बच्चों के अनुपम नाटक - गिरिराजशरण अग्रवाल Bachchon Ke Anupam Natak - Hindi book by - Girirajsharan Agarwal
लोगों की राय

नाटक-एकाँकी >> बच्चों के अनुपम नाटक

बच्चों के अनुपम नाटक

गिरिराजशरण अग्रवाल

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2013
पृष्ठ :160
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5143
आईएसबीएन :81-288-1529-6

Like this Hindi book 9 पाठकों को प्रिय

108 पाठक हैं

बच्चों के लिए उपयोगी अनुपम नाटक

Bachchon Ke Anupam Natak a hindi book by Girirajsharan Agarwal - बच्चों के अनुपम नाटक - गिरिराजशरण अग्रवाल

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

स्कूलों में प्रतिवर्ष सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। ऐसे अवसरों पर अनेक नाटक अभिनीत किए जाते हैं और तब बच्चों की भाषा में लिख गए सरल नाटकों की खोज होती है। ये नाटक विशेष रूप से स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को ध्यान में रखकर लिखे गए हैं। ये सरल भी हैं शिक्षाप्रद भी और बाल मनोंविज्ञान के अनुकूल भी। मंच पर इनका अभिनय किया जा सके इसी उद्देश्य से रचित प्रस्तुत हैं बच्चों के अनुपम नाटक।

बच्चों की कचहरी


केशवचंद्र वर्मा


पात्र-परिचय


गोपी : सरकारी वकील
रामू : जज
चंपा : झगड़ालू लड़का
परमू : सुशील का सहपाठी
टिल्लो : सुशील का सहपाठी
जूरी : सुशील की छोटी बहन
माली : सुशील की छोटी बहन

