प्रेमचंद की कहानियों पर आधारित नाटक - गिरिराजशरण अग्रवाल Premchand Ki Kahaniyon Par Aadharit Natak - Hindi book by - Girirajsharan Agarwal
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प्रेमचंद की कहानियों पर आधारित नाटक

गिरिराजशरण अग्रवाल

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :158
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5300
आईएसबीएन :81-288-1552-0

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प्रेमचंद की कहानियों पर आधारित नाटक...

Premchand KI kahaniyon Par Aadharit Natak

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रेमचंद एक ऐसे कालजयी कथाकार हैं, जिन्होंने अनेक अमर कहानियों की रचना की, ऐसी कहानियाँ जो जनमानस को आंदोलित करती हैं, समाज की वास्तविकता का दिग्दर्शन कराती हैं, युवा पीढ़ी को प्रेरणा प्रदान करती हैं तथा बच्चों को जागृति का संदेश देती हैं।
प्रेमचंद की इन कहानियों में नाटकीयता के विशिष्ट गुण विद्यमान हैं। इस नाटकीयता को मंच तक लाने के प्रयास में इनका नाट्य रूपांतर किया गया है। निश्चय ही यह रूपांतर आपको पसंद आएगा और आपके मन को प्रेमचंद के अधिक निकट लाएगा।

तो प्रस्तुत हैं आपके लिए—प्रेमचंद की कहानियों पर आधारित नाटक।

एक
जुलूस

पात्र-परिचय
शंभूनाथ : दुकानदार
मैकू : पटरी पर बैठनेवाला दुकानदार
दीनदयाल : दुकानदार
बीरबल सिंह : पुलिस इंस्पैक्टर
इब्राहीम अली : सुराजियों का नेता
मिट्ठन बाई : पुलिस इंस्पैक्टर की पत्नी
एक युवती : जुलूस में सम्मिलित युवती
दूसरी युवती : जुलूस में सम्मिलित युवती
तीसरी युवती : जुलूस में सम्मिलित युवती
सुराजी-1 : जुलूस में सम्मिलित आंदोलनकारी
सुराजी-2 : जुलूस में सम्मिलित आंदोलनकारी
सुराजी-3 : जुलूस में सम्मलित आंदोलनकारी
कैलाश : आंदोलनकारी
एक बुढ़िया :
सिपाही :


दृश्य : एक


(पूर्ण स्वराज्य का जुलूस निकल रहा है। युवक, बूढ़े और बालक झंडे लिए हुए वंदे मातरम् गाते हुए माल रोड के सामने से निकल रहे हैं। दोनों तरफ़ दर्शकों का समूह खड़ा हुआ है। उन्हें इस जत्थे से कोई सरोकार नहीं है, मानो यह कोई तमाशा है और उनका काम केवल खड़े-खड़े देखना है। जत्था नारे लगा रहा है)
वंदे मातरम्।
भारत माता की जय।
(नारे गूँजते रहते हैं। सड़क पर खड़े होकर कुछ दुकानदार बातें कर रहे हैं।)
शंभूनाथ : (दुकानदार की पटरी पर खड़े होकर अपने पड़ोसी दीनदयाल से) सब-के-सब काल के मुँह में जा रहे हैं। आगे सवारों का दल खड़ा है। वह सबको मार-मारकर भगा देगा।
दीनदयाल : महात्माजी भी सठिया गए हैं। जुलूस निकालने से स्वराज्य मिल जाता, तो अब तक कब का मिल गया होता ! और जुलूस में हैं कौन लोग ? देखो, आवारा लड़के, सिर-फिरे। शहर का कोई बड़ा आदमी नहीं। (मैकू बाज़ार में चट्टियाँ और स्लीपर बेच रहा था। चट्टियों और स्लीपरों की माला उसकी गरदन में लटकी हुई है। वह इन दोनों सेठों की बातें सुनकर हँस पड़ता है।)

