हितोपदेश - विष्णु शर्मा Hitopadesh - Hindi book by - Vishnu Sharma
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हितोपदेश

विष्णु शर्मा

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :176
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5160
आईएसबीएन :81-8133-457-4

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मूर्ख राजकुमारों को राजनीति में निपुण बना देने वाली रोचक एवं शिक्षाप्रद कथाएं.....

Hitopdesh

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

हितोपदेश की यात्रा

मंदाकिनी नदी के पवित्र तट पर बसे ‘पाटलिपुत्र’ का इतिहास में अपना एक विशेष स्थान रहा है। इस नगर को आज पटना के नाम से जाना जाता है, जो वर्तमान में बिहार राज्य की राजधानी है। उस समय का पाटलिपुत्र भी एक विशाल राज्य की राजधानी था। वहाँ बड़े ही प्रतापी, विद्वान व शूरवीर राजा सुदर्शन का राज्य था। राजा सुदर्शन के राजदरबाद में देशभर के चुने हुए विद्वानों को विशेष स्थान प्राप्त था। राजा उनके मान- सम्मान का यथोचित आदर करते और विद्वान उन्हें विद्वता, नीति व ज्ञान की बातें बताते।
एक बार राजा सुदर्शन का दरबार लगा हुआ था। सभी विद्वान सभा में बैठे नीति व ज्ञान की गंगा प्रवाहित कर रहे थे और राजा उनसे नीति व ज्ञान की बातें ग्रहण करके उन्हें यथोचित सम्मान व पुरस्कार आदि दे रहे थे। उसी सभा में किसी विद्वान ने एक श्लोक कहा-

अनेक संशयोच्छेदि परोक्षार्थस्य दर्शकम्।
सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः।।
यौवनं धनसम्पत्तिः प्रभुत्वमविवेकिता।
एकैकमप्थनर्थाय किमु यत्र चतुष्यम्।।

अर्थात्-धर्म और राजनीति, समाज और इतिहास सम्बन्धी उलझनों की धुन्ध के पार केवल ज्ञान की आंखों से ही देखा जा सकता है। ज्ञान तो एक ऐसा प्रकाश है जो संसार के हर अंधेरे को मिटा सकता है, जहाँ तक ज्ञान का प्रकाश पहुंच सकता है, वहां तक मानव की आंखें नहीं पहुंच सकतीं। जो नजर के सामने नहीं है, उसे देख सकने वाली ज्ञान की आंखें महान है। जिसके पास ज्ञान की आंखें नहीं हैं, वे आंखें रहते हुए भी धंधे हैं।
जिस प्राणी को यौवन, धन-दौलत, सत्ता तथा महानता में से कोई एक चीज मिल जाए वह अंहकार में अंधा होकर बड़े से बड़ा पाप भी कर सकता है, और यदि किसी को ये चारों एक साथ मिल जाएं उस प्राणी का क्या हाल होगा ?


‘‘मर्कटस्य सुरापानं ततो वृश्चिकदंशन्,
तन्मध्ये भूत संचारो यद्वा तद्वा भविष्यति।’’


राजा सुदर्शन ने जब इन श्लोलो को सुना तो उन्हें अपने मूर्ख पुत्रों की चिन्ता ने आ घेरा। राजा के सभी पुत्र मूर्ख व व्यसनी थे। वे पंड़ितों ज्ञानियों की संगत न करके क्षुद्र विचारों के लोगों के साथ उठते-बैठते थे और उन्हीं की भाँति क्षुद्र और छोटे विचारों के हो गए थे।
राजा सुदर्शन के पास इतना बड़ा खजाना था कि एक तो क्या सात पीढ़ियां भी आराम से बैठकर खा सकती थीं, किन्तु ज्ञान के बिना तो इंसान अधूरा है। एक राजा, जिसके कन्धों पर पूरी प्रजा का बोझ होता है, जिसे पूरे देश के संचालन का महान कार्य करना होता है, यदि वही अज्ञानी हो तो उस देश का क्या होगा ? राजा सुदर्शन को यही चिन्ता भीतर ही भीतर घुन की भांति खाये जा रही थी। वे रात-दिन इसी चिन्ता में खोए रहते कि ऐसी निकम्मी और अज्ञानी सन्तान का क्या लाभ ? जो पढ़ने-लिखने में रुचि न लें, जो धर्म के बारे में न सोचे, जिसे अपने कर्तव्यों का बोध न हो, ऐसी सन्तान का तो होना न होना समान ही है।

