विश्वास अविश्वास - आशापूर्णा देवी Vishwas Avishwas - Hindi book by - Ashapurna Devi
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विश्वास अविश्वास

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : सन्मार्ग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :104
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5136
आईएसबीएन :0000

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नारी जीवन पर आधारित उपन्यास...

Vishwas Avishwas - A Hindi Book by Ashapurna Devi

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

विश्वास और अविश्वास.....इसी द्वन्द्व का नाम ही तो है जीवन। फिर भी इसी द्वन्द के बीच फूल खिलते हैं। वसन्ती बयार बहती है। ‘जीवन’ को अपनी सार्थकता मिलती है। ढूँढ़ लेता हैं जीने का अर्थ। जैसा मिला था कुशल और तितीक्षा को। छोटी-सी एक घटना-पल भर के लिए एक अविश्वास ने दोनों का जीवन बिखेर डाला। चलती कार से कूदी थी तितीक्षा खुद को बचाने लेकिन अंधकार के आवर्त से और ज्यादा ही उलझ गयी। वहाँ से उद्धार पाने की आशा से भागते-भागते अन्तर में पा सकी थी एक निश्चिन्त आश्रय। डॉक्टर घोषाल और उनकी पत्नी ने उसे अपनी बेटी मानकर अपने आगोश में भर लिया था।

उधर उसके असली जन्मदाता पिता ने अपनी बेटी को अविश्वास किया, उसे अछूत बनाकर अलग-थलग कर रखा। और उसी को वरण कर ले जाने के लिए अलकनंदा ने ज़मीन-आसमान को एक कर डाला था ढूँढ़ते-ढ़ूँढते। नहीं मिली थी। लम्बे चौदह साल बाद, कलकत्ते से दूर एक समारोह में जाकर उसकी लड़की को ढूँढ़ निकाला था कवि अग्निवाहन ने। तितीक्षा का नाम अब आलो था। कुशल ही था अग्निवाहन। इसके बाद....इसके बाद ही तो तितीक्षा और कुशल ढूँढ़ पाए थे जीवित रहने का अर्थ।

विश्वास-अविश्वास


‘अचानक घड़ी की सुई ने दौड़ लगाना क्यों शुरू कर दिया ?’ सुचित्रा ने अपने आपसे यह प्रश्न पूछा-‘क्या मेरे साथ दुश्मनी करने के लिए ? और दिन तो रात के नौ बजने में बहुत समय लग जाता है।’
सोच रही है और बार-बार कमरे से निकलकर छह फुट बाई चार फुट की बालकनी में आकर खड़ी हो जा रही है। फिर भी ज्यादा देर तक स्थिर होकर खड़ी भी नहीं रह पाती थी। कमरे में लौट आती थी। बैठ जाती थी सोफे पर या फिर खाट पर। इस कमरे में यही एक सोफा है। कमरे के बीचोबीच डबल बेड़ बहुत सारी जगह घेरे बैठा है और उस पर शरीर को ढीला छोड़े बैठी हैं दो बहनें। दोनों ही बराबर की वज़नी, मोटी और हट्टी-कट्टी। सोफे पर बैठने से ज्यादा खाट पर बैठना पसन्द करती हैं वह दोनों। थोड़ी देर पहले जब वे दोनों यहाँ घूमने आई थीं, सुचित्रा खुशी से फूली नहीं समाई थी। और अब मन-ही-मन सोच रही है- ‘और कब तक बैठी रहेंगी ये लोग ? चली क्यों नहीं जाती बाबा ?’

 उधर दोनों बहनों को भी एक ही तरह की अस्वस्ति हो रही थी- ‘और कब तक बैठा रहा जा सकता है ?’ उस पर जाएँ भी तो कैसे जाएँ ? सुचित्रा को दुश्चिन्ताजनक परिस्थिति में छोड़कर जाया भी तो नहीं जा सकता है ? वह भी इतने सगे होकर ? अपनी घर-गृहस्थी है। घड़ी की सुइयाँ मानो शरीर में चुभ-चुभ कर जता रही थीं कि घर में उनकी अनुपस्थिति से क्या-क्या असुविधा हो रही है।

एक बार और बरामदे से होकर ज्यों ही सुचित्रा लौटी, भाभी की दीदी बोल उठीं- ‘न; लगता है आज चित्रा की लड़की से मुलाकात न होगी। अब तो उठना चाहिए। नीरू, अब लौटा जाए। उधर चिन्ता भी हो रही है....’
भाभी बोल उठीं- ‘क्यों री चित्रा, तू तो कह रही थी, ‘पास ही किसी सहेली के जन्म-दिन के निमन्त्रण पर गई है, शाम को लौटेगी’ तो आई क्यों नहीं ?’