अन्य कुछ बच्चे
---------------------------
गोपी : भई, अगर इतना हल्ला-गुल्ला मचाओगे तो फिर हम लोग जिस काम के लिए इकट्ठे हुए हैं, वह सौ जन्म में भी न हो पाएगा।
रामू : हाँ, सुनो। मैं कह रहा हूँ कि अगर अपने अधिकारों के लिए हम लोगों को लड़ना है तो एका रखकर ही आगे बढ़ सकते हैं। आप सब लोगों की अगर एक राय हो, तभी हम लोग माली पर मुकदमा चलाएँ। .....ऐसे कई आदमी हैं, जो हम बच्चों के अधिकारों का ठीक-ठीक ख़्याल नहीं करते। हम उन सबको बारी-बारी से अपनी कचहरी में लाएँगे। इसके लिए यह बहुत जरूरी है कि आप सब लोग एक राय होकर हमें बताएँ। हम सबसे पहले माली को बुलाना चाहते हैं।
कई बच्चे : (1) हाँ, हाँ, माली को जेल में बंद करवा दो, दादा !
(2) जेल कर दो !
(3) बेंत लगाओ दादा !
रामू : (समझाते हुए) ठीक है, ठीक है, सब हो जाएगा।...सब हो जाएगा। मगर आपकी राय है न ?
कई स्वर : हाँ, हाँ, राय है.....मुकदमा चलाओ।
गोपी : अच्छा तो अब जज किसे बनाया जाए ?
चंपा : राजू दादा को जज बनाओ। एक झापड़ में सबको ठीक कर...
गोपी : चुप रह चंपी। जज झापड़ थोड़े ही मारता है। वह तो फाँसी देता है, फाँसी !
टिल्लो : तब तो परमू भैयै को बनाओ। इन्होंने तो जमील को उठा के पटक दिया था। इनको कह दो, यह फाँसी लगा देंगे।
गोपी : तू भी बड़ा उल्लू है टिल्लो। जज थोड़े ही न फाँसी लगाने बैठता है। जज तो हुक्म करता है सोच-समझ कर..!
परमू : मेरी मानों मैं कहूँ। भाई सोचने-समझने वाली बात है। रामू दादा को जज बनाओ। वही सबसे होशियार आदमी अपने बीच में हैं। क्यों भाई क्या कहते हो ?
सब : हाँ, हाँ, ठीक है....
(कमरा कचहरी की तरह सजा दिया गया है। रामू जज की कुर्सी पर बैठा हुआ है। चार-पाँच लड़कों की जूरी बनाकर बैठा दी गई। टिल्लो, चंपी और गोपी मुकदमा चला रहे हैं। गोपी वकालत कर रहा है। राजू, परमू, पुलिस के रूप में मैजूद हैं। हल्ला मचता है।)
रामू : (हथौड़े से मेज़ ठोंकता हुआ) आर्डर, आर्डर। आप लोग सब चुप होकर बैठिए। मैं अदालत की कार्यवाही शुरू करना चाहता हूँ। हाँ, टिल्लो देवी, आपको क्या कहना है ?
टिल्लो : रामू दादा।
रामू : मिस्टर गोपी, आप इनके वकील हैं। आप इनको बताइए कि अदालत में कैसे बातचीत की जाती है !
गोपी : अरे टिल्लो...जज साहब कहो, जज साहब !
टिल्लो : जज साहब...हमने बाग में से गुलाब का एक फूल तोड़ लिया था। उसके लिए माली ने हमको डाँटा है और कहा है कि बाबू जी से शिकायत कर देंगे।
रामू : माली को पेश किया जाए। राजू, ले आओ जाकर।
राजू : यह हाजिर है जज जी। गोविंद माली हाजिर है।
सब : (एक साथ) अच्छा, यही है ?
माली : का बात है छोटे सरकार ?
रामू : रामू तुमने टिल्लो को फूल तोड़ने पर डाँटा था ?
माली : नाहीं छोटे सरकार ! बिटिया कली-कली तोड़ के फेंकत रहीं, तो हमने मना कै दिया। ...हमका तो भइया...!
रामू : (हथौड़ा ठोकते हुए) शट अप ! बिटिया का मन कै दिया ? क्या माने हैं ?
गोपी : हाँ, दादा...अरे जज साहब, हमको भी गोविंद माली ने बाबू जी से डाँट खिलवायी थी।
चंपा : हमको भी कहा था कान खिंचवाएँगे।
रामू : आर्डर, आर्डर, मैं कहता हूँ मिस्टर गोपीनाथ, आप टिल्लो देवी के वकील की हैसियत से हैं कि आप को खुद कुछ शिकायत है ?
गोपी : (सकपका कर) जी...जी नहीं, जी हाँ, मुझे जो कहिए, चाहे जो समझिए। ममैं तो वकील भी हूँ फरियादी भी हूँ।
सब बच्चे : गोविंद माली को सजा दी जाए।
रामू : आर्डर, आर्डर। हाँ, माली तुमको क्या कहना है इस बारे में ?
