एक और अनारकली - महेन्द्र वर्मा Ek Aur Anarkali - Hindi book by - Mahendra Verma
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एक और अनारकली

महेन्द्र वर्मा

प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :136
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5151
आईएसबीएन :0000

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‘एक और अनारकली’ एक दुःखांत ऐतिहासिक उपन्यास है

Ek Aur Anarkali

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘एक और अनारकली’ एक दुःखांत ऐतिहासिक उपन्यास है, जिसका चरित्र-नायक का कला प्रेमी महासौंदर्योपासक तथा विलासी राजा जगतसिंह है और चरित्र नायिका जयपुर की ही अनिद्य सुंदरी, सुप्रसिद्ध नर्तकी रसकपूर है।
उपन्यास आरंभ से ही सम्भ्रम, करुणा, श्रृंगार और दर्शन इन चारों को साथ लेता हुआ चलता है जिससे एक बार उपन्यास आरंभ करने के बाद उसे बिना पढ़े हुए पाठक नहीं छोड़ सकता।

यह उपन्यास की एक बड़ी खूबी है। क्योंकि उपन्यास दुःखांत है, इसलिए लेखक ने जिन परिस्थितियों में नायक और नायिका की मृत्यु का वर्णन किया है वह अत्यंत कारुणिक हो गया है और उसे पढ़कर पाठक के आंसू बिना टपके हुए नहीं रहते। यह उपन्यास की दूसरी विशेष ख़ासियत है। राजनैतिक षड्यंत्रों के कुचक्रों के नाम पर यह उपन्यास न केवल अतीत व वर्तमान का एक प्रतिबिम्ब है, बल्कि आने वाले कल का भी एक सांकेतिक संदेश है, जो उपन्यास का सबसे अहम् पक्ष बन गया है।

डॉ. महेंद्र वर्मा बुंदेलखण्ड के जाने माने, चित्रकार, निबंधकार के साथ-साथ इतिहासकार हैं। लेकिन इन विधाओं के साथ-साथ अनेक ऐतिहासिक व सामाजिक कहानियों को लिखकर उन्होंने कहानीकारों में अपना जो स्थान बनाया है वह उनके अनेक बहुआयामी व्यक्तित्व का परिचायक ही कहा जाएगा। इन आयमों में एक ओर आयाम, उपन्यासकार के रूप में जुड़ गया है।

यह उपन्यास भाषा, शैली, भावाभिव्यक्ति तथा ऐतिहासिकता के परपेक्ष्य में निश्चय ही अपना एक महत्त्वपूर्ण स्थान बनाएगा, तथा ऐतिहासिक उपन्यासकारों की श्रृंखला में डॉ. महेन्द्र वर्मा का नाम भी एक सार्थक कड़ी के रूप में सिद्ध होगा, ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है।

भगवानदास सेठ


1


आज का राजस्थान। सैकड़ों वर्ष पहले के इतिहास के पृष्ठों में प्रसिद्ध रहा राजपूताना। राजपूतों की आन-बान शान का एक आदर्श प्रतीक। शरणागतों की रक्षा में अपने को सदैव बलिदान करने में अग्रणी रहने वाला प्रेरणा का एक स्रोत। स्वतंत्रता की दीपशिखा को सतत प्रज्वलित रखने वाला एक अप्रतिम पावन तीर्थ। शौर्य व पराक्रम की साक्षात् प्रतिमूर्ति।

आबू पर्वत और शिवालिक व अरावली जैसी पर्वत-श्रेणियों की गोद में फलने-फूलने वाला राजस्थान। उदयगिरि की झीलों की मनमोहकता, चित्तौड़ व रण-थंभौर जैसे दुर्गों की अभेद्यता व दुरुहता एवं भव्य, विशाल, अलंकृत राज-प्रासादों की वास्तुकला का चमत्कार सभी कुछ तो है-उस राजस्थान में। उस पर भी जयपुर की गुलाबी रंगीनी शाम का कहना ही क्या ? इसी जयपुर नगर में स्थिति देशप्रसिद्ध जौहरी बाजार, जो जवाहरातों ओर उनके कला-पारखी जौहरियों के नाम पर अपनी एक अलग ही साख रखे हुए है।