सन्तान पैदा न हो या पैदा होकर मर जाए तो यह दुख कुछ दिनों तक सालता है, किन्तु यदि सन्तान बुद्धिहीन हो, धर्म व ज्ञान से दूर रहे, जिसकी पढ़ने-लिखने में रुचि न हो, ऐसी सन्तान का दुख तो बहुत बुरा होता है। ऐसी सन्तान को देखकर तो माता-पिता भीतर ही भीतर कुढ़ते जलते रहते हैं और यही कुढ़न एक दिन उन्हें भी ले डूबती है। ऐसी सन्तान न तो केवल स्वयं के लिए बल्कि धरती के लिए भी बोझ ही होती है। ऐसे दस मूर्ख पुत्रों से तो एक बुद्धिमान कन्या अच्छी। पुत्र एक हो लेकिन गुणी व नेक हो। कुपुत्रों की अधिक संख्या तो आकाश के अगणित तारों की तरह निरर्थक होती है जबकि एक सुपुत्र चन्द्रमा की भांति अकेला ही समस्त कुल को उज्जवल कर देता है।
परन्तु मेरे राजकुमारों में तो कोई सुपुत्र कहलाने के योग्य नहीं है। विचारों के इसी भंवर में फंसे राजा सुदर्शन का सिर चकराने लगा और अन्त में उन्होंने मन -ही -मन में निश्चय किया कि चाहे जो भी हो, मैं अपने पुत्रों को अपने से भी बड़ा नीतिज्ञ व विद्वान बनाऊंगा।
दूसरे दिन ही उन्होंने एक सभा बुलाई जिसमें पाटलिपुत्र के अतिरिक्त अन्य राज्यों के विद्वानों व पण्डितों को भी आमंत्रित किया। उन सभी विद्वानों का अभिनन्दन करते हुए राजा सुदर्शन ने कहा-

‘‘मेरे आदरणीय साथी विद्वानों व बुद्धिजीवियों आज मैंने आप सबको इसलिए बुलाया है कि मैं अपने पुत्रों के पथभ्रष्ट होने से अत्यन्त दुखी हूं। मैं अपने व्यसनी पुत्रो को देखता हूं तो मुझे अपने राज्य की प्रजा का ख्याल आता है कि मेरे बाद इनका हितचिंतक कौन होगा ? आप लोगों से प्राप्त ज्ञान के प्रकाश से मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि इस अंधेरे को दूर करने के लिए मैं आपसे ही सलाह लूं। आपने ही बताया है कि बुद्धिमान वही है जो संकट के समय किसी दूसरे बुद्धिमान का सहारा ले, अतः अब आप लोग ही बताएँ कि मैं अपने पुत्रों का सुधार कैसे करूं ?’’

