श्री शिरडी साई बाबा के दिव्य चमत्कार - सत्यपाल रुहेला Sri Shirdi Sai Baba Ke Divya Chamatkar - Hindi book by - Satyapal Ruhela
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श्री शिरडी साई बाबा के दिव्य चमत्कार

सत्यपाल रुहेला

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :192
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5144
आईएसबीएन :81-288-1490-7

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श्री शिरडी साई बाबा के चमत्कार...

Shri Shirdi Baba Ke Divya Chamatkar

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

आज भारत में जितने योगी, साधु-संन्यासी तथा सिद्ध पुरुष हुए हैं उनमें शिरडी के साईं बाबा का नाम सर्वोपरि है। उनके भक्तों और अनुयायियों की इतनी बड़ी संख्या का प्रमुख कारण है साईबाबा में उनका अटूट विश्वास। श्री शिरडी साईं बाबा के ‘सबका मालिक एक’ मानकर पूजा जाता है।

प्रस्तुत संकलन श्री शिरडी साईं बाबा के भक्त के अनुभवों पर आधारित है। यह पुस्तक आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि हिंदी भाषी साईं भक्तों और अन्य धार्मिक व अध्यात्मिक खोजकों को इसमें बाबा की दिव्य और अगाध कृपा की एक झलक अवश्य ही मिलेगी और उनके जीवन में आनंद और शांति आएगी।

श्री शिरडी साई बाबा को ‘‘सबका मालिक एक’ मानकर पूजा जाता है। संसार में सैकड़ों आध्यात्मिक संत, गुरू, अवतार, औलिया और दिव्य चमत्कारी व्यक्तित्व हुए हैं। और आज भी कई जीवित हैं जो मानवता का मार्गदर्शन कर रहे हैं। सभी के अनुसार प्रत्येक प्राणी की आत्मा एक सी है, आत्मा परमात्मा की चिंगारी है जो परमात्मा से ही निकली है और पुनः उन्हीं में लौटकर विलीन हो जाती है, लेकिन श्री शिरडी साईं बाबा ही ऐसे एकमात्र अवतार पुरुष हुए जिन्होंने यह प्रयोग कई बार करके दिखलाया था कि कैसे प्रत्येक प्राणी की आत्मा एक सी है।

प्रस्तुत संकलन श्री शिरजी साई बाबा के भक्त व उन पर शोधकर्ता होने के अनुभवों पर आधारित है। मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि हिंदी भाषी साई भक्तों और अन्य धार्मिक व आध्यात्मिक खोजकों को  इसमें और उनके जीवन में आनंद और शांति आएगी।

समर्पण


यस्य स्मृत्या च नामोक्तया तापोदानक्रियादिषु।
प्रयत्नस्सफलो भूयात् साई वन्दे तमच्युतम्।।

मैं साई के आगे नतमस्तक होता हूँ जिनके नाम स्मरण से तप, दान व अन्य क्रियाएँ सफल हो जाती हैं।

साई नामैव नामैव नामैव मम जीवनम्।
ध्रुवा नास्त्येव नास्त्येव नास्तिमे गातिरन्यथा।।

केवल मात्र साई नाम ही मेरे जीवन का आधार है। मेरा कोई अन्य आधार या आश्रम नहीं है।

भर्जनं भवबीजाना मार्जनं सर्वसंपदाम्।
तर्जनं यमदूतानां साई साईति गर्जनम्।।

‘साई’ ‘साई’ का गर्जन करने से पुनर्जन्म के बीज जल जाते हैं और सभी प्रकार की धन प्राप्ति होती हैं और मृत्यु के दूतों को भी धमकाया जाता है।

-श्री नरसिंह स्वामीजी कृत ‘साई मननंम्’ के अंश

भूमिका


आज विश्व में कोई भी ऐसा देश नहीं है, धर्म नहीं हैं, जाति या वर्ग नहीं है जिनके कई लोग श्री शिरडी साई बाबा के दिव्य नाम से परिचित न हों। वे विश्व की महान आध्यात्मिक विभूति थे। संभवतः 1838 में उन्होंने पथरी ग्राम में जन्म लिया था और अस्सी वर्ष की आयु में उन्होंने शिरडी नामक ग्राम (महाराष्ट्र) में अपना भौतिक शरीर त्यागा था। वे संभवतः एक ब्राह्मण परिवार में उत्पन्न हुए थे, लेकिन बचपन में उन्हें एक मुस्लिम फकीर परिवार में कुछ वर्ष तक पाला गया था और तत्पश्चात् वे शेलू ग्राम के एक ब्राह्मण संत गुरू वेंकुशा के आश्रम में 1842 से 1854 तक अर्थात् 12 वर्ष रहे थे। 1854 में अपने गुरु के आदेश से व आशीर्वाद के साथ शिरडी ग्राम में पहुँचे थे। वहाँ लगभग दो माह तक एक नवयुवक संत के रूप में रहने के बाद वे अचानक वहाँ से चले गए थे और पुनः तीन वर्ष बाद 1858 में चांदभाई पाटिल (धूपखेड़ा के एक मुस्लिम जागीरदार) के भतीजे की बारात के साथ बैलगाड़ी में बैठकर शिरडी आए थे और फिर वहीं बस गए थे। वहाँ उन्होंने एक पुरानी त्यागी हुई वीरान मस्जिद को अपना स्थान बनाया और उसे ‘द्वारिका माई’ का नाम दिया था।

