प्यार का चेहरा - आशापूर्णा देवी Pyar Ka Chehara - Hindi book by - Ashapurna Devi
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प्यार का चेहरा

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : सन्मार्ग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :102
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5135
आईएसबीएन :000

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नारी के जीवन पर केन्द्रित उपन्यास....

Pyar Ka Chehra - A Hindi Translation of Bangla Book by Ashapurna Devi

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लेखिका आशापूर्णा देवी का एक नया उपन्यास।
आशापूर्णा देवी का लेखन उनका निजी संसार नहीं है। वे हमारे आस-पास फैले संसार का विस्तारमात्र है।
इनके उपन्यास मूलत: नारी केन्द्रित होते हैं। सृजन की श्रेष्ठ सहभागी होते हुए भी नारी का पुरुष के समान मूल्यांकन नहीं ? पुरुष की बड़ी सी कमजोरी पर समाज में कोई हलचल नहीं लेकिन नारी की थोड़ी सी चूक उसके जीवन को रसातल में डाल देती है। यह है एक असहाय विडम्बना !
बंकिम, रवीन्द्र, शरत् के पश्चात् आशा पूर्णा देवी हिन्दी भाषी आँचल में एक सुपरिचित नाम है-जिसकी हर कृति एक नयी अपेक्षा के साथ पढ़ी जाती है।

प्यार का चेहरा


लोहे की दो सलाखों के बीच की फाँक में चेहरा कसकर दबाए रहने के कारण दो गोलाकार शिकनें पड़ गई हैं और इसके फलस्वरूप दाग उभरता जा रहा है, तो भी सागर अपने चेहरे को कसकर दबाए हुए है। देखकर लगता है, यदि उसके वश की बात होती तो वह उस सँकरे स्थान से अपना माथा बाहर निकाल झुककर उस दृश्य को देखता।
हालाँकि वह देखने लायक कोई दृश्य नहीं है।
एक अधबूढ़ा आदमी बगीचे में घूम-घूमकर शायद खाद छिड़क रहा है।

यह फूलों का बगीचा नहीं, साग-सब्जी का बगीचा है। भला गरमियों के इस मौसम में फल ही क्या सकता है ? न तो गोभी, न झकमक करता टमाटर, न गदराया हुआ बैंगन-निहायत भिंडी, झींगा, वरसेम ही फल सकते हैं। फिर भी सेवा-जतन में कोई ढिलाई नहीं बरती जा रही है। यह भी भला कोई देखने लायक चीज़ हैं ?
सागर की आँखें देखने से अलबत्ता यह नहीं लगता कि उसे बगीचे के सम्बन्ध में कोई कुतूहल है, कुतूहल है तो बस उस आदमी के सम्ब्नध में ही।

उस आदमी का पहनावा है एक बदरंग खाकी हाफपैंट और बिना बाँह वाली बनियान, मौजेविहीन पैरों में भारी गमबूट और सिर पर इस अंचल का पेंटेंट ताड़ के पत्ते का हैट।
सागर ने छुटपन में इस किस्म का हैट देखा है, माँ जब मेले के मौके पर मायके आती तो सागर के लिए खरीदकर ले जाती। शायद प्रवाल के लिए भी उसके बचपन में ले जाती थी। यहाँ के मेले की ताड़ के पत्तों की चीज़ें मशहूर हैं-बैंग, छोटी टोकरी, पिटारी और इस किस्म की टोपियाँ।
मेले के बाद कुछ दिनों तक बच्चों-बूढ़ों-सभी के सिर पर इस तरह के हैट देखने को मिलते हैं।
सागर ने यह सब अपनी माँ से सुना है।
इसके पहले सागर कभी अपनी माँ के देस के मकान में नहीं आया था।

