काल के हाथ कमनियां - महाराजी Kaal Ke Hath Kamaniyan - Hindi book by - Maharaji
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काल के हाथ कमनियां

महाराजी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :126
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5253
आईएसबीएन :81-288-1479-6

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जीवन के सत्य को उजागर करती पुस्तक...

Kaal Ke Hath Kamaniyan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

आरम्भ : विचार मंथन का

जीवन का सत्य आनंद है। आनंद अखण्ड और सम्यक् रूप से सीधा सधा हुआ होता है। वह बारीक लकीर का निशान भी सह नहीं सकता। इसलिए जब भी उसकी संज्ञा सामने आती है, वह स्वच्छ और निर्मल है। उसमें किसी तरह की क्रिया अथवा विशेषण या सर्वनाम आ ही नहीं सकते। इसलिए मनुष्य ने हमेशा मूल तत्व को स्वीकारा है और उसे सम्पूर्ण रूप से पाने के प्रयत्न किए हैं।

मनुष्य जीवन, यह सब समझते हुए भी उतना सीधा व सरल नहीं बन सका। हमेशा वह ‘बट’ और ‘परन्तु’ का शिकार रहा है। यह ‘बट और परन्तु’ विध्वन्सक हैं और अपनी मूल चेतना से हमें कहीं भी भटका सकते हैं। भटकना मनुष्य का लक्ष्य नहीं है और न वह भटकना चाहता है लेकिन इसके बावजूद उसे जाने-अनजाने कितने ही प्रसंगों और बिन्दुओं का सामना करना होता है। यहीं ऐसे व्यक्ति की तलाश होती है जो उसे बचा सके और सीधे रास्ते से ले जाने में सहायक हो। प्रस्तुत पुस्तक का पहला खंड ही ‘आनंद’ की खोज से गुजरता है। बातें छोटी होती हैं लेकिन हम उसे भटका देते हैं, अपनी जिज्ञासा के मृगजाल में फंसकर ‘यह क्या है ! वह क्या है ? वह ऐसा ही है तो आखिर क्यों ?’ इनके उत्तर की खोज में हमारा मस्तिष्क फंस जाता है क्योंकि वह भोजन और जल की प्रज्ञा से बच नहीं पाता। तब हम ऐसे व्यक्ति की खोज करते हैं जो बिना श्रम के हमें इनसे बचा सके और ठीक रास्ते पर ला सके। अर्थ यह भी हुआ कि श्रम कोई करे, हमें तो साफ और सुलझा मैदान चाहिए जिसमें किसी भी तरह के प्रश्न न उठें। हमारी समूची चेतना इसी खोज में लगी है। खोज में लगी है, वह उतना कठिन नहीं है परन्तु हमारा जीवन स्वयं इसके लिए बाध्य करता है। आज तक कोई नहीं समझ सका कि हमें कितने दिए जीना है। कल की सुबह का इंतजार हमारी गति हो गई है और कई बार तो समझ में नहीं आता कि रात के बाद दिन हमेशा आता है, अचानक क्या हुआ कि आज वह नहीं आया। अंधकार से प्रकाश और प्रकाश से बुद्धि की ओर बढ़ने के रास्ते इतने अनजाने छलदायी हैं कि हमें आज तक उत्तर नहीं मिल पाया।

इतनी लम्बी बात कहने के पीछे मात्र एक छोटा-सा चिंतन है कि अज्ञात शिविर में रहने के लिए बाध्य होना पड़ेगा और जो ज्ञानी इस छोटी-सी अवधि में जरा-सा भी ज्ञान दे दे, वह हमारे लिए वरेण्य है, श्रद्धेय है। प्रस्तुत पुस्तक में इसी सत्य को दस तरह से बांट कर रखा गया है। हमें समझाया गया है कि आने वाले के लिए अंततः जाना उतना ही अनिवार्य है। हमारे हाथ बंधे हुए हैं और शक्ति तथा समय उस मुक्ति के सहायक नहीं हो सके। सोच लें हम चाहे भले, हाथ कुछ नहीं लगेगा हमें:
मनुष्य हो या ईश्वर
संज्ञा दे दे कोई कुछ
नचा नहीं सका वह कभी
सत्य की नन्हीं डोर से
पुकार उठी है सदा-
उठो सोने वालो
जागो सोने वालो
क्रम कब बिखर जाए
अनजान हैं तुमसे
सोने का, उठने का !