शंभू : क्यों हँसे मैकू ? आज रंग चोखा मालूम होता है।
मैकू : मैं इस बात पर हँसा, जो तुमने कही कि कोई बड़ा आदमी जुलूस में नहीं है। बड़े आदमी क्यों जुलूस में आने लगे ? इन्हें इस राज में कौन आराम नहीं है ? बँगलों और महलों में रहते हैं, मोटरों पर घूमते हैं, साहबों के साथ दावतें खाते हैं, कौन तकलीफ़ है ? मर तो हम लोग रहे हैं, जिन्हें रोटियों का ठिकाना नहीं। इस बखत कोई टेनिस खेलता होगा, कोई चाय पीता होगा, कोई ग्रामोफ़ोन लिए गाना सुनता होगा, कोई पारिक की सैर करता होगा, यहाँ क्यों आएँ पुलिस के कोड़े खाने के लिए ? तुमने भली कही !
शंभू : तुम ये बातें क्यों समझोगे मैकू ! जिस काम में चार बड़े आदमी अगुआ होते हैं, उसकी सरकार पर भी धाक बैठ जाती है। आवारा लड़कों की निगाह में क्या जँचेगी ?

मैकू : बड़े आदमी को हमीं लोग बनाते-बिगाड़ते हैं, या कोई और ? कितने ही लोग जिन्हें कोई पूछता भी न था, हमने ही बनाए। बड़े आदमी बन गए और अब मोटरों पर निकलते हैं और हमें नीच समझते हैं। यह लोगों की तकदीर की ख़ूबी है कि जिसकी ज़रा बढ़ती हुई और उसने हमसे आँखें फेरीं। हमारा बड़ा आदमी तो वही है, जो लँगोटी बाँधे नंगे पाँव घूमता है, जो हमारी दशा को सुधारने के लिए अपनी जान हथेली पर लिए फिरता है। और हमें किसी बड़े आदमी की परवाह नहीं है। सच पूछो तो इन बड़े आदमियों ने ही हमारी मिट्टी ख़राब कर रखी है। इन्हें सरकार ने कोई अच्छी-सी जगह दे दी, बस उसका दम भरने लगे।

दीनदयाल : नया दारोगा बड़ा जल्लाद है। चौरस्ते पर पहुँचते ही हंटर लेकर पिल पड़े़गा। फिर देखना, सब कैसे दुम दबाकर भागते हैं। मज़ा आएगा !
(जुलूस स्वाधीनता के नशे में चूर चौराहे पर पहुँचता है। आगे सवारों और सिपाहियों का एक दस्ता रास्ता रोके खड़ा है। सहसा दारोगा बीरबल सिंह बढ़कर जुलूस के सामने आ जाते हैं।)1
बीरबल सिंह : तुम लोगों को आगे का हुक्म नहीं है।
इब्राहीम अली : (आगे बढ़कर) मैं आपको इत्मीनान दिलाता हूँ, किसी किस्म का दंगा-फ़साद न होगा। हम दुकान लूटने या मोटरें तोड़ने नहीं निकले हैं। हमारा मकसद इससे कहीं ऊँचा है।
बीरबल सिंह : मुझे यह हुक्म है कि जुलूस यहाँ से आगे न जाने पाए।
इब्राहीम अली : आप अपने अफ़सरों से ज़रा पूछ न लें !
बीरबल सिंह : मैं इसकी कोई ज़रूरत नहीं समझता।

अब्राहीम अली : तो हम लोग यहीं बैठते हैं। जब आप लोग चले जाएँगे तो हम निकल जाएँगे।
बीरबल सिंह : यहाँ खड़े होने का भी हुक्म नहीं है। तुमको वापस जाना पड़े़गा।
इब्राहीम अली : (गंभीर भाव से) वापस तो हम न जाएँगे। आपको या किसी को भी हमें रोकने का कोई हक़ नहीं है। आप अपने सवारों, संगीनों और बंदूक़ों के ज़ोर से हमें रोकना चाहते हैं, रोक लीजिए। मगर आप हमें लौटा नहीं सकते।
बीरबल सिंह : (लगभग चीख़ता हुआ) सामने से हट जाओ इब्राहीम अली अच्छा न होगा।
इब्राहीम अली : न जाने वह दिन कब आएगा, जब हम, हमारे भाईबंद ऐसे हुक्मों की तामील करने से साफ़ इंकार कर देंगे, जिनकी मंशा महज कौम को गुलामी की जंजीरों में जकड़े रखना है।

