संसारी साधु - हरकिसन महेता Sansari Sadhu - Hindi book by - Harkisan Mehta
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संसारी साधु

हरकिसन महेता

प्रकाशक : ज्ञान गंगा प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :176
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5169
आईएसबीएन :81-88139-94-7

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अत्यंत मार्मिक एवं कारुणिक उपन्यास...

Sansari Sadhu - A Hindi Book by - Harkisan Maheta

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


‘‘शायद आपके मन में प्रश्न उठेगा कि साधु जीवन ही बिताना था तो युवराज के बिना अधिकार पाने के लिए मैंने इतना संघर्ष क्यों किया ? इसका कोई संतोषजनक उत्तर मेरे पास नहीं है। परंतु मैं स्वयं की परीक्षा लेना चाहता था। इतने वर्षों की साधना की मुझे परीक्षा करनी थी। अब आप में से कोई हमें फिर माया के बंधन में जकड़ने का प्रयास न करें, यही प्रार्थना है।’’

निर्मल कुमार ने अंतिम शब्द कहे, ‘‘हम इस राज्य की हद छोड़कर कहीं जानेवाले नहीं हैं, साधु रहकर संसारी की तरह साथ जीनेवाले हैं; परंतु हमारा आवास राजमहल की बजाय मंदिर रहेगा।’’

डबडबाई आँखों से सबने उस संसारी साधु को सपत्नीक विदा किया। उन दोनो के जाने के बाद राजमाता कुँवर करण और राजकुमारी चंदन के गले से लगकर सिसक-सिसककर रोती रहीं। साथ ही उनके भीतर-मन-ही-मन मानो कोई कह रहा था, ‘जिसने सात जन्मों तक तप किया हो, उसकी कोख से ही ऐसा पवित्र पुत्र अवतार लेता है !’
राजमाता परम संतोष अनुभव कर रही थीं।

इसी उपन्यास से

हमारी बात

 
अगर सच पूछें तो साहित्य के अपने कोई प्रदेश, भाषा, धर्म या संस्कृति के स्वतंत्र क्षेत्र नहीं होते हैं। साहित्य का उपादान मनुष्य होता है मनुष्य का बाह्य आवरण अकसर भिन्न-भिन्न दिखाई देता है, लेकिन इन आवरणों को अगर हटा दिया जाए तो जो आकृति दृश्यमान होती है, वह निर्मल और सुरेख आकृति ही उसके अपने अंतःस्वरूप के साथ साहित्य का उपादान होती है।
लेकिन उपादान के अंतःस्वरूप की ऐसी तात्त्विक एकता होने पर भी साहित्य को अपने क्षितिज-विस्तार के लिए विभिन्न भाषाओं के माध्यम अंगीकृत करने पड़ते हैं। साहित्य का यह व्यवहारगत सत्य है।

इसी सत्य को स्वीकृत करके गुजराती साहित्य की सत्त्वशील रचनाओं को अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित और प्रकाशित कराने का एक प्रकल्प ‘गुजराती साहित्य प्रदान प्रतिष्ठान’ के नाम से आरंभ किया गया है। इस उपक्रम के अंतर्गत ही यह ग्रंथ प्रकाशित हो रहा है। यह घटना आनंदप्रद है।

पूरे ब्रह्मांड को नापने के लिए अत्यंत तेज गति से मनुष्य उद्यत हो रहा है। इसे मद्देनजर रखते हुए कहें तो राष्टीयता तो ठीक, अपितु ‘जय जगत्’ सूत्र भी पुरातन होता जा रहा है। ‘राष्ट्र’ शब्द को उसके अत्यंत शीर्षस्थ स्तर से देखें तो विवादास्पद भी हो सकता है। इस सत्य को स्वीकार करते हुए भी तत्कालीन युग में राष्ट्रीयता को अस्वीकार नहीं कर सकते। इस विभावना को व्यापक कर सकें, ऐसी प्रक्रिया साहित्यिक आदान-प्रदान है।

हमारे ‘प्रदान प्रतिष्ठान’ ने जिस अभियान को आरंभ किया है, वह इस प्रक्रिया का मूल है। प्रतिवर्ष सत्त्वशील गुजराती पुस्तकों को विभिन्न भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी में भी प्रकाशित करना प्रतिष्ठान का उद्देश्य है।

दिनकर जोशी
मैनेजिंग ट्रस्टी,
गुजराती साहित्य प्रदान प्रतिष्ठान

संसारी साधु
:1:


