आचार्य विनोबा की साहित्य दृष्टि - सुमन जैन Acharya Vinoba Ki Sahitya Dristi - Hindi book by - Suman Jain
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आचार्य विनोबा की साहित्य दृष्टि

सुमन जैन

प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :208
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5249
आईएसबीएन :81-7124-486-6

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दो अक्षर अंग्रेजी पढ़-लिख लेने वाले अपने को बहुत बड़ा अफलातून समझते हैं और भारतीय भाषाओं को पिछड़ी घोषित करने लगते हैं। लेकिन अंग्रेजी, फ्रेंच और जर्मन जैसी यूरोपीय भाषाओं के जानकार विनोबा भारतीय भाषाओं के अगाध साहित्य से बखूबी परिचित थे।

Aacharya Vinova Bave Ki Shahitya Drasti a hindi book by Suman Jain - आचार्य विनोबा की साहित्य दृष्टि - सुमन जैन

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भारतीय जन-जीवन पर साहित्यिकों की सत्ता हजार वर्षों तक चली और आज भी चल रही है। किस साहित्यिक ने कितना लिखा, उससे उसकी कीमत नहीं आँकी जा सकती, वह तो इससे आँकनी चाहिए कि उसने सामुदायिक जीवन को समृद्ध करने में कितना योग दिया।
जो सत्य का यशोगान करे, जीवन का अर्थ समझाए, व्यावहारिक शिक्षा दे और चित्त को शुद्ध करे—वही साहित्य है। शरीर-पोषक क्षर साहित्य टिकाऊ नहीं होता। टिकाऊ होता है वह साहित्य जिसके पीछे शोषणहीन अहिंसक समाज-रचना की प्रेरणा रहती है। उस प्रेरणा से लिखा गया सर्वोदय साहित्य अक्षर साहित्य है।
जब तक समाज में संवेदना है, सहृदयता है, तब तक सर्वोदय-साहित्य टिका रहेगा। यह है—आचार्य विनोबा की साहित्यिक दृष्टि—जिनका हर वाक्य, हर शब्द और हर ग्रंथ जीवन से जुड़ा है और जिनका विश्वास है कि कृति से शब्द, शब्द से चिन्तन और चिन्तन से अचिन्तन उत्तरोत्तर अधिक शक्तिशाली है।

