दूसरा बच्चा - चन्द्रकिरण सौनरेक्सा Doosra Bachcha - Hindi book by - Chandrakiran Saunrexa
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दूसरा बच्चा

चन्द्रकिरण सौनरेक्सा

प्रकाशक : इतिहास शोध-संस्थान प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :174
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5310
आईएसबीएन :81-8071-064-5

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महादेवी ने जो प्रसिद्धि कविता क्षेत्र में प्राप्त की है, चन्द्रकिरण ने वही कहानी के क्षेत्र में पाई। मध्यम वर्ग की नारी का जितना यथार्थ चित्रण आपकी कहानियों में हुआ है उतना कदाचित ही किसी कथाकार की कृतियों में हुआ हो।

Dusara Bachha - A Hindi Book by Hindi author Chandrakiran Saunrexa

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘‘तीव्रता की दृष्टि से चन्द्रकिरण सौनरेक्सा सबसे अधिक उल्लेखनीय है।...मध्यवर्गीय जीवन में पाखण्डों और स्वार्थ पर, आकांक्षाओं पर, चन्द्रकिरण इतनी गहरी चोट करती हैं कि पाठक तिलमिला उठे...।’’

अज्ञेय

‘‘महादेवी ने जो प्रसिद्धि कविता क्षेत्र में प्राप्त की है, चन्द्रकिरण ने वही कहानी के क्षेत्र में पाई। मध्यम वर्ग की नारी का जितना यथार्थ चित्रण आपकी कहानियों में हुआ है उतना कदाचित ही किसी कथाकार की कृतियों में हुआ हो।

विष्णु प्रभाकर

‘‘निम्न मध्यवर्ग के घरों के अन्दर का, विशेषकर स्त्रियों का इतना स्वाभाविक और पैना चित्र अन्यत्र दुर्लभ है। नारी की स्वभावगत तुच्छता एवं क्षुद्रता का भी, उनका अध्ययन बहुत व्यापक है। आज के कहानीकारों में, मैं उनका स्थान बहुत ऊंचा मानता हूँ।

श्रीपत राय

‘‘सजीव पात्रों की सृष्टि करने में वे शरतचन्द्र के समकक्ष ठहरती हैं, तो सरल एवं प्रभावपूर्ण भाषा-शैली में मुंशी प्रेमचन्द से टक्कर लेती प्रतीत होती हैं।

डॉ. उर्मिला गुप्ता

खटराग


घर में कुल दो प्राणी थे- विमल और उसकी अम्मा। विमल के बाबू जी की मृत्यु के पश्चात् उसकी अम्मा ने ही न जाने कैसे-कैसे उसे एम.ए. कराया। पिछले तीन वर्षों से तो उन्होंने अपने अकेले दम पर ही विमल को कॉलेज का छात्र बनाए रखा, अन्यथा उसके चाचा ने जब कह दिया था कि भाई साहब का दूकान में कोई हिस्सा नहीं बचा, सब कुछ हमारा ही है तभी-थर्डईयर से ही वह तो पढ़ाई छोड़ने का विचार कर बैठा था। किन्तु माँ ने लड़के का मन देखकर पढ़ाई छोड़ने न दी। जैसे-तैसे तीन वर्ष कट गए। विमल एम.ए. हो गया....किन्तु कॉलेज के उस अलमस्त हँसते-खेलते जीवन से बाहर आकर जब वह वास्तविकता के कठोर वातावरण में खड़ा हुआ तो उसे लगा मानो काश्मीर की स्वर्गभूमि से निकलकर सहारा के रेगिस्तान में आ गया हो; जहाँ दिन-रात पेट की समस्या के हाईफून चल रहे थे। क्लर्क की सर्विस आज मोती के मोल हो रही थी। एम.ए., बी.ए. जूतियाँ चटखाते फिरते थे। ऐसी परिस्थिति में वह घबरा सा गया था; घबराने की बात भी थी। सर्विस के अतिरिक्त वह और कर भी क्या सकता था। दूकान तो अब उसके बस की थी नहीं-न सेल की तमीज, न व्यापार का अनुभव। उस पर एम.ए. की दुम लगाकर वह पोस्ट ग्रेजुएट बन गया था, उसकी लाज भी तो खाए जाती थी। भला दूकान वह कैसे करता।