आकाश की यात्रा पर निकले सूर्य देवता तीव्र गति से पश्चिम की ढलान उतर रहे थे। बैसाख की हवा के नशे में मदहोश-से लगते वृक्ष मस्ती से झूम रहे थे। उत्तप्त जमीन की धूल हवा के पलटते रुख से प्रसन्न होकर बेहद बल प्रयोग करके दो-चार चक्कर काटकर फिर असल ठिकाने पर आ जाती थी। परों में पवन भरकर चक्राकार उड़ते पक्षी बीच-बीच में विश्राम के लिए वृक्षों की डालियों पर झूल लेते थे। जड़ एवं चेतन में सब जगह आनेवाले तूफान के आसार नजर आते थे।

तब हिम्मतगढ़ की ओर जाती पगडंडी पर उसके कदम तीव्र गति से बढ़ रहे थे। उसकी चाल में चेतना छलकती थी। हर कदम के साथ जमीन को छूती उसकी खड़ाऊँ की पटाक की आवाज काफी तालबद्ध थी। स्नायुबद्ध पैरों की पुष्ट पिंडी पर चिपके रज-कण हीरे की कणिकाओं के समान चमक रहे थे। बाईं ओर झूलती गेरुए रंग की झोली उसकी चाल के साथ  बराबर ताल मिलाती हुई आगे-पीछे सरक रही थी।

सहसा उसकी दृष्टि अस्त होते जा रहे सूर्य-प्रकाश से चमकते राजमहल के गुंबद की स्वर्णिम चोटी पर जा पहुँची। न जाने क्यों उसकी संन्यासी-दृष्टि में अचानक बिजली कौंध गई। संसारी जीव के भीतर झुनझुनी सी हुई और अज्ञात मंजिल तक पहुँचने की जल्दी न होते हुए भी, ऐसा आभास हुआ, मानो उसकी गति में चंचल तीव्रता आ गई हो।

पगडंडी छोड़कर उसने रास्ते की ओर पैर मोड़े। राजमहल के गुंबद से दृष्टि हटाने में उसे कुछ कष्ट महसूस हुआ। ठीक उसी समय सामने से तीव्र गति से आ रही राज-बग्घी उसे दिखाई दी। बग्घी के सफेद अश्व के मस्तक का वह श्याम टीका इतनी दूरी से भी न जाने क्यों उसकी दृष्टि से छिपा नहीं रहा ! इस बात का विस्मय हुआ। बग्घी के कोचवान ने अश्व को कोड़े से फटकारा, तब अपनी पीठ पर चरमराहट क्यों अनुभव की ! क्या उसके साधु—हृदय को प्राणिमात्र की पीड़ा स्पर्श करती थी, इसलिए ऐसे हुआ या फिर संसारी जीव की माया ने अँगड़ाई ली !

गरदन को एक झटका देकर उसने वह विचार झटक दिया। इतने में पास से गुजरती बग्घी के अश्व ने भी न जाने क्यों गरदन को अचानक क्यों झटक दिया और उछला। गति में यकायक रुकावट आ जाने से अश्व के अगले दो पाँवों कुछ ऊँचे उठ गए। पिछले पाँवों की नाल पथ पर रगड़ जाने से चिनगारियाँ निकलीं और इस आकस्मिक धक्के से बग्घी में बैठे सभी लोगों को हलका सा धक्का लगा।

‘‘उइ माँ !’’एक स्त्री की आवाज सुनाई दी।
‘‘क्या हुआ, रानी साहिबा ?’’ सामने बैठी दासी मालती ने पूछा।
‘‘कहीं चोट तो नहीं आई ?’’
‘‘देख नहीं रही ?’’ दूसरी दासी मधुमती ने रानी साहिबा का प्यार पाने की रोज की युक्ति अपनाई, ‘‘तूने पूजा की थाली ठीक से नहीं उठाई, सो रानी साहिबा के ललाट तक गुलाल उड़ा।’’ कहते-कहते उसने अपने आँचल से लाजवंती का ललाट पोंछकर पहले जैसे समूचा कोरा कर दिया।

‘‘घोड़े के पैर उलटे क्यों पड़े जोरूभा ?’’ बग्घी से जमीन पर आ गिरे लखुभा ने उठते हुए कपड़े की धील झाड़ते हुए कोचवान को डाँटा, ‘‘कभी नहीं, और आज टिल्लू रूठकर क्यों भाग खड़ा हुआ ?’’
जोरुभा ने अपनी सीट से नीचे कूदकर हाँफते हुए घोड़े के पिछले पैरों की जाँच शुरू कर दी, ‘‘नहीं-नहीं, लँगड़ा तो नहीं हुआ है।’’