अपनी ओर से

आचार्य विनोबा के साहित्य से सारा देश परिचित है। उनका साहित्य शब्दों या वाणी में ही नहीं, व्यवहार में भी बोलता है। वैदिक युग से विज्ञान युग तक सृजित साहित्य की अन्तर्धारा में निहित सत् चित् आनन्द की विधा को एकरूपता प्रदान करने के लिए उन्होंने सीधी बात कही कि ‘‘जो सत्य का यशोगान करे, जीवन का अर्थ समझाये, व्यावहारिक शिक्षा दे और चित्त को शुद्ध करे, वही साहित्य है। किस साहित्यिक ने कितना लिखा, इससे उसकी कीमत नहीं आंकी जा सकती है, बल्कि उसने सामुदायिक जीवन को समृद्ध करने में कितनी ऊर्जा प्रदान की, उसी से उसकी पहचान होनी चाहिए।’ शब्दों के आडम्बर और चित्त को विक्षुब्ध करने वाली रचनाओं से मानवीय मूल्य आघातित होते हैं। मानव हित को प्रधानता देने वाला साहित्य जन-जन में विवेक जगाता है, समाज में समरसता बढाता है, समष्टि को सांस्कृतिक अधिष्ठान देता है। पुराने शब्दों में नया अर्थ भरने वाले साहित्यकार स्रष्टा की भांति सृष्टि की रचना करते हैं। रचनाकार विनोबा के साहित्य की शोध करना एक प्रकार से जीवन और जगत् के अनुभवों से गुजरने जैसा है, क्योंकि उसमें अतीत के प्रति आस्था, वर्तमान के प्रति विश्वास और अनागत के प्रति लगाव का संगम है।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा दी गई कार्य योजना के कारण विनोबा के साहित्यिक चिन्तन से परिचय हुआ और यह विश्वास जगा कि हम केवल साहित्य-सृजन कर ही समाधान न मान लें, वरन् उसे कल्पनाओं का परिमार्जन शब्दों का सृजन एवं सांस्कृतिक जागरण का वाहक बनायें, ताकि व्यक्ति की आकांक्षा, समाज की अपेक्षा, राष्ट्र की आवश्यकता और विश्व मांग पूरी करने का वह सफल माध्यम बने। ऐसी कार्य योजना में कार्य करने से साहित्य जगत् की सहज सेवा सधी है।
विनोबा विचार के अनुरूप महात्मा गांधी की संकल्पना को साकार करने में संलग्न प्रो. रामजी सिंह (पूर्व कुलपति, जैन विश्वभारती, लाड़नूँ,) आचार्य शरदकुमार साधक (अध्यक्ष, अखिल भारतीय आचार्यकुल), प्रो. घनश्याम प्रसाद सिंह (पूर्व प्रमुख भौतिकी विज्ञान, मगध विश्वविद्यालय, गया) प्रो. गुरूशरण (संपादक आचार्यकुल, ग्वालियर), प्रो. सुरेन्द्र सिंह (कुलपति, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ), प्रो. बच्चन सिंह (पूर्व कुलपति, शिमला युनिवर्सिटी), प्रो. रिनपोछे (पूर्व निदेशक, केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान, सारनाथ), प्रसिद्ध स्वदेशी चिन्तक श्री के. एन. गोविन्दाचार्य, शिक्षाविद् प्रो. हरिकेश सिंह आदि मनीषियों से विषय को समझने/परखने और लिपिबद्ध करने का संबल मिला। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रो. अवधेश प्रधान ने भूमिका लिखने की कृपा की।

डॉ. कुसुम मिश्रा से सहयोग मिला। अनुगृहीत हूँ विश्वविद्यालय प्रकाशन के सं. श्री. पुरुषोत्तम मोदी जी की, जिन्होंने पुस्तक प्रकाशित की और प्रधान कार्यालय के कार्यालय मंत्री की मेरी जिम्मेवारी को पूरा करने में सहभागिता निभायी। डॉ.वी.डी.उपाध्यक्ष ने डी.टी.पी.एवं निगेटिव आदि बनाने में रात-दिन एक किया और उनके साथियों ने पूरी निष्ठा से साथ दिया। इन सभी की हृदय से आभारी हूँ।

अपने परिवार, माता-पिता, पति श्री शैलेश जैन जी, पुत्री नेहा व पुत्र तेजस् की सहायता से यह कार्य पूर्ण हुआ, उनके लिए क्या कहूं, यह मात्र अनुभूति की बात है, वृहत् अनुभूति सहानुभूति के साथ अभिव्यक्ति बने और सामुदायिक हित रक्षण होता रहे, तो यथार्थ के साथ पुरुषार्थ एवं परमार्थ पोषक साहित्य निर्मित होता रहेगा, ऐसा विश्वास है।
विश्वासो फलदायक:।
विनोबा जयंति
11 सितंबर, 2005

