कालातीत - विवेकी राय Kalatit - Hindi book by - Viveki Rai
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कालातीत

विवेकी राय

प्रकाशक : अनुराग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :85
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5227
आईएसबीएन :81-902534-3-3

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भारतीय गाँवों की दुर्दशा को सम्मुख करते हुए व्यवस्था को खोखलेपन को उजागर करती कहानियाँ...

Kalatit

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

‘‘साहित्य अपने समय का सच्चा इतिहास होता है।’’ प्रेमचंद के उपर्युक्त कथ्य का डॉ. विवेकी राय के साहित्य में पूरी तरह साक्षात किया जा सकता है, जहाँ स्वातंत्र्योत्तर भारतीय गाँवों का सच चित्रित तो है ही, साथ-साथ नवसृजनवादी सोच की पर्याप्त प्रोत्साहन तथा प्रगतिशील सामाजिक ढाँचे को मजबूत करने का प्रयास भी मुखर है।

प्रस्तुत कहानी संग्रह ‘कालातीत’ डॉ. विवेकी राय का पाँचवाँ कहानी-संग्रह है, जिसमें कुल सत्रह कहानियाँ हैं और प्रत्येक कहानी का उद्देश्य तत्कालीन भारतीय गाँवों की दुर्दशा को सम्मुख करते हुए व्यवस्था के खोखलेपन को उजागर करना है। संग्रह की सभी कहानियाँ पाठकों उद्वेलित कर कुछ सोचने को विवश करने की क्षमता रखती हैं।
संग्रह की इन कहानियों में ललित चिन्तन के साथ-साथ काव्यात्मक सरसता भी है जो कहानीकार की सर्जनात्मक क्षमता के साथ-साथ संवेदना को प्रत्यक्ष करती है।

संग्रह की सभी कहानियों की भाषा, भाव और परिवेश के अनुरूप हैं। ये कहानियाँ अलग-अलग कोनों से, गाँवों से हमारा साक्षात्कार कराती चलती हैं। प्रेमचंद अपनी कहानियों में महाजनी समाज से लड़ते-जूझते नजर आते हैं, तो ड़ॉ. विवेकी राय भी अपनी कहानियों में छद्म राजनीति व विकास के नारों में से दो-दो हाथ करते दिखाई देते हैं। फणीश्वनाथ रेणु ग्रामीण परम्पराओं और अन्तर्सम्बन्धों की संवेदनाओं को व्यक्त करते हैं जहाँ एक-दूसरे के प्रति समवेदना, आपसी उत्साह व विनोद प्रचुर व प्रगाढ़ है, वहीं डॉ. राय अपनी रचनाओं में इन तत्वों के साथ-साथ विकास के प्रति व्याकुलता रखते हैं और दुर्व्यवस्थाओं पर तीखा प्रहार भी कर करते हैं।

‘‘गाजीपुर शहर डॉ. विवेकी राय का कुछ नहीं बिगाड़ सका, नगरीय संस्कृति के छींटे भी नहीं पड़े उन पर। हाँ, एक फायदा अवश्य हुआ कि उन्होंने शहर में रहकर साहित्य में प्रयुक्त गँवईपन को बचाने-बढ़ाने तथा उन्हें आम लोगों तक पहुँचाने का नया-नया अस्त्र खोज निकाला। नयी व पारम्परिक दृष्टि से एक साथ तत्कालीन गाँवों को देखने का तरीका डॉ. राय को खूब मालूम है।’’

कालातीत : गाँवों के सच से साक्षात्कार


‘‘साहित्य अपने समय का सच्चा इतिहास होता है।’’
प्रेमचंद के उपयुक्त कथ्य का डॉ. विवेकी राय के साहित्य में पूरी तरह साक्षात किया जा सकता है, जहाँ स्वातंत्र्योत्तर भारतीय गाँवों का सच चित्रित तो है ही, साथ-साथ नवसृजनवादी सोच को पर्याप्त प्रोत्साहन तथा प्रगतिशील सामाजिक ढाँचे को मजबूत करने का प्रयास भी मुखर है।