उन्हीं विद्वानों में एक महापण्डित, दार्शनिक, बुद्धिजीवी श्री विष्णु शर्मा भी थे। राजा के वचनों को सुनकर वे अपने स्थान से उठे और बड़े ही विनम्र व अपनत्व भरी वाणी में बोले-महाराज आप मेरे होते हुए किसी बात की चिन्ता करते हैं। मैं इन बालकों को अपने पास रखकर इन्हें मूर्खता के अंधकार से निकालकर नीतिशास्त्र की शक्ति से प्रकाश का मार्ग दिखाऊंगा। आप राजपाठ के कार्यों की ओर ध्यान दें और यह कार्य मुझ पर छोड़ दें। यह सत्य है कि परिश्रम वहीं सफल होता है, जहां पर इसकी आवश्यकता हो। विद्या का प्रभाव भी उसी पर पड़ता है, जिसके पास बुद्धि हो, जिस प्रकार बगुले को सौ बार पढ़ाओ। वह तोते की तरह नहीं रट सकता, उसी प्रकार मूर्ख भी विद्या ग्रहण नहीं कर सकता। किन्तु आपके पुत्र तो राजकुमार हैं जिन्होंने उच्च कुल में जन्म लिया है। आप स्वयं बहुत बड़े ज्ञानी हैं, ऐसे ज्ञानियों के यहां मूर्ख सन्तान उत्पन्न नहीं हो सकती। अन्तर केवल इतना है कि आपके पुत्रों की शिक्षा-दीक्षा ढंग से नहीं हुई, जिस कारण उन्हें क्षुद्र विचारों ने जकड़ लिया है, किन्तु अब मैं उन्हें अपने साथ ले जाऊंगा। मैं आपको वचन देता हूं कि छः माह के भीतर मैं उन्हें नीतिशास्त्र का ऐसा ज्ञान दूंगा कि वे बहुत विद्वान बन जाएंगे।’’

महाज्ञानी विष्णु शर्मा की बात सुनकर राजा सुदर्शन अत्यन्त प्रसन्न हुए। विष्णुजी की सांत्वना भरी वाणी सुनकर जैसे उनकी आत्मा पर से बहुत बड़ा बोझ हट गया था। उसी दिन राजा सुदर्शन ने अपने पुत्रों को विष्णु शर्मा के सुपुर्द कर दिया और कहा-पण्डित जी ! आज से मेरे इन पुत्रों के संरक्षक आप हैं। नीतिशास्त्र के ज्ञानोपार्जन हेतु मैं इन्हें आपके सुपुर्द करके सचमुच चिन्ता मुक्त हो गया हूं।’’

‘‘धन्यवाद राजन, मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि मैं अपने कर्तव्य का तन-मन से पालन करूंगा।’’
कहकर विष्णु शर्मा राजकुमारों को अपने साथ लेकर चले गए।
कुछ दिन पण्डित विष्णुजी उन बालकों का गहन अध्ययन करने के बाद इस नतीजे पर पहुंचे कि इन बच्चों में बुद्धि तो है किन्तु यह अपनी क्षुद्र संगति के कारण उद्दण्ड हो गए हैं, अतः इन पर सीधा-सीधा ज्ञान थोपने का अर्थ होगा कि ये या तो यहां से भाग जाएंगे या विद्रोह कर देंगे, इसलिए उन्होंने उन्हें सुधारने के लिए एक नया ही मार्ग निकाला, जिससे उनका मनोरंजन भी हो और उन्हें ज्ञान भी प्राप्त हो जाए।
पंडित जी ने दोनों राजकुमारों को अपने पास बुलाया और बड़े प्यार से बोले-देखो बच्चों। जो बुद्धिमान होते हैं उनका समय लिखने पढ़ने और ज्ञान प्राप्त करने में व्यतीत होता है और जो मूर्ख होते हैं, वे या तो सोते रहते हैं या उनका समय लड़ने झगड़ने में बीत जाता है। अतः मैं तुम्हारे मनोरंजन के लिए तुम्हें अच्छी- अच्छी कहानियां सुनाऊंगा, जिन्हें सुनकर न केवल तुम्हारा मनोरंजन होगा बल्कि ज्ञान भी प्राप्त होगा। ये कहानियां बड़ी ही विचित्र होंगी। इनमें शेर, चीता, हिरण, कौए, कछुए, कबूतर आदि पात्र होंगे।’’’
‘‘ऐसी कहानियां तो सचमुच मजेदार होंगी, गुरुजी’’ राजकुमारों ने खुश होकर कहा-‘‘ऐसी कहानियां तो हम अवश्य सुनेंगे।’’