इसी जौहरी बाजार में ही सांगानेरी दरवाजे के पास ही कांच की सुंदर पच्चीकारी के कारण ही ‘कांचमहल’ नाम से प्रसिद्ध भव्य महल, जिसे लगभग दो सौ वर्ष पहले नूरी बेगम ने आकर, अपने रूप, सौन्दर्य एवं सारंगी के तारों की झंकृत, कर्णप्रिय मनमोहक झनकार, तबले की थापों की संगत और पैरों में बंधे हुए घुंघरुओं की मदमाती थिरकन वाली मधुर स्वर-लहरियों की गूंज से और भी अधिक रंगीन व आकर्षण का केंद्रबिंदु बना दिया था।

नूरी बेगम मूलतः कहां की थी, किसकी औलाद थी, यह किसी आशिक-मिज़ाज आगंतुक ने कभी जानने की कोशिश नहीं की। लेकिन वह स्वयं इतना अवश्य जानती थी कि परिस्थितियों और बेगम बनने के प्रलोभन में उसे शाही महल या शानदार कोठी नहीं मिली, बल्कि दुर्भाग्य ने दिया-उसे कोठा। लेकिन उसे वह दिन अच्छी तरह से याद है, जब अन्य कुंवारी लड़कियों की तरह अपनी अनियारी आंखों में समाए अनेक स्वप्नों और हृदय में प्यार भरे अरमानों के सुंदर महल की कल्पना की वह नींव ढहा दी गई थी, जिस पर प्यार व हसरतों का सुंदर महल खड़ा होना था। आंखों में समाए सजीले सुखद स्वप्नों की डोली कोठे की परंपरा ने बुरी तरह से ऐसे फेंक दी कि सारे सपने कांच के टुकड़ों की तरह बिखरकर रह गए और उन कांच के टुकड़ों पर ही फिर उसे पैरों में घुंघरू बांधने को विवश होना पड़ा। उसकी देह से लज्जा व संकोच का आवरण कोठे की चहारदीवारी में ही हट गया।

उसे सिखाया गया कि लज्जा का आवरण उसके घूंघट में है, जिसकी चक्रव्यूही संरचना के अंदर ही उसे अपने नैनों के तीखे प्रहारों से हर चाहने वाले के हृदय को छेदन करना है और ये प्रहार जितने हृदय को तड़पाने वाले होंगे, उतने ही धन-दौलत, हीरे-जवाहरात, सोने-चांदी के ऊंचे ढेर लगेंगे। शोहरत, कामयाबी आसामानी बुलंदी की ऊंचाई तक पहुँचेगी और उसकी शान-शौकत किसी महल की महारानी से कम न होगी। उसे अपनी देह को सही-सलामत रखना है क्योंकि जब तक उसके पास गदराया बदन और मदराया यौवन है, रूप और सौंदर्य की पराकाष्ठा के रूप में समुद्र के ज्वार-सा सुंदर, सलौना, मनभावन आकर्षण है, देह में लता जैसा लचीला व कोमलपन है, मुस्कराहट में वशीवरण है, नेत्रों में मदिरा की मस्ती है, पलकों की चिलमन से परखने की कला है, तब तक रूप-सौन्दर्य के भ्रमर उस पर न्यौछावर होते रहेंगे।

उसे याद है कि नूरी के रूप में पहली बार जब अपने माहुरी पैरों में घुंघरूओं को बाँधकर, झीने आसमानी चमकते परिधान में भरी महफिल में साजिंदों के वाद्य-यंत्रों की स्वर-लहरियों और थापों के बीच में घुंघरुओं से निकलने वाली मनमोहक झनकार के साथ उपस्थित हुई थी, तब ऐसा लगा था, जैसे कि नीलगगन में कोई आकाश-गंगा अवतरित हो गई हो। महफिल में आए सभी लोगों की निगाहों पर मानों पक्षाघात-सा हो गया। उसके अनिंद्य सौंदर्य पर तरह-तरह की उपमाओं की बौछारें होने लगीं। उस दिन उसने वही सब कुछ किया था, जो उसे सिखाया गया था।

