बीत गया सो बीत गया - महाराजी Beet Gaya So Beet Gaya - Hindi book by - Maharaji
लोगों की राय

कविता संग्रह >> बीत गया सो बीत गया

बीत गया सो बीत गया

महाराजी

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :126
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5254
आईएसबीएन :81-288-1478-8

Like this Hindi book 7 पाठकों को प्रिय

350 पाठक हैं

जीवन के सत्य से संबंधित...

Bit Gaya So Bit Gaya

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भारतीय कविताएँ 1987-88 सभी भाषाओं की दोनों वर्षों की पाँच-पाँच प्रतिनिधि कविताओं की महत्वपूर्ण चयनिका है।

सम्पादकीय

सृष्टि के विकास में सबसे पहला तत्व आकाश माना गया है। आकाश से ही शब्द की उत्पत्ति हुई है। यही नाद-ब्रह्म है। आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी-ये पंचमहाभूत जड़-चेतन सृष्टि के आधार-स्तम्भ हैं। आकाश तत्त्व से उद्भूत नाद या शब्द में नागरी वर्णमाला के पचास अक्षर अन्तर्निहित हैं जो नाद की ही तरह सृजनात्मक एवं विनाशात्मक शक्ति से भरपूर हैं। अतीन्द्रिय दृष्टा ऋषि-मुनियों ने शब्द की इस अनन्त अनादि शक्ति को ही मन्त्र और तन्त्र की साधना-प्रणालियों में अभिलक्षित किया है। योगशास्त्र के अनुसार भी मानव अपने-आप सम्पूर्ण ब्रह्म का ही पूर्ण पर छोटा-सा प्रतीक है। योगशास्त्र के अनुसार भी मानव अपने-आप में सम्पूर्ण ब्रह्म का ही पूर्ण पर छोटा-सा प्रतीक है। केवल शरीरस्थ षट्चक्रों में वर्णमाला के यही समस्त अक्षर अपनी सम्पूर्ण ओजस्विता एवं शक्ति के साथ विद्यमान रहते हैं। अन्तःस्थिति इसी अक्षर-सामर्थ्य से मानवीय जीवन गतिशील है। मानव ह्रदय में जब असह्य दुःख अथवा अतिशय आनन्द का उद्रेक होता है तो अनायास ही तद्भाववाचक शब्द का स्फुरण होता है। और शब्द अपने स्वभाव के अनुरूप ही श्रोता में भाव जागृत करता है। साधारण व्यक्ति के शब्द की अभिधा शक्ति ही विद्यमान रहती है। असाधारण व्यक्ति शब्द की अभिधा, लक्षणा और व्यंजना शक्ति का भी अपने भावात्मक ह्रदय तथा विवेकपूर्ण विचार से प्रयोग करता है और उसी से उद्भुत होता है, काव्य जो सृजनात्मक, भावात्मक एवं प्रभावोत्पादक-तीनों एक साथ होता है।

काव्य चाहे वह किसी भी भाषा में और किसी भी समय में क्यों न लिखा गया हो और उसका कलेवर क्यों न विभिन्न हो, पर उसमें अन्तर्निहित भाव या उसकी आत्मा सर्वत्र एक ही होती है।
समग्र भारतीय काव्य की आत्मानुभूति के लिए ही भारतीय ज्ञानपीठ ने 1983 से हर वर्ष ‘भारतीय कविता’ विद्या में भारतीय भाषाओं में उस वर्ष प्रकाशित चुनी हुई कविताओं का संकलन निकालना शुरू किया है। हमें संतोष है कि हमारे सुधी पाठकों ने इस संकलन को भी उतना ही सराहा है जितना भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित अन्य ‘भारतीय उपन्यासकार’ या भारतीय कहानीकार आदि श्रृंखलाओं को।
और अब प्रस्तुत है यह कृति ‘भारतीय कविताएँ: 1987-88’ दो वर्षों की एक साथ। इस संग्रह के सम्पादक-प्रकाशन में मेरे सहयोगी गुलाबचन्द्र जैन ने जो अथक परिश्रम किया है उसके लिए मैं उनका अत्यंत आभारी हूँ।

कविता

एक कवि ने कहा था : कविता नहीं पढ़ते जो
कविता है उन्हीं के लिए
उन्हीं के आहत दिलों काँटों से बिंधी
उँगलियों के लिए
मृत और जीवित लोगों के लिए
पथ-वीथियों में अहर्निश गूँज रहे
चीत्कार के लिए
मरुभूमि के सूर्य के लिए