सागर के दादा ने एक बार सागर की माँ से कहा था, ‘‘बच्चे को न ले जाना ही बेहतर रहेगा। देहात है, मच्छरों की भरमार है, कहीं रोग-व्याधि का शिकार न हो जाए। सुना है, बहू, तुम्हारे पिता के देस के मच्छर एक साबुत आदमी को घर से घसीटेते हुए मैदान में ले जाकर फेंक दे सकते हैं।’’
बस, उस समय जो माँ के मन में अभिमान जगा तो कभी लड़के को अपने साथ ले मायके नहीं गई। उन दिनों सागर का भाई प्रवाल शायद बच्चा था। सागर का जन्म नहीं हुआ था।
सिर्फ दादा को ही क्यों गुनाहगार ठहराया जाए ? सागर का बाप भी कब यहाँ आया है !
सुनने को मिला है, सागर का बाप भी गाँव के नाम पर बेहद घबराता था। किसी भी हालत में जाने को राजी नहीं होता-इस-उसके साथ मां को भेज देता। माँ के गोत्र का एक बड़ा भाई भोला कलकत्ता की मेस में रहता था। वह मेले के अवसर पर घर जाने से कभी चूकता नहीं था।

घर जाने के एक दिन पहले शाम के वक्त भोला मामा सागर के घर आ जाता, साला ही आदर-खातिर के साथ खाना खिलाता, रात में वह खर्राटे भरकर सोता और सुबह की गाड़ी से माँ के साथ रवाना हो जाता। हाँ, सुबह की गाड़ी में जाना ही सुविधाजनक रहता।
गाड़ी खुलने का वक्त यदि छह बजे होता तो भोला मामा रात के तीन बजे ही उठकर तैयार। रह-रहकर आवाज लगाता, ‘‘अरी चिनु तू तैयार हो गई ?’’
भोला मामा को सागर फूटी आँखों भी देख नहीं पाता।

प्रवाल भोला मामा के ताश का मैजिक देख मोहित होता, भोला मामा के गप्प जमाने के हुनर से आकर्षित होता, लेकिन सागर पर उसके व्यक्तित्व या कला का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उसे देखकर सागर को लगता, यह आदमी छद्म वेशधारी दैत्य है, सागर की माँ को बहलाकर उसका हरण कर लेने के मौके की तलाश में है और इसलिए इस तरह मजलिसी शख्स का स्वांग रच रहा है।
एक दिन यह बात माँ से कही भी थी। सुनकर माँ हँसी से लोट-पोट हो गई थी।
इतना ही नहीं, सागर से विश्वासघात करने में भी माँ बाज नहीं आयी थी। हँस-हँसकर भोला मामा को उसकी बात बता दी थी।
मुछन्दर भोला मामा की मूँछों के बीच कितनी हँसी छलक पड़ी थी ! सागर के मन में हुआ था, उसे ठेलते हुए घर से बाहर निकाल दे। अब सोचता है तो मन कैसा-कैसा तो करने लगता है !
लगता है, वह वाकई एक भलामानस था।

कई साल पहले भोला मामा गुजर चुके हैं, सो भी अकस्मात् ही। मेस से आकर एक आदमी ने सूचना दी, तेज बुखार आ गया है। यह सुनते ही सागर का बाप वहाँ गया। सागर की माँ से कहकर गया, वैसा कुछ होगा तो यहाँ ले आऊँगा। तुम घबराना नहीं।’’
जाने पर देखा, मौत के घाट उतर चुका है।
उस दिन की बाबूजी की बात सागर को अच्छी तरह याद है। घर वापस आने के बाद मां से कहा, ‘‘भोला दा को लाना संभव नहीं हो सका।’’
मां बोली, ‘‘बुखार उतर गया क्या ?’’
बाबूजी बोले,‘‘हां, हमेशा-हमेशा के लिए।’’
मां अचकचाकर फूट-फूटकर रोने लगी।
वही पहला मौका था कि सागर नामक बालक के मन में गहरी चोट लगी थी। सागर ने अपराध-बोध का भार महसूस किया था।