अब उसकी हर रात पिछली बीती रात से कहीं अधिक खुशनुमा होती, क्योंकि उसकी दिलकश अदा के मुज़रों की अदायगी और बानगी, उसके पैरों की थिरकन और खंजर जैसे नेत्रों के तीखे कटाक्ष तथा उसकी एक-एक भावमुद्रा और अंग-प्रत्यंगों में बिजली-सी चमक, उसके कामोद्दीपन युक्त दहकते शरीर की उष्णता से अपने को तृप्त करने की उत्कंठा में पुराने आशिकमिज़ाज चेहरों के साथ रोज कुछ नए चेहरे भी महफिल में होते और उसकी एक-एक अदा पर रुपयों और अशर्फियों व आभूषणों की बौछार करते और जब इस सबके बदले में कृतज्ञता यापन के लिए बाअदब कोर्निश करता हुआ उसका दाहिना हाथ उठाकर माथे को स्पर्श करता तो लोग उसकी इस रस्म अदायगी की नज़ाकत पर मर मिटते। उनकी फिकरेबाजी से कक्ष गूंज उठता।

लेकिन इतना सबकुछ होने के बाद भी नूरी अपना पाक़ दामन बड़ी ही चतुराई, सूझ-बूझ और सांत्वना से बचाती चली गई। प्रत्येक के साथ वह ऐसी आत्मीयता से पेश आती कि हर व्यक्ति यही सोचता कि नूरी उसी की है, केवल उसी की है। पर पं. शिवनारायण मिश्र इन सबमें बड़े भाग्यशाली रहे, कि उन्हें नूरी से वह सब कुछ मिल गया जो अन्य लोग अपना सब कुछ लुटाने के बाद भी न पा सके। संभवतः जहां एक ओर पंडितजी के निश्छल प्रेम ने नूरी के हृदय में श्रद्धा व विश्वास पैदा किया, वहीं दूसरी ओर वह अपने को पंडितजी के इस एहसान से भी दबी हुई मानती थी कि उन्होंने ही अपने प्रभाव से तवायफी कोठे से कांचमहल में लाकर बैठाया था, जहाँ उसकी शौहरत आसमानी ऊंचाइयों को छूने में कामयाब रही और उस पर धन की वर्षा हुई।

नूरी बेगम दिलों-ज़ान से पंडित शिवनारायण के लिए समर्पित हो गई। उसके हृदय में पंडितजी के प्रेम व समर्पण की भावना का बीज अंकुरित होकर वट-वृक्ष की भांति संपूर्ण हृदय-पटल पर छा गया।

2

पंडित शिवनारायण मिश्र को नूरी के पास आने की पूरी स्वतंत्रता थी। उनके ऊपर न नूरी की ओर से ही कोई पाबंदी थी और न ही नूरी की खाला की तरफ से ही कोई प्रतिबंध था। खाला भी नूरी की तरह पंडितजी के एहसान को तहेदिल से बहुत मानती थी, क्योंकि नूरी के कदमों पर धन-दौलत के ढेर लगने का मुख्य आधार वह कांचमहल ही था, जहाँ रात के रंगीन उजाले में सोने की चमक चमका करती थी।

पंडित शिवनारायण जयपुर के प्रतिष्ठित परिवारों में से एक सम्माननीय परिवार वाले व्यक्ति थे। उनका राज-दरबार से संबंध जुड़ा हुआ था। राजा प्रताप सिंह के अतिरिक्त, समस्त दरबारी तथा सामंतगण, ठाकुर, जागीरदार सभी उनका यथेष्ट सम्मान किया करते थे। वे विद्वता में अपना कोई सानी नहीं रखते थे। वे श्री-लक्ष्मी से शोभायमान व सभी प्रकार की संपन्नता से पूर्ण थे। गौर वर्ण, तेज व ओज से युक्त, सुंदर और हृदयाकर्षक देह-यष्टि वाले व्यक्तित्व के वे धनी व्यक्ति थे। बड़ी-बड़ी नीली आंखों, घनी भौंहों व मूंछों से उनके व्यक्तित्व में और अधिक चुंबकीय आकर्षण आ गया था। इन सबसे परे था-पंडितजी की सम्मोहनी वाणी, बात करने का सुंदर ढंग। इन्हीं सब बातों ने नूरी के हृदय में एक स्थायी स्थान बना लिया था।