मृत्यु के अर्थ और जीवन की सारहीनता के लिए
ध्वंसावशेषों के अभिशप्त
पत्थरों के लिए
युवतियों के कामार्त होंठों की
लालिमा के लिए
लौह-श्रृंखल में जकड़े हाथों के लिए
कीट-पतंगे, सीप-घोंघे, शैवाल और
सेमल के फूलों के लिए
सन्ध्याकाश में अकेले उड़ते

पंछियों के लिए
जल और अग्नि की
उद्विग्नता के लिए
पाँच सौ करोड़ रुग्ण क्षुधातुर
शिशुओं की माओं के लिए
चाँद रक्ताभ न हो जाये
इस भय से स्तब्ध
प्रत्येक मुहूर्त के लिए
सृष्टि के पहले दिन के लिए

माटी का पुतला फिर से
माटी में जा मिलेगा
इसी पुरानी बात के लिए
और....
पृथ्वी घूमती रहे-इसलिए ।

हम अमरता के द्वार पर खड़े हैं !

महामना प्रेम रावत या महाराजी की पहली कृति ‘जिंदगी की कहानी’ की लोकप्रियता को देखते हुए मन में विचार आया कि वे जो प्रवचन करते हैं, क्यों न उसे सभी के लाभ के लिए प्रस्तुत किया जाए। व्यक्ति का सम्पर्क और सम्यक से भाषा और भाव का प्रवेश एक बात है। यह इतना सहज नहीं है।
सहज नहीं है, क्योंकि विश्व में सर्वत्र फैले अवयव हर समय और सुविधानुसार मिल जाएं, संभव नहीं है। इसी प्रक्रिया को ध्यान में रखकर मनुष्य की चेतना ने एक दूसरा रास्ता अपनाया। रास्ता है पुस्तकों का। पुस्तकों का आविर्भाव लोक-गाथाओं से हुआ। एक ने एक बात कही, दूसरे ने सुनी और उसके मस्तिष्क ने उसे गांठ बांधकर रख लिया। यही गांठ है जो सदियों से बंधी चली आ रही है और जैसे-जैसे समय बीतता है, वह और मजबूत होती है। आप कमजोर रस्सी को लीजिए। उसे निरंतर तेल पिलाते रहिए, वह ऐसा मजबूत अवयव बन जाएगा कि बिजली का तार टूट जाएगा, सामान्य तेल पिया धागा कभी नहीं टूलेगा। इसका कारण साफ है। यह हमारी मूल चेतना के तेल कभी नहीं टूटेगा। इसका कारण साफ है। यह हमारी मूल के तेल से उजागर होकर उसमें घुलता हुआ मिलता जाता है। ऐसी चीज टूटेगी कैसे ?
तेल शब्द सामान्य हो सकता है, किन्तु यदि यही हमारी चेतना के सूक्ष्म तत्व तक पहुंच जाए और उसे बांध लें तो हम नाम देते हैं ‘बुद्धि’ का। बौद्धिकता अजर अमर है। एक गांठ काफी है। इसी गांठ को बांधने के लिए अक्षर, शब्द, बुद्धि, चिंतन और चेतना की रचना हुई है। वह जीवन पर्यन्त चलती रहेगी।

मनुष्य सबसे श्रेष्ठ प्राणी है। प्राणी, हां, सामान्य रूप से प्राणी उसे कहते हैं जिसमें प्राण हो। प्राण हो सकते हैं, लेकिन यदि उनमें शब्द नहीं है तो चेतना के द्वार नहीं खुलेंगे। यहीं से तो सोच के दरवाजे खुलते हैं। जो जितना सोचता है, उतना बांधता भी है और यही प्रसाद अन्ततः बांटने वाले को अमर बना देता है।
इसी क्रम में प्रस्तुत है प्रेम रावत जी की दूसरी कृति ‘बीत गया सो बीत गया’। सोचिए, इतने शब्दों में कितना गहरा अर्थ छिपा है-अतीत लौटता नहीं, सही हो या गलत, हो गया सो हो गया। कोई यदि यह सत्य प्रस्तुत कर रहा हो कि बीत गया सो बीत गया, अब पछताए क्या होत है तो उसे क्या कहेंगे हम ?
मैं उसे ऐसे व्यक्ति से उद्गार कहना चाहूंगा जो सत्य, न्याय, धर्म और मन के नितांत चिंतक घेरे से उभरकर सामने आये हैं और जिनमें वह शक्ति है कि हम कभी गलती कर ही नहीं सकते। हमारा कभी अंत नहीं होगा। वह अमरत्व की पौड़ी है जो गंगा की पौड़ी से ज्यादा मजबूत है।
‘बीत गया सो बीत गया’ का पहला पाठ खोलिए और पढ़ते-पढ़ते रुक जाना होगा-
मित्रता करो अपने अभ्यंतर से
अपनी आखरी श्वास तक
सच्चा मित्र वही तो है।
यही उस परमसत्ता का आभास है !