सुचित्रा की इच्छा हो रही थी, गला फाड़कर रोएँ। फिर भी मुश्किल से आत्म संवरण किया। फीकी आवाज़ में बोलीं-‘यही तू कहकर गई थी बार-बार।’ कहा था ‘थोड़ी ही देर में लौट आऊँगी।’
भाभी ने अप्रसन्न भाव से कहा-‘आज जब घर पर कोई है नहीं तो मुझे ही जाने नहीं देना चाहिए था।’
क्या कहती, सहेली खुद आई थी, बहुत बार कहने लगी, ‘जरूर भेज दीजिएगा मौसीजी’ तो मना न कर सकी। कहा था, ‘देर नहीं होगी।’

‘यहाँ से दूर कितना है ? किसी तरह से पता नहीं किया जा सकता है ? पता जानती है न ?’
सुचित्रा को लगा, उसे जैसे कटघरे में खड़ा कर दिया गया है, अब सवाल पूछे जायेंगे। इसलिए मन-ही-मन कहने लगी।, पता जानकर करना क्या है ? वहाँ चिट्ठी लिखनी है क्या ? फिर इसके पहले तूतून-तुतान-तितिक्षा ने ऐसा किया था क्या ? जैसा कहकर जाते हैं वैसे ही लौट आते हैं। बहुत ज्यादा दोस्त-वोस्त भी नहीं है। मेरी लड़की कोई गपोड़ी भी नहीं है, ज्यादातर पढ़ाई-लिखाई लेकर ही रहती है। आश्चर्य है। आज ही इन दोनों महिलाओं का मन हुआ कि बेचारी सुचित्रा के यहाँ घूम आयें ? इस समय सुचित्रा अपने आपको ‘बेचारी’ सोच रही थी ? जब से चित्रों में दिखाई देने वाला फ्लैट खरीदा है तबसे दिल करता है कि परिचित जान-पहचान वाले आयें, देखे। ऐसा वैसा तो नहीं है नहीं-तीन-तीन कमरों वाला फ्लैट। दो बालकनी, दो-दो बाथरूम। इसके अलावा आधुनिक डिजाइन वाले फ्लैटों में और भी जो जो रहना चाहिए वह सब भी है। बालकनी का आकार कैसा भी हो,  दो-दो अधिश्वरी बनना क्या मामूली बात है ? हालाँकि एक लड़ाकूँ बहू के कब्जे में है, बेड़रूम बाथरूम समेत, तो इससे क्या होता है ? ये कब्जा भी तो सुचित्रा के कारण ही कर सके हैं ? फ्लैट खरीदा किसने है ? सुचित्र के पति ने न ?

वैसे तो भाभी सब देख चुकी थीं। कई बार आ चुकी थीं। लेकिन भाभी की दीदी ? जो हैं मध्यप्रदेशवासिनी और उनका एक होनहार पुत्र गोकुल में बढ़ रहा था। अमेरिका प्रवासी उसी पुत्री का विवाह सम्पन्न कराने के नेक इरादे से दीदी कलकत्ता निवासी रिश्तेदारों से मिलने आई हैं। और उनके इस ‘महान प्रयास’ की खबर का आभास पाते ही सुचित्रा खुशी से उछल पड़ी थी। उस समय लगा था, अच्छा ही हुआ कि इन ‘महामुहूर्त’ में लड़की घर नहीं है। अचानक लड़की देखने की प्रक्रिया को समझ जाती तो भगवान जाने उसकी प्रतिक्रिया क्या होती ? अचानक मूर्खों जैसी कोई बात कहकर पुत्र गर्व से गर्विता माँ की नज़रों में ‘अनस्मार्ट’ बन जाती।

यद्यपि लड़की ने घर न रहने पर मेहमानों की ख़ातिरदारी सुचित्रा को अकेले ही करनी पड़ी। पर इसके अलावा वह कर ही क्या सकती थी ? सुचित्रा कोई कम काम करने वाली है ? हालाँकि वह बार-बार कहने लगी कि पहले से पता होता तो क्या इस तरह से नमो नमो करके खिलाती भाई ? या फिर लड़की को ही जाने देती ?
पर भाभी की दीदी ने भी सुनते ही तुरन्त कहा- ‘पहले से बिना अपाइन्टमेंट के जा धमकना मेरे लिए नीतिबद्ध है। यह एटीकेट भी नहीं है। लेकिन नीरू ने कहा, खबर करना संभव नहीं होगा। तुम्हारे यहाँ फोन नहीं है।’
फोन नहीं है। ओफ, कितने शर्म की बात है। जबकि-