हम अपने जीवन में ऐसे ही पुरुष की तलाश करते हैं जो इस अनजान ज्ञान के अक्षरों में लिख दे। शेष तो वह भी नहीं रहेगा, रहेगा शेष तो उसके लिए अक्षर। अक्षर जो अनंत हैं, अमर हैं और काल तथा कर्म की सीमा में कभी बंधे नहीं। प्रेम रावत अथवा महाराजी उन थोड़े गिने-चुने प्रबुद्ध व्यक्तियों में से हैं जिन्होंने आत्मवाणी के पहले दर्शन किए और फिर आत्ममंथन से उन्हें प्रस्तुत किया। वाणी के दर्शन सहज नहीं हैं, वह तो बुद्धि, विचार और चिंतन का माध्यम मात्र हो सकती है।

विद्वान, वक्ता और चिंतक प्रेम रावत अथवा महाराजी ने सीधी सहज भाषा और शब्दों में गहनतम विचारों को इस ढंग से प्रस्तुत किया है कि हर तरह का जिज्ञासु उसे समझ सकता है। वे स्वयं कुशल वक्ता हैं इसलिए जब प्रवचन करते हैं तो यहां वहां भटकाते और उलझाते हुए नहीं चलते, जो सहज और बोधगम्य है वही उनका प्रवचन है। परिणामतः दूर-दूर से लोग उन्हें सुनने आते हैं। उनके भक्तों की कोई सीमा नहीं है। दुनिया के अनेक देशों में वे फैले हैं और विभिन्न भाषा तथा बुद्धि के बावजूद सभी आसानी से उनके विचारों को समझ लेते हैं। यह समझाना कि जो कुछ है वह बाहर नहीं आपके भीतर है, सभी विद्वानों के लिए संभव नहीं है। यह काम वही व्यक्ति कर सकता है जो सचमुच सीधा और सरल हो। प्रेम रावत को सुनना जैसे किसी कहानी का अंश है, जो किसी अन्य गुरु अथवा समालोचना का आकांक्षी नहीं है। मुझे विश्वास है, पाठक इस पुस्तक के दस खंड़ों में विभाजित उनके विचार आसानी से समझ लेंगे। श्रोताओं के लिए तो वह एकदम अलग विचार मंच है, जिससे प्राप्त उद्गार वहीं नहीं ठहर जाते, वे निरंतर श्रोता के भीतर समाहित हो जाते हैं।
राजेन्द्र अवस्थी
लेखक, सम्पादक, दार्शनिक

आनंद की चेतना

वैसे, लोग अपने हृदय में अपने मन में तरह-तरह की जिज्ञासा रखते हैं। परंतु एक ऐसी जिज्ञासा है जिसका इस दुनिया में कोई मतलब नहीं है। जिसका ऊपर से, नीचे से, किसी भी तौर पर इन चीजों से मतलब नहीं हैं। जिसका रईसी से, अमीरी से, गरीबी से कोई मतलब नहीं है।
एक ऐसी जिज्ञासा होती है कि जब मनुष्य बीमार हो, तब भी उसके हृदय में जिज्ञासा रहती है; अगर वह बीमार नहीं है, तब भी उसके हृदय में जिज्ञासा मौजूद है। वह अमीर है, तब भी उसके हृदय में जिज्ञासा है; वह अमीर नहीं है तब भी उसके हृदय में जिज्ञासा है। क्यों ? क्योंकि यह जो हमारी बनायी हुई रेखाएं हैं, ये जो बनाये हुए डिब्बे हैं, हम इन्हीं के अनुसार लोगों को देखते हैं। आज मनुष्य, मनुष्य को नहीं देखता है। बनाने वाले ने आंखें दी हैं, और आंखें सभी को एक ही बराबर देखती हैं। किसी की ऐसी आंखें नहीं हैं कि वे गरीब के लिए अपने-आप बंद हो जाएं। कोई अमीर है, कोई गरीब है-कोई कैसा भी हो, आंखें तो सबको बराबर ही देखती हैं।