इन्हीं शब्दों को मैं यदि कहकर रख दूं-भाई मेरे, भटके क्यों हो ? आखिरी श्वास कहां है ? आप जैसे व्यक्ति की आखिरी श्वास हो नहीं सकती। जीवित रहना एक बात है, अमर होना दूसरी बात है। अमर होने का कोई तराजू है तो यही है-सामान्य देह तो आता-जाता दरिया का जल है तुम्हारे मुंह से जो निकल गया और जिसे हजारों-लाखों ने आत्मसात कर लिया वह आता-जाता नहीं है। वह अमर स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। ऐसा व्यक्ति कभी क्षीण नहीं होता। सूर, तुलसी, मीरा से पहले बाल्मीक और प्लेटो आज भी अमर हैं। उन्हें कोई विस्मृत नहीं कर सका है।
सदा अमर अजर रहते हैं
शब्द, अक्षर और ज्ञान
सदा जीते हैं फैले हवा में
बांटते हैं अर्जित अपना ध्यान
महाराजी कहते हैं-एक दीपक है हमारे पास। दीपक वह जो हवा को भी पीता है, पानी में डूबकर एक नयी जलधार छोड़ता है और अंधेरा जिन्दगी भर तरसता रहता है, ‘‘भाई, कुछ क्षण के लिए तो थम जा।’ वह नहीं थमता। अक्षर ज्ञान नहीं थमता। ज्ञानी कभी मरता नहीं, वह समय के साथ और उभरकर आगे बढ़ता जाता है तब समय हाथ जोड़कर कहता है, ‘हे मेरे अज़र अविनाशी पराजय मेरी।’

महाराजी की चेतना और अमर रहने के द्वार अपने प्रवचनों से खोले हैं। नदिया गहरी है कहां ? डूबता कौन है ? दुःख पाता कौन है ? भ्रमित कौन है ? न जाने कितने प्रश्न हैं जो महाराजी ने उठाये हैं और यह सदा अमर रहने वाला व्यक्ति उजाले के जंगल में मंगलमय तैरता है। इसीलिए वह हमसे श्रेष्ठ हैं और पूजनीय हैं और हम उसे अपने भीतर उसी तरह रख लेना चाहते हैं जैसे प्राण की बाती। सब बुझ जायेगा प्राण की बाती कभी नहीं बुझती।
कितना कुछ लिखा है इस पुस्तक में, आइए उसे हम पढ़ें-सारी चिंताओं से मुक्त हो जायेंगे। सदाबहार हम खिलेंगे कमल की तरह और भटकेंगे कहीं नहीं क्योंकि मेरा साईं तो मेरे भीतर है। तभी तो आप कह देते हैं-
जगह छोटी कितनी
समय कितना बेजार
भरा पड़ा है देखो तो
पाने वालों का संसार।
बस, पढ़िए इस दूसरी कृति को-बीत गया सो बीत गया। पहले पढ़ा था ‘जिंदगी की कहानी !’ एक सांस में पढ़ गये। दूसरी सांस में यह कृति पढ़ें, अपने मन के द्वार खुले रहेंगे तो पढ़ेंगे तीसरी भी, चौथी भी, कितना पढ़िएगा।
विद्यादान से बढ़कर महादान नहीं है। महाराजी उदारतापूर्वक बिना लाग-लपेट के, बिना आपसे कुछ मांगे खुलकर यह उपहार दे रहे हैं। अपने मन के दरवाजे पूरी तरह खुले रहने दीजिए, पछताना न पड़े आपकी कि महाज्ञान का एक कोष सामने आया था, आप पूरी तरह उसे अपने भीतर समाहित नहीं कर सके।
राजेन्द्र अवस्थी
लेखक, संपादक, दार्शनिक