फोन के लिए आवेदन दिया हुआ है कब से। हाल में ही फोन मिलने की उम्मीद बँधी है। इसी खबर को सुनाकर सुचित्रा ने उस उक्त अपनी इज्जत बचाई थी। किन्तु अब ? अब कैसे शर्म के हाथों से बचा जाए ? घड़ी की सूई-सूई चुभो-चुभो कर भागी जा रही थी। और उद्भ्रान्त उत्कण्ठित सुचित्रा परेशान होकर हर मिनट बरामदे में निकलकर देख रही थी और फिर निस्तेज होकर लौट आती थी।

भाभी बोल उठीं- ‘तेरा लड़का हर शनि-इतवार को बहू-बच्चे को लेकर ससुराल जाता है ?’
सुचित्रा ज़रा आक्षेप करती हुई बोली, ‘अब पूछों मत। चाँद-सूरज के नियम फेरबदल हो सकता है, इन लोगों का नहीं। मैंने सोचा था बच्चा होने के बाद कुछ ‘ये’ होगा, लेकिन कहाँ ? तौलिए में लपेटकर कन्धे पर डालकर भाग रहे हैं।’
‘बढ़िया ! अच्छी व्यवस्था है। तुम भी जैसी ढीली-ढाली लड़की हो। पड़े होते मेरे हाथ में तो पता चलता।’ हालाँकि की भाभी को यह अहंकार शोभा देता है क्योंकि पुत्र या पुत्रवधू इन दोनों ही के स्वाद से वह वंचित हैं। उनकी दो-तीन लड़कियाँ हैं जिनकी शादी करके फुर्सत पा चुकी है। लड़कियाँ दूर-दूरान्त में हैं और जमकर अपनी घर-गृहस्थी सँभाल रही हैं।’

भाभी की दीदी, छोटी बहिन की इस दम्भोक्ति को सँभालते हुए बोलीं-‘इस जमाने में यह अहंकार निरर्थक है नीरू। फिर भी यह बात तो कह ही सकती हूँ चित्रा की अगर लड़के की यही व्यवस्था है, तो लड़के के पिता ने ही क्यों मातृदर्शन के लिए आज ही का दिन चुना और गाँव चले गये ? उनका तो कोई छुट्टी का सवाल नहीं उठता है-पूरे हफ्ते में किसी भी दिन जा सकते थे। घर में तुमको अकेला छोड़कर....’

फिर एक बार अभियोग के सुर में बोल उठी सुचित्रा- ‘वही तो। यह बात कौन समझाये ? कहा नहीं कि हजारों दलीलें पेश कर देंगे कि सिर्फ माँ को देखने ही तो नहीं, ज़मीन-जायदाद वगैरा भी तो है ? उन्हें देखने जाना तो पड़ेगा। शनि-रविवार न गए तो वे अपने नाते-रिश्तेदारों से, भाई बन्धुओं से नहीं मिल पाते हैं। और यह भी कहा जाएगा कि ‘मां जो बारहों महीना एकदम अकेली पड़ी है, तब ?’ वैसे तीन-चार साल से हैं तो वहाँ ही जब से यह फ्लैट खरीदा है। लेकिन मैंने उन्हें क्या अकेले पड़े रहने को कहा है ? आप ही कहिए न भाई ? अब मैं क्या करूँ अगर वह चिड़िया के पिंजड़े जैसे इस घर में रहना न चाहें और इसी कारण गाँव रहने चली जायें। उनका वहां रहना एक तरह का नुकसान ही है। खोका कह रहा था, अब वहां की जमीन भी खूब महँगी हो गई है। सिर्फ हमारा हिस्सा ही अगर बेच दिया जाए तो कई लाख रुपया मिल जायेगा।’