प्रस्तुत कहानी–संग्रह ‘कालातीत’, डॉ. विवेकी राय का पाँचवाँ कहानी-संग्रह है, जिसमे कुल सत्रह कहानियाँ हैं और प्रत्येक कहानी का उद्देश्य तत्कालीन भारतीय गाँवों की दुर्दशा को सम्मुख करते हुए व्यवस्था के खोखलेपन को उजागार करना है। संग्रह की सभी कहानियाँ पाठकों को उद्वेलित कर कुछ सोचने को विवश करने की क्षमता रखती हैं। डॉ. राय स्वयं इस कहानी-संग्रह को श्रेष्ठतर मानते हैं, और इसमें संकलित ‘अतिथि’ कहानी को अपनी सर्वोत्तम कहानी। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने के कारण संग्रह की अधिकाधिक कहानियाँ चर्चित हैं। 18 दिसम्बर 1966 में ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित ‘अतिथि’ कहानी को पढ़कर यशपाल की कहानी ‘दुःख का अधिकार’ की याद हो आती है।’’

ललित निबन्धकार के रूप में भी विख्यात डॉ. विवेकी राय के इस संग्रह की लगभग दर्जन-भर कहानियों में ललित निबन्ध की छाया मिलती है, मसलन- ‘परन्तु’, ‘अतिथि’, ‘आप लोग कौन हैं’, ‘खेल’, ‘समाजवादी सुबह में एक दिन’, ‘हमारे गाँव कहाँ हैं’, ‘विलायती डिजाइन का अफसर’, ‘सीवान का कोल्हू’ व ‘यह जमाना’ इत्यादि कहानियाँ ललित निबन्ध, हास्य-व्यंग्य, संस्मरण या रिपोतार्ज के मिले-जुले भावों से संप्रक्त हैं। इन कहानियों में ललित चिन्तन के साथ-साथ काव्यात्मक सरसता भी है जो कहानीकार की सर्जनात्मक क्षमता के साथ-साथ संवेदना को प्रत्यक्ष करती है। ललित साहित्य के सर्जकों में व्यक्तित्व-स्तर पर अधिकांशतः दम्भ मिलता है किन्तु पूर्वांचल के छोटे-छोटे दो शहरों (गाजीपुर व बलिया) के लगभग मध्य में बसे ‘उरेहा’ गाँव में जन्मे डॉ. विवेकी राय किसी प्रकार के दम्भ, प्रचार-प्रसार की भावना, पुरस्कार-सम्मान की होड़ तथा तेजी से शिखर तक पहुँचने की व्यग्रता से काफी दूर, क्षेत्रीय-ग्रामीण संस्कृति व संस्कारों के अनुरूप अत्यन्त विनम्र, हँसमुख व मृदुभाषी हैं। उन्होंने गाँवों को जीया है, गाँवों में रहकर। बिल्कुल उसी प्रकार जैसे किसान-मजदूर जीते हैं। गाजीपुर में अब रहने लगे, जहाँ अभी भी शहर का कम, गाँव का माहौल अधिक है। वे गाजीपुर में रहकर भी नागर नहीं हो पाये, या डॉ. नामवर सिंह के शब्दों में कहें तो ‘‘गाजीपुर शहर डॉ. विवेकी राय का कुछ नहीं बिगाड़ सका, नगरीय संस्कृति के छींटे भी नहीं पड़े उन पर। हाँ, एक फायदा अवश्य हुआ कि उन्होंने शहर में रहकर साहित्य में प्रयुक्त गँवईपन को बचाने-बढ़ाने तथा उन्हें आम लोगों तक पहुँचाने का नया-नया अस्त्र खोज निकाला। नयी व पारम्परिक दृष्टि से एक साथ तत्कालीन गाँवों को देखने का तरीका डॉ. राय को खूब मालूम है।’’ डॉ. राय ने केवल गाँवों को लिखा। गाँवों के किसान-मजदूरों की पीड़ा, उनकी समस्याओं तथा उनके प्रति प्रशासनिक उदासीनता व उपेक्षा को उसी प्रकार निष्ठा से जमकर लिखा, जिस प्रकार किसान अपने खेतों में दिन-रात श्रम करता है।