पर था वह भाग्य का धनी ही, उसके बाबूजी के एक मित्र सी.आई.आर.ऑफिस में हैडक्लर्क थे। उन्होंने इसे इस संकट-सागर से उबार लिया। उनकी कृपा से उनके ही ऑफिस में, कॉलेज में पचास रुपए मासिक खरचने वाले विमल को पैंतालीस रुपए की क्लर्की मिल गई। यह पोस्ट जिस दिन उसे मिली, मारे प्रसन्नता के उसके कोट के दो बटन टूट गये थे। टूटते भी क्यों न, उस देव-दुर्लभ वेकेंसी के डेढ़-सौ बी.ए.-एम.ए. और डबल एम.ए. उम्मीदवारों में से बाबू की सिफारिश करने पर बड़े साहब ने उसका नाम छाँट लिया था। यदि कुछ समय के लिए वह अपने को पैसठवाँ इन्द्र समझ बैठा हो तो आश्चर्य ही क्या। अस्तु, वह नौकर हो गया। संसार सागर से पार होने के लिए उसे पतवार मिल गई। माँ की आशाएँ....आकाँक्षाएँ और स्वयं विमल की सारी भावुक कल्पनाओं की चरम परिणति हुई, उस पैंतालीस रुपए की क्लर्की में। किन्तु विमल पेट की चिन्ता से मुक्त होकर भी सुखी नहीं हुआ। पेट भर जाने पर भी उसके हृदय और मस्तिष्क भूखे ही रहते थे। उन्हें उसके उस जीवन में मोटा दाल-भात भी नहीं मिल पाता था। सवेरे नौ बजे से लेकर सन्ध्या के पाँच बजे तक, नवीनता, रहित नीरस ड्राफ्ट लिखते और टाइप करते-करते उसकी देह और मन सभी कुछ त्रस्त और क्लान्त हो उठते थे। उसके बाद छुट्टी होने पर जब वह घर आता तो एक गिलास जल के साथ जरा-सी दालमोट या सेब इत्यादि गले से नीचे उतार लेने पर फिर उसमें यह दम नहीं रहता था कि संगीत और साहित्य जिनकी सुगन्ध अभी तक उसकी नाक-आँख से निकलती रहती थी-की चाशनी में अपने जलते मस्तिष्क को डुबोकर शान्त कर सके। उस समय तो इच्छा होती थी पलंग पर पड़े-पड़े आधी आँखें मूँदकर, किसी के मधुर स्वर में सोहनी या श्याम कल्याण का मीठा-मीठा राग सुने। रात का भोजन के बाद भी दिन भर की क्लान्ति से भरे हुए मन को लेकर किसी सभा-सोसायटी में जाने की इच्छा नहीं होती थी। जी करता था कि यहीं छत पर-चाँदनी रात में...दस पाँच साहित्यिक कीट जमा होकर गल्प गोष्ठी करें... विश्व की वर्तमान राजनीति से लेकर पाषाण युग तक का विश्लेषण कर डालें...शेक्सपियर और बायरन, भारवि और कालिदास से लेकर शरत और रवीन्द्र सभी की काव्य सरिता में नहाकर विभोर हो जाएँ, तो कितना अच्छा हो। पर किसे इतना अवकाश था जो प्रतिदिन आकर विमल की यह इच्छा पूरी करता...बहुत मन ऊबने पर कभी-कभी वह आर्यकुमार सभा में चला जाता था। इससे अधिक की न तो उसकी शक्ति ही थी और न समय ही...सवेरे जाने कैसे वह समीप के डॉक्टर बनर्जी की दूकान पर जाकर हिन्दुस्तान टाइम्स पर एक उड़ती दृष्टि डाल देता था, अवश्य ही इस कोल्हू के बैल क्लर्क जीवन में उसे इतनी ही सरसता मिल पाई थी।