बीरबल सिंह : इब्राहीम साहब, डी.एस.पी. इधर ही आ रहे हैं। उनके आने से पहले आप यहाँ से हट जाएँ।
(जुलूस में आए सभी लोग एक स्वर में वंदे मातरम् बोलते हैं।)
कुछ लोग : हम नहीं जाएँगे ! हम नहीं जाएँगे !
बीरबल सिंह : तो फिर मुझे शक्ति का प्रयोग करना होगा। बेकार में ख़ून बहेगा। हो सकता है कि कुछ और भी नुकसान हो जाए।
कुछ लोग : कुछ भी हो जाए, हम लोग नहीं हटेंगे।

(तभी बीरबल सिंह डी.एस.पी. को घोड़े पर आते देखता है। वह कमर से बेटन निकाल लेता है और घोड़े को एड़ लगा कर जुलूस पर चढ़ाने लगता है। उस देखते ही सवार भी घोड़ों को जुलूस पर चढ़ाना शुरू कर देते हैं। इब्राहीम अली दारोगा के ठीक सामने खड़े हुए हैं। उनके सिर पर ज़ोर से बेटन पड़ता है। उनकी आँखों के सामने अँधेरा छा जाता है। सिर पकड़कर बैठ जाते हैं। उसी वक़्त दारोगा जी का घोड़ा दोनों पाँव उठाता है और ज़मीन पर बैठे हुए इब्राहीम उसकी टापों के नीचे आ जाते हैं। इब्राहीम को गिरते देखकर कई आदमी उन्हें उठाने के लिए दौड़ते हैं।)
कुछ लोग : देखो, देखो। इब्राहिम साहब को चोट लगी है।
(कुछ लोग इधर-उधर भागते हैं)

सुराजी-1 : शहर के लाखों आदमियों की निगाहें हमारी तरफ़ लगी हुई हैं। यहाँ से डंडा खाकर हम लोग लौट गये, तो फिर किस मुँह से आज़दी का नाम लेंगे !
सुराजी-2 : हमें अपने प्राणों की चिन्ता नहीं है। यह पेट के भक्तों, किराए के ट्टुओं का दल नहीं है।
सुराजी-3 : (सिपाहियों को सम्बोधित करते हुए) ओ सिद्धांतहीन लोगों ! पीटो, तुम कितना पीट सकते हो। हम चाहें तो एक हल्ले में सवारों की पंक्तियों को चीर सकते हैं, मगर हमारे पैरों में सिद्धांत की, धर्म की, आदर्श की बेड़ियाँ पड़ी हुई हैं।
(दस बारह मिनट तक यों ही डंडों की बौछार होती रहती है किंतु लोग शाँत खड़े रहते हैं। देशभक्ति की धुन बजती रहती है)


दृश्य : दो



(मार-धाड़ की ख़बर एक क्षण में बाज़ार में जा पहुँचती है। भिन्न-भिन्न स्वर सुनाई देते हैं...इब्राहीम घोड़े से कुचले गए...कई आदमी जख़्मी हो गए...कई के हाथ टूट गए...मगर न वे लोग पीछे फिरते और न पुलिस उन्हें आगे जाने देती है।)
मैकू : (उत्तेजित होकर) अब तो रुका नहीं जाता। चलो, हम भी चलते हैं, देखा जाएगा, जो भी होगा।
शंभूनाथ : (एक मिनट तक मौन खड़ा रहता है। एकाएक वह भी अपनी दुकान बढ़ाता है) मैकू, मैं भी चलता हूँ। एक दिन तो मरना ही है, जो कुछ होना है, हो। आख़ि़र वे लोग सभी के लिए तो जान दे रहे हैं।
दीनदयाल : पुलिस के अत्याचार के विरोध में सारा बाजार बंद हो रहा है। मैं अपनी दुकान कैसे खुली रख सकता हूँ। चलो, मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ।