1858 से 1918 तक, अर्थात् 60 वर्षों तक वे शिरडी में उसी मस्जिद में रहे थे। उन्होंने किसी को भी अपने परिवार, जाति, धर्म के बारे में नहीं बताया, यद्यपि कुछ प्रमाणों के अनुसार वे ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। वे शिरडी में एक मुस्लिम फकीर का सीधा-सादा जीवन यापन करते थे। वे हमेशा ‘‘अल्लाह मालिक है’’ कहते रहते थे और सभी को—मानवों व पशु-पक्षियों को—अपना-प्रेम और सद्भाव देते थे। वे अनपढ़ प्रतीत होते थे, लेकिन वे संस्कृत, ऊर्दू, अरबी, मराठी, हिंदी और तमिल की जानकारी रखते थे।

वे शिरडी ग्राम के केवल पाँच विशेष परिवारों से ही रोज दिन में दो बार भिक्षा मांग लाते थे। टीन के बर्तन (मग) में तरल पदार्थ और कंधे पर डाले गए कपड़े की झोली बनाकर उसमें रोटी और ठोस पदार्थ, जो भी भिक्षा में मिल जाता था, द्वारिका माई में लाते थे, सभी को मिट्टी के बड़े बर्तन (परात) में मिला देते थे और एक-दो घंटे तक खुला रख देते थे। कुत्ते, बिल्लियाँ, चिड़ियें निसंकोच आकर उसका एक अंश खा लेते थे, शेष को वे बाकी भक्तों के साथ मिल बाँट कर खा लेते थे। उन्होंने 1858 में द्वारिका माई में जो धूनी स्थापित की थी वह आज भी लगातार प्रज्ज्वलित हो रही है। वे उसकी भस्म (जिसे वे ‘ऊदी’ कहते थे।) अपने भक्तों और आगंतुकों को अपने आशीर्वाद के साथ दिया करते थे जिससे उनके सभी शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कष्ट दूर हो जाते थे।

वे त्रिकालदर्शी थे। लोगों के भूत, भविष्य और वर्तमान के बारे में जानते थे, पशु-पक्षियों व अन्य प्रणियों के पूर्व जन्मों के बारे में उन्हें पूर्ण जानकारी होती थी।

उन्होंने जिसको जो भी आशीर्वाद दे दिया, वह अवश्य ही फलीभूत होकर रहता था। उन्होंने दिखाने के लिए नहीं, जैसा कि आजकल कई संत करते हैं, स्वाभाविक रूप से करुणावश कई अत्यंत रोमांचकारी चमत्कार किए थे। उनके चमत्कारों तथा भक्तों पर अनुग्रह की ख्याति धीरे-धीरे सारे महाराष्ट और बाद में दक्षिण भारतीय प्रांतों और बाद में समूर्ण भारत और अंततः विश्वभर में फैल गई। उन्हें ‘विश्व गुरू’ (Universal Master)  स्वीकार किया गया है।