नौकरी करते तीन महीने बीत गए। अब केवल एक कसर रह गई थी-वह थी विमल का विवाह-वरों के इस महँगे बाजार में विमल अब तक बिना ब्याहा कैसे रह गया, यही आश्चर्य था। अन्यथा कॉलेज में पढ़ता हुआ लड़का जिसे माथा ढकने के लिए अपने घर की झोंपड़ी भी मौजूद हो,..तेईस बरस तक कुँवारा रह जाए और उसकी अम्मा चालीस से दो साल ऊपर हो जाने पर भी बहू का मुख देखने को उतावली नहीं हो गई, यही क्या कुछ कम था। पर बात असल यह थी-विमल के बाबू जी पढ़ाई के दिनों में लड़कों का विवाह करने के एकदम विरुद्ध थे। उनका कहना था-‘‘पढ़ाई के दिनों में बच्चों का विवाह करना उनके जीवन को मिट्टी में मिला देने के बराबर है। बहू का चन्द्रमुख देखकर भी, जो लड़के अच्छे नम्बरों से पास होते रहे उन्हें मैं भीष्म का गुरु मानने को तैयार हूँ। अपने विमल का विवाह तो मैं तब तक नहीं करूँगा जब तक वह अपने पैरों पर खड़ा होकर चार पैसे कमाने योग्य न हो जाए।’’