(देखते-देखते अधिकांश दुकानें बंद हो जाती हैं। वे लोग, जो दस मिनट पहले तमाशा देख रहे थे, इधर-उधर से दौड़ पड़ते हैं और हज़ारों आदमियों का विराट दल घटना-स्थल की ओर चल पड़ता है। नैपथ्य से अनेक प्रकार के स्वर सुनाई दे रहे हैं।)
एक स्वर : मारो, मारो !
दूसरा स्वर : इन सिपाहियों ने हमारे सुराजियों को पीटा है।
तीसरा स्वर : इन सिपाहियों को मारो !
चौथा स्वर : ये कैसे भारतीय हैं, जो अपने ही भाइयों को पीट रहे हैं !

(तभी आजादी के गीत का समवेत स्वर सुनाई देता है)
(भीड़ बढ़ती जा रही है। क्रोधित जनसमुदाय का कोलाहल बढ़ता जा रहा है। बीरबल सिंह के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। जीप के स्टार्ट होने का स्वर सुनाई देता है।)
बीरबल सिंह : डी.एस.पी. तो अपनी कार में बैठकर जा रहे हैं। अब मैं क्या करूँ ? शांति और अहिंसा के व्रतधारियों पर डंडे बरसाना और बात थी, एक उन्मत भीड़ से मुकाबला करना दूसरी बात। (सिपाहियों को आदेश देता हुआ) सिपाहियो ! पीछे हट जाओ।
(घोड़ों की टापों का स्वर सुनाई देता है)
इब्राहीम अली : (एक युवक को इशारे से बुलाकर, कराहते हुए) क्यों ये आवाज़ें कैसी हैं ? क्या कुछ लोग शहर से आ रहे हैं ?
कैलाश : (उस बढ़ती हुई भीड़ को देखकर) जी हाँ, हज़ारों आदमी हैं।
इब्राहीम अली : तो अब ख़ैरियत नहीं है। झंडा लौटा दो। हमें फौरन लौट चलना चाहिए, नहीं तो तूफ़ान मच जाएगा। हमें अपने भाइयों से लड़ाई नहीं करनी है। फौरन लौट चलो।

(इब्राहीम यह कहते हुए उठने की चेष्ठा करते हैं, मगर उठ नहीं पाते हैं)
कैलाश : आप यूँ ही लेटे रहिए। आप जैसा कहेंगे, वैसा ही होगा। (साथियों को संबोधित करता हुआ) आप लोग इब्राहीम चाचा के लिए स्ट्रेचर तैयार कीजिए।
इब्राहीम अली : (अपने साथियों की ओर देखते हुए) हम जानते थे, हमारा संघर्ष अपने ही भाइयों से है। ऐसे भाइयों से, जिनके हित परिस्थितियों के कारण हमारे हितों से भिन्न हैं। हमें उनसे बैर नहीं करना है। हम यह भी नहीं चाहते कि शहर में लूट और दंगे का बाजार गर्म हो जाए। हमारा धर्म लूटी हुई दुकानें और टूटे हुए सिर नहीं हैं। हमारी विजय का सबसे उज्जवल चिह्न यह है कि हमने जनता की सहानुभूति प्राप्त कर ली है। वही लोग जो पहले हम पर हँसते थे, हमारा धैर्य और साहस देखकर हमारी सहायता के लिए निकल पड़े हैं। जनता की मनोवृत्ति का यह परिवर्तन ही हमारी विजय है। हमें किसी से लड़ाई करने की ज़रूरत नहीं। हमारा उद्देश्य केवल जनता की सहानुभूति प्राप्त करना है, उनकी मनोवृत्तियों को बदल देना है। जिस दिन हम इस लक्ष्य पर पहुँच जाएँगे, उसी दिन स्वराज्य के सूर्य का उदय होगा। वंदे मातरम्।
जनता : (पूरे जोश से) वंदे मातरम् भारत माता की जय।