कान दिये हैं भगवान ने सुनने के लिए। कोई सच बोल रहा हो, कोई झूठ बोल रहा हो, ये कान थोड़े ही निर्णय लेंगे कि यह सच है, यह झूठ है। वह तो केवल आवाज़ है। अगर गाने वाला अच्छा है तो उसकी भी आवाज़ कानों में पड़ेगी और गाने वाला अच्छा नहीं है तो उसकी भी आवाज़ कानों में पड़ेगी। वह क्या कह रहा है, वह भी सुनाई देगा। इन चीजों का निर्णय कि यह अच्छा गाना है, या यह गाने वाला अच्छा है, या यह गरीब है, यह अमीर है-इसे ये इन्द्रियां नहीं तय करती हैं। इसका निर्णय करता है मन, दिमाग़, बुद्धि ! और बुद्धि इन चीजों का निर्णय उस तरीके से क्यों करती है जिस प्रकार हम लोग निर्णय करते हैं ? क्योंकि ये सब बातें हम लोगों को सिखायी हुई हैं।
बुद्धि की जिज्ञासा-अलग-अलग तरीके से अलग-अलग चीजों में लगती है, परंतु एक जिज्ञासा है जो सच्चे हृदय की जिज्ञासा है। चाहे कोई भी हो, किसी भी देश का रहने वाला हो, किसी भी भाषा को बोलने वाला हो, कुछ भी कर्म करने वाला हो, कोई भी हो, कैसा भी हो, सभी मनुष्यों के हृदय में एक जिज्ञासा है। और चीजें एक जैसी नहीं हैं, एक समान नहीं हैं। इस संसार के अंदर सारी चीजें एक समान नहीं हैं।

अब लोग सूर्य की बात करते हैं। मैं भी कहता हूँ कि सूर्य सबके लिए एक ही समान चमकता है, परंतु उसमें भी एक अंतर है। वह अंतर यह है कि जैसे-जैसे आप ऊपर की तरफ चलते रहेंगे, नॉर्थ (उत्तर) की तरफ, वैसे-वैसे ठंड बढ़ती चली जाएगी। जो पृथ्वी के ऊपर वाले हिस्से में ठंडे मुल्क हैं या पृथ्वी के दक्षिण के हिस्से में देश हैं, उनमें इतनी गरमी नहीं होती है। जून, जुलाई और अगस्त में जो हिंदुस्तान में गरमी होती है, तो जो इक्केटर (विषवत् रेखा) है, जो पृथ्वी के बीच का हिस्सा है उसके नीचे ठंड रहती है। जब वहां गरमी होती है तो यहां ठंडी होती है। तो सूर्य भी सबके लिए एक समान नहीं चमकता है और सितारे भी सबके लिए एक समान नहीं हैं. अगर तुम चलते रहो, भ्रमण करते रहो तो पृथ्वी के नीचे वाले हिस्से में, ऐसे-ऐसे सितारे नजर आयेंगे, जो ऊपर वाले भाग में नहीं हैं। कहीं सूर्य उदय होता है तो कहीं अस्त होता है। यहां तक भी है कि पृथ्वी के बहुत ऊपर उत्तरी भाग में तो सर्दियों में सूर्य निकलता ही नहीं है ! छः महीने के लिए रात और गरमियों में छः महीने के लिए सूर्य निकलता है।
परंतु एक चीज है जो सबके लिए एक बराबर है। सबकी भाषा एक बराबर नहीं है। सबका रहने का तरीका एक बराबर नहीं है। सब लोगों का व्यवहार करने का तरीका एक बराबर नहीं है। पर एक चीज है जो सबके लिए बराबर है। चाहे कोई अमीर हो या गरीब हो। चाहे हमारे देश के रहने वाले हों, चाहे गरीब देश के रहने वाले हों। क्या उनका बाहर का रंग है, इसका भी कोई अंतर नहीं है। चाहे वे धर्म को मानते हों या नहीं मानते हों।
सचमुच में जो सबके लिए एक बराबर है, उसको पाने के लिए, उसको जानने के लिए जो अपने हृदय में जिज्ञासा रखता है, वह सब धर्मों से अलग है।