बड़बड़ाते हुए उसने घोड़े की गरदन पर हाथ पसारते हुए झिड़की दी, ‘‘टिल्लू, आज तुझे यह क्या सूझी ! बग्घी पलट जाती तो तू और मैं दोनों गोली से बींध दिये जाते।’’ कहते-कहते कोचवान दूर जा चुके साधू की पीठ की तरफ देखते हुए बोला, ‘‘कुछ भी तो नहीं था, केवल साधु के गेरुए वस्त्र देखकर भड़क उठा, पाजी !’’

उसका अंतिम वाक्य बग्घी में बैठी रानी साहिबा के कान से टकराते ही कर्णफूल पर रक्तिम आभा फैल गई। याद की एक कसक उठी। विधवा होने के दूसरे साल मन के संताप को कम करने के लिए वे कुंभ मेले में संगम तीर्थस्नान करने गई थीं। वहाँ त्रिकालदर्शी संन्यासी सत्यानंदजी के दर्शन करने का सुअवसर प्राप्त हुआ था। उनके चरणों पर फूल चढ़ाकर, साष्टाँग दंडवत् करके ऊठते ही गहरी गुफा से आती आवाज के समान स्वामीजी की गहन-गंभीर वाणी सुनाई दी—
‘अखंड सौभाग्यवती भव।’

बंद आँखें खोले बिना ही संन्यासी के द्वारा दिया गया आशीर्वाद सुनते ही वह इस प्रकार अभिभूत हो उठी थी, मानो उसके दिल ने किसी धारदार हथियार का स्पर्श कर लिया हो। घुटनों में झुनझुनी हो उठी हो, ऐसे उठने के लिए मालती तथा मधुमती का सहारा लेना पड़ा। दुखते दिल से कुटीर की दहलीज लाँघ ही रही थी कि आवाज टकराई थी, ‘‘स्वामीजी ! आप नारी को कभी भी चर्मचक्षु से देखते नहीं, आप तो त्रिकालदर्शी हैं, तो फिर समूचे कोरे ललाटवाली इस विधवा को अखंड सौभाग्यवती के आशीर्वाद कैसे ?’’

अपने ही मन का प्रश्न किसी अन्य ने पूछा हो, इस प्रकार वह स्वामीजी का उत्तर सुनने के लिए अधीर हो गई थी, परंतु काफी देर तक मौन छाया हुआ देखकर उसकी अधीर दृष्टि पीछे मुड़कर अंदर जा चुकी थी। गहन समाधि में भीतर जा चुकी आँखों के समान स्वामीजी की आँखें मुँदी हुई ही थीं। केवल उनके दो होंठों के बीच संकेत भरा हलका-सा स्मित दिखाई दिया।

आज साढ़े सात साल बाद स्वामीजी का वह गूढ़ सांकेतिक स्मित लाजवंती की आँखों के सामने सदृश्य हो उठा। विचारमग्न अवस्था में ही उसका हाथ ललाट तक चला गया।
‘‘नहीं रानी साहिबा, ललाट पर अब गुलाल का दाग बिलकुल नहीं रहा।’’ मधुमती ने खुश होते हुए कहा, ‘‘मैंने बड़ी दरकार से पोंछा है !’’

और फिर बग्घी समान गति से आगे बढ़ गई। लाजवंती के जी में बार-बार आता था कि जरा परदा उठाकर इस संन्यासी के दर्शन कर लूँ, लेकिन इच्छा को दबाए रखना पड़ा। पीछे बैठा हुआ चौकीदार अगर उसका मुँह देख लेता तो विधवा की मर्यादा लुप्त हो जाती !

