संगीत की रसिक परम्परा - प्रमिला प्रियहासिनी Sangeet Ki Rasik Parampara - Hindi book by - Pramila PriyaHasini
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संगीत की रसिक परम्परा

प्रमिला प्रियहासिनी

प्रकाशक : विश्वविद्यालय प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :136
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5228
आईएसबीएन :81-7124-549-8

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इस ग्रंथ में सुव्यवस्थित रूप से संगीत के विविध आयामों, विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है।

Sangit Ki Rasik Parmpara

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

इस ग्रंथ में सुव्यवस्थित रूप से संगीत के विविध आयामों, विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है। संगीत के लौकिक एवं लोकोक्तर क्षितिज को अपनी संवेदनशील दृष्टि से अनुभूत कर शब्दों में अभिव्यक्त किया है। संगीत के कला पक्ष तथा भाव पक्ष दोनों को सम्यक् रूप से स्पष्ट किया है, उनकी महत्ता को बताया है। संगीत एक ओर यदि स्वान्तः सुखाय होता है तो दूसरी ओर स्वात्म से सर्वात्म की ओर मानव हृदय को उन्मुख करता है।

‘नादाधीनं जगत्सर्वम्’—साधकों ने, योगियों ने नाद की सर्वव्यापिनी सत्ता को जाना, महत्ता को समझा, नाद की अपार, अथाह शक्ति के प्रति सचेत हो वे नतमस्तक हुए, समर्पित हुए और कालान्तर में इसी नाद को ब्रह्म के रूप में प्रतिष्ठित किया और संगीत साधना को नाद ब्रह्म की उपासना माना। नाद ब्रह्म के उपासक, संगीत मर्मज्ञ राजा श्यामानन्द सिंहजी के गहन संगीत प्रेम, उनकी सहृदयता, उनका संवेदनशील व्यक्तित्व, संगीतज्ञों के प्रति उनकी असीम उदात्त, आदर भावना, उनके सांगीतिक जीवन से जुड़ी अनेक घटनाओं, अनेक संस्मरणों से यह पुस्तक अनुप्राणित हुई है। उनके जीवन से जुड़े अनेक रोचक, हृदयग्राही, शिक्षाप्रद प्रसंगों ने पुस्तक को समृद्ध किया है।

प्राक्कथन


सकल भुवन विस्तारिणी, विघ्नौघ पाप ताप संहारिणि।
खल कलि कलुष निवारिणि वाग्देवते नमस्तुभ्यम्।।


यह आम धारणा है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत के सभी प्रमुख घराने राजाओं और महाराजाओं के आश्रय में उत्पन्न और विकसित हुए (नेटल, 1978)। प्रसिद्ध समाजशास्त्री डी० पी० मुखर्जी (1948) के अनुसार आज का शास्त्रीय संगीत करीब चार सौ वर्ष पुराना है। प्रारम्भ में इसका स्वरूप धार्मिक था। कालान्तर में राजदरबार में प्रवेश के साथ इसका धार्मिक महत्त्व कम होता गया। राजाओं की शक्ति घटने पर शास्त्रीय संगीत नगरों में रहने वाले मध्यम वर्ग के घरों में पहुँचने लगा।

मेरी दृष्टि में संगीत के विकास में राजपरिवार की भूमिका का प्रमुख होना अर्द्धसत्य है। संगीत का घराना मुख्य रूप से गुरुओं का घराना है। किसी भी संगीतज्ञ को सम्मान का स्थान तभी प्राप्त होता है जब वह पूर्ण रूप से ‘गुणी’ बन जाता है। ‘गुणी’ बनने पर ही उसको राजाश्रय मिलता है। ‘गुणी’ बनने की प्रक्रिया तथा संगीत शिक्षा का अपना भिन्न परिवेश है। इसका राजाश्रय से प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है। अर्थोपार्जन के लिए संगीतज्ञों का राजपरिवार से सम्बद्ध होने के महत्त्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता, किन्तु इसे संगीत के विकास का प्रमुख आधार मानना अनुचित है। आज हर प्रकार के विकास को अर्थ से जोड़ने की प्रवृत्ति सर्वत्र व्याप्त है। प्राचीन भारतीय जीवन दर्शन में अर्थ धर्म से नियंत्रित है, अर्थ की सत्ता अपने में पूर्ण नहीं मानी जाती। भारतीय संगीत में गुरु और ईश्वर की प्रधानता रही है।

राजाश्रय में संगीत का विकास हुआ अथवा ह्रास, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण आधुनिक मीडिया तथा राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय जजमान को पोषित भारतीय संगीत का वर्तमान शास्त्रीय स्वरूप है। यह भी विवादास्पद हो सकता है, किन्तु यह निर्विवाद है कि संगीत के विकास में रसिकों का प्रत्यक्ष एवं अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। संगीत-रसिक संगीत और समाज दोनों की अपेक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है। संगीतज्ञ की कला तथा प्रतिभा का स्तर इस बात पर निर्भर करता है कि वह उन अपेक्षाओं के अनुकूल कितना सृजन करता है।

