चार्ल्स डार्विन - विनोद कुमार मिश्र Charles Darwin - Hindi book by - Vinod Kumar Mishra
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चार्ल्स डार्विन

विनोद कुमार मिश्र

प्रकाशक : प्रतिभा प्रतिष्ठान प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :171
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5172
आईएसबीएन :81-88266-50-7

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बचपन से ही प्राकृतिक वस्तुओं में रुचि रखनेवाले चार्ल्स को जब प्रकृति विज्ञानी के रूप में बीगल अनुसंधान जहाज में यात्रा करने का अवसर मिला तो उन्होंने अपने जीवन को एक नया मोड़ दिया।

Charls Darvin BY VINOD KUMAR MISHRA O.K.

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भूमिका

दुनिया के सभी धर्मग्रंथों में यह स्पष्ट रूप से उल्लिखित है कि मानव सहित सृष्टि के हर चर और अचर प्राणी की रचना ईश्वर ने अपनी इच्छा के अनुसार की। प्राचीन पौराणिक ग्रंथों में उपलब्ध वर्णन से भी स्पष्ट होता है कि प्राचीनकाल में मनुष्य लगभग उतना ही सुंदर व बुद्धिमान था जितना कि आज है।
पश्चिम की अवधारणा के अनुसार यह सृष्टि लगभग छह हजार वर्ष पुरानी है। यह विधाता द्वारा एक बार में रची गई है और पूर्ण है।

ऐसी स्थिति में किसी प्रकृति विज्ञानी (औपचारिक शिक्षा से वंचित) द्वारा यह प्रमाणित करने का साहस करना कि यह सृष्टि लाखों करोड़ों वर्ष पुरानी है, अपूर्ण है और परिवर्तनीय है-कितनी बड़ी बात होगी। इसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है। ईश्वर की संतान या ईश्वर के अंश मानेजाने वाले मनुष्य के पूर्वज वानर और वनमानुष रहे होंगे, यह प्रमाणित करनेवाले को अवश्य यह अंदेशा रहा होगा कि उसका हश्र भी कहीं ब्रूनो और गैलीलियो जैसा न हो जाए।
उन्नीसवीं सदी के पहले दशक में प्रख्यात चिकित्सक परिवार में जनमे चार्ल्स डार्विन ने चिकित्सा का व्यवसाय नहीं चुना। हारकर उनके पिता ने उन्हें धर्माचार्य की शिक्षा दिलानी चाही, पर वह भी पूरी नहीं हो पाई।

बचपन से ही प्राकृतिक वस्तुओं में रुचि रखनेवाले चार्ल्स को जब प्रकृति विज्ञानी के रूप में बीगल अनुसंधान जहाज में यात्रा करने का अवसर मिला तो उन्होंने अपने जीवन को एक नया मोड़ दिया।
समुद्र से डरनेवाले तथा आलीशान मकान में रहनेवाले चार्ल्स ने पाँच वर्ष समुद्री यात्रा में बिताए और एक छोटे से केबिन के आधे भाग में गुजारा किया। जगह-जगह की पत्तियाँ, लकड़ियाँ पत्थर कीड़े व अन्य जीव तथा हडड्डियाँ एकत्रित कीं।
उन दिनों फोटोग्राफी की व्यवस्था नहीं थी। अतः उन्हें सारे नमूनों पर लेबल लगाकर समय-समय पर इंग्लैंड भेजना होता था। अपने काम के सिलसिले में वे दस-दस घंटे घुड़सवारी करते थे और मीलों पैदल भी चलते थे। जगह-जगह खतरों का सामना करना, लुप्त प्राणियों के जीवाश्मों को ढूँढ़ना, अनजाने जीवों को निहारना ही उनके जीवन की नियति थी।
गलापागोज की यात्रा चार्ल्स के लिए निर्णायक सिद्ध हुई। इस द्वीप में उन्हें अद्भुत कछुए और छिपकलियाँ मिलीं। उन्हें विश्वास हो गया कि आज जो दिख रहा है, कल वैसा नहीं था। प्रकृति में सद्भाव व स्थिरता दिखाई अवश्य देती है, पर इसके पीछे वास्तव में सतत संघर्ष और परिवर्तन चलता रहता है।