डॉ. सुमन जैन

भूमिका


विनोबा जी की ख्याति गांधीजी के अनुगामी, अहिंसा और सत्याग्रह के सिपाही, सर्वोदय और भूदान आंदोलन के अग्रणी नायक के रूप में है। लेकिन उनका व्यक्तित्व और भी बड़ा है। वे भारतीय नवजागरण की महान् परंपरा के लगभग आखिरी स्तंभ हैं-आधुनिक भारत की नई ऋषि परंपरा के एक दैदीप्यमान नक्षत्र; समाज, शिक्षा साहित्य, संस्कृति, आध्यात्म, धर्म आदि विषयों के मौलिक चिंतक और गांधीवादी प्रयोगों के मौलिक अनुसंधानकर्ता; पूर्ण कर्मयोगी। विचार और कर्म के क्षेत्र में उनके योगदान का सम्यक् मूल्यांकन अभी नहीं हुआ है। वेद से लेकर भक्ति साहित्य तक का, विभिन्न धर्मों का उन्होंने गंभीर अध्ययन किया, व्याख्या की और उसका जनसुलभ और उपयोगी सार-संग्रह किया-वह सब भारतीय वाङ्मय की मूल्यवान थाती है। वे भारत और भारत के बाहर की लगभग बीस-पचीस भाषाएं जानते थे। संस्कृत का ज्ञान तो उनका प्रौढ़ था ही; भूदान पदयात्रा करते हुए समूचे भारत में जहां भी गये, वहां की भाषा सीखी, वहां के मूल्यवान भक्ति साहित्य का अध्ययन किया। कुरान का अध्ययन करने के लिए श्रमपूर्वक अरबी सीखी। अंग्रेजी, फ्रेंच जर्मन आदि सीख कर विदेशी साहित्य का भी अध्ययन किया। इस कारण विविधता में एकता का दर्शन करने वाले वे अद्वितीय आचार्य हैं।

विनोबा जी ने पचास वर्षों तक वेदों का अध्ययन-मनन कर सार निकाला और मंत्रों की नई व्याख्या की; उनसे युगानुरूप नये से नये सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश निकाले। विश्वदृष्टि विश्वमानवतावाद, सर्वधर्म-समन्वय, ग्रामस्वराज्य, मानवमात्रा की एकता, जीवदया, गोसेवा आदि के सूत्र वेदों से निकाले। उदाहरण के लिए-अज्येष्ठासो अकनिष्ठास: यानि वैदिक ऋषि का आदर्श ग्राम वह है, जहां न कोई बड़ा है, न कोई छोटा, सभी समान हैं। वह सबको मैत्रीभाव से देखता है-मित्रस्य चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे। वैदिक ऋषि एक ऐसे स्वराज्य के लिए यत्न करने का संदेश देते हैं, जहां सबको मताधिकार प्राप्त हैं, जहां लोक कल्याणकारी नीतियां चलन में हैं-व्यचिष्ठे बहुप्राप्तये यतेमहि स्वराज्ये। व्याचिष्ठ यानि अत्यंत व्यापक अर्थात् सभी को मताधिकार प्राप्त हैं; बहुप्राप्य अर्थात् जहां के बहुसंख्यक अल्पसंख्यक के रक्षण के विषय में सावधान है। इसी प्रकार-विश्वं पुष्टं ग्रामे अस्मिन् अनातुरम्-इसमें ग्रामनिष्ठा और विश्व दृष्टि दोनों का समन्वय है। गांव में ही स्वस्थ और समृद्ध विश्व का दर्शन हो रहा है। दोनों में कोई विरोध नहीं, वरन् सामंजस्य है।

विनोबा जी ने उपनिषदों का भी सार-संग्रह किया। लेकिन विशेष रूप से ईशावास्योपनिषद् की जो वृत्ति लिखी, वह उनके वैदुष्य, गंभीर ज्ञान और मौलिक चिंतन का प्रमाण है। ‘गीता प्रवचन’ जैसी लोकप्रियता शायद ही किसी आध्यात्मिक ग्रंथ को मिले। ऐसी निर्मल, प्रसन्न भाषा, ऐसा उदात्त विचारदर्शन और ऐसी स्वच्छ अभिव्यक्ति बहुत कम को मिलती है। उनके गद्य में कविता का आनंद मिलता है। सरल और उदात्त-एक साथ। इसे सामान्य जन भी पढ-समझ सकते हैं। ‘गीताई चिंतनिका’ और ‘स्थितप्रज्ञ दर्शन’ गीता-तत्त्व के गंभीर और प्रौढ़ पाठकों के लिए है। विनोबा जी में अध्यात्म तत्त्व को रोचक और गंभीर दोनों शैलियों में उपस्थित करने की अद्भुत प्रतिभा थी।