दृश्य : तीन



(तीन दिन बीत गए हैं। बीरबल सिंह अपने कमरे में बैठे हुए हैं। उनकी पत्नी मिट्ठन बाई पुत्र को गोद में लिए सामने खड़ी है।)
मिट्ठन बाई : (व्यंग्य के साथ) अब तो पूरे पुलिस महकमे पर आपकी धाक जम गई होगी।
बीरबल सिंह : मैं क्या करता उस वक़्त। पीछे डी.एस.पी. खड़ा था। अगर जुलूस को रास्ता दे देता, तो अपनी जान मुसीबत में फँसती।
मिट्ठन बाई : (सिर हिलाकर) तुम कम-से-कम इतना तो कर ही सकते थे कि उन पर डंडे न चलाने देते। तुम्हारा काम आदमियों पर डंडे चलाना है ? कल को यदि तुम्हें अपराधियों को बेंत लगाने का काम दिया जाए, तब तो तुम्हें बड़ा आनन्द आएगा। क्यों ?
बीरबल सिंह : (खिसियाकर) तुम बात को समझती नहीं हो।
मिट्ठन बाई : मैं तुम्हारी बातें अच्छी तरह समझती हूँ। डी.एस.पी. पीछे खड़ा था। तुमने सोचा होगा कि ऐसी कारगुज़ारी दिखाने का अवसर फिर कभी मिले या न मिले। क्या तुम्हारी समझ में उस दल में कोई भला आदमी न था ? उसमें कितने आदमी ऐसे थे, जो तुम्हारे जैसे लोगों को नौकर रख सकते हैं ? विद्या में अधिकांश तुमसे बढ़े हुए होंगे। मगर तुम उन पर डंडे चला रहे थे और उन्हें घोड़ों से कुचल रहे थे, वाह री जवाँमर्दी !

बीरबल सिंह : (बेहयाई की हँसी हँसते हुए) जानती हो मिट्ठन, डी.एस.पी. ने मेरा नाम नोट कर लिया है।
मिट्ठन बाई : (मुख पर हर्ष की कोई रेखा नज़र नहीं आती है) ज़रूर कर लिया होगा और शायद तुम्हें जल्दी तरक्की भी मिल जाए। मगर बेगुनाहों के ख़ून से हाथ रँगकर तरक्की पाई, तो क्या पाई। यह तुम्हारी कारगुज़ारी का इनाम नहीं, तुम्हारे देशद्रोह की कीमत है।

बीरबल सिंह : मैं समझता था कि तुम इस समाचार से ख़ुश हो जाओगी।
मिट्ठन बाई : तुमने ग़लत समझा। मैं तो उस दिन खुशी मनाऊँगी, जिस दिन तुम किसी ख़ूनी को खोज निकालोगे, किसी डूबते हुए आदमी को बचा लोगे।
(एकाएक एक सिपाही का प्रवेश)
सिपाही : (बरामदे में खड़े होकर) हुजूर, यह लिफ़ाफा लाया हूँ। (बीरबल सिंह बाहर निकलकर लिफ़ाफा ले लेता है। भीतर आकर सरकारी चिट्ठी पढ़ने लगता है। पढ़कर उसे मेज़ पर रख देता है।)
मिट्ठन बाई : (व्यंग्य से) क्या तरक्की का परवाना आ गया ?
बीरबल सिंह : (झेंपते हुए) क्यों मेरी हँसी उड़ा रही हो ! आज फिर कोई जुलूस निकलने वाला है। मुझे उसके साथ रहने का हुक्म हुआ है।
मिट्ठन बाई : फिर तो तुम्हारी चाँदी है, तैयार हो जाओ। आज फिर वैसे ही शिकार मिलेंगे। ख़ूब बढ़-चढ़कर हाथ दिखाना। डी.एस.पी. भी ज़रूर आएँगे। अब की तुम इंसपैक्टर हो जाओगे। सच।




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