धर्म भी धारण किया जाता है। जब बच्चा पैदा होता है तो क्या धर्म होता है उसका, बताओ ? जब बच्चा पैदा होता है छोटा-सा, जब मां की कोख में से निकलता है, तो क्या धर्म होता है उसका ? मेरे गुरु महाराज कहा करते थे, ‘‘बुद्ध भगवान के परदादे का क्या धर्म था’’ ? जब बुद्ध भगवान पैदा ही नहीं हुए थे, तो बौद्ध कितने थे ? तो समझने की बात है कि धर्म से भी अलग, कर्म से भी अलग वाली बात है, क्योंकि ये सब हमारे बनाये हुए नियम हैं।
अंतर एक ही है, जो चीज मेरी बुद्धि से परे है मैं उसको कैसे समझ पाऊंगा ? सूरदास इसके उदाहरण हैं। सूरदास को क्या पता कि कहां क्या है ? उसको तो यह पता नहीं है। वह तो देख भी नहीं सकता। उसको क्या मालूम कि यहां दीवार लगी हुई है। तो क्या करता है सूरदास ? उसको यह नहीं मालूम कि यहां दीवार है, यहां एक खम्भा लगा हुआ है। यहां दरवाजा है, यहां मेज हैं यहां कुर्सी है। उसको नहीं मालूम। वह देख नहीं सकता। जैसे हम लोग देखते हैं, वैसे सूरदास नहीं देख सकता। तब हाथ से टटोलता है। जब हाथ से कोई टटोलता है तो क्या अनुभव हो रहा है, इस चीज की कल्पना वह पहले से ही मन में नहीं करके बैठता। जब हाथ लगता है तो टटोलने से मालूम पड़ता है, ‘‘अच्छा यह दीवार है !’’ दीवार है तो टटोलते-टटोलते अंदाजा लगता है कि दरवाजा भी कहीं होगा। यह खिड़की है, यह दरवाजा है। हाथ में अगर लकड़ी है तो उससे टटोल लिया कि यब जगह जाने के लिए साफ है या नहीं। तो जब इन आंखों से दिखायी नहीं देता है तो यह हाथ क्या बन जाते हैं ? इन हाथों पर विश्वास करना पड़ता है कि नहीं ? जब आंख से नहीं दिखायी दे रहा है, जब अंधेरा हो गया, तो हाथों पर विश्वास करना पड़ता है।

हमारे पास भी ऐसा हाथ है और वह हाथ है हृदय। जब हम अपने हृदय से इस बात को टटोलेंगे, हृदय से इस विषय को समझेंगे कि हृदय क्या कहता है, बुद्धि से नहीं। बुद्धि तो यह समझ लो कि पेड़ पर बैठी हुई है और चहचहा रही है-‘‘यह क्या है, यह क्या है ? ऐसा क्यों है, ऐसा क्यों है, ऐसा क्यों है ?’’ बुद्धि किसी चीज का उत्तर नहीं देगी। प्रश्न पूछने के लिए हमेशा तैयार है। उत्तर देने के लिए कोई तैयार नहीं है।
जब पानी पीते हैं तो क्या मालूम कि कितना पानी पीना है ? किसी ने एक गिलास पानी आगे रख दिया और वह सारा पी लिया। उससे प्यास नहीं बुझी तो एक और मांगेंगे। अनुभव से पता लगता है, ‘‘अच्छा, अब मेरी प्यास बुझ गयी।’’ जब खाना खाने का समय आता है और कोई तुमसे कहे, ‘‘इतना ही बहुत है।’’