‘‘वेद-वेदांत-गीतानां विनुमा सार उद्धृत:-विनुना अर्थात् विनोबाचार्येण यानि बाबा ने वेद, वेदांत और गीता का सार उद्धृत किया। इसका जो संदेश उन्होंने निकाला उसमें ब्रहस् सत्यम् तो है, लेकिन जगत् मिथ्या नहीं, ‘‘स्फूर्ति’ है और जीवन-सत्य शोधन है-‘‘ब्रह्म सत्यं जगत्स्फूर्तिः जीवनं सत्यशोधनम्।’’ विनोबा ने वेदांत को विवेकानंद की ही तरह ‘व्यावहारिक वेदांत’ के रूप में उतारने की कोशिश की। उनके चिन्तन में विज्ञान अध्यात्म का विरोधी नहीं, सहयोगी है। उनके आदर्श समाज जीवन की त्रिसूत्री हैं-योग, उद्योग और सहयोग। उसमें अध्यात्म-साधना और श्रम सेवा का सहमेल है। कृष्ण का अर्थ उनके लिए किसान है। श्रम को उन्होंने आध्यात्मिक अर्थ-गौरव दिया।

वेद से उन्होंने जो सर्वधर्म समन्वय का संदेश रेखांकित किया, उसे अपनी व्याख्या पर भी लागू किया। उन्होंने वेद से कुरान, बाइबिल, धम्मपद, समणसुत्तम् और जपुजी साहिब के साथ सामंजस्य दिखलाया। ‘कुरान-सार’ में आयतों के साथ उपनिषदों के समानार्थक मंत्र उद्धृत किये। लक्कड़तोड़ पांडित्य-प्रदर्शन की तुलना में विनोबा जी का समन्वयपरक अर्थापन अत्यंत मूल्यवान है।
संस्कृत भाषा और वेद विद्या के प्रति अगाध निष्ठा के बावजूद विनोबा जी की ज्ञान-साधना वहीं तक सीमित नहीं रही। उन्होंने वैदिक साहित्य की भावधारा और चिंताधारा का अविच्छिन्न प्रवाह बुद्ध-महावीर से लेकर संतों की बानियों तक में दिखलाया।

विनोबा जी की दृष्टि में वेदों की वाणी भी संतवाणी है। बुद्धवाणी और भक्ति साहित्य उसी का अगला विकास है। उन्होंने वेदवाणी, बुद्धवाणी और तमिल भक्तवाणी को संतसाहित्य की मूलत्रयी माना। यह मूलत्रयी भारतीय संस्कृति का सार है। भारत की पहचान सम्राटों से नहीं, संतों से है। कश्मीर की पहचान नुंद ऋषि और लल्लेश्वरी से है, पंजाब की नानक से, गुजरात की नरसी मेहता से, राजस्थान की मीरा से, बंगाल की चैतन्य से, आसाम की शंकरदेव से, आंध्र की पोतना से, तमिलनाडु की वैष्णव और शैव भक्तों से है। बाबा ने ज्ञानेश्वर एकनाथ, नामदेव, तुकाराम और रामदास की बानियों का सार संग्रह किया। उन्हें मराठी संतों की ही तरह कबीरदास, तुलसीदास, रैदास और मीरा भी प्रिय हैं। कश्मीर यात्रा के दौरान उन्होंने ‘जपुजी साहिब’ का विशेष अध्ययन किया। ‘जपुजी साहिब’ का उनका भाष्य अत्यंत गंभीर है। जपुजी के आध्यात्मिक रहस्यों का उन्होंने वेदों और उपनिषदों से मेल दिखलाया। संत साहित्य के सरल शब्दों में निहित गूढ़ अर्थों का भेद खोला। संतों के विशिष्ट शब्द प्रयोग पर उनकी अचूक दृष्टि वैसी ही पड़ी जैसी वेद या उपनिषद् या गीता पर। वेद को माता कहा गया, गुरु को भी माता कहा गया, लेकिन आत्मा को माता कहना ? यह बिल्कुल अद्भुत प्रयोग है। संत ज्ञानेश्वर के इस प्रयोग-आत्मा या उसी-पर संत विनोबा की दृष्टि गयी है। भारत के विभिन्न प्रदेशों के संतों के व्यक्तित्व की एक और विशेषता है उनका स्वाधीनता चरित्र और चिंतन। वे राज्याश्रम और चाटुकारिता से विमुख श्रम और सादगी का जीवन जीते हैं। यह आदर्श विनोबा को खींचता है। इसे आज के साहित्यिक के लिए भी प्रासंगिक मानते हुए वे लिखते हैं, ‘‘साहित्यिक या तो किसान हो सकता है या कोई उद्योग करने वाला कबीर हो सकता है, जो जनता पर निर्भर रहे।’’
साहित्य और साहित्यकार के प्रति विनोबा के मन में विशेष आदर है। वे मानते हैं कि दुनिया को बनाने वाली तीन ताकतें हैं-1. विज्ञान, 2.अध्यात्म, 3.साहित्य। ईशावास्य में उल्लिखित ‘कवि’ शब्द की गरिमा उनके ध्यान में बराबर रहती है। उनकी दृष्टि में मानव सभ्यता के भावी विकास के लिए विज्ञान और अध्यात्म को जोड़ना बहुत जरूरी है और दोनों को जो़ड़ने वाली कड़ी साहित्य है।

