आजादी की कहानी डाक टिकटों की जबानी - गोपीचंद श्रीनागर Aazadi Ki Kahani Dak ticketo Ki Jabani - Hindi book by - Gopichand Shrinagar
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आजादी की कहानी डाक टिकटों की जबानी

गोपीचंद श्रीनागर

प्रकाशक : ग्रंथ अकादमी प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :99
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5154
आईएसबीएन :81-88267-51-1

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डाक टिकटों के माध्यम से सर्वथा नवीन शैली में भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का परिचय कराते ये डाक टिकट...

Ajadi Ki Kahani Tikto Ki Jabani a hindi book by Gopichand Shrinagar - आजादी की कहानी डाक टिकटों की जबानी - गोपीचंद श्रीनागर

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


देश की आजादी में अनेक महान् विभूतियों-क्रांतिकारियों, सत्याग्रहियों एवं स्वतंत्रता सेनानियों-का योगदान रहा है। इसके साथ ही आजादी में अनेक आंदोलनों, घटनाओं, स्थानों एवं वस्तुओं की भी महती भूमिका रही। स्वतंत्र भारत में आजादी में इनके योगदान व महत्ता को दरशाते डाक टिकट जारी किए गए।

जब डाक टिकटों पर नए-नए समसामयिक व्यक्तित्व, घटनाएँ, स्थान, परंपराएँ आदि चित्रित होने लगे तब डाक टिकटों के संग्रह की अवधारणा ही बदल गई। परिणामतः समसामयिक डाक टिकट जीवंत ऐतिहासिक दस्तावेज बनते चले गए, जो अब सिक्कों की भाँति इतिहास-लेखन के नए सशक्त माध्यम (टूल्स ऑफ हिस्ट्री राइटिंग) के रूप में सामने आए हैं। वस्तुतः डाक टिकट इतिहास के झरोखे हैं।

प्रस्तुत पुस्तक द्वारा सुधी पाठकगण डाक टिकटों के माध्यम से सर्वथा नवीन शैली में भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का परिचय पा सकेंगे।

भूमिका

डाक टिकट की शुरूआत सर्वप्रथम इंग्लैंड में हुई। डाक टिकटों को जारी करने का मुख्य उद्देश्य यह था कि अपनी चिट्ठी-पत्री आदि भेजनेवाले लोग अपना डाक शुल्क इन डाक टिकटों के माध्यम से पहले ही भुगतान कर दें। समय के साथ-साथ डाक शुल्क भरने का यह माध्यम अप्रत्याशित रूप से इतना सफल रहा कि विश्व के एक के बाद दूसरे देश इसकी उपयोगिता एवं आवश्यकता से प्रभावित हुए बिना न रह सके। आज विश्व इन डाक टिकटों के घेरे में समा चुका है।

शुरू में एक नए अवतार व आकर्षण के कारण अपनी रानी विक्टोरिया (सन् 1835-1901 ई.) के चित्रमय डाक टिकटों के संग्रह का शौक खेल-खेल में जरूर पनपा था; परंतु जब डाक टिकटों की मध्य डिजाइन पर नए-नए समसामयिक व्यक्तित्व, घटनाएँ, स्थान, परंपराएँ आदि इनके डिजाइनकारों द्वारा सही-सही चित्रित होने लगीं, तब डाक टिकट संग्रह की घिसी-पिटी अवधारणा ही बदल गई। परिणामतः समसामयिक डाक टिकट जीवंत ऐतिहासिक दस्तावेज बनते चले गए जो अब सिक्कों की भाँति इतिहास लेखन के नए सशक्त माध्यम (टूल्स ऑफ हिस्ट्री राइटिंग) के रूप में सामने आए हैं।

मैं मई, सन् 1985 ई. में श्री अरविंद सक्सेनाजी (तत्कालीन सहायक महानिदेशक-फिलेतली) से संसद मार्ग, नई दिल्ली स्थित उनके कार्यालय में जब मिला था तब चर्चा के दौरान मैंने भारतीय फिलेतली के इस गंभीर पक्ष को रखा था। श्री सक्सेना मेरे विचारों से प्रभावित लगे थे। इससे डाक टिकट संग्रह में मेरा उत्साह बढ़ा था।

मेरी इस पुस्तक-‘डाक टिकटों में आजादी की कहानी’ में सुधी पाठकगण डाक टिकटों के माध्यम से कही गई महान् भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए छेड़े गए विविध आंदोलनों से जुड़े विभिन्न पक्षों के इतिहास की एक मनोरम झाँकी पाएँगे। समसामयिक डाक टिकट इतिहास के झरोखे हैं। अगर यह माध्यम सजग पाठकों को पसंद आता है तो इसे मैं अपने प्रयत्नों की सफलता मानूँगा।

मुझे अपने पाठकों से रचनात्मक सुझावों की प्रतीक्षा रहेगी।
जय भारत ! जय भारती !!