संग्रह की कहानी ‘अतिथि’ एक ऐसे पंडित की कहानी है जो भोले-भाले आम ग्रामीण लोकनाथ को अपने तिकड़म व पाण्डित्य के आडम्बर से उसकी जर्जर स्थिति की परवाह किये बगैर दिव्य भोजन की जुगत में लगाया हुआ है। बिम्ब सम्प्रेषण की यह श्रेष्ठ कहानी है। चित्रात्मक सौन्दर्य के बीच झाँकती अल्हड़ता को मर्यादाओं में समेटकर प्रस्तुत करने का नाटकीय ढंग ‘वही इन्द्रधनुष’ कहानी की अपनी विशेषता है। ‘परन्तु’ कहानी में उन सयाने व चालाक लोगों का चित्रण है जो मीनमेख निकालना ही अपना कर्तव्य समझते हैं। ‘आप लोग कौन हैं’ में लोकगीतों के प्रति आज के बुद्धिजीवी वर्ग के छद्म मोह को एक रजाई के माध्यम से व्यक्त किया गया है। ‘तारीखें’ कहानी में वर्तमान न्यायालय के क्रियाकलापों पर करारा व्यंग्य है, जहाँ न्याय नहीं, बहस और तारीखें अधिक मिलती हैं। ‘मकड़जाल’ कहानी में शहर के बाजार का यथार्थ है जिसमें मोबिल लेने गया ग्रामीण फँस जाता है, पर यहाँ भी शासन अपना अदृश्य जाल ताने है। बिक्री कर को लेकर किया गया यह व्यंग्य बहुत सटीक है। ‘खेल’ कहानी में ग्रामीण बच्चों के खेल का चित्रण है। ‘बाप मेरे भइलें कठबपवा’ कहानी में ग्रामीण वृद्ध-विधुरों की युवा कन्याओं से विवाह के लोभ की मानसिकता सामने आयी है। ‘समाजवादी सुबह में एक दिन’ में विकास की हाथीदाँत योजनाओं का पर्दाफाश है, जिसमें देहात के बच्चे साइकिल के पहिए के निशान देखकर खुश होते हैं और कहते हैं-‘‘साइकिल गयी है।’’ लेखक सोचता है कि चुनाव के लिए आयी जीप के पहिये के निशान देखकर बच्चे बोलेंगे-‘मोटरगाड़ी आयी है।’’ पहिये के निशान देखने को कभी-कभार मिल सके, भारत के गाँवों का इतना विकास तो हो ही गया है।

संग्रह की सभी कहानियों की भाषा, भाव और परिवेश के अनुरूप हैं। ये कहानियाँ अलग-अलग कोनों से, गाँवों से हमारा साक्षात्कार कराती चलती हैं। प्रेमचंद अपनी कहानियों में महाजनी समाज से लड़ते-जूझते नजर आते हैं, तो डॉ. विवेकी राय भी अपनी कहानियों में छद्म राजनीति व विकास के नारों से दो-दो हाथ करते दिखाई देते हैं। फणीश्वरनाथ रेणु ग्रामीण परम्पराओं और अन्तर्सम्बन्धों की संवेदनाओं को व्यक्त करते हैं जहाँ एक-दूसरे के प्रति संवेदना, आपसी उत्साह व विनोद प्रचुर व प्रगाढ़ है, वहीं डॉ. राय अपनी रचनाओं में इन तत्त्वों के साथ-साथ विकास के प्रति व्याकुलता रखते हैं और दुर्व्यवस्थाओं पर तीखा प्रहार भी करते हैं। भारत-पाकिस्तान बँटवारे की टीस और मुसलमानों के ग्राम-चरित्र को राही मसूम रज़ा ने जिस सजीवता के साथ चित्रित किया है, डॉ. राय ने भी ग्रामीण संवाद की भाषा में स्थानीयता की गंध, लोक-परिवेश-परिधान, अन्तर्सम्बन्ध व ग्रामीण जनता के अन्तः में चुभे उन काँटों को उसी ढंग से महसूसा और चित्रित किया। यही कारण है कि उपर्युक्त तीनों लोक-साहित्यकारों के साथ ही डॉ. विवेकी राय की रचनाएँ भी पाठकों के हाथ में आकर छूटती नहीं, और जब हाथ से छूटती हैं, तब दिमाग में जमकर बैठ जाती हैं। यही इन रचनाओं की सार्थकता है।
विश्वास है कि पाठकों को ‘कालातीत’ की कहानियाँ भुलाए नहीं भूलेंगी।