पंडित शिवनारायण रात की महफिल के अतिरिक्त जब भी समय मिलता अथवा जब उनका चित्त मलीन होता, तब वे उस मलिनता को मिटाने के लिए नूरी के ही पास आते। नूरी के व्यक्तिगत अलंकृत कक्ष में उसके सामीप्य में बैठते-लेटते, बतियाते। उन्हें कविता व शायरी का भी शौक था, इसलिए बातों के सिलसिले में ही कभी-कभी शेर, या पूरी ग़ज़ल तथा कविता वग़ैरह एकांत में सुना दिया करते थे।

नूरी को वह रात कभी नहीं भूलती थी, जब पंडितजी ने नूरी के द्वारा मुज़रे गाए जाने के पहले नूरी व उसकी खाला से मुस्कुराते हुए कहा था-‘‘जब तक साज़िंदे सुर-ताल मिला रहे हैं, तब तक इस खूबसूरत नाज़नीन की खिदमत में रंगीन ख्यालों में डूबी हुई ग़ज़ल के चंद शेर पेश करने की इज़ाजत चाहता हूं।’’
महफिल में उपस्थित बेसब्र लोगों को पंडितजी के इस बेमौके की भैरवी अच्छी नहीं लगीं। उनमें से कुछ तो बोल ही पड़े थे, कि, ‘‘पंडितजी क्या झड़े में कूड़ा फैला रहे हो।’’ कोई कह उठा था-‘‘पंडितजी, नूरी के हुस्न की स्याही से अब दिल के कागज पर शायरी भी करने लगे हैं। वाह, क्या बात है ?’’

लेकिन नूरी ने जो समय-समय पर पंडितजी के द्वारा कहे गए शेरों के अंदाज़े-बयां से बाखूबी परिचित हो गई थी, बड़े ही शायराना अंदाज़ में पंडितजी से आग्रह किया-‘‘पंडितजी, जरूर सुनाइए। महफिल की रौनक में चार-चांद लग जाएंगे।’’
नूरी की सहमति पर सारे आगंतुकों की ज़बान बंद हो गई। उनकी नज़रे फिर पंडितजी पर केंद्रित हो गईं।
पंडितजी ने तब नूरी की तरफ देखकर बड़े ही नाजुक मिज़ाज में कहा-‘‘हां, तो बेगम साहिबा, सुनिए। दिली जज़वात हैं। उम्मीद है, इन जज़वातों को आपकी पसंदगी हासिल होगी।’’
नूरी ने भी कहा-‘‘इरशाद ! फरमाइए, पंडितजी ! फरमाइए।’’
पंडित जी ने तरुन्नम में ग़ज़ल का मुखड़ा पेश किया-

‘‘ऐसी चली हवा कि गुलिश्तां महक गए,
पी तो नहीं थी, फिर भी कदम बहक गए।’’

नूरी सुनते ही खुश होकर मुस्कराते हुए बोली-‘‘वाह क्या बात है ?’’
महफिल में भी फब्दियों के स्वर गूंज उठे-‘‘पंडितजी, अपनी हकीकत पेश कर रहे हैं।’’
नूरी का कोकिल-कंठ चहक उठा-‘‘हां पंडितजी। आगे शेर पढ़िए।’’
कक्ष में सामूहिक आवाज गूंज उठी-‘‘हां, जरूर, जरूर।’’
पंडितजी ने आगे का शेर पढ़ा-

‘‘आने का जिनके था, मुद्दत से इंतजार,
महफिल में जब वो आए, तो शोले दहक गए।’’