दीपावली 2006
राजोलहर 1187, नया रायगंज
सीपरी बाजार, झाँसी-284003
-गोपीचंद श्रीनागर

आजादी की कहानी, डाक टिकटों की जबानी

अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम की पहली लौ, जो सन् 1857 में उठी थी, वह देशवासियों की एकता के अभाव में बेअसर होकर दब चुकी थी। वह ऐसा समय था जब बड़ी संख्या में देशी राजे-महाराजे व नवाब अंग्रेजों से मुँह की खा चुके थे, शेष ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार की शरण में चले गए थे।

हालाँकि, प्रथम स्वतंत्रता संग्राम असफल अवश्य रहा, लेकिन जल्दी ही अंग्रेजों को देश से बाहर निकाल फेंकने के लिए जनमानस में चिनगारियाँ फूटने लगीं थीं। उस समय के एक आई.सी.एस सुरेन्द्रनाथ बनर्जी (सन् 1848-1925) के अंग्रेजी राज के खिलाफ विद्रोह से इन चिनगारियों को हवा मिली और कानूनी तरीके से देशवासियों की माँगें मनवाने के लिए सुरेंद्रनाथ बनर्जी1 ने 17 जुलाई, 1983 को एक ‘नेशनल फंड’ की स्थापना की थी। यह इंग्लैंड के प्रधानमंत्री बेंजामिन डिजरायली व अंग्रेजों के बढ़ते अंह का विरोध मात्र था।

भारत की स्वतंत्रता का यह विचार देशवासियों में जोरों से फैला और तभी 28 दिसंबर, 1985 को बंबई महानगरी में ‘इंडियन नेशनल यूनियन’ का जन्म हुआ। यह ‘इंडियन नेशनल यूनियन’ ही बाद में ‘इंडियन नेशनल कांग्रेस’ के नाम से प्रसिद्ध संस्था बनी। इस राष्ट्रीय संस्था की स्थापना में एक सेवानिवृत अंग्रेज आई.सी.एस. श्री ओक्टेवियन ह्यूम2 (सन् 1829-1912) का प्रमुख योगदान था। श्री ह्यूम सन् 1857 की भारतीय क्रांति के समय इटावा (उत्तर प्रदेश) में कलक्टर थे। जिन अन्य भारतीयों ने इस संस्था की स्थापना में सहयोग किया, उनमें सर्वश्री महादेव गोविंद रानाडे (सन् 1842-1904), उमेश चंद्र बनर्जी, दादाभाई नवरोजी3 (सन् 1825-1917), फिरोज शाह मेहता (सन् 1825-1915), रघुनाथ राव, गंगा प्रसाद वर्मा, मुंशी नवल किशोर4 (सन् 1836-1895) आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

सन् 1985 से 1904 तक का समय ‘इंडियन नेशनल कांग्रेस’ का शैशव-काल था। उस समय इस संस्था के सदस्य राजभक्त हुआ करते थे और इसके बदले में उनको अंग्रेजों की पूरी सद्भावना और कृपा प्राप्त होती थी। अंग्रेजी सरकार भी ऐसी संस्था से खुश थी, परंतु उस समय कुछ ऐसे नेता भी मौजूद थे, जो अनुनय-विनय की नीति-रीति में तनिक भी विश्वास नहीं रखते थे और अंग्रेजी सरकार से डटकर लोहा लेना चाहते थे। इनमें महाराष्ट्र के बाल गंगाधर तिलक (सन् 1856-1920), पंजाब के लाला लाजपतराय (सन् 1865-1928) और बंगाल के विपिन चंद्र पाल5 (सन् 1858-1932) प्रमुख थे। उस समय लाल, पाल, बाल की तिकड़ी से ब्रिटिश सरकार भयभीत रहा करती थी।

कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन (सन् 1887) में पं. मदन मोहन मालवीय (सन् 1861-1946) की खूब धूम रही। मालवीयजी6 छुआछूत के घोर विरोधी थे। सन् 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में बंकिमचंद्र चटर्जी (सन् 1838-1894) रचित ‘वंदे मातरम्’7 को राष्ट्रीय गीत के रूप में गाया गया था। इसे गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर8 (सन् 1961-1941) ने गाया था। यह राष्ट्रीय गीत संपूर्ण भारत में क्रांति का प्रतीक तो बन ही चुका था, साथ ही गोरी सरकार के लिए भयानक सिर दर्द भी था।

आजादी की लड़ाई का दूसरा युग (सन्) 1905-1919) कांग्रेस में नरम दल और गरम दल के नेताओं के बीच वैचारकि टकराव का रहा। यह वैचारिक टकराव कांग्रेस के बनारस अधिवेशन (सन् 1905) में सामने उभर आया था। इस अधिवेशन के सभापति नरम दल के नेता गोपाल कृष्ण गोखले9 (सन् 1866-1915) थे, जो ब्रिटिश साम्राज्य के अंदर रहकर ‘औपनिवेशिक स्वराज्य’ की माँग कर रहे थे। दूसरी ओर, गरम दल के बाल गंगाधार तिलक10 जो हर हालत में अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकना चाहते थे। उस समय कांग्रेस, में दलवालों की संख्या अधिक थी। अंग्रेजी सरकार को मौका मिला और उसने गरम दलवालों पर दमन का शिकंजा कस दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि तिलक को छह वर्ष की कठोर सजा मिली और उन्हें भारत से मांडले जेल में भेज दिया गया।

तिलक जी का नारा था-‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा’। लाला लाजपतराय11 वही शेर-ए-पंजाब थे, जिन्होंने सन् 1928 में साइमन कमीशन के विरोध में लाहौर में जुलूस का नेतृत्व किया था और अंग्रेजों की लाठियाँ खाई थीं। 17 नवंबर, 1928 को मृत्यु से पहले लालाजी द्वारा की गई भविष्यवाणी एकदम सही निकली कि उनको लगी एक-एक लाठी अंग्रेज हुकूमत के ताबूत की एक-एक कीले साबित होगी।

सन् 1914 में श्रीमती एनी बेसेंट12 नामक एक विदेशी महिला के भारतीय राजनीति में पदार्पण से आजादी की लड़ाई को प्रेरणा और बल मिला था; पर अगले ही वर्ष (1915) गोपाल कृष्ण गोखले का निधन हो गया। इसके पहले सन् 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध शुरू हो चुका था। इस विश्वयुद्ध में भारतीयों ने अंग्रेजों का इस आशा में पूरा-पूरा साथ दिया था कि युद्ध के बाद भारत को आजादी दे दी जाएगी। सन् 1914 में ही गांधीजी13 दक्षिण अफ्रीका से भारत लौट आए थे। जवाहरलाल नेहरु की महात्मा गांधी से पहली मुलाकात सन् 1916 में हुई सन् 1918 में श्रीमती बेसेंट (सन् 1847-1933) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्षता चुनी गई थीं। ये प्रथम महिला कांग्रेस अध्यक्षा थीं।

उस समय खोखले जी के शिष्यों में वी.एस.श्रीनिवास शास्त्री14 (सन् 1869-1946) अपनी प्रखर भाषण कला और भारतीय मूल के लोगों के लिए लगन से काम करने के कारण श्री गोखले के राजनीतिक उत्तराधिकारी माने जाने लगे थे। लेकिन एक बार गांधीजी के भारतीय राजनीति में प्रवेश करने के बाद गांधीजी भारतीय राजनीति की तप्त सतह पर उमड़ते-घुमड़ते बादलों की भाँति छा गए। इसके बाद सन् 1920 से आजादी की लड़ाई को भारतीय इतिहास का ‘गांधी-युग’ माना जाता है। गांधीजी ने अपनी विलक्षण सूझ-बूझ से भारत की दलित-गरीब जनता, महिलाओं व हरिजनों को राष्ट्र की मुख्य धारा में लाकर खड़ा कर दिया था। गांधीजी ने सत्य, अहिंसा और असहयोग के बल पर अपनी लड़ाई लड़ी थी। ये ही उनके मुख्य हथियार थे। जलियाँवाला बाग15 के बर्बर हत्याकांड (13 अप्रैल, 1919) ने भारतीय नेताओं को झकझोर दिया। उनका अंग्रेजी शासन पर जो थोड़ा-बहुत विश्वास शेष था वह भी उठ गया। भारतवासियों ने देशव्यापी हड़ताल करके इस घटना का विरोध प्रकट किया।