भाग्य से मिला है जीवन

किसी पंक्षी को पिंजड़े में बंद कर दीजिए और उसको यह कहिए, ‘देख यह पिंजड़ा कितना सुंदर है ! यह पिंजड़ा सोने का है। यह पिंजड़ा तेरे लिए बनवाया है।’ तो क्या होगा ? पक्षी अपने पंख फड़फड़ाएगा। कोई कुछ भी कहे, उसको सिर्फ एक बात मालूम है कि उसको वह आजादी चाहिए। इसी प्रकार मनुष्य को स्वतंत्रता चाहिए-ऐसी स्वतंत्रता, ऐसा सुख जो सिखाया नहीं जाता। जो स्कूलों में नहीं सिखाया जा सकता। जो पुस्तकों से नहीं सिखाया जा सकता है।
मनुष्य कोई भी हो, कहीं का भी हो, कैसा भी हो, पढ़ा-लिखा हो, अनपढ़ हो, उसका हृदय वह परम सुख पाने के लिए तड़पता है। जैसा वह पक्षी है, वैसा ही हम लोगों के अंदर भी एक पक्षी है। उस पक्षी को किसी ने सिखाया नहीं। हम सब लोगों के अंदर जो हृदय रूपी पक्षी है, उस पक्षी के सामने कुछ भी लाकर रख दो, परंतु फिर भी वह पक्षी सुखी नहीं होगा। कब सुखी होगा वह पक्षी ? कब उस पंक्षी के पंख फड़फड़ाने बंद होंगे ? जब उसे वह परम सुख मिलेगा।
सारा संसार आज किसी न किसी चीज़ के पीछे लगकर दुखी है। चाहे लोग अपने आपको सुखी समझते भी हों परंतु असली सुख वह नहीं है। वह सुख ऐसा है जो एक घंटे के लिए है, दूसरे घंटे तक रहेगा, नहीं रहेगा, किसी को नहीं मालूम। जो दुनिया का सुख आज है, कल रहेगा, नहीं रहेगा किसी को नहीं मालूम। लोग समझते हैं कि अगर हम दुखी नहीं हैं तो हम सुखी है परंतु संतों ने, महात्माओं ने किसी और सुख की बात की है। कहा है-

नानक दुखिया सब संसारा, सुखिया केवल नाम अधारा।
इस संसार के अंदर कई प्रकार के लोग आए। बड़े-बड़े लीडर लोग भी आए। उन्होंने ने भी केवल अपनी बात लोगों के आगे रखी। बड़े-बड़े पढ़े-लिखे लोग भी आगे आए। इसी तरह फ़िलास्फ़र लोग भी आगे आए, उन लोगों ने भी अपनी बात आगे रखी। और कबीर जैसे संत-महात्मा भी आए, उन्होंने भी अपनी बात आगे रखी। आज संसार में राजतंत्र के कितने सिस्टम हैं। कहीं डेमॉक्रैसी (जनतंत्र) है, कहीं कम्यूनिज़्म (साम्यवाद) है, कहीं कुछ राजनीतिक पद्धति है, कहीं कुछ पॉलिटिकल सिस्टम है, परंतु एक भी काम नहीं करता। कितने ही सालों पहले कबीरदास जी ने एक छोटी-सी बात कही थी।

पानी में मीन पियासी, मोहे सुन-सुन आवे हाँसी।।
मुश्किल यह है कि बड़े-बड़े फ़िलास्फ़र और पढ़े-लिखे लोग इस बात को नहीं समझते। किसी ने एक बात समझी तो उस बात को लिख दिया। फिर लोग उस बात को लेकर चलते हैं कि हम इस बात को समझेंगे कि इसने यह क्या कहा ? फिर उस पर विवाद होगा कि उसने यह क्यों कहा ? फिर उस पर जांच होगी कि यह क्यों कहा गया ? जब जवाब सही-सही दोगे तब डिग्री मिलेगी। जब डिग्री मिल जाएगी तो उसको लगाएंगे दीवार पर और कहेंगे कि अब हमको वह मालूम हो गया, जो उसको मालूम था। बस ! परंतु संत-महात्माओं ने जो बात आगे रखी, वह कुछ दूसरी बात है।
मैं यह बात कहना चाहता हूं कि और सारे तरीके जितने भी तरह से प्रयोग किये गए, वे सब फेल होते जा रहे हैं, परंतु वह बात जो कबीरदास ने कितने ही सालों पहले कही, वह आज भी सत्य है।

