ना-भोंता लांगलेर धार जेमन।’
(किसान की बुद्धि बिना धार वाले हल के फाल जैसी होती है।)
रंजन खड़े-खड़े भागती किशोरी की उस चपल गति को देखता रह गया। कमली इस बीच अपने में पहुंचकर अपने आंगन में उन दोनों लताओं की छांह के नीचे बैठकर बेर छांटने में व्यस्त हो गयी।
रंजन की मां कमली को हास्यमयी कहती थी। रंजन को मंडा (मिठाई-विशेष) देते समय उसका आधा कमलिनी को भी देती। लेकिन जिस दिन रंजन कमली के झूठे बेर खाकर घर लौटा, उस दिन वह बोली, ‘राक्षसी कहीं की।’ और उसे खिलाने के लिए ‘झाडू’ की व्यवस्था भी कर ली।

उसे जूठा बेर खाते हुए खुद उसके पिता हरि मोड़ल ने देखा था।
रंजन की मां यह बात सुनकर अपने गालों पर हाथ रखकर चकित होते हुए विस्मित स्वर में बोली, ‘अरे बार रे, अब हमारा क्या होगा ? जात और कुल दोनों का ही सत्यानाश हो गया। राक्षसी हरामजादी ! कैसे लड़की है वह ! उसके मुंह पर झाड़ू मारो। और वह हरामजादा कहां गया ?’
हरि मोड़ल ने टोकते हुए कहा, ‘चुप ससुरी ! इस तरह चीखते हुए गाली- गलौज मत कर। जाति वाले सुन लेंगे तो जीना हराम कर दें। जाति से बाहर कर देंगे....’
झिड़की सुनकर रंजन की मां उस वक्त चुप हो गयी। मगर रंजन को सामने पाते ही हाथ और अपनी घनी भौहें नचाकर बोली, ‘‘मैं पूछती हूं, अरे ओ मुंह झौंसा, तेरे रंग-ढंग क्या हैं, बता तो ?’
रंजन बिना दबे हुए बोला, ‘मुझे भूख लगी है। मैं यहां तुम्हारी गाली खाने नहीं आया हूं।’
मां बोली, ‘आ तुझे खाने को दूं। तेरे मुंह में राख डालूं। कमलिनी के झूठे बेरों से पेट नहीं भरा ? बेहया जात खोने वाला कहीं का।’
सांप के माथे पर जैसे मूसल की चोट पड़ी हो। रंजन की लाल-लाल आंखें जमीन पर झुक गयीं।
आड़ से पिता ने निकलकर कहा, ‘तू पैदा होते ही मर क्यों नहीं गया ? मेरी जगहंसाई कर दी।’
रंजन चुप खड़ा रहा। उसे खामोश देखकर मोड़ल का गुस्सा और भी बढ़ गया। उसने कहा, ‘तू चुप क्यों हैं। जवाब दे।’
फिर भी उसे जवाब नहीं मिला।

हरि मोड़ल ने कहा, ‘मैं भी वैसा आदमी नहीं हूं। मैं तुझे बेदखल कर दूंगा। इस घर से निकाल दूंगा। खबरदार, अब उधर गया भी। मां-बेटी की उस चोहद्दी के आसपास नहीं जायेगा। समझा।’
मोड़ल चेतावनी देकर वहां से चला गया। रंजन खामोश बैठा रहा।
अब मां ने आकर उसे ढाढ़स बंधाया, ‘इस माघ में ही तेरी शादी कर दूंगी। ऐसी बहू लाऊंगी कि उसके सामने कमली भी पानी भरेगी।’
रंजन ने सिर हिलाकर कहा, ‘नहीं।’
मां ने चकित होकर पूछा, ‘मतलब ?’
‘मैं शादी नहीं करूंगा।’
मां और भी चकित होकर बोली, ‘तब क्या करेगा ?’
रंजन उठकर वहां से जाते हुए बोला, ‘मैं संन्यासी बनूंगा।’
रंजन की मां लाज-शर्म भूलकर जोर से चिल्लाने लगी, ‘मोड़ल-ओ मोड़ल।



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