10 सितंबर, 1920 में लाला लाजपतराय के सभापतित्व में हुए कांग्रेस के कल्कत्ता अधिवेशन में गांधीजी का असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव पूर्ण बहुमत से पारित हो जाने के बाद एक व्यापक जन-आंदोलन शुरू हआ। गांधीजी16 ने कहा था, ‘‘अन्याय करनेवाली सरकार को सहयोग करना अन्याय को सहायता देना है।’’ अंग्रेजी सरकार ने असहयोग आंदोलन को ‘शेखचिल्ली की योजना’ का नाम देकर गांधीजी की खिल्ली उड़ाई।

अब देश भर में स्वदेशी आंदोलन ने जोर पकड़ लिया था। घर-घर चरखा चलता था। वस्त्रों की होली जलती थी। इसके साथ-ही-साथ छुआछूत उन्मूलन,मद्य-निषेध, राष्ट्रभाषा-प्रचार आदि का कार्य भी तेजी से आगे बढ़ रहा था। राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन17 (सन् 1882-1962) आजीवन हिंदी आंदोलन के प्राण बने रहे। ठक्कर बापा18 (सन् 1869-1951) छुआछूत के खिलाफ जूझते रहे थे। गांधीजी से प्रभावित होकर देश के कोने-कोने से देशभक्तों की टोलियाँ उठ खड़ी हुई थीं। जवाहरलाल नेहरू (सन् 1889-1964) सरदार पटेल19 (सन् 1875-1950), डॉक्टर राजेंद्र-प्रसाद20 (सन् 1884-1963), चक्रवर्ती राजगोपालाचारी21 (सन् 1878-1972), टी प्रकाशम्22 (सन् 1872-1957), अबुल कलाम आजाद23 (सन् 1888-1958), रफी अहमद किदवई24, गोविंद वल्ल पंत25 (सन् 1887-1961), लालबहादुर शास्त्री26 (सन् 1904-1966) आदि उसी आंदोलन की देन थे।

सन् 1925 में पटना में मजहरुल हक27 (सन् 1866-1930) ने ‘सदाकत आश्रम की स्थापना की थी जो बिहार में कांग्रेस का प्रमुख गढ़ था। यहाँ के सीधे-सादे डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की योग्यता का इससे बढ़कर और क्या सबूत हो सकता था कि वह ब्रिटिश भारत में कांग्रेस के तीन-तीन बार (सन् 1934, 1939 व 1947) अध्यक्ष चुने गए थे।

वर्धा में श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर देश का ऐसा पहला मंदिर था, जिसे सन् 1928 में जमनालाल बजाज28 (सन् 1889-1942) के नेतृत्व में हरिजन भाइयों के लिए खोल दिया गया था। आजादी की लड़ाई में उस समय एकाएक जबरदस्त मोड़ आया जब असहयोग आंदोलन 4 फरवरी, 1922 को चौरी-चौरा (गोरखपुर, उ.प्र.) में हिंसात्मक हो उठा। अहिंसावादी गांधीजी ने यह असहोयग आंदोलन तत्काल वापस ले लिया। गांधीजी के इस निर्णय से तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देशबंधु चितरंजनदास29 (सन् 1870-1925) व महामंत्री पं. मोतीलाल नेहरू31 (सन् 1861-1931) नाराज हो गए और उन्होंने मिलकर ‘स्वराज पार्टी’ नामक एक नए राजनीतिक दल का गठन कर डाला।

सन् 1924 में महात्मा गांधी ने बेलगाँव कांग्रेस का सभापतित्व करते हुए विदेशी माल का बहिष्कार व कताई-बुनाई30 करने का प्रस्ताव रखा था। इसी वर्ष हिंदु-मुसलिम एकता के लिए गांधीजी ने 21 दिनों का उपवास रखा था। सन् 1925 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन कानपुर में हुआ। इस अधिवेशन की सभापति ‘भारत कोकिला’ श्रीमती सरोजनी नायडू32 (सन् 1879-1949) थीं। देश की नारी जागरूकता का अनुपम उदाहरण श्रीमती नायडू का यह कथन उल्लेखनीय है-‘‘मैं अबला नारी हूँ, भारत के लिए अपने आपको होम करने को तैयार हूँ।

 


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