वही इन्द्रधनुष


पश्चिम ओर, जिधर मुँह करके वह खड़ा था, ठीक उसके सामने एक खूब बड़ा-सा इन्द्रधनुष उग आया। उसे लगा, भीतर का इन्द्रधनुष बाहर कढ़कर टँग गया है। कहीं टूट नहीं, एकदम पूर्ण इन्द्रधनुष, आसमान की ऊँचाई को छूता हुआ, पूरे क्षितिज को घेरकर, सतरंगी निखार का, तरल ज्योति-पथ, आँख-मन-प्राण समस्त क्षणों को समेटकर अपने में लीन कर लेने वाला।
कोई सपना नहीं, जादू नहीं, कल्पना नहीं, बिल्कुल ही सामने नमूदार है, एकदम पास में जैसे दोनों हाथ बढ़ाकर उसे पकड़ लिया जा सकता है। ऐसा इन्द्रधनुष उग आया, नदी उस पार बिना किसी सूचना के, बिना हल्ला-गुल्ला किये।
वह नदी भूल गया, नाव भूल गया। एक बार मुँह से निकला, ‘ऊगत ऊगे माहि भरै !’ मगर क्या सचमुच ? किसकी जमीन भरेगी ? शरद के सौभाग्य-जल की बूँदों में उसका मन नहा रहा था। पानी में खड़े-खड़े एक बार फिर उसके कानों में चूड़ियों की खनखनाहट, मुक्त खिलखिलाहट और कंठवीणा के कुछ बोल गूँज गये। फिर एक बार एक गंगाजली प्रतिभा उसकी आँखों में लहरा गयी।

भोजन के लिए पीढ़े पर बैठा तो पीछे चुहान घर में, कोठिला के ओट के पीछे कुछेक क्षणों का समारोह हो गया और वही आर-पार का संग, लेकिन कितना जोरदार !
वह कल ही वहाँ गया था। जरूरी काम था। नहीं तो भदवारी की शेष बीहड़ता में वह ‘यात्रा’ नहीं करता। वहाँ पहुँचा तो अभी दिन था। दोस्त ने खूब खातिर की। उसे मालूम था कि ‘वह’ है और एक बड़ी थाली में बड़ी उदारता के साथ भरकर ढेर सी पकौड़ी आयीं। तेल-मसाले में तर आम के अचार की एक बड़ी-सी सलगी फट्ठी और उसी तरह मिरचे का भी एक भीमकाय अचार। देखकर ही मारे ‘मिठास’ के उसका मन भर गया।

यह उसके दोस्त की बीवी है। उसे वह अच्छी तरह जानता है। एकाध बार देखा भी है। खूबसूरती में जवाब नहीं, लम्बी, छरहरी सोनगुड़िया। संयोग नहीं बैठा, कट गयी, नहीं तो उसकी शादी ‘उसी’ के साथ लगी थी। यह कोई चार-पाँच साल पहले की बात है।
‘‘थके होंगे ?’’ दोस्त ने पूछा था।
‘‘बिलकुल ही नहीं ?’’ उसने जवाब दिया।
वास्तव में वह बहुत ‘सुख’ अनुभव कर रहा था। दोस्त का वह गाँव उस दिन बहुत हँसता लगता था। मित्र के दरवाजे पर रौनक बरस रही थी। मच्छरों के डर से ढेर-सी करसी एक जगह कोने में रखकर धुआँ कर दिया गया था। मोटा-कड़ा धुआँ गुम्मज बाँधकर पहले तो बैठक में अँड़स गया और फिर बाहर फैलने लगा। बैलों का सारीघर बैठक से लगा था। उसमें भी धुआँ भरा था और उसी बीच बैठकर खिला-पिलाकर हटाये गये बैल ‘आँख’ मूँदकर जुगाली कर रहे थे। उधर धुएँ से मिल एक अजीब-सी गीली-गुमसाइन गोबरही-गंध बैठक में आ रही थी। मगर यह धुआँ और गंध जब भी उसके नथुने पर धक्का देतीं, फिसल जातीं और वह कैसे आराम से बीड़ी दगाए पड़ा था।