लंबी यात्रा की थकान अभी उतरी भी नहीं थी कि चार्ल्स ने आगे का अन्वेषण तथा उस पर आधारित लेखन आरंभ कर दिया। बहुत थोड़े से लोगों ने उनका हाथ बँटाया। समस्त कार्य चार्ल्स को स्वयं ही करना पड़ा।
श्रेष्ठ वैज्ञानिकों का कार्यस्थल आमतौर पर कोई प्रतिष्ठित संस्था या शिक्षा केंद्र ही रहा है। अरस्तू से लेकर न्यूटन, फैराडे तक को कोई-न-कोई रॉयल सोसाइटी रॉयल संस्थान आदि मिल ही गया था, जो काम और काम के खर्च दोनों में हाथ बँटाता था।
परंतु डार्विन ने अपना कार्य ग्रामीण इलाके के दूर दराज स्थित मकान में शुरू किया। अपनी पैतृक संपत्ति के रूप में प्राप्त सारा धन उन्होंने इस कार्य पर लगा दिया। जिस प्रकार का काम वे कर रहे थे-उसमें न तो कोई पैसा लगाने के लिए आगे आया और न ही चार्ल्स ने इसके लिए विशेष प्रयास ही किए।

उनके मस्तिष्क में जीवोत्पत्ति का सिद्धांत जन्म ले चुका था। सन् 1844 में उन्होंने इसे विस्तार से कलमबद्ध भी कर लिया था, पर इसे प्रकाशित करने की कोई जल्दी उन्होंने नहीं दिखाई; क्योंकि इसकी भावी प्रतिक्रिया का उन्हें एहसास था। इसलिए वे इसमें कोई कमी या गुंजाइश रहने देना नहीं चाहते थे। वे लगातार प्रयोग-दर-प्रयोग करके उसे प्रमाणिक करते चले गए।
वे धैर्यपूर्वक लिखते रहे। उनकी रचनाएँ तेजी से पाठकों के हाथों में आती रहीं। संभवतः वे कुछ वर्ष और इंतजार कर लेते, पर वालेंस के अनुसंधान का परिणाम देखकर उन्हें भी अपना सिद्धांत सार्वजनिक करना पड़ा। हालाँकि उनके पास पुख्ता प्रमाण थे कि वे निष्कर्ष पर पहले पहुँचे थे, पर उन्होंने वालेस को बराबर का सम्मान दिया।
तत्कालीन समाज में उनके सिद्धांत पर जोरदार बहस हुई। ईश्वर की संतान माना जानेवाला मानव वानर की संतान माना जाने लगा। इसे मानव के पतन की संज्ञा दी गई। राजशाही से लेकर चर्च तक सभी तिलमिला गए, पर डार्विन जरा भी विचलित नहीं हुए। सभी प्रकार की प्रतिक्रियाओं को वे पूरी विनम्रता से स्वीकार करते रहे।
अथक परिश्रम से किए गए प्रयोगों के परिणामों की शुद्धता के आगे उठनेवाला भारी विरोध दूर भागता चला गया और अंततः लुप्तप्रजातियों की तरह विलुप्त हो गया।
डार्विन ने जीवन के हर पहलू पर प्रयोग किए। उन्होंने पत्तों, फूलों, पक्षियों, स्तनपायी जीवों-सभी को अपने प्रयोगों के दायरे में लिया। अपने मित्र माइकेल फैराडे द्वारा विकसित विद्युत जेनरेटर का प्रयोग करके उन्होंने विभिन्न मानसिक स्थितियों का चेहरे पर पड़नेवाले प्रभाव का अध्ययन किया और उस पर आधारित पुस्तक की रचना की। इसमें उनके कुत्ते बॉब ने उन्हें भरपूर सहयोग दिया और उन्हें बतलाया कि भूख लगने पर, गुस्सा होने पर तथा प्रसन्न होने पर उसकी मुखमुद्रा कैसे बदलती है।

दुनिया को मांसाहारी पौधों के बारे में ज्ञान देनेवाले चार्ल्स डार्विन ने निरीह केंचुओं के व्यापक योगदान पर भी प्रकाश डाला और उन्हें सामाजिक सम्मान दिलवाया। उनके योगदान को प्रमाणिक करने के लिए उन्होंने गणित का भी सहारा लिया; हालाँकि वे न्यूटन व गैलीलियो की तरह गणित में दक्ष नहीं थे, पर वे अपने सिद्धान्तों को अनेक दृष्टिकोणों व तरीकों से परखना जानते थे।