सागर यह नहीं चाहता था कि भोला मामा का ‘बुखार हमेशा-हमेशा के लिए’ खत्म हो जाए। सागर सिर्फ यही चाहता था कि भोला मामा का कलकत्ता से तबादला हो जाए। दूर, बहुत दूर-किसी देस में।
भोला मामा के मरने के बाद से ही सागर की मां का फूलझांटी जाना बन्द हो गया। कौन ले जाएगा ? मां को अपना कोई सगा भाई नहीं है। दो बड़ी बहनें हैं, जो दूर देस में रहती हैं। फूलझांटी में मां की मां, दादी और दादा हैं।
भैया के जनेऊ के दौरान अपनी मां की दादी और दादा को देखा है सागर ने। वे लोग आए थे। नानी नहीं आयी थी। बोली थीं, ‘‘मेरी आशा-आकांक्षा सारा कुछ खत्म हो चुका है। उत्सव के घर में मेरा जाना शोभा नहीं देता।’’
उस वक्त सागर ने महसूस किया था चूंकि सागर के नाना जीवित नहीं हैं, इसलिए ऐसा कहा है। एक व्यक्ति के मरने से दूसरे की आशा-आकांक्षा पर पानी फिर जाता है-यह जानकर सागर को बहुत ही दुख हुआ था। सागर ने जब से होश संभाला था अपनी नानी को नहीं देखा था।

लेकिन सागर की मां के दादा-दादी आए, चहल-पहल और खुशियों में शरीक भी हुए। मां की देखादेखी हमने उन्हें जब ‘दादी’ कहा तो हमारी गलती सुधारते हुए कहा, ‘‘नहीं-नहीं। दादी तो मैं तुम लोगों की माँ की हूं। तुम लोग झी मां कहकर पुकारना।’’
सुनकर सागर छि:-छि: बोल उठा था।
‘‘झी मां क्यों ? झी (नौकरानी) तो बरतन मांजती हैं।’’
मां बोली, ‘देहात में यही कहकर पुकारते हैं। खैर, बाबा, तुम लोग ‘बूढ़ी नानी’ कहा करना।’’
उन लोगों ने प्रवाल को सोने के बटन, नग जड़ी हुई अंगूठी दी, सागर को भी एक अदद ‘हाफ गिनी’ दी। बोले, ‘‘तेरे छोटे लड़के को तो देखा नहीं था, चिनु ! मुँह-दिखाई दी।’’
उन दिनों भोला मामा जीवित थे। उन्हीं को भेजकर मां ने फूलझांटी से सभी को बुलवाया था। दादा-दादी के अलावा बुआ, ताई जी वगैरह को। भोला मामा के साथ ही उन्हें वापस भेजा था। भोला मामा कहा करते, ‘‘मेरे लिए छुट्टी लेना कौन सी बड़ी बात है ! हूं ! चेयर की पीठ पर चादर बांध पांच दिन तक गायब रह सकता हूं ! ऑफिस का बंकिम बाबू सभी के दस्तखत की नकल कर सकता है। मेरे दस्तखत को हुबहू इस तरह उतार देता है कि देखकर मैं भी पता नहीं लगा सकता। आफिस की हाजिरी, बही का दस्तखत बंकिम बाबू मैनेज कर लेता है।

भोला मामा ने शादी नहीं की है, पत्नी पुत्र गृहस्थी कुछ भी नहीं है। तो भी इतनी छु्टटी की जरूरत क्यों पड़ती है ?...इस सवाल का जवाब है कि भोला मामा के परिचय के दायरे में जितने लोग जहां भी रहते हैं, उन लोगों के जितने भी कामों की जिम्मेदारी खड़ी होती है, उसका बोझ भोला मामा के मत्थे है।
‘‘भोला दा न होते तो मेरा यह सब कुछ भी न होता।’’ यह बात मां दुख के साथ अब भी कहती हैं।
यह भी कहती है, ‘‘भोला दा के चल बसने से फूलझांटी का मेरा माघ का मेला देखना बन्द हो गया।’’
बाबूजी को सुना-सुनाकर ही कहती हैं, मगर बाबूजी ऐसे बेवकूफ नहीं है कि कहें, ‘‘अच्छा, अभी मैं ही ले जाऊँगा।’’
सागर का अब तक यज्ञोपवीत-संस्कार नहीं हुआ है।
प्रवाल का इसी उम्र में बहुत पहले हो चुका है, जब वह नौ या ग्यारह साल का था।
सागर ने इस बार हायर सेकेण्डरी का इम्तिहान दिया है, फिर भी उसके यज्ञोपवीत-संस्कार के बारे में किसी को चिन्ता नहीं है।
कोशिश कर किसी उपलक्ष्य की तलाश की जाए और धूमधाम से यज्ञोपवीत-संस्कार कर दिया जाए, इस बात की इच्छा नहीं है किसी को। जिन्हें सबसे अधिक उत्साह हो सकता था, वे दुनिया से विदा हो चुके हैं। वे थे दादा जी।
इतना जरूर है कि सागर के दादा का श्राद्ध बड़ी ही धूमधाम से मनाया गया था।