इन सब बातों को याद करने में भी एक सुख था मगर सामने सवाल था-नदी पार जाने का, नाव का। उस पार वाले आदमी ने स्वर ऊँचा कर पूँछा, ‘‘अरे भाई, नाव का कहीं पता है ?’’
‘‘बस कहीं से आती होगी।’ उसने उत्तर दिया।
‘‘और अगर नहीं आयी तो ?’’
इस ‘तो’ का उत्तर उसके पास नहीं था। उसने अब कुछ उलझन का अनुभव किया। कई आवश्यक काम थे, फिर इस पार तट डूबा था। और पानी उतने स्थान पर कीचड़ था। अतः घुट्टी भर पानी में खड़ा था। कब तक ऐसे खड़ा रहा जा सकता है ! उसने जोर लगाकर सोचा, यह पानी जमकर सफेद संगमरमर की चट्टान जैसा हो जाता तो उस पार पहुँच जाना कितना आसान हो जाता !

तभी उसे याद आया कि कभी ऐसा हो जाता है तो इस सुविधा का लाभ तो सबको हो जायेगा और उसकी कल्पना का स्वाद फीका हो गया। जब उसके कारण पानी जमकर पुल हो जाता है तो मजा भी उसी को मिले ! या उसकी मरजी से दूसरों को मिले। एक हलकी खिजलाहट के बीच एक बार उस पार उसने निगाह दौड़ाई और ठीक उस इन्द्रधनुष के फाटक के बीचोंबीच एक स्त्री की आड़ में एक वीर बधूटी-सी एक झाँकी पाकर वह फिर आठ-दस घंटे पीछे वाले सुखद अतीत में खो गया। उसके दोस्त ने रात में भोजन के लिए जगाया तो उसे रोमांच हो आया। हवेली में घुसते उसे लगा कि हर चीज पर उसके आने की छाप है। दालान में एक अतिरिक्त चिराग रखा गया है। नये सिरे से झाड़ू लगा है। आँगन में जिस ओर पानी गिरता है, हाथ लगा दिया गया है और बहुत साफ लग रहा है। एक ओर आँगन में एक जोड़ी खड़ाऊँ गुनगुने पानी के साथ रखा है। अनावश्यक चीजें हटा दी गयी हैं।

पैर धोते-धोते उसका मन एक जोड़ी आँखों पर अटका रहा। किसी न किसी ओर से निशाना बाँध गया होगा। चौके में आते-जाते तो वह जैसे एकदम उड़ रहा था। चौके में नयी माटी से ‘ठहर’ दी गई थी जिसकी ताजी-सोंधी गंध अभी गई नहीं थी। पीढ़ा भी धो-पोंछकर साफ किया गया लगता था। लोटा-गिलास चम्मच।
पीढ़े पर बैठते ही साड़ी की खरखराहट, चूड़ियों की खनक और कुछ साँय से कही गयी बात की आहट पीछे कोठिले की ओट से मिली। इसी बीच परसी गई थाली दोस्त ने आगे कर दी। सोनाचूर की सुवास से तबीयत भर गई।
‘‘आप भी बैठ जाइये न !’’ उसने कहा।
संकोच छोड़कर अब उसके दोस्त भी एक पीढ़ा खींच बगल में कुछ उधर हटकर इस तरह बैठ गये कि आवश्यकता पड़ने पर चीजें भीतर से बाएँ हाथ सरकाया करेंगे।
लक्ष्मीनारायण हुआ और दो-दो हाथ शुरु ही हुआ था कि भीतर से ‘हाय राम’ फिर एक खिलखिलाहट और फिर ‘घी तो आग पर ही रह गया’ बहुत धीमे पर साफ सुनाई पड़ा। उसने जिन्दगी में पहली बार कोयल की आवाज सुनी थी। एक जिन्दा रस।

‘‘तब यहाँ कौन तुम्हारा लजारू है, उठकर दे दो।’’ उसके दोस्त ने कहा। और जो आँचल से जलती कटोरी पकड़कर दाल में घी छोड़ा गया तो वह पिड़-पिड़-पिड़ करता उसके अंतर में, गहरे अंतर में अपनी सुगन्धित तरलता लिये उतरता चला गया और फैल गया। उसने देखा तो जादुई खनक की खान कलाई को और रेशमी उँगलियों को, पर अधघूँघट में अनदेखी अंचल आँखें और बिहँसते होंठ की भी देखारी हो गई।
न हाथ-पैर बजा, न शोर-हंगामा और एक घटना घट गई। दोस्त की बीवी ने नीले पाढ़ की चेक डिजाइन वाली हलके गुलाबी रंग की रेशमी साड़ी पहन रखी थी। उसे यह रंग बहुत पसंद है। नीला और गुलाबी : विश्वास और भाव। उसने मन-ही-मन सोचा अबकी धान उतरा तो ऐसी ही साड़ी अपनी बीवी के लिए खरीदेगा।