अब की बार इस शेर पर नूरी के विस्फारित नेत्र पंडितजी के मुख पर जाकर स्थिर हो गए। अपनी प्रशंसा की पराकाष्ठा सुनकर वाणी जैसे अवरुद्ध हो गई। लेकिन महफिल के सारे लोग इस शेर पर झूम उठे और उनके मुख से निकल पड़ा-‘‘वाह पंडितजी, क्या बात है ? हम सब लोगों के दिल की हक़ीकत ही बिल्कुल पेश करके रख दी है। मज़ा आ गया ! हां, आगे कहिए।’’
पंडितजी की दृष्टि नूरी की दृ़ष्टि से जा टकराई, मानो वह आगे कहने की इजाजत मांग रहे हों। नूरी ने भी कटाक्ष करके मानो पंडितजी को अपनी ओर से अनुमति दे दी।
पंडितजी ने कहा-‘‘तो सुनिए-

नज़रें झुकी रहीं, तो रही अंजुमन ख़मोश,
नज़रें जब उठ गईं, तो हजारों बहक गए।’’

नूरी इस शेर पर शरमाकर रह गई। उसके मुख पर लज्जा की रक्तिमाभा फैल गई। बड़ी-बड़ी बरौनियों वाले कजरारे नेत्र नीचे को झुक गए। माथे पर शोभित शीर्ष-फूल भी खुशी में माथे को छोड़कर झूम उठा। अधरों की स्मित रेख के बीच दंत-पंक्ति दमक उठी और लोग चिल्ला उठे-‘‘वाह पंडितजी, क्या शेर है ? गज़ब के ख्यालात हैं। हर शेर अपने में लाज़वाब। अब आगे फरमाइए।’’
पंडितजी ने नूरी की तरफ हंसती हुई आंखों से देखा और कहा-‘‘बेगम साहिबा ! कहने की इज़ाजत है ?’’
नूरी की नज़रें उठीं। पंडितजी ने रतनारी नयन-सीपियों में झांककर देखा। वे सिहर उठे। नूरी ने बड़ी ही शालीनतापूर्वक उत्तर दिया-‘‘कहिए।’’
पंडितजी ने महफिल को संबोधित करते हुए कहा-‘‘ज़रा इस आखिरी शेर पर खास तौर से गौर फरमाएं।’’
सामूहिक आवाज गूंज उठी-‘‘जरूर, जरूर ! अर्ज करें।’’
पंडितजी ने शेर पढ़ा-

‘‘उनके नूरे जिस्म की, रौनक को क्या कहें,
निकला न आफताब, परन्दे चहक गए।
ऐसी चली बयार कि गुलशन महक गए।’’

पूरा कक्ष गूंज उठा-‘‘क्या बात है ? वाह खूब। कमाल है पंडितजी। क्या नई सोच है ? क्या अंदाज़े-बयां है। सुबहान-अल्लाह।’’ वगैरह-वगैरह।

नूरी की खाला, जो अभी तक शांत बैठी थी, अपनी नूरी की इस प्रकार की प्रशंसा सुनकर बाग़-बाग़ हो उठी। उसके मुंह से भी निकला-‘‘वाह पंडितजी, वाह ! इस शेर ने तो बड़े-बड़े शायरों को बहुत पीछे छोड़ दिया है।’’

इतना कहते ही उसने दोनों हाथों से नूरी की बलैयां लीं। पंडितजी की तरफ से उसके दिल में दिली-हमदर्दी और अपनापन का अंकुर शायद उसी समय फूट निकला था। और नूरी तो जैसे लाज की गठरी बनकर सिमट कर रह गई। उसकी चुनरी के बेजान सलमा-सितारे मुस्करा उठे। गर्व से वक्ष उन्नत हो उठा। पूरी देह में सिरहन का एक कंपन-सा हुआ। उस क्षणिक कंपन में पैरों में बंधे घुंघरू भी झंकृत हो उठे। धानी सलवार और पायजामा सिहरन में दामिनि की भांति चमक उठे।
कुछ देर बाद वातावरण शांत हो गया। लोगों की नज़रें अब नूरी पर उठीं और केंद्रित हो गईं। और उस रात के बाद तो फिर...