किसी के मरने पर विवाह जैसी धूमधाम का माहौल क्यों रहता है, सागर को यह बात समझ में नहीं आयी थी। सागर को बड़ा ही दुख हुआ था। दादा को सागर बहुत ही प्यार करता था। उस तड़क-भड़कदार आयोजन के बाद बहुत सारे संदेश बच गए थे, इसके कारण मन और भी अधिक उदास हो गया था।
दादा संदेश खाना बेहद पसंद करते थे। हर रोज एक अदद संदेश खाते थे।
सागर के जी में हो रहा था, अगर कोई उपाय होता तो चार अदद संदेश कागज में मोड़कर दादा के पास भेज देता।
शायद उसी तड़क-भड़कदार आयोजन करने के फलस्वरूप बाबूजी लड़के के मामले में माथापच्ची नहीं कर रहे हैं।
माँ ने एक बार कहा था, ‘‘हायर सेकेंडरी का इम्तिहान देने के बाद ही सागर का यज्ञोपवीत-संस्कार कर देना अच्छा रहेगा। कॉलेज में दाखिला लेने के वक्त सिर पर बाल उग आएंगे।
बस, इतना ही।
उसके बाद ही फूलझांटी आने का जिक्र छिड़ा। माँ बोली, ‘‘लड़के बड़े हो गए हैं, उन लोगों के साथ मैं जा नहीं सकती हूं ? अब भी क्या उन्हें मच्छर घसीटकर ले जाएँगे ?’’

प्रवाल भी अभी बेकार बैठा हुआ है।
कब ‘पार्ट टू’ का इम्तिहान होगा, इस अनिश्चय की आशा में निराश होकर बैठा हुआ है।
‘‘पढ़ाई की जो कुछ तैयारियाँ की थीं भूलता जा रहा हूँ।’’- प्रवाल ने कहा था, ‘‘‘लेकिन किताबों को छूने तक की इच्छा नहीं हो रही है। अच्छा रहेगा कि माँ के मायके के गाँव के मच्छर काटेंगे तो सब कुछ भूल जाऊंगा। लौटकर आने पर नये सिरे से पढ़ने की एनर्जी हासिल होगी।’’
भैया ने ही हिम्मत बढ़ाई।
सागर से चार साल बड़ा है प्रवाल।

फूलझाँटी आते ही माँ सगे-संबंधियों के बीच खो गई। बड़े भाई का भी कोई अता-पता नहीं चलता। सागर को ही इस पुराने मकान की दूसरी मंजिल के कमरे में लाचार होकर रहना पड़ता है।
रेलगाड़ी से उतरने के दौरान सागर के पैर में मोच आ गई है।
सागर सुबह से दोपहर तक खिड़की पर मुँह टिकाये उस आदमी को देखता रहता है-ताड़ के पत्ते के हैट और गमबूट पहने आदमी को।
सुनने को मिला है, यह आदमी किसी समय एक आई. सी. एस. अफसर था। रिश्ते में मां का चाचा है वह।
ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता।

सच, ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता कि एक आई. सी. एस. इस प्रकार की हास्यप्रद वेशभूषा से सज्जित होकर खेत-खलिहान में काम कर सकता है।....मां की जबान से उनके इस चाचा के बारे में बहुत सारी बातें सुनी हैं सागर ने। मौका मिलते ही मायके के इर्द-गिर्द के लोगों के बारे में बातें करना मां की एक किस्म की व्याधि है। उनके पैतृक वंश का जो भी जहां कहीं है या था, उन्होंने अपनी बातचीत के सूत्र से उससे परिचित करा दिया था।
सागर को लगता है, मां के पास जैसे एक कैमरा हो, मां उसी के द्वारा अपने उन तमाम सगे-संबंधियों का, जो जहां भी है और था, फोटो खींचकर मन के एलबम में चिपकाकर रखे हुए हैं।
मौका मिलते ही मां उस एलबम को खोल लड़कों को दिखाने बैठ जाती है।
उसके साथ ही उन बातों का जिक्र छेड़ देती है जो कि बहुत बार कह चुकी है।
मां के दादा अनायास ही दस मील रास्ता पैदल चल सकते हैं, यह बात मां हर रोज नये सिरे से सुनाने बैठ जाती है।
प्रवाल ध्यान लगाकर नहीं सुनता।