‘‘ना बाबा, मुझको तो अभी भूख लगी है।’’ जब भूख खत्म हो जाती है और कोई कहे, ‘‘और खाओ जी,’’ तो कहोगे, ‘‘नहीं, अब संतुष्टि है।’’ क्योंकि यह स्वयं अनुभव करने की चीज है। ज्ञान, भक्ति, सेवा और सबसे उत्तम चीज वह परमानंद, जो सबके अंदर विद्यमान है, जो सबके अंदर बराबर है, उसको अनुभव करने के लिए हृदय में जिज्ञासा पैदा होती है। जिज्ञासा किसी की बनायी हुई नहीं है। यह सबके हृदय में स्वयं ही विद्यमान है। अगर यह जिज्ञासा विद्यमान नहीं होती तो मेरे ख्याल से यह संसार कभी का खत्म हो गया होता। क्योंकि यही जिज्ञासा है जो ढुंढ़वाती है, खोज करवाती है, मनुष्य को आगे बढ़ाती है, ‘‘खोजो ! ढूंढ़ो। सेवन करो। इस जीवन को सफल करो। इस जीवन का आनंद उठाओ।’’
देखो, इस समय कितनी चीजें हैं जो मनुष्य समझता है कि उसको आनंद देती हैं ! मनुष्य समझता है कि अगर उसका मनोरंजन हो तो उससे उसको आनंद मिलेगा। एक जमाना था कि टेलीविजन नहीं था। एक समय था, मनुष्य पैदल सफ़र करता था। फिर उसको जानवर दिखायी दिया-घोड़ा। उसने सोचा कि घोड़ा है, घोड़े पर बैठकर चलेंगे। घोड़े से हो गयी कार ! और मनुष्य ने क्या सोचा ? सोचा कि इससे उन्नति होगी। टेलीविज़न है। अब यहां सेल्यूलर फ़ोन आ रहा है। छोटे-छोटे फ़ोन आ गए हैं। अब विदेश में तो सबके पास वह सेल्यूलर फोन है। हिंदुस्तान में तो लोग सोचते हैं कि बस, एक बार सेल्यूलर फ़ोन हो जाय, उससे बड़ा अच्छा हो जायेगा। लेकिन अच्छा नहीं होगा। क्यों नहीं होगा ? मेरे पास भी हैं विदेश में। एक नहीं-दो तीन हैं मेरे ख्याल से। क्या है वह ? सिर दर्द है। बस, सिर दर्द ! कम से कम अगर घर में फोन रखा है और फोन नहीं उठाना है तो घर से चले गये और यह ऐसी चीज है कि घर से चले भी जाओगे तब भी रिंग करती रहेगी !
मनुष्य चाहता है कि उसकी उन्नति हो। पर इतिहास को देख लो दुनिया में जितनी भी चीजें उन्नति के नाम पर हुई हैं, क्या सचमुच में उन चीजों से मनुष्य की उन्नति हुई है ?
टेलीविज़न ने कितने आदमियों को ‘परमानंद’ और ‘परम सुख’ दिखा दिया ? एक को भी नहीं। मनोरंजन है। मन का रंजन है-मनोरंजन ! जिस मन की सीमा इतनी बड़ी है कि यह मन मनुष्य की बुद्धि में रहकर के विश्व की कल्पना किया करता है-ब्रह्माण्ड की कल्पना करता है, जिसमें पता नहीं कितने करोड़ों, अरबों, खरबों सितारे हैं, उनकी कल्पना करता है :

कबहूं मन रंग तुरंग चढ़े, कबहूं मन सोचत है धन को।

मन कहां-कहां भागता रहता है। मन की प्रकृति में खुश होना लिखा ही नहीं है। यह है वह मन ! परंतु इन चीजों के बावजूद भी, इन चीजों के अलावा भी मनुष्य के हृदय में वह चीज है जो उसको सुख दे सकती है।
किसी को चाहिए पुत्र सुख। ज्ञान वह नहीं दे सकता। ज्ञान का पुत्र से कोई मतलब नहीं है। किसी को चाहिए कार्य का सुख, नौकरी का सुख। वह भी ज्ञान नहीं दे सकता। किसी को चाहिए कि मेरी उन्नति हो, मेरा प्रमोशन हो, ज्ञान वह भी नहीं दे सकता। किसी का यह ख्याल हो कि ‘‘जी, मेरा पैर ठीक नहीं है। ज्ञान मेरा पैर ठीक कर देगा।’’ यह ज्ञान उसके पैर ठीक नहीं कर सकता है।