नूरी और पंडितजी का एक-दूसरे के प्रति समर्पण बढ़ता ही गया। महफिल में हर रात ज़वान होती और एकांत में वे दोनों एकाकार होते। एक रात ऐसी भी आई, जब उन दोनों के प्यार की निशानी नूरी के पेट में आ गई। जब पंडितजी को यह मालूम पड़ा, तो वे बहुत दुखी हो गए। क्योंकि उन्हें बदनामी का भय था। इसलिए उन्होंने नूरी को बहुत समझाया कि वह उस निशानी को समाप्त करा दे।

लेकिन नूरी इस पर तैयार नहीं हुई। पर पंडितजी ने उससे यह आश्वासन अवश्य लिया कि होने वाली संतान, पिता के नाम पर गुमनाम अंधेरी ज़िंदगी में ही जिएगी और कभी भी उसके मुंह से पिता के नाम पं. शिवनारायण मिश्र का नाम नहीं निकलेगा। नूरी ने कलेजे पर पत्थर रखकर यह शर्त स्वीकार कर ली। उसके ऊपर पंडितजी की प्यार की निशानी का कुछ ऐसा मोह-जाल छा गया था कि वह अपना भविष्य ही भूल गई। क्योंकि जमाना कभी यह नहीं चाहता है कि एक नर्तकी कभी मां बने। उसके दिल में ममता का दीप जले। उसके स्तनों में दूध जन्म ले। उसके आंगन में कभी किसी शिशु की किलकारी या उसके-नन्हें-नन्हें पैरों में बंधी पायल के घुंधरूओं की झनकार गूंजे।

पर जो जमाना नहीं चाहता है, नर्तकी के दीवानें नहीं चाहते हैं, वही हुआ-नूरी बेगम ने एक कन्या को जन्म दिया। श्वेत रूई सी कोमल। नूरी प्रसन्न हो उठी, लेकिन पं. शिवनारायण की छाती पर मानो सांप लोट गया। नूरी के चेहतों पर मानो गाज़ गिर गई। उन्हें ऐसा लगा, जैसे कि नूरी ने सबके अरमानों का गला घोंटकर बहुत बड़ा कोई अपराध किया हो।
और अपराध की सज़ा नूरी को धीरे-धीरे कटे हुए जख्म पर नमक छिड़कने जैसी मिलती ही गई। उसकी साख़ गिरती ही गई। महफिल से उसके चाहने वाले एक-एक करके वृक्ष से झड़ने वाले पत्तों की तरह कटते चले गए। बहारें खिज़ां बनके रह गईं। रंगीनियां बदनसीबी के आलम में डूब गईं। महफिल के ठहाकों और फिकरेबाजी का दौर कम हो गया। जयपुर की सर्वश्रेष्ठ नूरी एक साधारण नर्तकी के रूप में रह गई।

3


नवजात कन्या नूरी के प्यार के साए में पतली रही। नाम रखा गया-रसकपूर। पं. शिवनारायण मिश्र ने यह नाम इसलिए सोचकर रखा कि कपूर में शीतलता और दर्दनाशिनी शक्ति दोनों ही हैं। साथ में देवी-देवताओं की आरती उतारने के लिए एक पवित्र वस्तु है। लेकिन उन्होंने शायद कभी यह नहीं सोचा होगा कि रसकपूर पारे से निर्मित वह औषधि भी होती है, जिससे कामोत्तेजक शक्ति के साथ-साथ असावधानी हो जाने पर वही रसकपूर भयंकर विष भी बन जाता है। रस कपूर के जीवन में भी यही सब घटित हुआ।

रसकपूर का बचपन इसी हवेली में ठुमकते-ठुमकते बीता। जैसे-जैसे वह उम्र की सीढ़ी पर एक-एक वर्ष करके चढ़ती गई, वैसे-ही-वैसे उसके रूप का निखार सूर्य की आभा की भांति बढ़ता गया। किशोरावस्था तक पहुंचते-पहुंचते उसके अंग-प्रत्यंगों से अनिंद्य रूपगर्विता बनने के लक्षण स्पष्टतः दिखने लगे। नूरी व पंडितजी दोनों ही उसके अप्रतिम रूप-लावण्य और सुकुमारता से मन-ही-मन बहुत प्रसन्न थे। लेकिन दोनों की मनःस्थिति में भिन्नता थी। नूरी ने जहां अपने मन में यह दृढ़ निश्चय कर लिया था कि उसकी रसकपूर बड़े होने पर पैरों में घुंघरू नहीं बांधेगी।