उनके शिरडी वास के 60 वर्षों में हजारों भक्त दुखी और याचक उनकी कृपा दृष्टि पाने आए थे और सभी की मनोकामनाएं पूर्ण हुई थीं। उनसे महाराष्ट्र के एक महान भक्त श्री दामोलकर ‘हेमाडयंत’ ने पार्थना की थी कि वे उनके दिव्य जीवन, चमत्कारों और उपदेशों पर एक ग्रंथ लिखने की अनुमति दे दें। उन्होंने अपनी अनुमति व आशीर्वाद देते हुए यह कहा था :
‘‘मेरा सतचरित्र (श्री साई सत्चरित्र) लेखक के लिए मेरी पूर्ण अनुमति है।.....जो प्रेम पूर्वक मेरा नाम स्मरण करेगा मैं उसकी समस्त इच्छाएं पूर्ण कर दूँगा। उसकी भक्ति में उत्तरोत्तर वृद्धि होगी। जो मेरे चरित्र और कृत्यों का श्रद्धापूर्वक गायन करेगा उसकी मैं हर प्रकार से सहायता करूँगा। जो भक्तगण हृदय और प्राणों से मुझे चाहते हैं, उन्हें कथाएँ श्रवण कर स्वाभाविकतः हृदय और प्राणों से मुझे चाहते हैं, उन्हें कथाएँ श्रवण कर स्वाभाविकतः प्रसन्नता होगी। विश्वास रखो कि जो मेरी लीलाओं का कीर्तन करेगा, उसे परमानंद और चिर-संतोष की उपलब्धि हो जाएगी। यह मेरा वैशिष्ठय है कि जो कोई अनन्य  भाव से ही मेरी शरण आता है, जो श्रद्धापूर्वक मेरा पूजन निरंतर स्मरण और मेरा ही ध्यान किया करता है, उसकों मैं मुक्ति प्रदान कर देता हूँ।

जो नित्य प्रति मेरा नाम स्मरण और पूजन कर मेरी कथाओं और लीलाओं का प्रेमपूर्वक मनन करते हैं, ऐसे भक्तों में सांसारिक वासनाएं और आज्ञानरूपी प्रवृतियाँ कैसे ठहर सकती हैं ? मैं उन्हें मृत्यु से बचा लेता हूँ। मेरी कथाएं श्रवण से मुक्ति हो जाएगी। अतः मेरी कथाओं को श्रद्धापूर्वक सुनों, मनन करो। सुख और संतोष प्राप्ति का सरल मार्ग ही यही है। इससे श्रोताओं के चित्त को शांति प्राप्त हो जाएगी। केवल ‘साई’ ‘साई’ के उच्चारण मात्र से ही उनके समस्त पाप नष्ट हो जाएंगे।


 (श्री साई सत् चरित्र, पृष्ठ 13-14)


उपरोक्त कथनांश श्री साई बाबा शिरडी संस्थान, शिरडी द्वारा प्रकाशित श्री हेमाड़पंतजी की अमर रचना ‘श्री सत् चरित्र’ से लिया गया है, जो पुस्तक लाखों-करोड़ों साई बाबा के भक्तों को संपूर्ण विश्व में आध्यात्मिक ज्ञान और मार्ग-दर्शन तथा अनुपम आत्मिक शांति अनेक दशकों से प्रदान करती आ रही है।

श्री शिरडी बाबा को ‘‘सबका मालिक एक’’ मानकर पूजा जाता है। संसार में सैकड़ों आध्यात्मिक संत, गुरु, अवतार, औलिया और दिव्य चमत्कारी व्यक्तित्व हुए हैं और आज भी कई जीवित हैं जो मानवता का मार्गदर्शन करते रहे हैं और कर रहे हैं। सभी ने ऐसा उपदेश दिया है कि प्रत्येक प्राणी की आत्मा एक सी है, आत्मा परमात्मा का चिंगारी है जो परमात्मा से ही निकली है और पुनः उन्हीं में लौटकर विलीन हो जाती है, लेकिन श्री शिरडी साई बाबा ही ऐसे एकमात्र अवतार पुरुष हुए हैं जिन्होंने यह प्रयोग कई बार करके दिखलाया था कि कैसे प्रत्येक प्राणी की आत्मा एक सी है। साई सद्चरित्र और बाबा पर लिखी गई कई पुस्तकों में ऐसी कई रोमांचकारी घटनाओं का वर्णन मिलता है जिनसे ऐसा स्पष्ट होता है।

 भक्त के बुलावे पर श्री शिरडी साई बाबा उसके घर खाने को गए लेकिन वे कुत्ते के रूप में, निश्चित समय से पूर्व ही भोजन को खाने के लिए उसके पास पहुँचे। भक्त ने उस समय उस कुत्ते पर जलती हुई लकड़ी मारी और उसे भगा दिया। जब बाबा उसके घर खाने को नहीं पहुँचे तो भक्त ने बाबा की द्वारिका माई मस्जिद में आकर उलाहना दिया, ‘‘बाबा आप तो आए नहीं। मेरा निमंत्रण स्वीकार करके भी आप अभी तक क्यों नहीं आए ? अब मेरे साथ चलो।’’ बाबा ने उत्तर दिया, ‘‘मैं तो कुत्ते के रूप में तुम्हारे घर भोजन करने को आया था। परंतु तुमने तो जलती हुई चूल्हे की लकड़ी से मारकर मुझे भगा दिया था।’’

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