ज्ञान अगर कुछ करता है तो वह अंदर तक पहुंचाने की बात है। चार क्रियाएं हैं, जो ध्यान को अंदर की ओर मोड़ देती हैं। क्योंकि आज तक हम लोगों ने क्या सीखा है ? हम लोगों ने यही सीखा है कि अपने ध्यान को अंदर से लेकर बाहर की तरफ लगाएं। मैं सिखाता हूं कि नहीं, उस ध्यान को अन्दर की तरफ लगाओ। इससे उस चीज का अनुभव होगा जो प्राकृतिक रूप से है। बनायी हुई नहीं। जो स्वयं अंदर है ! तो अंदर क्या है ? अगर मनुष्य अपनी आंखें बंद कर ले, बाहर की रोशनी को न देखे तो क्या दिखायी देगा ? सोचने की बात है क्या दिखायी देगा ? अंधेरा दिखायी देगा। परंतु यह मनुष्य की प्रकृति नहीं है। क्योंकि जब आंखें बंद हुईं और ध्यान अंदर की तरफ गया तो अंधेरा नहीं है। उस अंधेरे में भी उजाला है !
आंख तो लोग बंद कर सकते हैं, पर कान कौन बंद कर सकता है ? कान तो हमेशा खुले रहते हैं। दुनिया भर की आवाजें कानों में पड़ती रहती हैं और मनुष्य सुनता रहता है। अगर वह आवाज किसी तरीके से बंद कर भी दी जाय, तो क्या सुनायी देगा ? जो आवाज अंदर की है, वही सुनायी देगी ! क्योंकि मनुष्य के अंदर अंधेरे में भी उजाला है। साइलेंस में, मौन में भी, जब सारी आवाजें बंद हैं, तब भी आवाज है। वह अंदर की आवाज है। मन व्याकुल होता है। जब ध्यान को अंदर की तरफ ले जाओगे तो चाहे संसार में कुछ भी न हो रहा हो, क्योंकि ध्यान अंदर की तरफ चला गया। कोई दुनिया वाले से पूछे, ‘‘क्या होगा ?’’ ‘‘कुछ नहीं होगा।’’ अब ‘‘कुछ नहीं’’ क्यों नहीं होगा ? क्योंकि अंदर के लिए क्या कहा है ? अंदर झूला लगा है। जब ध्यान अंदर की तरफ जायेगा तो उस समय और तो कुछ नहीं चल रहा है, परंतु वह झूला फिर भी चलेगा और उसके लिए यही कहा है-
सतगुरु मिले झुलावनहार, सुरतिया झूल रही।

ज्ञान जो मैं देता हूं तो चार क्रियाएं देता हूं ताकि मनुष्य अपने अंदर विद्यमान जो अनुभव है, उसे अनुभव करे। उसका अनुभव करे, जो चीज उसके अंदर विद्यमान है। मैं लोगों को कोई पुस्तक या किताब नहीं देता हूं कि भाई यह-यह अनुभव होना चाहिए। नहीं ! यह तो स्वयं होता है। जैसे आईना चेहरे के आगे रखोगे, उस आईने में देखोगे तो अपना चेहरा दिखायी देगा। बात है अंदर ध्यान करने की। बात है उस जिज्ञासा को लेकर आगे आने की।
जब भगवान कृष्ण अर्जुन को ज्ञान के बारे में समझाते हैं तो अर्जुन कहता है, ‘‘आप मुझको यह ज्ञान दीजिए ? बताइए कैसे मुझे यह ज्ञान मिले।’’ तब भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, ‘‘तू समय के महापुरुष के पास जा।’’ यह नहीं कहा है, ‘‘जब खूब सारे लोग कहें कि यह समय का महापुरुष है, तो वह समय का महापुरुष होगा।’’


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