भोजन समाप्त कर अँचवते-अँचवते वह एक निर्णयात्मक शब्दावली पर पहुँच चुका था-इन्द्रधनुष में लिपटा चम्पा का ताजा फूल-और दूर-दूर से ही एक ऐसा अज्ञात नशा सवार हुआ कि कब भोजन खतम हुआ, कब खरिका-पान करके वह बाहर बैठक में आया, कब संक्षेप में काम की बातें हो गईं, कब सुबह का प्रोग्राम बना और कब वह सो गया, कुछ पता नहीं चला।
और उसी झाँक में कब सुबह ही तैयार होकर दोस्त से विदा माँग बीहड़ बरसाती मंजिल तय कर वह नदी पर आ गया, यह भी पता नहीं चला।
पछिवा सिसकारी दे रही थी और हलकी ठंडक गुदगुदा रही थी। सवेरे ही सवेरे देव घिर आये। झींसी पड़ने लगी। वह कपड़ों को गीला कर देने के लिए काफी थी। उसने छाता तान लिया।

उस पार तीन स्त्रियाँ थीं और एक पुरुष। ये लोग भी उसी की तरह प्रतीक्षातुर प्रतीत होते थे। नदी बहुत चौड़े पाट की नहीं थी, परन्तु इस पार और उसे पार में अंतर तो था ही। वक्त गुजारने के लिए उस पार वालों से बातचीत करना भी कठिन था। उसने देखा उस पार वालों के पास छाता नहीं है। पुरुष बेचैनी से नाव के लिए इधर-उधर ताक-झाँक कर रहा है। उसे फुहार की तनिक परवाह नहीं है। वह साधारण मोटे कुरते-धोती में एक किसान लग रहा है।

अचानक वह चौंक उठा। वह स्त्री किसी काम से उठ गई तो उसकी आड़ में बैठी स्त्री की झलक साफ हो गई। वही चेक डिजाइन, वही गुलाबी रंग, वही इन्द्रधनुष, इन्द्रधनुष के भीतर इन्द्रधनुष, लेकिन यह दूसरा गठरी की तरह क्यों सिकुड़ा, धरती में गड़ा अति संकुचित क्यों ? इसके भी कोमल कलाइयाँ होंगी, कलाइयों में चूड़ियाँ होगीं और चूड़ियों में खनक होगी। लेकिन वैसी खनक यहाँ कहाँ ? वह तो पीछे दूर छूट गई, बहुत दूर, जहाँ के धुले बागों के पत्तों में अजब तेज गाढ़ी हरियाली है; जहाँ की माटी में सुबास है। एक बार फिर बहुत गहरे डूब गया। और क्षणभर बाद ऊपर आया तो वही मनहूस पानी ! लेकिन अबकी बार उसे लगा कि यह नदी का पानी नहीं, चमचमाती सड़क है। सड़क की इस पटरी पर वह खड़ा है और उस पटरी पर एक सजीला समारोह है, जिसमें इन्द्रधनुष के विशाल फाटक से होकर जाना है। उसे साफ लगा कि इस विशाल फाटक के दो सतरंगी खम्भे ठीक इस पार धरती में गड़े हैं। रंगारंग ज्योति के ये खम्भे गोल घेरा बनाते हुए आसमान में उठते-उठते पूरी ऊँचाई पर जाकर मिल गये हैं। अमरावती का फाटक, गोलोक का सिंहद्वार कि बैकुंठ की पवित्र पौर है ?