दो अक्षर अंग्रेजी पढ़-लिख लेने वाले अपने को बहुत बड़ा अफलातून समझते हैं और भारतीय भाषाओं को पिछड़ी घोषित करने लगते हैं। लेकिन अंग्रेजी, फ्रेंच और जर्मन जैसी यूरोपीय भाषाओं के जानकार विनोबा भारतीय भाषाओं के अगाध साहित्य से बखूबी परिचित थे। वे भारत में शिक्षा और संस्कृति के विकास के लिए और समूचे राष्ट्र जीवन के सुचारू गठन और संचालन के लिए भारतीय भाषाओं का, विशेष रूप से हिंदी का महत्व जानते थे। स्वाधीन भारत में राष्ट्रीय एकता, सर्वधर्म समभाव, समानता, अहिंसा, सेवा बन्धुत्व की भावना के साथ हिन्दी का जैसा प्रचार-प्रसार उन्होंने किया, वैसा किसी अंग्रेजी गिटपिटाने वाले नेता ने नहीं किया।

हमारी भाषा और साहित्य परंपरा के अध्ययन, विश्लेषण और विकास के क्षेत्र में विनोबा जी ने जो महत्वपूर्ण कार्य किया, वह ऐतिहासिक महत्व का तो है, प्रांगसिक भी है। ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’, ‘धर्म की राजनीति’, ‘सांप्रदायिक फासीवाद’ और भूमंडलीकरण के आसन्न संकट को देखते हुए विनोबा जी के विचारों और कार्यों की प्रांसगिकता और बढ़ गई है। इसीलिए विनोबा जी की साहित्य दृष्टि को लेकर डा. सुमन जैन ने तो यह विशद अध्ययन कार्य किया है, मैं इसका स्वागत करता हूं।
डा. सुमन जैन ने विनोबा जी के साहित्य विषयक विचारों के अतिरिक्त उनके स्त्री विषयक विचारों का भी संकलन किया है और पुस्तक के अंतिम अध्याय में विनोबा जी द्वारा स्थापित आचार्यकुल दर्शन पर भी प्रकाश डाला है। परिशिष्ट भाग में विनोबा जी द्वारा स्थापित आचार्यकुल संबंधी विचारों और प्रयोगों के परिचायक दो साक्षात्कार संलग्न किये हैं। इससे पुस्तक और भी उपयोगी हो गयी है। इस कार्य के लिए मैं डा. सुमन जैन को बधाई देता हूं। और आशा करता हूं कि भविष्य में भी वे इस कार्य को आगे बढ़ाती रहेंगी।
वाणारसी-221 005
21 जुलाई, 2005