औरों की बात सच है या नहीं है, परंतु यह बात आज भी सच है। उनको किस बात का अनुभव हुआ ? उन्होंने क्या समझा ? किस बात को समझा कि उनके हृदय में ऐसी प्रेरणा आयी कि मनुष्य जिस चीज़ को सचमुच में चाहता है, वह उसके पास ही है। एक यह भी कहा-
मृग नाभी कुण्डल बसे, मृग ढूंढे बन माँहि।
ऐसे घट-घट ब्रह्म हैं, दुनिया जानत नाँहि।।
अब कोई यही तो समझेगा कि एक बार कह दिया किसी ने तो फिर दुनिया जान जाएगी, परंतु फिर भी नहीं जानी यह दुनिया। क्योंकि यह बात कहीं और की है। यह बात है हृदय की।
आदमी एक नारियल उठा सकता है क्योंकि उसका हाथ है और नारियल का जो आकार है उसको वह हाथ से उठा सकता है। परंतु जो सूक्ष्म कीटाणु हवा में चल रहे हैं, जो मनुष्य को आँख से नहीं दिखायी देते उनको मनुष्य कैसे उठाएगा ? जब उसको दिखायी ही नहीं दे रहे हैं मालूम भी क्या पड़ेगा कि कीटाणु कहां हैं ?
हिंदुस्तान में जगह-जगह कितनी बड़ी-बड़ी इमारतें बनी हुई हैं। कितने ही बड़े-बड़े किले बने हुए हैं। अब गिरना शुरू हो गये। जिसने भी पहले किला बनाया, उसने गिराने के लिए नहीं बनाया ! वह तो इसलिए बनाया कि हमेशा-हमेशा के लिए रहेगा। परंतु आज कहां गये वे किले ? गिरना शुरू हो गये। आज मनुष्य बड़ी-बड़ी इमारतें बना रहा है। मुंबई में ऐसी-ऐसी इमारतें बन गयी हैं, जब मैं पहले यहां मुंबई में आया था तो ऐसी इमारतें नहीं थीं। कुछ थीं परंतु अब और नयी-नयी इमारतें बन गयी हैं। तो भाई, इन इमारतों का क्या होगा ? ये भी गिरेंगी ! क्या हम सब में यह क्षमता है या नहीं है कि हम भी अपने हृदय की आँखों से देखें-इन आँखों से नहीं क्योंकि आँखों से जो दिखायी देता है वह एक न एक दिन जरूर नष्ट होगा।

इजिप्ट के राजाओं के लिए बड़ी-बड़ी पिरामिडें बनवायी गयीं, शिल्पकारों ने बड़ी-बड़ी मूर्तियां बनायीं। परंतु समय एक ऐसी चीज़ है कि वह आदमी के अभिमान को तोड़कर रहेगी ! वह आदमी के अभिमान को, आदमी की शक्ति को सदा-सदा के लिए नहीं रहने देगी। समय अच्छे-अच्छों को-जो आज बड़े घमण्ड से छाती फुलाकर चलते हैं, समय एक ऐसी चीज़ है कि वह उनकी भी छाती को अंदर कर देगी। समय ऐसी चीज़ है। आज लोग कितना पैसा खर्च करते हैं सुंदर बनने के लिए। चाहे कोई कितना भी सुंदर हो, परंतु समय एक ऐसी चीज़ है, एक दिन सारी सुंदरता खत्म हो जायेगी। चाहे कितनी बड़ी इमारत खड़ी करे आदमी, चाहे कुछ भी करे, चाहे चंद्रमा तक जाये, चाहे चंद्रमा से आये; कितनी भी बार आये, कितनी भी बार जाये, कुछ भी करे। समय एक ऐसी चीज़ है कि वह सबको खत्म कर देती है। एक मिस्त्री मिट्टी से इमारत खड़ी करता है और समय भी मिस्त्री है। वह क्या करता है ? बड़ी-बड़ी इमारतों को भी मिट्टी बना देता है ! जहां से बनीं, वहीं पहुंचा देता है। वह समय रूपी मिस्त्री अभी भी काम कर रहा है।