अपने इस दृढ़ सकल्प के बल पर ही उन्होंने कितने ही अच्छे घरों और दहेजों का मोह संवरण कर लिया था, नहीं तो विमल के सोलहवें वर्ष से ही उसे देखने और रोकने और टीका करने के लिए लड़कीवालों की फौज हर तीसरे दिन धावा बोले रहती थी। पति की इसी बात को गाँठ बाँधकर विमल की अम्मा ने भी विमल के एम.ए. करने से पहले विवाह के लिए अधिक जोर नहीं दिया। एक-दो बार ही कहकर रह गई किन्तु अब जबकि उनका सपूत लायक हो गया था तो भला वे इस शुभ कार्य में विलम्ब कैसे करतीं। उनकी बहू मुखदर्शन की अभिलाषा एकदम बाँध तोड़कर बह चली। विमल के नौकर होने के तीसरे ही दिन से वे एक सुघड़ बहू की खोज में दत्तचित्त हो गई। खोज भी क्या करनी थी लड़कियाँ सैकड़ों और एक से एक बढ़िया। पर वे चाहती थीं ऐसी लड़की जो इस बिगड़े जमाने की लड़कियों जैसे छलछन्दी न हो ! कॉलेज स्कूल की पढ़ी लड़कियों की भाँति हाथ भर की सीना निकालकर...आधा सिर खोलकर सड़क पर नि:संकोच भाव से चलने वाली या रात के समय सास के पैर दबाने के स्थान, पर लैम्प तेज करके उपन्यास पढ़नेवाली न हो। दिन में उनके पके बाल उखाड़ने या पैर में सुरसुरी देनी छोड़कर सखी-सहेलियों से गप्पे लगाने वाली या उनके कुछ कहने पर हिन्दी की चिन्दी निकालकर प्रत्युत्तर देनेवाली न हो-दो महीने में उनका परिश्रम ठिकाने लगा। बलिया के मित्तल बाबू की पन्द्रह वर्षीया बालिका सरस्वती को उन्होंने विमल के लिए पसन्द किया। सब ठीक-ठीक हो जाने पर उन्होंने एक दिन सन्ध्या को विमल के ऑफिस से वापिस आने पर उसे सुनाकर कहा-‘‘लै भैया, इतने दिनों में मेरी मेहनत ठिकाने लगी, अब कहीं जाकर लड़की पसन्द आई...’’ विमल बोला नहीं, जूते के फीते खोलता रहा। माँ ने उसे कुछ हूँ हाँ न करते देखकर निकट आकर पूछा-‘‘कैसी तबीयत है लल्ला !’’ ‘‘अच्छी है ! विमल ने सूखी हँसी हँसकर उत्तर दिया-‘‘तुम को जरा सा चुप देखा और बेचैन हुई।’’-‘‘ ले बेचैन होने की एक ही कही।’’ भला ब्याह की बात सुनकर भी तू चुपका-चुपका सूखा-सा मुँह बनाए रहा, तो बेचैन न होती, आजकल तो लड़कों की कौन कहे, लड़कियों के मुख पर ही ब्याह का नाम सुनते ही लाली दौड़ जाती है। विमल सुनता रहा, अम्मा तब भी हँसती-हँसती कह रही थी, परसों जरा जल्दी चला आइयो,, साहब से कहकर दो छुट्टी ले लीजियो, समझा। वे लोग टीका करने आवेंगे न उस दिन।’’ ‘‘कौन लोग ?’’ इस बार विमल को भी रसिकता सूझी कौन आवेंगे; अम्मा ? अरे, वही तेरे ससुर और कौन ? अम्मा ने आँख मुख होंठ, सभी से एक साथ मुस्कराकर उत्तर दिया। विमल फिर चुप हो गया, हँसी उससे आगे निबाही न गई। ब्याह करने की उसकी इच्छा न हो ऐसी बात तो नहीं है। किन्तु उसके मन की पटरी पर माँ के हृदय के मेल दौड़ता ही न था। अम्मा बहू में जिन गुणों को खोजती थी, उन में से एक के प्रति भी उसका आग्रह नहीं था। पर वह कैसे समझावे अपनी उस पगली अम्मा को, जो बीसवीं सदी के लगभग मध्य में रहकर भी, अभी उन्नीसवीं सदी के भाव राज्य में विचर रही थीं-‘‘अम्मा ! मुझे तुम्हारी वह गुड़िया सी बहू नहीं चाहिए, जो मेरे और आपके इशारों पर नाचकर केवल एक चतुर दासी का काम पूरा कर सकती हो।’’ उसे तो वह बहू चाहिए जो उसके कन्धे से कन्धा मिलाकर, अर्थोपार्जन न कर सकने पर भी कम से कम उसकी भावनाओं-उसके सरस हृदय की शिक्षित कल्पनाओं में से थोड़ा बहुत रस तो ग्रहण कर सकती हो। पर वह यह सब कहे किस से और कहने पर भी मानेगा कौन ? थोड़ी देर चुप रहकर उसने धीरे से पूछा :‘‘अम्मा ! वह पढ़ी हुई भी है ?’’ लो, सुनो लड़के की बात।’’ माँ-पुत्र की इस निर्मूल शंका पर हँसते-हँसते बोल पड़ी-‘‘मैं क्या कोई पागल हूँ, जो अपने इतने पढ़े-लड़के के गले से बिन पढ़ी बहू बाँध देती। तेरे जैसे कॉलेज की पढ़ी तो वह है नहीं, पर पाठशाला में वह पूरी पाँच कक्षाएँ पास कर चुकी है। समधी कहते थे कि हमारी सरस्वती का जी तो आगे पढ़ने को बहुत था, पर सयानी लड़की को कब तक बाहर भेजते। सो तीन बरस हुए उन्होंने उसे पढ़ने से बिठा लिया था। फिर भी रामायण और चिट्ठी-पत्री तो वह अच्छी तरह बाँच लेती है।’’ कहती-कहती ही अम्मा बहू की सलज्जता स्मरण करती हुई रसोईघर में चली गई और विमल लड़की की इतनी उच्च शिक्षा सुनकर ही ठण्डे हृदय से कुर्सी पर नीचे पैर और ऊपर मुख लटकाकर बैठा रह गया।