प्रो.अवधेश प्रधान
हिन्दी-विभाग
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय

अनुक्रम


1. विनोबा जीवन विचार कर्म और साहित्य-


परिचय (1), प्रेरक शिक्षा-दीक्षा (1), गांधी सानिन्ध (4), विलक्षण प्रयोग (6), तन की भांति मन पर भी नियंत्रण (8), व्यक्तिगत सत्याग्रह (9), जेल में गीता-प्रवचन (10), विभाजन और उसके परिणाम, (11), गांधी विश्वास बनाम आत्म विश्वास, (12), आधुनिक सभ्यता का संकट, (12), व्यवहार शुद्धि हेतु कांचनमुक्ति की साधना, (13), सर्वोदय सबके लिए है, (14), समस्या की जड़, (15), शान्तिपूर्ण समाधान का सूत्र, (16), भूदान संपत्ति दान की गंगा, (16), संस्कृति का सर्वोत्तम दर्शन, (18), सर्वहितकारी परिणाम, (18), नयी दृष्टि, (20), अशान्ति दमन, नहीं शान्ति शमन हो, (21), दया और सेवा का राज्य अपेक्षित, (22), परस्पर पोषण की आवश्यकता (22), स्वशासन के दो पहलू, (23), तालीम कैसी हो ?, (24), राजनीति और धर्म का विकल्प, (26), आन्दोलन पर नहीं, चिन्तन पर बल (29), गांधीजनों का कर्तव्य (30), बुद्धि के साथ हृदय को बड़ा बनायें, (32), ईश कृपा या युग-संदेश, (33), सेवा व्यक्ति की भक्ति समाज की, (33), जीवनोपलब्धि (34), ब्रह्म सत्यं जगत्स्फूर्तिः जीवनं सत्य शोधनम्(34)

2. विनोबा जी की साहित्यिक मान्यताएं


साहित्य एवं साहित्यकारों का सर्जक (36), साहित्यिक नहीं, साहित्य की प्रेरणा, (37), साहित्यकार की वेदनानुभूति, (39), सहित चलनेवाले साहित्य की शक्ति, (40), साहित्य के प्रतिमान, (41), शब्द, तत्त्व सारज्ञ प्रज्ञा (43), निर्विकार फिर भी अभिमुख, (44), भीतर का मंगलदर्शन (45), साहित्य का मननपूर्वक उपयोग, (45), साहित्य की कला, (46), शब्द शक्ति, (47), विज्ञान युग में साहित्य, (49), शब्दों का जीवननिष्ठ उपासक, (51), साहित्यिकों का दायित्व, (53), साहित्यिक खेती करें, (56) बिनोबा रचित मराठी कविताएँ, (56), राम-नाम: एक चिन्तन, (60), नाम, निरूपण, (60), वेदों में नाम का महत्व, (61), नाम का अर्थ, (62), विकार मुक्ति, (64), रोग मुक्ति, (65), राम नाम का उत्सव, (65), राम-नाम का अभ्यास कैसे करें ? (67)

3. भारतीय साहित्य की दार्शनिक पृष्ठभूमि (वेद-वेदान्त)


वेद संतति (70), तुलनात्मक अध्ययन (70), ऋग्वेद सार (70), वेदों का विकास काल (71), वेद बीज हैं, उपनिषद् फल (71), वेदों की समन्वय दृष्टि (76), वेद और ईसाई धर्म (77), वेद और इस्लाम (77), वेद और बौद्ध (78), वेद और जैन (79), वेद और अवेस्ता (79), वेद और सिक्ख (80), वेद और संतवाणी (81), मूलत्रयी (81), वेद-मौक्तिक (82), ब्रह्म विद्या और विज्ञान में मेल (99)