स्वभाव से विनम्र, परिश्रमी धैर्यवान्, साहसी तर्कसंगत विचारोंवाले, कलम के धनी चार्ल्स डार्विन आज भी दुनिया के श्रेष्ठतम वैज्ञानिकों में से एक और न्यूटन आइंस्टान आदि के समकक्ष माने जाते हैं। तत्कालीन समाज में उनका विरोध हुआ और होता रहा, पर उनके सिद्धांत का विकल्प कोई नहीं दे पाया। आमतौर पर श्रेष्ठ वैज्ञानिकों के परिवार का इतिहास अस्त-व्यस्त रहा है, पर डार्विन का भरा पूरा परिवार प्रगतिशील व समृद्ध था और उनके पुत्र भी श्रेष्ठ वैज्ञानिक बने। शायद इसमें उनकी करुणाशील पत्नी एम्मा का भी विशेष योगदान रहा।
विज्ञान के अतिरिक्त चार्ल्स ने किसी अन्य कार्य, जैसे समाज सेवा, राजनीति, व्यवसाय आदि में हाथ नहीं डाला, पर दासप्रथा के वे घोर विरोधी थे। उन्हें मनुष्यों के ही नहीं पशु पक्षियों के दुःख दर्द की भी चिंता थी और वे घोड़े को चाबुक लगाना भी बरदाश्त नहीं कर पाते थे।
ऐसे महान् वैज्ञानिक की जीवनी लिखने हेतु सामग्री जुटाने के लिए सी.एस.आई.आर., अनुसंधान भवन, दिल्ली स्थित लाइब्रेरी की प्रभारी श्रीमती रेणु पांडेय तथा साहित्य अकादेमी की लाइब्रेरी के श्री पद्मनाभन ने विशेष सहयोग दिया।
हर बार की ही तरह मेरे मित्रों व सहयोगियों के अलावा मेरी पत्नी वीना मिश्र तथा पुत्रों वरुण व विशाल ने अनुकूल वातावरण बनाए रखकर एवं अनेक प्रकार से इस पुस्तक के साकार होने में प्रत्यक्ष व अप्रयत्क्ष रूप से सहयोग दिया। मैं उन सभी का हृदय से आभारी हूँ।

इस जीवनी से पूर्व मैं एक अन्य श्रृंखला के अंतर्गत अष्टावक्र, राणा संग्राम सिंह (साँगा) फ्रैंकलिन डिलानो रूजवेल्ट व हेलेन कीलर की जीवनी लिख चुका हूँ। वर्तमान श्रृंखला के अंतर्गत अल्बर्ट आइंस्टाइन व थॉमस अल्वा एडिसन की जीवनी प्रकाशित हो चुकी हैं। इस जीवनी ने आगे का मार्ग प्रशस्त कर दिया और आनेवाले समय में अल्फ्रेड नोबल, ग्राहम बेल, लियोनार्डो द विंसी, हेनरी फोर्ड तथा मैडम क्यूरी आदि की जीवनियाँ पाठकों के हाथों में आएँगी। अतः आपसे विनम्र प्रार्थना है कि कार्य में त्रुटियों व भावी सुझावों से अवगत कराते रहें।

-विनोद कुमार मिश्र


प्रकृति की खोज का सिलसिला




मानव सभ्यता के प्रारंभ में मनुष्य के मन में जिज्ञासाएँ उठने लगीं थीं कि आखिर इस विविधतापूर्ण प्रकृति की रचना कैसे हुई होगी ? उसने अपने आस-पास का प्राकृतिक सौंदर्य देखा होगा। थोड़ी बहुत यात्रा करके पाया होगा कि इस सौंदर्य का एक प्रमुख आधार विविधता है।
परंतु तब यह प्रश्न बड़ा था और मनुष्य की क्षमता थोड़ी थी। निश्चित ही उसने जल्दी ही मान लिया होगा कि इस संसार के रचयिता ने ही यह सब रचा होगा। वह परम शक्तिमान है। उसने न सिर्फ मनुष्य को रचा वरन् मनुष्य के उपभोग के लिए सुंदर एवं मोहक सृष्टि रचकर दी।
मनुष्य का ईश्वर के प्रति आदर व आस्था बढ़ते चले गए। यह सब स्वतः स्फूर्त कल्पना थी और इतनी प्राकृतिक थी कि दुनिया के सभी धर्मों में इसे स्थान मिला।