दूसरे महीने की पहली तीज को ही विमल की विवाह तिथि निश्चित हुई थी।

दो


ब्याह हो गया। चार दिन रहकर बहू बाप के घर चली भी गई। इस बीच बहू से विमल का इतना ही परिचय हुआ था कि विवाह की रात को उस जेठ की गर्मी में शाल में ढकी वह दुबली-पतली बालिका गठरी सी बनी हुई, दो तीन घण्टे तक उसके समीप बैठी रही थी। उतने समय में केवल कन्यादान के समय में ही दो बार कहने पर उसने अपना दाहिना हाथ बाहर किया था, सो विमल को दिख गया था कि बहू काली नहीं है, और दूसरी बार घर आने पर, कंगना खेलते समय, मिट्टी की हाँडियों में बन्द देवी-देवताओं के सम्मुख बैठे हुए विमल ने दिन होने के कारण उसके मेंहदी से रंगे और तीन तीन बिछुओं से लदे हुए पाँव भी देख लिए थे, और बस। हाँ, बहू जाने के बाद उसकी यहाँ की सुख्याति जो उसने इतने अल्प समय में अर्जन की थी, उसने महरी, पड़ोसनों और माँ के मुख से ही कई बार सुन ली...स्वर तो सब के कहने के अलग-अलग ही थे, किन्तु साराँश उन सब का यही था कि बहू बड़ी सुघड़ आई है। चार लड़कियाँ होते हुए भी बाप ने दिल खोलकर लिया दिया है। अच्छे-अच्छे रईसों से इतना नहीं बन पड़ता। पूरे तेरह गहने तो सोने के हैं, चाँदी का एक सेट और इक्यावन जोड़े पक्के रेशम के हैं। बर्तनों का तो सारे का सारा सेट मुरादाबादी है...और उस पर बहू कितनी लाज शर्मवाली है। मुँह देखने वालियों को भी जबरदस्ती उसके हाथ हटाकर मुँह देखना पड़ता था। तीन दिन में मुश्किल से तीन फुलके खाए होंगे। बराबर घर की याद करके रोती रही, यही तो कुलीन घरों की बेटियों के सुलच्छन हैं...यह सब सुनकर विमल बहुत प्रसन्न हुआ हो ऐसा तो दीख नहीं पड़ता था। माँ उसकी यह उपेक्षा लक्ष्य करके मन ही मन हँस पड़ी। उन्होंने जल्दी ही गौना लेने की तैयारी कर दी, उनका विचार था बहू के जाने से ही विमल उदास हो गया है। इतने बड़े सयाने लड़के को ब्याह हो जाने पर भी अकेले रखना क्या कोई अच्छी बात है। सभी का दिल तो खाने-खेलने को करता है..........

दस दिन बाद ही विमल गौना लेकर आ गया। दूसरे दिन, रात को, उसकी दूर की एक भाभी ने, सिर से पैर तक गहनों से लदी हुई, हाथ भर का घूँघट खींचे हुए बहू को बलात् ही विमल के कमरे में धक्का देकर बाहर से कुण्डी चढ़ा दी। विमल द्वार की ओर से पीठ किये, ईजी चेयर पर पड़ा हुआ कुछ सोच रहा था। आज उसकी सुहाग रात थी। भाभी की खिलखिलाहट से चौंककर मुख फेर कर देखने पर, उसे किवाड़ों से चिपकी हुई बहू दिखाई दी।

वह प्राणपण से अपने घूँघट को दाँतों से दबाकर सिर झुकाए बैठी थी। विमल का मन जाने कैसे होने लगा, कुछ क्षण चुप रहकर उसने पुकारा-‘‘सरस्वती !’’ ओह, कपड़ों का वह पुलिन्दा तो अपना नाम सुनकर ऐसे सिहर उठा जैसे किसी बच्चे ने सड़क पर साँप देख लिया हो। पति भी स्त्री का नाम लेते हैं, उस दस और पाँच-पंद्रह बरस की सरस्वती ने तो अपने घर में यह सुना नहीं था। वह और भी सिमट गई। विमल ने फिर पुकारा-‘‘सरस्वती ! सरस्वती ! यहाँ आओ न’’....लाचार गिन-गिनकर पग रखती हुई बहू विमल से एक हाथ दूर पर ही खड़ी हो गई....पूरे तीन घण्टे की चेष्टा के बाद विमल बहू का मुख देख पाया। बहू सलोनी थी, आँख-नाक सभी सुड़ौल थे, रंग भी गोरा था। फिर भी विमल का मन नहीं भरा। सुन्दर बहू पाकर भी उसके हृदय की प्यास नहीं बुझी। बुझे भी कैसे, पानी की प्यास तो पानी से ही मिटती है। बहू सुन्दर थी पर। केवल रूप को लेकर ही तो दिन नहीं कटते। ऐसा होता तो वह कभी विवाह का नाम भी न लेता, एक सुन्दर-सी प्रस्तर प्रतिमा लाकर आले में छाप लेता। अपने हृदय का यह दुख, यह अभाव, वह उस अनूढ़ा से कहता भी कैसे-जो शरीर के विकास में पन्द्रह वर्ष पूरे करके भी मस्तिष्क-विकास में दस-ग्यारह वर्ष ही बढ़ पाई थी। मन की व्यथा को मन ही में दबाकर विमल ने अपनी गुड्डे-गुड्डियों के खेल सी सुहागरात पूरी कर डाली।