माली : अब छोटे सरकार मैं का कहूँ ? जौन कुछ हमका कहे का रहा तो हम पहिलेन कहि दीन। हम का करी ? बड़े सरकार रोज़ै फूल गिनत हैं। जब फूल गायू रहत हैं, बड़े सरकार उनके हिसाब माँगत हैं। फिर तू पंच जी, सब फूल तोड़ लेत हौ तौ फिर हम कहाँ से उनका हिसाब देई ?
रामू : कुछ नहीं....यह सब फिजूल बात कर रहे हो।
चंपी: फूल बच्चों के लिए नहीं हैं तो क्या बूढ़ों के लिए हैं ?
टिल्लों : क्या बाबूजी फूलों से खेलते हैं ?
गोपी : माली झूठ बोलता है। बाबूजी तो कुछ नहीं कहते। यही हम लोगों पर अपनी साहबी जमाते हैं। लगता है कि बाग इन्हीं के बाप का बनवाया हुआ है। अब तो हमने और राजू ने तय किया था कि अगर फिर कभी हमारी शिकायत की तो हम लोग ख़ूब इनकी मरम्मत करेंगे।
रामू : आर्डर, आर्डर। शांत गड़बड़ बात अदालत में मत बोलिए।
माली साहब आप का कोई वकील भी है ?
माली : सरकार, हमार कौन वकील है। जौन कहित है मान लेव। तौ मान लेव नाहीं तो फिर इहै समुझि लेव की हम झूठै कहित हैं।
सब : हाँ हाँ, झूठ है, बिलकुल झूठ।
रामू : अच्छी बात है। हर एक आदमी ने इसकी बात भी सुन ली है। और टिल्लोदेवी की बात भी पता चल गई है। अब जूरी लोगों की क्या राय है ?
जूरी : (सभी सदस्य) इसको फाँसी दी जाए।
सब : हाँ, हाँ, बहुत ठीक। (ताली बजती है)
रामू : नहीं, मेरी राय है कि जूरी ने बहुत सख्ती से काम लिया है। अब भी कुछ सोच-समझ लिया जाए तब फिर जूरी अपनी राय दे। सजा बहुत कड़ी दे दी जाए।
जूरी : (सभी सदस्य) कालापानी भेजा जाए।
एक स्वर : लेकिन वहाँ पर भी यह बाग की रखवाली करेगा।
दूसरा स्वर : और वहाँ के बच्चों को भी तकलीफ देगा।
सब : नहीं, नहीं कालापानी नहीं, फाँसी दी जाए।
रामू : (हथौड़ा ठोकता हुआ) आर्डर आर्डर ! जूरी लोग क्या कहते हैं ?
जूरी : हमारी राय में जज साहब खुद ही अपनी राय दें।
माली : छोटे सरकार। हमका माफ कै दीन जाय। अब आप लोग जौन-जौन कहि हैं तौन तौन हम लोग करब। हम सब नौकर –चाकर आपै लोगन की सेवा करे बरै तौ हइन। हमका जौन चाहै तौन सजा दै लैव। चाही तो माफ कै दैब।
जूरी : (सब लोग) नहीं, नहीं, हरगिज माफ नहीं किया जाए। इस तरह से करने पर इनकी आदत खराब हो जाएगी। आप लोग सब क्या कहते हैं ?
सब लोग : फांसी, फांसी। (चिल्लाकर) फांसी दो इनको।
रामू : (बहुत गंभीर होकर निर्णय देता है) आर्डर आर्डर ! सुनिए। जो कुछ भी दोनों पक्षों ने कहा सुना है, मैंने सब सुन लिया है। मैं समझता हूँ कि गोविंद को माफ कर देना इस तरह की हरकतों को बढ़ावा देना होगा। इसलिए सोचता हूँ कि गोविंद माली को सज़ा ज़रूर देनी चाहिए।
सब लोग : (चिल्लाकर) वाह वाह ! हियर हियर !
(ताली बजाते हैं शीटी बजाते हैं)
रामू : शांत, शांत ! जी हाँ, यही सोचकर मैं गोविंद माली को यह सजा देना चाहता हूँ कि यह पचास अमरूद हम लोगों को लाकर दे, जो कि हम लोग आपस में बाँटकर खाएँगे।
सब लोग : वाह वाह ! (ताली बजाते हैं)
रामू : जी हाँ। और मैं दूसरी बात यह कहना चाहता हूँ कि आइंदा से माली जब कभी भी बाग में रहे, तब हम लोग न जाएँ और अगर जाएँ भी तो उसकी आँख बचाकर जाएँ। और अगर माली कभी देख भी ले तो हम लोगों से आँखें चुरा लें।
सब लोग :वाह वाह ! वैरी गुड (शोर)
रामू : शांत। जी हाँ, और इतिवार के दिन हम लोगों की छुट्टी रहती है, उस दिन माली बिलकुल ही बाग में न जाए।
सब लोग : बहुत अच्छा...बहुत अच्छा...वाह वाह !
रामू : सब लोग खुश हैं। और माली तुम भी खुश रहो कि फांसी की सजा तुम्हें नहीं दी गई।
माली : (सांस) खींच कर) का कही छोटे सरकार। जौन-जौन बात हमका कह्यौ ऊतौ हमरे लिए कच्ची फांसी ह्वै गयी। राम-राम चिरियन केर जान जाए लरिकन कै खिलौना...और का रही।
सब : (चिल्लाकर ) रामू दादा की जै !