दुनिया में क्या चीज़ निश्चित है ? कल क्या होगा, किसी को नहीं मालूम। संसार में अगर कोई एक बात निश्चित है तो वह यह है कि एक दिन हमें इस दुनिया को छोड़कर चले जाना है। क्योंकि हम सबका जन्म हुआ, हम जीवित हैं, एक चीज़ निश्चित है कि एक न एक दिन ऐसा जिन जरूर आएगा जिस दिन हम नहीं रहेंगे ! यह निश्चित नहीं है। और क्या होगा, क्या होना है, क्या होना चाहिए, क्या हो सकता था-यह किसी को नहीं मालूम। सब लोग अटकलें लगाते रहते हैं। अब लोग बातें करते रहते हैं। अंग्रेजी में कहावत है ‘बीती बातों पर व्यर्थ का वाद-विवाद’।
मनुष्य आज सबकुछ करने के लिए तैयार है। परंतु एक चीज़ में वह आगे नहीं बढ़ा है। वह चीज़, जिसके बारे में कबीर ने चर्चा की, जिसके बारे में तुलसीदास ने चर्चा की, जिसके बारे में गुरु नानक ने चर्चा की, वह सुख असली सुख है। संतों ने कहा कि सिर्फ सुखी वही है जो नाम के आधार पर है। और नहीं। और जिसको ‘सुख’ समझते हैं वह सुख, सुख नहीं है।
कहानी है कि एक बार कुछ लोगों ने यह जानने की कोशिश की कि आखिर इस संसार में अगर कोई सुखी है, तो वह कौन है ? पहले सोचा कि भिखारी के पास जायेंगे। भिखारी कोई टैक्स नहीं देता। उसका कोई दायित्व नहीं है, तो हो सकता है वह सुखी हो। भिखारी के पास गयी कमेटी। भिखारी से पूछा, ‘‘तुम सुखी हो ?’’
भिखारी ने कहा, ‘‘मैं कहां सुखी हूं ? मुझे तो हमेशा खाने की चिंता लगी रहती है। कहां सोऊंगा रात को, यह चिंता लगी रहती है। मैं तो सुखी नहीं हूं। सेठ से पूछो।’’
सेठ के पास गये। सेठ से पूछा, ‘‘भाई, क्या तुम सुखी हो ?’’

सेठ ने कहा, ‘‘मैं कहां सुखी हूं ? मैं दूकानदारी करता हूं, मुझे चिंता लगी रहती है कहीं मेरा सौदा, मेरा माल कम बिके, मेरे बगल में जो दुकान है उसका ज्यादा बिके। मैं कहां सुखी हूं ? अरे, सुखी होगा तो राजा होगा क्योंकि वह तो मुझसे भी अमीर है।’’
राजा के पास गये। राजा से पूछा, ‘‘राजा, तुम सुखी हो ?’’
राजा ने कहा, ‘‘मैं कहां सुखी हूं ? मैं कैसे सुखी हूं ? जो बादशाह है वह कभी भी मेरे ऊपर चढ़ाई कर सकता है। मेरा राजपाट छीन ले। या जो मेरा पड़ोसी राजा है वह मेरा राजपाट न छीन ले। मुझे चिंता रहती है तो मैं सुखी कहां हूं ? बादशाह के पास जाओ। हो सकता है, बादशाह सुखी हो।’’
बादशाह के पास गये, ‘‘क्या तुम सुखी हो ?’’
बादशाह ने कहा, ‘‘मैं कहां सुखी हूं ? मुझको तो हमेशा चिंता लगी रहती है कि मैं जिन-जिन राजाओं का सम्राट हूं, इनमें से कोई मेरे राज्य पर हमला न कर दे, तो मैं सुखी कहां हूं ? मुझे हमेशा चिंता लगी रहती है कि कहीं मुझे कोई मार न दे। मैं सुखी कहां हूं ? अगर कोई सुखी होगा, तो भगवान है ! और भगवान से जाकर पूछो।’’
भगवान से पूछा, ‘‘भगवान, अगर कोई सुखी है तो कौन सुखी है ? कौन है इस संसार में जो सुखी है ?’’ भगवान कहते हैं, ‘‘जो मेरा भक्त है, जो मेरा सुमिरण करता है, जो मेरा चिंतन करता है, वह सुखी है। और कोई सुखी नहीं है।’’ यह मैंने देखा है।

भगवान का चिंतन कैसे करना चाहिए ? कैसे होता है भगवान का चिंतन ? कोई कहता है, ‘‘नाम लो भगवा का।’’ अब संसार में तो भाई इतने सारे धर्म हैं। हर एक धर्म कहता है, ‘‘नहीं, हम जैसा कहते हैं, वैसा करो।’’ देखो, सब धर्म कहते हैं एक ही भगवान है, परंतु हर एक धर्म कहता है, ‘‘हमारा भगवान सही है। भगवान एक है, परंतु भगवान तक जाना है तो हमारे रास्ते से आकर चलो। दूसरा रास्ता कहीं नहीं जाता।’’ परंतु भगवान का चिंतन क्या है ? असली चिंतन क्या है ? जब कुछ था ही नहीं एक समय, तो भगवान का चिंतन कैसे होता था ? जब हृदय खोल कर वह चिंतन होता है तब जाकर सच्चे हृदय से पुकार होती है। जब हृदय से पुकारते हैं तो हृदय की आवाज उस खुदा तक, उस भगवान तक हमेशा पहुंचती है। यह मैंने अपने आप अनुभव किया है। कहा है-