उसने देखा इन्द्रधनुष के फाटक के भीतर वह किसान बौने की तरह लग रहा है। वह बबूल का पेड़ एक मामूली झाड़ी की तरह लग रहा है। दूर-दूर के बगीचे मरकत प्राचीर की तरह लग रहे हैं। और वह नारी ? विशाल, गोल, रंगों के झिलमिल मेहराबी मण्डप के बीच इँगुरौटी की तरह लुढ़की है। कौन लूट रहा है कि लाज का ऐसा बचाव ? इन्द्रधनुष धरती में धँस क्यों जाय ? पानी में खड़ा होकर वास्तव में उसका मछुआ मन दो पारदर्शी चंचल मछलियों की झलक के लिए छटपटा उठा।

उसके मन में एक बात आयी मगर अपनी मूर्खता पर स्वयं हँस पड़ा। साड़ी की तरह साड़ी होती है, रंग की तरह रंग होता है और औरत की तरह औरत होती है। उस इन्द्रधनुष को देखा और अब वह इसे भी देख लेगा, उसके भीतर से, उस फाटक से होकर वह गुजरेगा, दुनिया का एक खुशकिस्मत इन्सान, लेकिन यह पानी ? इतनी देर बाद वह पहली बार क्षुब्ध हुआ।
पानी चुपचाप बह रहा था। धरती पर सरकती यह चंचल धारा और आसमान में उभर आयी क्षणजीवी विविध रंगों की अचंचल मणि-मेखला ! उसने जोर से सोचा, उसे इसी दम उस पार जाना है। समय चूक न जाय।

इन्द्रधनुष आसमान में उसी गम्भीर आवाज से छाया था। बल्कि उसके ठीक समानान्तर ऊपर से एक और पतली धार की तरह हलके-हलके उभर आया। नीचे चेक डिजाइन और गुलाबी रंग का रहस्य उसी प्रकार अनखुला था। नाव उसी प्रकार लापता थी। अथाह पानी सामने उसी तरह लहरा रहा था। सब वही था, मगर कहीं कुछ जरूर बदल गया था। उसने बंडी और चादर लपेटकर सिर पर रखा। उसके ऊपर छाता धोती से कसकर बाँध लँगोट पहने पानी में उतर गया और दो हाथ चलाया कि दूसरे किनारे की माटी मिल गई, लेकिन सख्त अफसोस हुआ कि इन्द्रधनुष सच्चाई नहीं है।

परन्तु


इसी घटना के सिलसिले में मैंने ‘परन्तू पाण्डे’ को जाना। उनके ‘पण्डित कालिकाप्रसाद पाण्डेय’ वाले पुरोहित के रूप से परे, उनके व्यक्तित्व में क्या है जिसके चलते, गाँववालों ने उनका ‘परन्तू पाण्डे’ नाम रख दिया। इसकी अब तक हमें सिर्फ उड़ती खबर जैसी जानकारी थी। आज सीधे और सही-सही रूप में अपने परन्तू पाण्डे को सामने पाकर उस बारात से भी अधिक आनन्द हमें मिला। लोग ठीक कहते हैं कि पण्डितजी ऐन मौके पर ऐसा ‘किन्तु-परन्तु’ लगाते हैं कि लोग भौंचक्के हो जाते हैं। आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि किसी बात को बिना काटे, सीधे-सीधे उन्होंने मान लिया। सो इस बारात-सुख को भी एक छोटा ‘परन्तु’ लगाकर उन्होंने कतर दिया। उसका सारा जादू क्षणभर में हवा हो गया और बहुत कुछ सोचने के लिए शेष रह गया।

हाँ, गाँववाले यही कहते हैं कि बारात पर लड़की वालों ने जादू कर दिया। मैं सोचता हूँ, सबसे बड़ा जादू भोजन है। कटकटाये-भूखे बारातियों पर भोजन का जादू बुरा तो नहीं रहा ! असर अभी बहुत गहरा है, क्योंकि चर्चाएँ गरम हैं। क्या हुआ, जो चार दिन की हैं ? दुनिया की हर चर्चा की यही गति है।