अनादि माने जानेवाले सनातन धर्म, जिसे हिंदू धर्म के नाम से भी जाना जाता है, में कल्पना की गई है कि ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की और मनु व श्रद्धा को रचा। आदिपुरुष व आदिस्त्री माने जाने वाले मनु और श्रद्धा को आज भी पूरे श्रद्धा व आदर से पूजा जाता है, क्योंकि हम सब इन्हीं की संतान माने जाते हैं। उसी तरह अति प्राचीन यहूदी धर्म, लगभग दो हजार वर्ष पुराने ईसाई धर्म और लगभग तेरह वर्ष पुराने इसलाम धर्म में आदम एवं हव्वा को आदिपुरुष और आदिस्त्री माना जाता है। उनका नाम भी आदर के साथ लिया जाता है, क्योंकि सभी इनसान उनकी ही संतान माने जाते हैं।
पर कालक्रम की गणना में विभिन्न धर्मों में अंतर है। सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि की रचना होती है, विकास होता है और फिर संहार (प्रलय) होता है। इसमें युगों की गणना का प्रावधान है और हर युग लाखों वर्ष का होता है, जैसे वर्तमान कलियुग की आयु चार लाख बत्तीस हजार वर्ष आँकी गई है।

पर पश्चिमी धर्मों की मान्यताओं के अनुसार ईश्वर ने सृष्टि की रचना एक बार में और एक बार के लिए की है। उनके अनुसार मानव की रचना अधिक पुरानी नहीं है। लगभग छह हजार वर्ष पूर्व मनुष्य की रचना उसी रूप में हुई है जिस रूप में मनुष्य आज है। इसी तरह सृष्टि के अन्य चर-अचर प्राणी भी इसी रूप में रचे गए और वे पूर्ण हैं।
लेकिन मनुष्य की जिज्ञासाएँ कभी शांत होने का नाम नहीं लेती हैं। सत्य की खोज जारी रही। परिवर्तशील प्रकृति का अध्ययन उसने अपने साधनों के जरिए जारी रखा और उपर्युक्त मान्याताओं में खामियाँ शीघ्र ही नजर आने लगीं।
पूर्व में धर्म इतना सशक्त व रूढ़िवादी कभी नहीं रहा। समय-समय पर आर्यभट, ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य जैसे विद्वानों ने जो नवीन अनुसंधान किए उन पर गहन चर्चा हुई। लोगों ने पक्ष और विपक्ष में अपने विचार स्पष्ट रूप से व्यक्त किए।
परंतु पश्चिम में धर्म अत्यंत शक्तिशाली था। वह रूढ़ियों से ग्रस्त भी था। जो व्यक्ति उसकी मान्यताओं पर चोट करता था उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती थी। कोपरनिकस ने धार्मिक मान्यता पर पहली चोट की। उनका सिद्धांत उनकी पुस्तक मैग्नम ओपस के रूप में जब आया तो वे मृत्यु-शय्या पर थे और जल्दी ही चल बसे।

पर ब्रूनो एवं गैलीलियो जैसे वैज्ञानिकों को भारी कीमत चुकानी पड़ी। ब्रूनो को जिंदा जला दिया गया। गैलीलियो को लंबा कारावास भुगतना पड़ा। पर उनके ये बलिदान व्यर्थ नहीं गए। उन्होंने लोगों के ज्ञानचक्षु खोल दिए। अब लोग हर चीज को वैज्ञानिक नजरिए से देखने लगे।
उस काल तक यातायात की सुविधाएँ भी विकसित हो चुकी थीं। यूरोप के लोग व्यापार धर्म प्रचार और अन्य उद्देश्यों के लिए विश्व भ्रमण पर निकलने लगे। अनेक साहसिक यात्रियों ने अगम्य माने जानेवाले सागरों का सीना चीरते हुए दुनिया के ओर छोर नाप लिये।
अब लोग प्रकृति की खोज में भी निकलने लगे। प्रकृति प्रेमियों ने अब तक प्रकृति का जो अध्ययन किया था, उसने नए विज्ञान का रूप ले लिया था। ये विज्ञानी अपने प्रकृति विज्ञान का विस्तार करना चाहते थे और इसके लिए लंबी-लंबी यात्राओं पर निकलने लगे।

अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में ऐसी बहुत सी यात्राएँ संपन्न हुईं। ये यात्राएँ अनेक उद्देश्यों से की गईं। उनमें से एक प्रमुख उद्देश्य था-विभिन्न उपलब्ध चर-अचर प्राणियों का वर्गीकरण। इस समय तक लगभग सभी प्रमुख प्रजातियों के जंतुओं व वनस्पतियों का ज्ञान हो चुका था और बिना उचित वर्गीकरण के उनका अध्ययन कठिन हो रहा था।
इस संबंध में पहली महत्त्वपूर्ण यात्रा सन् 1700 में टोर्नफोर्ट ने संपन्न की थी, जिसमें दो वर्ष लगे। टोर्नफोर्ट फ्रांस के रहनेवाले एक वनस्पति शास्त्री थे। उन्होंने अपनी यात्रा के अनुभवों को पत्रों द्वारा व्यक्त किया, जो अत्यंत लोकप्रिय साबित हुए। बीसवीं सदी में जब इनका पुनःप्रकाशन हुआ तो खूब बिके। उनके वर्णन में वहाँ की भूमि व नवस्पतियाँ सभी शामिल थे। उन्होंने वहाँ की राजनीतिक व धार्मिक स्थिति का भी वर्णन किया।

टोर्नफोर्ट की यात्रा को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था और उसका खर्च फ्रांसीसी प्रशासन द्वारा उठाया गया था। इस पर बाद में किए गए शोध के अनुसार इस यात्रा का उद्देश्य ऑटोमन साम्राज्य में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का पता लगाना था। उस समय फोटोग्राफी की सुविधा नहीं थी, इसलिए एक ड्राफ्टमैन भी उनके साथ भेजा गया था।
इसके ठीक तीन वर्ष बाद स्वीडन से एक साहसी यायावर यात्री निकला जिसका नाम लीनियस था। उस काल में स्वीडन फ्रांस की तुलना में गरीब देश था। लीनियस ने लैपलैंड की यात्रा की। गरमियों में आयोजित यह एक कम अवधि की यात्रा थी। इसके लिए रॉयल विज्ञान सोसाइटी से मामूली अनुदान ही मिला था। पर इसमें वनस्पति शास्त्र को नया आयाम मिला।

उपर्युक्त यात्राओं ने लंबी दूरी की दीर्घकालीन यात्राओं को आधार प्रदान किया। अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में साइबेरिया की यात्रा के दौरान वहाँ से नई-नई प्रजातियों के प्राणी व वनस्पतियाँ मिलीं। कैप्टन जेम्स कुक के नेतृत्व में दक्षिणी गोलार्द्ध की यात्रा संपन्न हुई। उस समय महाशक्ति माने जानेवाले ब्रिटेन और फ्रांस इस दिशा में भी एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी बन गए।
बहूपयोगी यात्राओं का सिलसिला चल निकला। अन्वेषण दल जब मिस्र गया तो उसके साथ सेना भी थी भौगोलिक खोज के साथ उपनिवेश बनाने की ललक भी इसके साथ जुड़ गई। इससे प्रकृति विज्ञानियों का कार्य कठिन हो गया। विभिन्न यूरोपीय ताकतें आपस में एक-दूसरे को नीचा दिखाने लगीं। उनके इस व्यवहार के कारण स्थानीय लोग अकसर भड़क उठते थे। सन् 1788 में ला पेरुज का अभियान दल प्रशांत महासागर से गायब ही हो गया। कई जगहों पर प्रकृतिविज्ञानियों और नौसैनिकों में तीखी झड़पें हुईं।

परंतु अभियान निरंतर चलते रहे। कुछ बहुत सफल रहे और कुछ में प्रकृति विज्ञानी वापस स्वदेश नहीं लौट पाए। फ्रांसीसी यात्री विक्टर जैकमांट अपनी चार वर्ष की यात्रा में भारत में प्रकृति का अध्ययन करते रहे और सन् 1832 में बंबई में ही चल बसे।
कुछ काल के पश्चात् अभियान दल पर्याप्त संसाधन जुटाकर चलने लगे। उनके साथ धर्म प्रचार करनेवाले पादरी भी होते थे। अभियान दल के सभी लोग टोर्नफोर्ट की तरह कुशल लेखक तो नहीं होते थे, पर उनकी यात्राओं के विवरण कुल मिलाकर अत्यंत रोचक होते थे। उनमें नए-नए तथ्य भी होते थे और तस्वीरें भी।
इनके अभियानों के आधार पर कथा साहित्य भी तैयार होने लगा, जो अपने आप में अद्भुत था। अनेक दार्शनिक इसके आधार पर नए सिरे से चिंतन करने लगे, जो मौलिक और तथ्यपरक होने लगा। वे समाज से फैली विविधता एवं सापेक्षता पर विचार करने लगे और ये विचार अब तक की मान्यताओं से भिन्न थे।