सुख में सुमिरण ना किया, दुख में किया याद।
कहे कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद।।
जब सब ठीक रहता है तो कौन चिंतन करना चाहता है ? सब लोग चाहते हैं-कुर्सी। देखो, जितनी भी कंपनियां हैं, उनमें एक चेयरमैन होता है। जमादार से लेकर के मैनेजिंग डाइरेक्टर तक, प्रेसिडेंट और वाइस प्रेसिडेंट, सब लोग उस कुर्सी वाले की कुर्सी के पीछे पड़े रहते हैं। सब जानते हैं कि सबसे बढ़िया कार्य वह है। सबके सब चाहते हैं कि कोशिश करें कि वह कुर्सी मिले। अब चेयरमैन बन गये कंपनी के तो वाह-वाह हो जायेगी। पर क्या कोई चेयरमैन से जाकर भी पूछता है, ‘‘तेरी वाह-वाह हो गयी ?’’ अब चेयरमैन बेचारा क्या करता है कुर्सी के साथ ? उसको भी तो पकड़ के रखनी पड़ती है कुर्सी ! क्यों इतने लोग पीछे लगे हुए हैं कुर्सी छीनने के लिए, तो उसको भी तो बड़ा डर रहता है। क्योंकि कुर्सी पर बड़े लोग बैठेंगे तो जमे रहेंगे और दुबला-पतला बैठ जाय तो उसको कोई भी हटा देगा। यह बड़े-बड़े लोगों की बात बै। पर क्या वे भी सुखी हैं ? नहीं। तो भाई, हम यही कहने के लिए आये हैं और यही हम कहना चाहते हैं कि सचमुच में सुख है।
जो कुछ भी मैंने कहा लोगों के सामने, यह सब सिद्धांत हो सकता है। ठीक है, परंतु जो मैं कह रहा हूं, इसमें अंतर है। क्यों अंतर है ? क्योंकि मैं थ्यौरी की बात नहीं कर रहा हूं। मैं यह कहता हूं कि मेरे पास जिज्ञासु बनकर आओ। तर्क करने के लिए नहीं। तर्क करना है तो पेड़ से जाकर तर्क करो। पक्षी से जाकर तर्क करो। समुद्र के पास जाकर तर्क करो। मैं तर्क नहीं करना चाहता। ताली दो हाथ से बजती है एक हाथ से तो बजेगी नहीं। जिज्ञासु बनकर आओ। ताली दो के हाथ से बजती है एक हाथ से तो बजेगी नहीं। जिज्ञासु बनकर आओ और खूब सवाल पूछो। एक नहीं, लाख पूछो। तर्क नहीं करो, क्योंकि तर्क लड़ाई है।

लोग कहते थे, ‘‘जी, शास्त्रार्थ करेंगे।’’ तुमको अगर शास्त्र का अर्थ नहीं मालूम है तो पहले मालूम कर लो अर्थ, जो शास्त्र का मूल अर्थ है। पानी एक ऐसी चीज़ है कि पानी के लिए किसी को तर्क करने की जरूरत नहीं है। सिर्फ हाथ से इशारा करो तो सब समझ जायेंगे, क्योंकि सबने पानी पिया हुआ है।
लोग क्रोध करते हैं। किस पर क्रोध आ रहा है तुमको ? क्यों क्रोध करते हो ? क्यों लड़ाई करते हो ? क्यों झगड़ा करते हो ? भगवान ने दिमाग दिया है। अगर दो बंदर लड़ते हुए दिखाई दें तो समझ में आता है कि भाई, बंदर हैं, दिमाग छोटा है। परंतु जब दो ‘बड़े बंदर’ (मनुष्य) लड़ाई करते हुए दिखाई दें तो समझ में नहीं आता है, क्योंकि दिमाग बड़ा है। कम से कम दिमाग बड़ा है तो इसका मतलब सोचना तो चाहिए ! पर सोचते नहीं हैं, लोग, विचारते नहीं हैं लोग कि क्रोध करने की क्या जरूरत है ? मोह, लोभ ये सारे जो दुश्मन है ये सब तुम्हारे पीछे पड़े हुए हैं। एक-एक करके सब पीछे पड़े। अंदर से आदमी को खाते चले जाते हैं। परंतु भाई भगवान ने, बनाने वाले ने हृदय भी दिया है। बनाने वाले ने इन सब चीज़ों से परे शांति भी दी है ! यह समझो कि यह तो नदीं है और नदी ही क्या-काम, क्रोध, लोभ, मोह की यह मायावी नदी है, सभी इसमें डूबे हुए हैं। इस नदी में से जरा अपनी नाक बाहर तो निकालो ! श्वासन लो। असली श्वास लो और इस चीज़ का अनुभव करो कि तुमको बनाने वाले ने क्या सुंदर मौका दिया है।