(परदा गिरता है)


ईमानदार लड़का


विष्णु प्रभाकर


पात्र – परिचय


बसंत : एक ग़रीब शरणार्थी लड़का
प्रताप : बसंत कका छोटा भाई
पंडित राज किशोर : एक नेता
कृष्ण कुमार : पंडित राजकिशोर के एक परिचित
भीखू अहीर : बसंत और प्रताप का संरक्षक
डॉक्टर तथा दो राह चलते व्यक्ति


पहला दृश्य


(स्टेज पर सुविधानुसार एक बड़े नगर के बाज़ार का प्रतीकात्मक दृश्य। आने-जाने, लेने-देने का शोर, फेरीवालों की पुकार। उन्हीं के बीच में एक लड़का, नंगे पैर, फटे कपड़े पहिने हाथ में सामान सँभाले भागता हुआ आता है। उसकी आयु लगभग 12 वर्ष की है। उसका नाम बसंत है। वह पुकार रहा है।)
बसंत : छलनी ले लो, बटन ले लो, दियासलाई ले लो।
(कोई उसकी बात नहीं सुनता। सब उसे देखते हैं और आगे बढ़ जाते हैं इसी समय एक खद्दरधारी व्यक्ति वहाँ से जाते दिखाई देते हैं। साथ में सामान से भरा थैला है। मजदूर नेता पं. राजकिशोर हैं। बसंत उन्हें देखकर उनके पीछे भागता है।)
बसंत : साहब ! बटन लीजिए, देसी बटन। साहब दियासलाई लीजिए।
राजकिशोर : नहीं भाई ! कुछ नहीं चाहिए।
बसंत : साहब एक तो लीजिए। देखिए बटन कितने सस्ते हैं।
राजकिशोर : भाई, मुझे कुछ नहीं चाहिए। जाओ किसी और को दो।
बसंत : साहब छलनी लीजिए। दूध छानिए, चाय छानिए...
राजकिशोर : मुझे नहीं चाहिए।
बसंत : बटन....
राजकिशोर : नहीं।
बसंत : दियासलाई...
राजकिशोर : नहीं, नहीं।
बसंत : विनम्र स्वर) साहब एक छलनी ले लीजिए। सिर्फ दो आना कीमत है।
राजकिशोर : पर भाई ! मुझे नहीं चाहिए तो कैसे ले लूँ ?
बसंत : अच्छा आप छः पैसे दे दीजिए।
राजकिशोर : भाई तुम तो...
बसंत : साहब एक ले लीजिए छः पैसे...।
राजकिशोर : ओहो ! कह दिया मुझे कुछ नहीं चाहिए।
बसंत : (रुआँसा) साहब, सबेरे से अब तक कुछ नहीं बिका। आपसे आशा थी। साहब ! एक तो ले लीजिए।
राजकिशोर : (जेब से दो पैसे निकालते हुए) तुम तो...अच्छा तुम्हें पैसे चाहिए। लो, ये दो पैसे ले लो और जाओ।
बसंत : (एकदम) नहीं साहब, नहीं। मैं पैसे नहीं लूँगा।
राजकिशोर : नहीं लोगे ?
बसंत : जी नहीं, आप छलनी ख़रीद लीजिए।
राजकिशोर : अच्छा, एक छलनी में तुम्हें क्या बचेगा ?
बसंत : दो पैसे।
राजकिशोर : तो बस पैसे ले लो और समझ लो मैंने एक छलनी खरीद ली।
बसंत : नहीं साहब, नहीं। यह तो भीख है। मैं भीख नहीं लूँगा। आप छलनी ले लें।
(राजकिशोर पर इस बात का बड़ा असर होता है। वे सहसा उस बच्चे को देखते हैं फिर जेब टटोलते हैं, पर पैसे नहीं मिलते)
राजकिशोर : भाई, मेरे पास पैसे नहीं है। होते तो ले लेता नोट है। बसंत : (उदास) नोट है। पैसे तो मेरे पास भी नहीं हैं। कुछ बिका ही नहीं।
राजकिशोर : तभी तो कहता था। कल ले लूँगा या मेरे घर ले आना। किशनगंज में रहता हूँ।
बसंत : (एकदम) नहीं साहब आज ही ले लीजिए। आप नोट मुझे दे दीजिए, मैं अभी बाज़ार से भुना लाता हूँ।
राजकिशोर : भाई तुम तो...
बसंत : बस मैं यह आया।
राजकिशोर : अच्छा लो, भुना लाओ, अभी आना।
बसंत : अभी आया साहब। आप यहीं ठहरें; अभी पलक मारते ही आया।
(बसंत नोट लेकर बाजार की ओर भागता है। राजकिशोर वहीं खड़े रहते हैं। धीरे-धीरे पंद्रह-बीस मिनट बीत जाते हैं। जैसे-जैसे समय बीतता है, वे उत्सुक होकर बाज़ार की ओर देखते हैं।)
राजकिशोर : पंद्रह मिनट हो गए, अब तक नहीं आया। कहाँ रह गया। मुझे तो...
(तभी एक परिचित मनुष्य वहाँ आता है उन्हें देखकर ठिठकता है।)
कृष्णकुमार : पंडित जी जय हिन्द ! कहिए, आप यहाँ कैसे खड़े हैं ?
राजकिशोर : (हँसकर) क्या बताऊँ ? एक लड़का चिपक गया था। एक छलनी दे गया है। पैसे थे नहीं। नोट भुनाने गया है।
कृष्णकुमार : वह लड़का गया है ?
राजकिशोर : जी।
कृष्णकुमार : कितनी देर हो गई ?
राजकिशोर : कोई पंद्रह-बीस मिनट हो गया।
कृष्णकुमार : तो बस, अब वह नहीं आएगा।
राजरकिशोरः सच !
कृष्णकुमार : अजी, बाज़ार के हर कोने पर आजकल ऐसे ही लड़के मिलते हैं। उनका काम गिड़गिड़ा कर लोगों को ठगना है।
राजकिशोर : ठगने की क्या बात है ! एक रुपया ही तो है।
कृष्णकुमार : श्रीमान, एक –एक करके ही अनेक होते हैं, पर हाँ आपको क्या ? आप तो ग़रीबों और मजदूरों के सेवक हैं। ले भी गया तो घर में ही हैं।
राजकिशोर : (हँसकर) सो तो तुम सच कहते हो। सब उन्हीं का प्रताप है। पर भाई इसका मतलब यह नहीं कि वे इस तरह ठगी करते फिरें।
कृष्णकुमार : (हँसकर) देख लीजिए।
राजकिशोर : पर भाई वह लड़का तो मुझे भला लगता था। विश्वास नहीं होता। अच्छा चलो, कोई बात नहीं। समझेंगे यह भी एक रुपया देकर एक पाठ पढ़ा।








अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book