दिन बीत रहे। दस-पाँच दिन में बहू की लाज भी खुल गई, वह अब उसे देखकर चकित हिरणी की भाँति छलाँग लगाकर भागती न थी। अकेले में होने पर घूँघट कर मुंह भी न छिपाती थी, बात पूछने पर उत्तर दे देती थी। उसे अब पति नाम के जन्तु से विशेष भय नहीं लगता था। अम्मा बहू से प्रसन्न थी, होती भी क्यों न, वह भोजन अच्छा बनाती थी, पान लगाना भी जानती थी। बाहर से आने वाली के पल्ला नीचे करके पाँव छूती थी और बदले में मुक्त हाथों में सदा आशिष बटोरती थी। पढ़ने-लिखने के नाम इन पन्द्रह दिनों में उसने केवल एक बार अपनी माँ को और दूसरी बार अपनी सहेली को पत्र लिखने के लिए एक-दो घण्टे लेखनी और कागज पकड़े थे। अन्यथा वह तो सारे दिन ही सास के इर्द-गिर्द उसकी परछाईं-सी बनी हुई घूमती रहती थी। उनके बहुत कहने पर ही विमल को पान देने जाती थी। नहीं तो वह भली और उसकी रसोई भली। अम्मा स्वयं ही विमल के रहते दो-चार घण्टों को बाहर चली जाती। उसके ऑफिस से लौटने का समय होते ही अपनी चादर संभालती हुई अपनी सहेलियों के यहाँ टूर पर निकल पड़ती। तो गई रात के आठ बजे ही घर मे घुसती, घर की तो अब कोई विशेष चिन्ता करनी नहीं पड़ती। वहाँ पर अधिकार तो अब भी उनका ही था एकछत्र रूप से, किन्तु कामकाज, रोटी-पानी करने को तो बहू आ गई थी न...पर विमल क्या करे, फुरसत के उन चार घण्टों में वह उस बहू से क्या बातें करें, जिसे बाहरी दुनिया की हवा भी नहीं लगी हुई थी। समाज और राजनीति किस चिड़िया का नाम है, वह नहीं जानती। समाचार-पत्र से तो उसका परिचय बिल्कुल ही नहीं है। तब भला वह उससे किस विषय पर और क्या बातें करे। दोनों ही दो दुनिया के जीव थे-एक पृथ्वी पर रेंगने वाला, दूसरा आकाश में उड़ने वाला। सवेरे टाइम्स पढ़कर उसकी सम्पादकीय टिप्पणियों पर आलोचना करने को सदा की भाँति जब विमल का मन मचल पड़ता तब ऐसे किसी साथी को न पाकर बहू पर ही उसकी खीज उतरती थी...इतनी बड़ी होने पर भी इसमें वे बातें समझने की बुद्धि भी नहीं। पर अपनी इस खीज को मन-ही-मन पीकर वह आधा पेट खाकर ही अपने उस ऑफिस की राह लेता, जहाँ उसकी जान के लिए साहब ने कितने अधूरे ड्राफ्ट रख छोड़े होते संध्या में रास्ते में पड़ती हुई लाइब्रेरी को देखकर उसका मन एक बार ललक उठता, कोई पुस्तक ले चलने को। पर क्या करे ले चल कर..कौन पढ़कर सुनावेगा उसे, वह स्वयं ही पढ़कर समझावेगा किसे। जिसे चन्द्रकान्ता पढ़ने में ही ग्यारह दिन लग गए, उससे इसकी आशा रखना ही पागलपन है। वह अपनी उमड़ती हुई इच्छाओं को कुचलता सा मन-मन के पैर लिए हुए चुपचाप आकर घर में घुसता। तब उस पर एक विचित्र-सी क्लान्ति छाई होती थी। दिन बीत रहे थे।