अब सोचिए, पूरे ग्यारह कोस दूर वह गाँव है। सवारी का रास्ता नहीं। स्टेशन से सात-आठ मील शुद्ध पद यात्रा करनी पड़ी। ‘गाँव-गाँव में सड़क’ वाले विकासी प्रोपेगैंडा और वैषम्य-शोषणमुक्त समाजवादी नारों पर मत जाइये। यहाँ गाँववालों और गाँव को देखिए कि ‘हाय-हाय, हू-हू करती गरमी की जलती दोपहरी में तीन-चार सौ लोग पाँव घसीटते, भूख-प्यास की बाढ़ हेलते, ‘रानीपुर अब कितनी दूर है’ पूछते, पसीना पोंछते, होंठ चाटते, बारात की चढ़ाई के मूड में बीच के प्रत्येक गाँव को ससुराल समझते और पल्लव-गुच्छ वाले मँड़वे के ऊँचे-ऊँचे बाँसों को निहारते आखिरकार बेर ढरकते-ढरकते पहुँच ही गये।
फिर वहाँ क्या हुआ ?
बारात गाँव के गोयँड़े पहुँची नहीं कि उधर से मस्ती पानी की ऐसी लहर लस्सी-ठंडाई और मिठाई-पान आदि के रूप में उमड़ी की लोगों का दुःख बिसर गया। ऐसी स्वादिष्ट खातिरदारी की लोगों ने कल्पना भी नहीं की थी। कहते हैं, बाराती लोग पहुँचे तो धूप के चाँटे खा, उनकी आँखें लाल हो गयी थीं और चेहरे मुरझाकर उतर गये थे। वहाँ पानी से सींचकर तर की गयी भूमि, ऊँचे-ऊँचे पलंग, दूध-सी चमकती चादरें उनके नीचे धँस-धँस जाएँ जैसे गद्दे ! घराती के द्वार की रोबीली ठंडक एक-एक जन के जी में जैसे सनसनाने लगी। फिर लोग हैं कि हाथ जोड़कर एक पैर खड़े हैं। हाथों में चमचमाते कटोरे, कटोरे में गुलाबजल से सुवासित शीतल जल, जल के छींटे चाँदी की पिचकारियों से छूट-छूटकर उतरे चेहरों पर हरियाली चढ़ा देते हैं। तबीयत एकदम फुरफुराकर खिल जाती है। नशा छाने लगता है और वह उत्तरोत्तर गहरा होता जाता है। तीन दिन में वह नशा ऐसा चढ़ा कि आज तेरह दिन बाद भी नहीं उतरा है। आप भला सोचिए, जलपान का नशा जब वैसा, तो भोजन का कैसा ? एक जून का वैसा, तो जून-जून का मिलाकर कैसा ? हालात यह है कि जहाँ भी चार जने बटुरते हैं, अनायास मुँह से निकल जाता है, खूब खिलाया ! एक बैठकी की बातें आज हमने सुनी हैं-

‘‘हाँ  भाई, खूब खिलाया, इसी का नाम है खातिरदारी।’’
‘‘पता नहीं इतनी मिठाइयाँ सब्जियाँ कैसे बन जाती थीं।’’
‘‘बनारस के कारीगर, सुना है, आये थे।’’
‘‘जरूर यही बात थी। मैं तो भइया बस, खाता जाता था। अच्छा लगता था। यह पता नहीं कि क्या है, किस चीज का है, कैसे बना है।’’
‘‘बहुत पोख्ता कलेजे वाला जमींदार है। दिल है कि दरियाव है ! लुटा दिया। दान-दहेज से चौधरी का घर भर गया।’’
‘‘इसमें क्या शक ? खूब दिया।’’
‘‘हाँ भाई, खूब दिया।’’
‘‘एक गाड़ी बर्तन, एक गाड़ी कपड़ा-भरे बक्स, तीन गाड़ी फर्नीचर ! कुर्सी-टेबल को कौन पूछता है ! ऐसे चमकते सोफे कि आँख झँप जाये। मिठाई, गाय, बैल, मोटर साइकिल, और क्या-क्या कि हम गँवार मनई को नाम याद रखना कठिन। नुमायश झूठ।’’
‘‘राजा है राजा। एकदम बादशाह।’’
‘‘बड़ी तकदीर चाँद है हमारे चौधरी की कि ऐसा समधी मिला। बड़ी औकात है।’’
‘‘नहीं जी, औकात क्या बड़ी है, दिल बड़ा है। फिर यही एक लड़की थी और काफी दिनों से बहुत परेशान था।’’
‘‘मगर कर्ज से लद गया पट्ठा।’’
‘‘तुमने कैसे जाना ?’’
‘‘गाँववाले कह रहे थे।’’

              
    


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