4. भारत के सन्त कवि और उनका साहित्य


उत्तर-पूर्व के सन्त (102), युग किसका-राजाओं का या सन्तों का ? (107), लोक ग्रन्थ और धर्म ग्रंथ (108), तुलसी रामायण का वैशिष्ट्य (109), कबीरदास (120), मीराबाई (132), सूरदास (135), रैदास (137), नरसी मेहता (139), शंकर देव और माधवदेव (141), नानक (146), महाराष्ट्र के सन्त (151), दक्षिण के सन्त (160),

5. विनोबा जी की दृष्टि में स्त्री-शक्ति


स्त्री मुक्ति बनाम स्त्री-शक्ति (168), शब्दों का भ्रम (170), परिपूर्ण बनने की पद्धति (171), लादी गयी अक्षमता (173), तीन उद्धारक (174), स्त्री आत्मनिष्ठ हो (176), स्त्री शक्ति और सामाजिक क्रान्ति, (176), शील रक्षा और नैतिक बल का प्रयोग (179), साम्प्रदायिकता से मुक्ति (180), स्त्री का सृजनात्मक पक्ष (181),

6. विज्ञान और अध्यात्म का सृजनात्मक पक्ष


कुरुक्षेत्र का यथार्थ रूप (184), अन्वेषक का काम (185), कर्म और ध्यान शक्ति है अध्यात्म नहीं (185), सामूहिक उत्थान का प्रयत्न (186), स्वार्थ की भाँति परमार्थ का दोष (187), सामाजिक समाधि (190), वैज्ञानिक दृष्टि (191), दिमाग के साथ दिल को बड़ा बनायें (192), त्रिसूत्री शिक्षा (192),
7. दो विचारकों से साक्षात्कार एवं मूल्यांकन

अध्याय-1
विनोबा-जीवन, विचार, कर्म और साहित्य
परिचय


स्वतंत्र भारत की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि क्या है ? भूदान मूलक, ग्रामोद्योग प्रधान अहिंसक क्रान्ति। परिणाम ? ज्ञानियों की ज्ञानशक्ति, मालिकों की व्यवस्था शक्ति, व्यापारियों की धनशक्ति और मजदूरों की श्रमशक्ति की परस्पर पूरकता। उत्पादित सम्पदा बंटी/बंटायी। भूमिहीनों साधनहीनों व आश्रयहीनों को अन्न वस्त्र, आवास, शिक्षा, चिकित्सा, उत्पादन और मनोरंजन के साधन सुलभ हुए। प्रेरक ? आचार्य विनोबा जिनके ज्ञान और कर्म, सत्य, प्रेम, करुणा को सामाजिक मूल्य प्राप्त हुआ, जिससे सामुदायिक जीवन, विचार कर्म और साहित्य प्रभावित है।

विनोबा जी का पूरा नाम था विनायक नरहर भावे। महाराष्ट्र के कोलाबा जिले में गागोदा नामक छोटे से गाँव में 11 सितम्बर 1895 को उनका जन्म हुआ। वे अपने माता-पिता की चार संतानों में सबसे बड़े थे। विनोबा जी के दादा शंभूराव भगवान के भक्त थे। वे हर उत्सव में अपना मंदिर हरिजनों के लिए खोल देते थे और उन्हें अपने हाथ से भोजन कराते थे। आज से सवा सौ साल पहले ऐसा करना साहस का काम था। अपने दादाजी का विनोबा जी पर बहुत प्रभाव था। उनका कहना था-‘‘मेरे भीतर थोड़ी बहुत जो पवित्रता है, वह मेरे दादा जी की देन है।’’ विनोबा जी के जीवन पर माता-पिता का भी व्यापक प्रभाव रहा है। वे अपने पिता के लिए लिखते हैं-‘‘वे बहुत मेहनती, सफाई पसंद और व्यवहार कुशल थे। हम तीनों भाइयों में जो विषय-विराग है, यह हमें अपने पिता से मिला।’’ माँ तो सभी की ममता वाली होती हैं, पर विनोबा जी की माँ ज्यादा ही ममतामयी थीं। ईश्वरभक्त, दयालु, मृदुभाषी विनोबा जी से कहा करतीं-‘‘विन्या, अधिक चीजों की इच्छा करने से सुख नहीं मिलता, सुख तो मिलता है संयम में, संतोष में। उनका कहना था-‘‘विन्या, उत्तम गृहस्थ आश्रम का निबाह करने से तो सिर्फ एक पीढ़ी तरती है, उत्तम ब्रह्मचर्य का पालन करने से सात पीढ़ियाँ तर जाती हैं।’’
माँ के इन वचनों को सुनकर विनोबा को लगा ब्रह्मचारी रहना ही ठीक रहेगा। ब्रह्मचर्य जीवन का पालन करने के लिए विनोबा जी ने कठोर जीवन जीना प्रारम्भ किया। ऐसे माता-पिता दादा के सान्निध्य में विनोबा बड़े हुए।