प्रवाल हंस-हंसकर कहता है, ‘‘यह कहानी और कितनी बार सुनाओगी मां ?’’
सागर मां के मन को उस तरह चोट पहुंचाना नहीं चाहता।
सागर को लगता है, मां के मन में कही एक दबा हुआ दर्द है। यही वजह है कि सागर मां की बातें और कहानियां मन लगाकर सुनता है।
मां के आई. सी. एस. चाचा की कहानी सुन-सुनकर उस आदमी के सम्बन्ध में सागर एक दमकता रंगीन चित्र बनाकर रखे हुए था। बहुत बार सुन चुका है कि उस बड़े ओहदे और वेतन को बात की बात में छोड़ दिया था, ‘‘बोले, झठ के साथ समझौता नहीं कर पाऊंगा।’’

लड़कों से अपने मायके के लोगों के संबंध में बातचीत करने के दौरान सागर की मां लड़कों की उम्र या बोधशक्ति का ख़याल नहीं करतीं, जिक्र छिड़ते ही (खुद ही जिक्र करती है) उनके चेहरे पर एक प्रकार की चमक आ जाती है।
उस आई. सी. एस. बी. एन. मुखर्जी के बारे में भी उसी तरह बताया है, ‘‘चाचाजी उन दिनों बांकुड़ा के जिलाधीश थे, कड़ी नीति के पाबन्द, अत्यन्त ही तेजस्वी पुरुष। अचानक उनके हाथ में एक मामला आया। एक घोटाले और भ्रष्टाचार का मामला। लाखों रुपये घोटाले का मामला। चाचाजी ने उसकी जड़ खोदकर देखा, इस घोटाले का गुरु है एक मंत्री का दामाद।

‘‘और उसके मददगार हैं उस दामाद के ससुर मंत्री जी।....तब देश की स्वाधीनता को लंबा अरसा नहीं गुजरा था, शिशु राष्ट्र के नाम पर मनमानी का दौर चल रहा था। इसके अलावा जनता भी उस समय इतनी जागरूक नहीं थी। भ्रष्टाचार देख-देखकर उसे अनदेखा करने की अभ्यस्त नहीं हुई थी; नतीजतन इस सम्बन्ध में शोर-शराबा मच गया।
मंत्री महोदय ने चाचा से अनुरोध किया कि इस मामले को किसी तरह दबा दिया जाए। कहने का मतलब था कि सारी बातों पर लीपापोती कर ऐलान कर दें कि गलती से इस तरह का मामला उठ खड़ा हुआ था।
चाचा बोले, ‘‘ऐसा करना नामुमकिन है।’’
उन लोगों ने कहा, ‘‘बात सही हो तो भी मंत्री के दामाद को कठघरे में खड़ा नहीं कराया जा सकता है। ऐसा करना संभव नहीं है।’’