‘ऐ ! अच्छा ?’
‘खोका तो यही कहता है। रिश्तेदारों के साथ जमीन का बँटवारा हो जाने के बाद भी तो कई बीघा जमीन हमारे पास है। और ये तो माँ के इकलौते लड़के हैं। पर माँ अगर वहाँ खूटा गाड़े बैठी रहेंगी तो बेचने-बाचने की बात तो मुँह से निकाली ही नहीं जा सकती है। खैर छोड़ो, उनकी बात वह जानें।’
भाभी बोल उठी- ‘अगर वहाँ इतने नाते-रिश्तेदार हैं तो सास को ‘अकेली’ पड़ी हैं कहा जा सकता है क्या ?’
दोनों हाथ उलटते हुए सुचित्रा बोली- ‘इस मामले में तुम्हारे नंनदोई के पास युक्तियों की कोई कमी नहीं है। कहते हैं-यहाँ तुम ही कहाँ ‘अकेली’ हो ? एक दूसरे सटे-सटे छह मंजिले तक बारह-बारह चौबीस फैमिली हैं। अचानक अगर रहना पड़ गया तो क्या ‘अकेले’ नहीं रह सकती हो ? लो समझो।’
यह सब ‘समझने समझाने’ वाली बातें बहुत पहले हो गई थीं। अब तो कन्धे सवार है किन्तु तूतुन वापस क्यों नहीं आ रही है ?

अगर अकेली होती सुचित्रा तो सोच-सोचकर जर्जर रहती और शायद आने वाले जाड़े की घोषणा करती बर्फीली हवा की परवाह किए बगैर बरामदे पर ही खड़ी रहती। और लगातार किसी एक अदृश्य जन के उद्देश्य में प्रार्थना करती- ‘हे ठाकुर जी ! अभी ले आओ।’ लेकिन इस समय उसे ‘अकेली’ न होना ही दु:खदायी जान पड़ रहा है।
वे लोग जाने के लिए छटपटा रहे हैं ये बात साफ समझ में आ रही थी पर शायद जाने से हिचकिचा रहे थे। सुचित्रा अकेली है सोचकर ही तो।

कुछ देर बाद सुचित्रा ने मजबूरन ही कहा- ‘इतनी देर क्यों हो रही है’ मेरी तो समझ में ये बात आ नहीं रही है- जहाँ गई है क्या पता नहीं उन्हीं के यहाँ कोई विपदा तो नहीं आ गई है। तुम लोग कितनी देर तक रुकी रहोगी भाभी ?’
‘भाभी’ मन-ही-मन हाथों में चाँद पाकर खूब खुश हुईं पर ऊपर से बोलीं-‘मेरे लिए तो नहीं, जल्दी दीदी के लिए ही है। जेठ के यहाँ पर ठहरी हैं, जीजा जी वहीं हैं। आज सुबह दीदी मेरे पास आई थी, शाम को लौट जाने की बात थी। और कल ही इन्हें लौटना है जबलपुर। सच तो यह है कि मैं ही इसे यहाँ जबरदस्ती ले आई थी। तेरी लड़की को जरा दिखला लेने के इरादे से। फाल्गुनी माने दीदी के लड़के ने तो कह ही दिया कि ‘अपनी आँखों से’ लड़की देखने की उसकी कोई वासना नहीं है। समय नहीं है। माँ का देखना ही काफी है। माँ की रुचि, पसन्द पर उसको बेहद भरोसा है। फिर भी इस बीच दीदी ने जितनी भी लड़कियाँ देखी हैं, सभी की एक-एक फोटो ली है उन लोगों से। लड़के के पास भेजने के लिए। तेरी लड़की की ली है न ? दी है तूने ? ’

दीदी बोली- ‘दी है। मैंने रख ली है। फिर भी अपनी आँखों से....खैर लड़की की खबर मिल गई होती तो निश्चिन्त हो जाती।’
तभी बाहर की घंटी बज उठी।
‘वह लो आ गई।’
कूद उठीं तीनों महिलायें और तीनों में से एक लगभग एक ही उछाल में दरवाजे के पास जा पहुँची।’
न !, इसके सामने देर करने के लिए डाँट-डपट करना ठीक न होगा, बाद में देखा जायेगा। कुछ नहीं, सहेली के जन्मदिन पर और भी पाँच-छह सहेलियाँ आईं होंगी....बस उसी कारण होश-हवाश खो बैठी होगी। लेकिन यह क्या ? दरवाजा खोलते ही पत्थर की मूर्ति बन गईं सुचित्रा। सामने कौन हैं ?
‘तुम ? तुमको तो...’
‘मैं-वह बाईस नम्बर के फ्लैट से। ये है कि....काम करती हूँ वहाँ। मौसाजी ने ये कागज़ आपको देखने के लिए भेजा है.....’ एक टुकड़ा कागज़।  

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