‘‘राम-राम, साधु महाराज !’’
रास्ते के सामनेवाले छोर से अधेड़ उम्र का एक आदमी पुकारता हुआ पास आया, तब तक पहली बार उसके पैर जमीन पर पड़े। उसने भावपूर्वक करबद्ध नमन किया, ‘‘क्या बात है महाराज, आज इस तरफ....?’’
‘‘हम ठहरे साधु, पथ जहाँ ले चले वहीं जानेवाले।’’ कहते-कहते फिर उसकी दृष्टि महल के गुंबद पर जा ठहरी। उसने कहा, ‘‘शाम हो गई है, सो यहीं, इस नगर में ही रात का पड़ाव डाल दूँ।’’

‘‘अगर ऐसा करें तो हमारे सौभाग्य महाराज !’’ कहते हुए वह रुक गया। साधु की दृष्टि महल पर ही थी, यह देख उस व्यक्ति ने आगे कहा, ‘‘कहा-सुना मुआफ करना महाराज, किंतु आजकल उस महल में साधु-संतों के सत्कार नहीं होते।’’ फिर भी साधु की दृष्टि वहीं पर जमी रही, इसलिए वह कहने लगा, ‘‘पहले तो बाहर से आनेवाले प्रत्येक साधु-संन्यासी राजा के मेहमान माने जाते थे। महल में उनका आदर-सत्कार होता था। राजमंदिर में उनके भजन-कीर्तन होते थे और राजमाता स्वयं साधु-संन्यासियों का आतिथ्य करतीं....’’ कहनेवाले ने जरा थमकर साँस ली। ‘‘इसके पहले कभी आप हमारे गाँव में आए हैं, महाराज ?’’ उसने पूछा, ‘‘ऐसा लगता है, जैसे आपको पहले कहीं देखा है !’’

‘‘वह तो सभी साधु समान, एक-से होते हैं, इसलिए ऐसा प्रतीत होता है।’’
पहली बार उसके चेहरे पर सौम्य स्मित झिलमिलाया, ‘‘एक बार मैं जिस जगह की यात्रा करता हूँ वहाँ दूसरी बार कदम नहीं रखता। भारत की भूमि इतनी विशाल है कि सारा जीवन घूमते फिरें तो भी यात्रा पूर्ण नहीं हो सकती। यहाँ पर आस-पास कहीं मंदिर तो होगा ही ?’’

मानो वह आदमी नींद से जागा हो, ‘‘हाँ-हाँ, महाकालेश्वर का मंदिर है न इस पहाड़ी के पीछे, झील के किनारे पर बहुत बड़ा मंदिर है। पुजारीजी भी अच्छे-भले हैं। अभी-अभी राजमहल की बग्घी मंदिर की ओर गई है, किंतु वह रास्ता आपको लंबा पड़ेगा। पैदल जाने के लिए सामनेवाली पगडंडी ठीक रहेगी। पहाड़ी चढ़ने पर मंदिर का ध्वज दिखाई पड़ेगा।’’
‘‘भगवान् तेरा भला करें।’’ कहते हुए साधु ने दिशा बदलकर पगडंडी की तरफ पैर बढ़ाए।

पहाड़ी की चोटी पर पहुँचकर चलती हवा के झोंके के बीच साधु ने निगाहें डालीं तो मंदिर पर फहराता ध्वज दिखाई दिया। ठीक उसी समय मंदिर के घंटों के बजने का स्वर सुनाई दिया। जैसे कि एक साधु जीव सांसारिक माया में न फँस जाए, इसलिए सावधान कर रहा हो, ऐसा वह घंटनाद था

दो औरतें परदे के छोर पकड़कर दोनों तरफ सीढ़ियाँ उतरती दिखाई दीं। रास्ते में मिली वह बग्घी भी कुछ दूरी पर ठहरी हुई थी। उसकी सजावट देखने से लगा कि वह राजबग्घी ही होनी चाहिए। फिर तो परदे में राजमाता ही होंगी।
उसने शीघ्रता से पहाड़ी उतरने का पयास किया। नीचे की ओर नजर करके देखा तो हवा के झोंके से वह परदा उन दो औरतों के हाथों से सरककर उड़ता उसकी ओर आ गया। आवरण हट जाने से व्याकुल स्त्रियों की चीखें सुनाई दीं।

 पहले-पहल तो मर्यादा-आवरण-सा परदा पकड़ने के लिए वे दोनों चार-छह कदम दौड़ीं भी, लेकिन रानी साहिबा के चेहरे पर किसी पुरुष की नजर पड़ जाएगी, इस विचार से वे दोनों तुरंत वापस आ गईं तथा उन्हें घेर लिया, उतने ही मिले पलों में साधु की दृष्टि ने रानी साहिबा के सौंदर्य की झलक अपनी आँखों में बसा ली थी। नहीं, वह राजमाता-सा वयोवृद्ध नहीं लग रहीं, तो फिर राजरानी होंगी !

तूफानी हवा के बीच फर्राटे से जाती हुई बग्घी जब दृष्टि-मर्यादा से दूर जा चुकी तब साधु ने मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ने की शुरुआत की।


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