प्रेरक शिक्षा-दीक्षा


सन् 1903 में विनोबा जी बड़ौदा पढ़ने आ गये। उससे पूर्व अपने दादा के साथ रहकर गाँव में ही पढ़ते थे। बड़ौदा में पिताजी, जो वैज्ञानिक थे, के सान्निध्य में रहने से जीवन को संवारने और व्यवस्थित करने का अवसर मिला। सन् 1913 में उन्होंने हाईस्कूल की परीक्षा दी। फिर देश सेवा और धर्म साधना में रुचि लेने लगे। सन् 1914 में बड़ौदा में वे विद्यार्थी मंडल की स्थापना कर हर सातवें दिन सदस्यों से मिलते और दुनिया की गतिविधि पर चर्चा करते। उन्होंने चन्दा कर एक पु्स्तकालय भी खोला, जिसमें 1600 से अधिक पुस्तकें जमा थीं।

पढ़ाई के दौरान विनोबा जी को बंगाल की क्रान्ति और हिमालय की शान्ति के विचारों ने प्रभावित किया। इंटर की परीक्षा देने वे बम्बई जा रहे थे, तब रास्ते में सोचने लगे कि मैं इस परीक्षा में बैठकर क्या करूँगा ? मुझे तो ब्रह्म खोजना है। ‘अथातो ब्रह्म जिज्ञासा’ ब्रह्म जिज्ञासा का भाव प्रबल होते ही वे बम्बई की गाड़ी से उतरे और बनारस जाने वाली गाड़ी में बैठ गये। बनारस संस्कृत का गढ़ है। संस्कृत जाने बिना संस्कार हो कैसे ? ब्रह्म प्राप्ति तो संस्कार शुद्धि से ही संभव है।
विनोबा जी काशी पहुंचे, उससे पहले 4 फरवरी, 1916 को महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के निमंत्रण पर विश्वविद्यालय के शिलान्यास समारोह में गांधी जी का क्रान्तिकारी भाषण हो चुका था। उस भाषण से देशवासियों के दिलों में क्रान्ति के बीज पड़ गये थे। भारतीय मानस को झकझोरने के लिए गांधी जी ने सीधी बात कही-‘‘कल शाम मैं विश्वनाथ के दर्शनों के लिए गया था। उन गलियों में चलते हुए मेरे मन में ख्याल आया कि यदि कोई अजनबी एकाएक ऊपर से इस मन्दिर पर उतर पड़े और उसे हम हिन्दुओं के बारे में विचार करना पड़े तो क्या हमारे अपने आचरण की ओर उंगली नहीं उठायेगा ? मैं यह बात एक हिन्दू की तरह बड़ी पीड़ा के साथ कह रहा हूँ ? क्या यह कोई उचित बात है कि हमारे पवित्र मंदिर के आसपास की गलियाँ इतनी गन्दी हों ? उसके आसपास जो घर बसे हुए हैं, वे बेसिलसिले और चाहे जैसे हों ? गलियाँ टेढ़ी-मेढ़ी और संकरी हों। अगर हमारे मन्दिर भी प्रशस्तता और स्वच्छता के नमूने न हों, तो हमारा स्वराज्य कैसा होगा।


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