लोग कहते हैं कि यह सब कुछ, यह दुख-दर्द सब भगवान के बनाए हुए हैं। भगवान ने दुख नहीं बनाए। अगर दुख बनाए हुए हैं तो मनुष्य के बनाए हुए हैं ! यह भगवान की करनी नहीं है। बनाने वाले ने तो दो हाथ दिये कि ‘‘कर, जो तू कर सकता है कर !’’ कर्म करने के लिए बुद्धि दी, पैर दिए, आँखें दीं। नाक दी कि सूंघ, क्या सूंघना चाहता है ! कान दिए कि सुन, क्या सुनना चाहता है ! और मनुष्य ने क्या किया ? सब कुछ होते हुए भी मनुष्य ने सब कुछ लुटा दिया। यही बात संत-महात्माओं ने बहुत साल पहले कही, जय ये तरह-तरह के सिस्टम नहीं थे। वह बात सदियों पुरानी तब भी सच थी और आज भी सच है। मैं अपने अनुभव से कहता हूं कि अगर चार लाख साल भी यह पृथ्वी रहे तो वे बातें तब भी सच रहेंगी। क्योंकि वह चीज़ सत्य है। हृदय सत्य है।
सोचो, विचारो। यह जीवन तुमको बनाने वाले ने दिया है। बड़े भाग्य से दिया है। मुझे नहीं मालूम कि तुमने क्या किया पिछले जन्म में कि तुमको आज इस जन्म में यह शरीर मिला। नहीं तो वही कर्म एक बार और कर लो, एक बार और मिल जायेगा। परंतु किसको याद है, क्या किया ? इसलिए आज मिला है, अब मिला हुआ है। तो इसको बेकार मत करो। क्योंकि और सारे कर्म तो पशु-पक्षी करते हैं। मनुष्य में और पशुओं में क्या अंतर है ? यही कि मनुष्य को बुद्धिजीवी कहा जाता है। अतः इस बुद्धि का इस्तेमाल करो। सोचो, विचारो और समुचित प्रयास करो, तुम उस परमानंद सुख का अनुभव कर सकते हो।

एक मजेदार घटना है। एक दिन जब मैं आ रहा था तो मैंने देखा एक बैंक-‘देना बैंक’। बैंक देता है या हमको देना पड़ता है ? क्योंकि लिखा तो है ‘देना बैंक’। ‘लेना बैंक’ तो है नहीं ! जाओ देना बैंक के पास और कहो कि-‘‘हमें दो और अगले जन्म में वापस दे देंगे।’’ बैंक वाले थोड़े ही देंगे ? कहेंगे, ‘‘बेवकूफ है।’’ बाहर निकाल देंगे। बाहर फिकवा देंगे। तो भी किसलिए बेवकूफ बनते हो ? अगला जन्म मिले या न मिले, यह तो मिला हुआ है ! इसको क्यों खराब करते हगो ? इसको किसलिए बेकार करते हो ? सचमुच में, इस जिंदगी के अंदर सारी चीज़ों के बावजूद भी आदमी को यह सच्चा सुख प्राप्त हो सकता है। चाहे कुछ भी हो रहा हो इस संसार के अंदर, फिर भी सच्चा सुख प्राप्त हो सकता है।
आज के लोग कहते हैं कि इतने लोग भूखे क्यों मरते हैं ? आज लोग कहते हैं कि ‘‘ऐसा क्यों होता है, ऐसा क्यों होता है ?’’ देखो, यह तो गड़बड़ कहीं और है। यह सब गड़बड़ के लक्षण हैं, सिम्पटम्स हैं। परंतु आदमी अपने आपको भूल गया। सुकरात ने कितने सौ साल पहले कहा-‘‘अपने आपको जानो !’’ परंतु सचमुच में मनुष्य अपने आपको ही भूल गया। जब अपने आपको ही भूल गया तो और किसकी परवाह करेगा ? किसी और आदमी की क्या परवाह करेगा ? किसी और चीज़ की क्या परवाह करेगा ? सचमुच में आज यहां भी देखो लोग किसी चीज़ की परवाह नहीं करते हैं, क्योंकि अपनी परवाह करना ही भूल गये हैं। भूल गए कि यह कितना कीमती जीवन है। भूल गए कि कितने भाग्य से हमको यह सब कुछ मिला है।


अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book