वह अपनी मां की भांति तवायफ नहीं कहलवाएगी। लेकिन दूसरी ओर, पंडितजी कुछ और ही सोचा करते थे, जो नूरी की समझ से परे था।
पंडितजी नूरी के कहने पर यही समझाते कि भले ही हम समाज के सामने अपने को रसकपूर का पिता न कहें, लेकिन आखिर मैं उसका पिता तो हूं ही और कोई भी पिता अपनी औलाद का अहित नहीं सोचता है।
‘‘तो फिर आपका हित रसकपूर के पैरों में घुंघरू बांधकर महफिलों में नचाकर धन कमाने में ही है, क्या ?’’

‘‘नहीं, बिल्कुल नहीं। लेकिन अर्जुन की तरह हमारा एक ही लक्ष्य है कि मेरी रसकपूर किसी राजमहल की महारानी बने।’’
‘‘आप तो आसमान के तारे तोड़ना चाह रहे हैं, जो जीवन में कभी भी संभव नहीं है और फिर एक तवायफ या नाचने-गाने वाली की बेटी के लिए।’’
‘‘नूर, सौंदर्य के आगे तो विश्वामित्र जैसे का तप भंग हो सकता है। मेनका भी तो वही थी, जो तुम हो। केवल अंतर स्वर्ग और मृत्युलोक का है। मेनका स्वर्ग की अप्सरा थी और तुम आज के युग में जयपुर जैसी रंगीन-शामों व रातों वाले नगर की अप्सरा हो। फिर हमारी रसकपूर का तो कहना ही क्या है ! शायद तुमने कभी उसके सौंदर्य को आत्मा की गहराई में जाकर न समझा है और न ही परखा है।’’

‘‘दुनिया में सौंदर्य की क्या कमी है ? यह तो विधाता की देन है। रसकपूर से भी बढ़कर भी तो कोई और सौंदर्य की देवी हो सकती है।’’
‘‘नहीं। विश्वास के साथ कह सकता हूं कि रसकपूर की रतनारी-नयन सीपियों में ऐसे लगता है जैसे मोतियों का ढेर एक साथ समा गया हो। पुतलियां जैसे काले घुमड़ाते मेघ हैं, जिनसे जल के स्थान पर मद की वर्षा होती है और बरौनियां जैसे समुद्र की हिलोरें। निश्चय है कि एक बार अगर जयपुर नरेश महाराजा जगतसिंह भी इन हिलोरों की भंवर में कहीं फंस जाएं तो उनका निकलना भी कठिन हो जाएगा। मेरे तीर का निशाना बस यही है नूर। लेकिन इसमें तुम्हें बस मेरे तीरों के लिए धनुष बनना पड़ेगा।’’

‘‘मतलब क्या है ? स्पष्ट रूप से कहिए।’’
‘‘यही कि, रसकपूर को नृत्य और गायन में ऐसी निपुणता हासिल हो जाए कि वह तुम्हें भी कोसों पीछे छोड़ दे।’’
‘‘आप अपनी औलाद को नाचते हुए देखना पसंद करेंगे और वह भी महफिलों में ?’’