‘‘अवश्य सुनो- सबसे पहले मैं तुम्हें यह उपदेश देता हूँ। कि इन्सान को कभी लोभ नहीं करना चाहिए। लोभी प्राणी अपने प्राणों को उसी प्रकार संकट में डाल देता है, जैसे मूर्ख से व्याकुल कबूतरों ने अपने प्राणों को संकट में डाला।’’
‘‘वह कैसे गुरुदेव ?’’
‘‘सुनो’’
विष्णु पंडित ने उन्हें नीति-ज्ञान की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी।



मित्र लाभ



मित्र वह है, जो हित की सलाह दे। मित्र वह जो विपत्ति में साथ न छोड़े। मित्र वह जो मित्र की पहाड़ सी भूल को राई समान बनाए और कण समान गुणों का बखान करते-करते न अघाए। ऐसे मित्र जल्द नहीं मिलते। ऐसे मित्रों की खोज सदैव करनी चाहिए। सच्चा मित्र मिलना जीवन की अमूल्य उपलब्धि हुआ करती है। क्या आप मित्रता की कसौटी पर खरे उतरते हैं ?

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लोभ अंधा कर देता है


गोदावरी नदी के तट पर सेमल का एक विशाल वृक्ष था। उसकी शाखाएं घनी व छायादार थीं। वर्षों बीत गए, कितने ही पथिक आए और नदी के शीतल जल से प्यास बुझाकर उसकी सुखद छाया में विश्राम कर थकान मिटाकर। अपनी अपनी राह पर चले गए, मगर सेमल का वह वृक्ष वहां अडिग खड़ा रहा।
पथिकों को उससे छाया मिलती थी और उसकी घनी शाखाओं पर भांति-भांति के पक्षी घोंसला बनाकर रहते थे, जिनमें लघुपतनक नामक एक कौआ भी अपने परिवार के साथ रहता था।
लघुपतनक वृद्ध व अनुभवी था।
वह आस-पास के वातावरण पर पूरी नजर रखता था।
सेमल के इस वृक्ष के साथ ही आम का एक वृक्ष भी था। गर्मी के दिनों में इस वृक्ष पर खूब आम आते। यात्रियों को तो इन दोनों वृक्षों से खूब लाभ बोता था। एक तो आम चूसने को मिलते, दूसरा ठंडा पानी पीने के मिलता, तीसरा वृक्षों की घनी छाया में विश्राम करने को मिलता।

जब कभी भी आंधी आती थी तो राहगीर इस सेमल की ओट लेकर खड़े होते। इस आंधी में पके हुए आम नीचे गिरते जिन्हें चूसकर यात्रियों को आनन्द आता।
कौआ अपने परिवार का मुखिया होने के कारण पूरे परिवार की सुरक्षा करता था।
इस क्षेत्र में अक्सर शिकारी अपना जाल लिये घूमते रहते थे, जिनके डर के मारे पक्षी बेचारे दुबके रहते।
एक कौआ ही था जो आस-पास के वातावरण पर न केवल दृष्टि रखता था बल्कि आने वाले किसी खतरे के प्रति पहले ही अन्य पक्षियों को सचेत कर दिया करता था।

एक बार एक शिकारी उसी वृक्ष की ओर आ निकला।
आम के पेड़ पर लटक रहे पके हुए आमों को देखकर उसके मुँह में पानी भर आया।
फिर उन दोनों पेड़ों पर इतने सारे पक्षी बैठे देखे तो वह हंसकर अपने आपसे ही बोला-‘‘वाह वाह एक साथ दो-दो मजे आज तो जरूर किसी भाग्यशाली व्यक्ति का मुंह देखा है जो शिकार भी मिलेगा और साथ में आम भी।’’,/div>



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