चाचा बोले, ‘‘तो फिर जो संभव है वही करना होगा।’’
‘‘बस, इतना बड़ा पोस्ट, इतनी बड़ी तनख्वाह की नौकरी छोड़कर फूलझांट चले आए। बोले, खेतीबाड़ी करूँगा।’’
यह कहकर सागर की मां लड़कों की ओर ताककर उल्लास भरे स्वर में कहती, ‘‘तुम लोगों की पाठ्य-पुस्तक में रवीन्द्रनाथ की वह जो कविता है: ‘मैं भी दण्ड त्याग रहा हूं अब तो, लौट रहा हूं अपने घर को, न्यायालय के खेलघर में अब न रहूँगा अवरुद्ध।’ ठीक ऐसा ही है न ?...अन्तिम पंक्तियां याद हैं-‘त्याग चला गया गौरव का पद, दूर फेंक सम्पदा सारी, गांव की कुटिया में चला गया दीन-दरिद्र वह विप्र।’....बिनू चाचा के बारे में सोचते ही मुझे उस कविता की याद आ जाती है-जानता है, सरकारी पेंशन तक स्वीकार नहीं की। कार्यकाल पूरा न होने पर भी यदि त्यागपत्र दे दे तो कुछ-न-कुछ पेंशन दी जाती है, लेकिन उच्च अधिकारी ने उन्हें न तो वक्तव्य देने दिया और न जाहिर ही होने दिया कि उन्होंने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया है। बताया कि अस्वस्थ रहने के कारण छोड़ रहे हैं। ऐसी हालत में पेंशन देने का नियम है। मगर चाचा ने कहा, फटे हुए जूते पांव से उतारकर फेंक देने के बाद क्या उसका हाफसोल इस मकसद से उठाकर रख लूं कि काम में आएगा।’’

मां और भी उल्लास भरे स्वर में कहती, ‘‘मगर दुनिया के लोग क्या इस पराक्रम का महत्त्व समझते हैं ? नहीं, समझते नहीं। बिनू चाची अपने पति की इन दो प्रकार की बेवकूफी से आग-बबूला हो चाचा से नाता तोड़कर अपने दो लड़कों के साथ मायके चली गई। इतना जरूर है कि लड़के तब छोटे थे। चाची के पिताजी एक बड़े पुलिस अफसर हैं। बड़ा भाई भी पुलिस की नौकरी में है। दुनिया की जितनी भी काली करतूतें और भ्रष्टाचार हैं, उन लोगों के लिए कोई मानी नहीं रखते। चाची जानती हैं, वे सब आम वारदातें हैं।

....हाथ में ताकत रहेगी तो लोग मौके से लाभ उठाएंगे, उस ताकत को अमल में लाएंगे। यही आदमी का निजी धर्म है। ऐसे लोगों से तालमेल बिठाकर ही समाज में रहना है। क्योंकि ऐसे ही लोग समाज के सिरमौर हैं। तुम सोचोगे मैं एक महान् व्यक्ति हूं, मगर लोग-बाग ऐसा नहीं कहेंगे। कहेंगे गंवार, मूर्ख और सूझबूझ से कोसों दूर करने वाला आदमी है। तुम अपनी महिमा को अक्षुण्ण रखोगे, यही क्या सबसे बड़ी बात है ? पत्नी और पुत्र के प्रति कोई कर्त्तव्य नहीं है ?’’

इस पर चाचा बोले, ‘‘पत्नी और बच्चे मेरी ही तरह रहेंगे। जब उच्च पद पर आसीन हो मुखर्जी साहब होकर घूमता-फिरता था, उस समय तो पति के सब कुछ के साझीदार थीं। अभी यदि पति की हालत में हेर-फेर आता है तो उसी के अनुसार चलना है। पत्नी क्या सिर्फ सुख-सुविधा की ही भागीदार होती है ? गरीबी की नहीं ? सुख की ही संगिनी होती है ? दु:ख की नहीं ?..इसके बाद तुम लोग सुनोगे तो अवाक् रह जाओगे। चाची ने दस्यु रत्नाकर की कहानी से नजीर पेश करते हुए कहा था, यही होता है। पत्नी-पुत्र, मां-बाप कोई भी दुर्बुद्धि और दुर्मुति के फलाफल का भागीदार नहीं होता।
सो उन्होंने उस भाग को स्वीकार नहीं किया।
तभी से मायके में रह रही हैं।

बच्चे बड़े हो चुके हैं। बड़ा लड़का अपने मामा और नाना की पैरवी के कारण पुलिस विभाग के उच्च पदाधिकारी की नौकरी पर आसीन हो चुका है। अब चाची भला यहां क्यों आने लगीं ?
सागर ने अवाक् होकर कहा था, ‘‘उन लोगों में फिर अभी मेलजोल नहीं हुआ ?’’
मां ने हंसकर कहा था, ‘‘नहीं। फिर कभी मेलजोल नहीं हुआ।’’
सागर उन दिनों आठवें वर्ग का छात्र था।






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