प्रकृति-विज्ञानी जब अभियान से वापस आते थे तो अपने साथ न सिर्फ तरह-तरह की कथाएँ, किस्से व विचार लाते वरन् बड़ी मात्रा में वर्तमान व लुप्त प्रजातियों के जीवाश्म, सूखी वनस्पतियों के नमूने भी लाते थे, जिसमें अन्य वैज्ञानिकों को भावी अनुसंधान का आधार मिलता था।
यात्राओं से ज्ञान का दायरा कितनी तीव्र गति से बढ़ रहा था, इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि सत्रहवीं सदी के अंत में टोर्नफोर्ट ने लगभग दस हजार पौधों का वर्णन दर्ज किया था; जबकि एक शताब्दी पूर्व कुछ हजार पौधों का ही ज्ञान उपलब्ध था।
सन् 1833 में मिस्र की यात्रा के पश्चात् पचास हजार वनसप्तियों के बारे में जानकारी उपलब्ध थी और इसके बादे इसकी संख्या में वृद्धि होती ही गई। कालांतर में इन वनस्पतियों को अजायबघर में रखा जाने लगा, ताकि आम आदमी भी उन्हें देख सके। साथ-साथ इनके वर्णनों का संग्रह भी तैयार हो गया।

लगभग ऐसी ही प्रगति जंतु विज्ञान के क्षेत्र में भी हुई। प्राणियों के कैटालॉग तैयार हुए। उन्हें वैज्ञानिक आधार पर वर्गीकृत किया गया। ज्यों-ज्यों अध्ययन आगे बढ़ा त्यों-त्यों वर्गीकरण का आधार भी बढ़ता गया। कुछ वनस्पतियों को घास माना गया तो कुछ को झाड़ी और कुछ को पेड़। इसी तरह चल प्राणियों को आरंभ में छह वर्गों में बाँटा गया-

1.मैमल अर्थात् स्तनपायी
2. बर्ड अर्थात् चिड़ियाँ
3.एंफीबियन, जिनमें मेढक, टोड आदि आते हैं
4.फिश अर्थात् मछलियाँ
5.इंसेक्ट अर्थात् कीड़े-मकोड़े
6.वर्म अर्थात् सूक्ष्म कीड़े।

इसके पश्चात इनका उप-विभाजन हुआ। इसके अलावा यौन व्यवहार के आधार पर भी इनका वर्गीकरण किया गया। विभिन्न वनस्पतियों और प्राणियों में वंश वृद्धि कैसे होती है, यह देखा गया और दर्ज किया गया।
लीनियस ने जो वर्गीकरण किया, उसमें बहुत सी कमियाँ थीं। समय के साथ उनमें सुधार हुए। विभिन्न प्रकार के क्षेत्रों एवं तापमान का वनस्पतियों पर प्रभाव दर्ज होते हैं जो हर प्रकार की भूमि, नमी में उग जाते हैं। जब यूरोप और ऑस्ट्रेलिया की वनस्पतियों की तुलना की गई तो पाया गया कि कुल वनस्पतियों का मात्र अस्सीवाँ हिस्सा ही साझा था।
चार्ल्स डार्विन ने जब सन् 1831 बीगल जहाज में यात्रा प्रारंभ की तो उन्हें अब तक किए गए कार्यों का बहुत कम ज्ञान था। बाईस वर्षीय युवक ने नए सिरे से अध्यय आरंभ किया और दुनिया को प्रकृति-विज्ञान के क्षेत्र में एक नई दिशा दी। उनके काम से न सिर्फ वैज्ञानिक जगत् में बल्कि समाज के अनेक क्षेत्रों में भी उथल-पुथल मच गई।


पारिवारिक विरासत



सन् 1760 का एक दिन ऐतिहासिक और महत्त्वपूर्ण दिन बन गया। उस शुभ दिन उस समय के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. एरास्मस डार्विन एक मरीज को देखने गए। वह मरीज एक युवा बरतन निर्माता था, जिसका नाम जोसियाह वेजवुड था।
सन् 1731 में जनमे डॉ. एरास्मस डार्विन ने चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई कैंब्रिज विश्वविद्यालय से पूरी की थी। कैंब्रिज व एडिनबर्ग में पढ़ने के पश्चात् उन्होंने लिचफील्ड में प्रैक्टिस प्रारंभ की।




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