रसिकों को समझने में रस सिद्धान्त और व्यक्तित्व की अवधारणाओं का समान रूप से विचार करना आवश्यक है। अभिनवगुप्त ने रस सम्बन्धी ‘अभिव्यक्तिवाद’ से रसिकों की शास्त्रीय रूप से व्याख्या की जा सकती है। कई अन्य विद्वानों ने भी इस तथ्य को अपने-अपने ढंग से रखा है। मनुष्य में अप्रकट सुसुप्त रूप में विद्यमान स्थायी भाव एक प्रकार से मोह के आवरण से आवेष्ठित है। कला (नाट्य काव्य, संगीत) के प्रदर्शन के संसर्ग में आने पर क्रमशः मोह की परतें (प्याज के छिलकों की भाँति) हटती चली जाती हैं। अन्ततोगत्वा विशुद्ध सात्विक आनन्द की जो स्थिति रह जाती है उसे ही ‘रस’ की निष्पप्ति समझना चाहिए। जब अपना-पराया का भेद न रहे, मोह का आवरण हट जाए, अज्ञान का अंधकार दूर हो जाए। तब रस का राज्य स्थिर हो जाता है। अभिनवगुप्त का ‘अभिव्यक्तिवाद’ मोह का आवरण हटने में सात साधक तत्त्वों का निरुपण करता है, जो इस प्रकार है-
1. रसिकत्व 2. सहृदय
3. प्रतिभा 4. वासना संस्कार
5. भावना चर्वना 6. शारीरिक और मानसिक योग्यता और
7. तादात्म्य।

प्रस्तुत शोध प्रबन्ध में रसिक व्यक्तित्व को अन्तःशास्त्रीय दृष्टि समझने का तथा संगीतज्ञों के सत्संग से इनके विकास का मुख्य रूप से मूल्याकंन किया गया है। इसके लिए जिस पात्र का चयन हुआ है उसके जीवन वृत्तान्त से यही सिद्ध होता है कि राजपरिवार से संगातज्ञों का विकास हुआ है, यह गौण विषय है, किन्तु रसिक व्यक्तित्व के विकास में संगीतज्ञों का प्रमुख योगदान रहा है।

आधुनिक संगीत शास्त्र के अध्ययन में संगीतज्ञों के जीवन वृत्तान्त लिखने की परम्परा बनने लगी है। कुछ संगीतज्ञों ने आत्मकथा भी लिखी है। यह शुभ है, यद्यपि प्राचीन रूप से मान्य नहीं है। प्राचीन काल से संगीत की महिमा ब्रह्मा, नारद, शिव एवं सरस्वती की ही कथा से प्रारम्भ और अंत करने की प्रथा चली आ रही है। उन दिनों देवता ही मनुष्य की प्रेरणा के स्रोत थे, अब मनुष्य ही मनुष्य का प्रेरक न रहा है। अतः संगीतज्ञों एवं रसिकों के जीवन वृतान्त का महत्त्व है। और इस संदर्भ में पिछले दो दशकों में कुछ ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं, जैसे अलाउद्दीन खाँ द्वारा लिखित ‘मेरी कथा’।
अनुसंधान की दृष्टि से इसका एक पक्ष अब तक अछूता है। जैसा संकेत किया गया है, संगीतज्ञ और रसिक श्रोताओं का सम्बन्ध अन्योन्याश्रित है। रसिक व्यक्तित्व के जीवन वृतान्त लिखने अथवा उसका विश्लेषण करने का जहाँ तक मुझे ज्ञात है, अब तक कोई प्रयास नहीं हुआ है।

रसिक व्यक्तित्व के विश्लेषण के लिए एक ऐसे पात्र की आवश्यकता थी जिनमें निम्नलिखित लक्षण प्रत्यक्ष रूप से विद्यामान हों।

(य) संगीत साधना का दीर्घ अनुभव
(र) संगीतज्ञों के सत्संग का व्यापक अवसर
(ल) ऐश्वर्यवान
(व) आध्यात्मिक
(स) परस्परवादी

चम्पानगर के राजकुमार श्री श्यामानन्द सिंह इन पाँच लक्षणों से विभूषित थे।
अतः इस पुस्तक के वे प्रमुख पात्र हैं।

राजकुमार श्री श्यामान्द सिंह का गहन साक्षात्कार किया गया। साक्षात्कार अनुसूची तैयार की गयी (देखें परिशिष्ट-1) एवं टेपरेकार्डर के सहारे उनसे अनुसूची में लिखित प्रश्नों का उत्तर देने का आग्रह किया गया। इस कार्य में कोई विशेष कठिनाई नहीं हुई। कुमार साहब ने बड़े सहज एवं स्वाभाविक ढंग से प्रश्नों के उत्तर दिये। अवस्था अधिक होने से कभी-कभी उन्हें कुछ घटनायें स्पष्ट रूप से स्मरण नहीं हो पाती थीं, फिर भी उन्होंने अपनी ओर से स्पष्ट करने का भरकस प्रयास किया। साक्षात्कार का एक सत्र प्रायः लगभग एक घण्टे का होता था, अर्थात् (सी-60) कैसेट के दोनों ओर पूरा हो जाने पर साक्षात्कार अक्सर समाप्त कर दिया जाता था। इस प्रकार के कई सत्रों में उनमें आवश्यक सूचनायें प्राप्त की गयीं। बाद में टेपरेकार्डर में उन कैसेटों को चला कर धीरे-धीरे कागज कलम के सहारे लिखित रूप में सारी सूचनाओं को उद्धृत कर लिया गया। साक्षात्कार की गति कहीं कहीं-कहीं तेज हो जाने से उन्हें कागज पर उतारने में थोड़ी परेशानी अवश्य हुई पर कई प्रयासों के पश्चात् उन परेशानियों से छुटकारा मिला।


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