‘‘नृत्य और महफिल दोनों अलग-अलग तथ्य हैं, अलग-अलग पहलू हैं। नृत्य और गायन ये कलाएं हैं और कलाएं भी सामान्य कलाएं नहीं, बल्कि ललित कलाओं के नाम पर जहां एक ओर नृत्य-नटराज शिव का प्रसाद है, वहां दूसरी ओर गायन मां सरस्वती की कृपा है। नृत्य और गायन दोनों में ही लय है। लय में ही रागात्मकता है। रागात्मकता में ही असीम प्रेम की अनुभूति है। उस अनुभूति में ही सम्मोहन है। उस सम्मोहन में ही आत्मा का आनंद है और आत्मा का आनंद ही जीवन का सच्चा सुख है, जीवन का सच्चा आनंद है, परमानंद है।

रही बात महफिल की, वह तो एक कसौटी है, जिस पर नर्त्तन और गायन की गुणवत्ता कसी जाती है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरी रसकपूर नृत्य और गायन कला में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करेगी और जिस दिन वह मेरे लक्ष्य-प्राप्ति में सफल हो जाएगी उस दिन मेरा जीवन सार्थक हो जाएगा। मैं अपने को परम सौभाग्यशाली समझूंगा। उस दिन संभव है कि मैं बड़े गर्व से कह सकूं कि रसकपूर एक तवायक या नर्त्तकी की बेटी नहीं, बल्कि पं. शिवनारायण मिश्र की बेटी है। उस दिन भले ही मेरे ऊपर तिरस्कार और बदनामी के हृदयभेदी बाण चलाए जाएं, मैं उन सबकी पीड़ा खुशी से सहन कर लूंगा, क्योंकि मुझे अपने लक्ष्य में सफलता पाने का गर्व होगा।

और इसके बाद वह समय आ भी गया, जब नूरी ने अपने पंडितजी की इच्छा पूरी करने के लिए अपने भावी भविष्य की सुखद कल्पनाओं के संसार को अपने ही हाथों नष्ट कर दिया। अपने दिल के अरमानों के नीड़ को अपने ही हाथों छिन-भिन्न कर दिया। अपनी सुखद आशाओं को कच्चे धागे की तरह तोड़कर रख दिया। और हृदय को भर लिया-एक असहनीय मर्मांतक वेदना से, जिसको सहने के लिए उसने घुट-घुटकर जीना स्वीकार कर लिया।
जीवन की शतरंजी चाल में पं. शिवनारायण की जीत हुई। रसकपूर के पैरों में नूरी के न चाहते हुए भी घुंघरू आखिरकार बंध ही गए और उन घुंघरुओं की झनकार में नूरी को रसकपूर की ओर से भावी भयंकर अट्टहास की भयानकता सुनाई पड़ने लगी।

रसकपूर को नूरी के पुराने उस्ताद रहमत खां और गुरु वृजनिधि के शिष्यत्व में सौंप दिया गया। उस्ताद रहमत खां शास्त्रीय संगीत में अप्रतिम समझे जाते थे और गुरु वृजनिधि कत्थक नृत्य में पारंगत माने जाते थे। उस्ताद रहमत खां ने उसे वीणा, सितार के साथ-साथ शास्त्रीय गायन की विधिवत् शिक्षा दी और गुरु वृजनिधि के चरणों में बैठकर कत्थक में उसने पूर्ण दक्षता प्राप्त की। रसकपूर ने अपनी अटूट लगन, अनवरत, साधना तथा अथक परिश्रम से जल्दी ही एक श्रेष्ठतम गायिका और नृत्यांगना के रूप में अपने दोनों गुरुओं का शुभ आशीर्वाद प्राप्त कर लिया।

उसके कंठ से गायन के नाम पर रागों की परिपक्वता और अविरल मिठास के साथ-साथ नृत्य में घुंधरुओं की स्वर-लहरी में किसी सरिता के प्रवाह जैसी निःश्छलता, मधुरता एवं मनमोहकता और पैरों की थिरकन में बिजली जैसी चपलता की चर्चा कांचमहल की रंगीन दीवारों से एक मादक गंध की भांति निकलकर नगर के कलावंतों श्रीमंतों और रसिकों के कानों तक जाकर पहुँच गई। वे लालयित हो उठे, उसकी अनूठी रूप-राशि को देखने के लिए, उसके नृत्य व संगीत का असीम आनंद प्राप्त करने के लिए। लेकिन यौवन की दहलीज की ओर कोमल कदम बढ़ाती हुई रसकपूर को देखना उतना ही असंभव था।


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