विमल के मन में एक बात उठी। कई दिन से सोच रहा था वह, इस बात को, पर कैसे श्रीगणेश करे वह उसका, कुछ समझ नहीं पाता। कैसे वह इस बहू के साथ घुल-मिल जाए। कैसे वह उसे अपने मनोनुकूल बनाए यही सोचता रहता वह दिन-रात। उसके भाव राज्य के कल्पनामय स्वर्गीय जीवों और ऐतिहासिक आत्माओं से सरस्वती का परिचय नहीं है और सरस्वती की उन गहनों कपड़ों वाली दुनिया में उसका प्रवेश नहीं है। तब, 6बात कैसे बने। उसे तो सरस्वती का यह नामकरण तक पसन्द नहीं। नाम की तो खैर कोई बात नहीं, उसने उसे बदलकर रखा सुवास, किन्तु इससे क्या। कागज के फूल के रंग देने से, उसमें सुगन्धि तो आने से रही। उस पर फूल भी कैसा जो विवाह के चार मास बीतते न बीतते ही अपने रूप-रंग को गँवाने लगा हो। सुवास के कपड़ों में अब प्राय: हल्दी और चिकनाई के धब्बे लगे रहते थे। प्रतिदिन बाल सँवारने का भी उसे कोई विशेष आग्रह नहीं था। वह तो नई-नई जब आई थी, तभी दो-चार दिन उसका ध्यान गया था। चाहे तो वह अब भी विमल के सामने साफ सुथरी रह सकती है। पर इसकी तो वह चेष्टा ही नहीं करती। विमल से कभी यह कहने पर भी कि सुवास, साड़ी बदल लो न, देखो तो सही पल्ले में हाथ पोंछ लेने से वह कितना गन्दा हो गया है, तो वह एक बार पल्ले को ताककर एक छोटी-सी ऊँह करके कह देती-‘‘मरी को कहाँ तक बदलें। रसोई में जाते ही तो मैली हो जाती है। हो जाने दो, हमें किसी को दिखाना थोड़े ही है...’’ अब इसके आगे विमल क्या कहे। दिखाना है या नहीं-इस पर तर्क करने की न तो विमल की इच्छा ही है, न सुवास को समय...।

इसी सब को सोच-सोचकर विमल के मन में आज कई दिन से एक बात उठी। क्यों न वह सुवास को पढ़ाए ? मगज मारूँ तो क्या थोड़ा बहुत बजाना यह न सीखेगी। न होगा दो-एक गीत ही गा लिया करेगी.. किन्तु, सोचकर ही वह रह जाता। लगातार आठ घण्ठों तक ऑफिस की चक्की पीसकर घर आने पर...एक बुड्ढे तोते को पढ़ाना, क्या उससे हो सकेगा-फिर जिसे एबीसी से लेकर वाइ-जेड तक सभी कुछ सिखाना हो। काव्य के रस-ग्रहण की योग्यता सुवास कितने दिन में पा सकेगी-इसका विमल को कोई अनुमान न था। सरगम की घाटियाँ पार करके राग रागनियों के हरे भरे उपवन में वह कब पहुँचेगी, इसका भी कोई निश्चय नहीं था। फिर भी कल रात उसने सुवास से यह बात कही। सुनकर वह कुछ प्रसन्न नहीं हुई। उत्साह का कोई भी चिन्ह उसके मुख पर नहीं था। विमल का मन उसका यह भाव देखकर भारी हो उठा। कुछ देर में धीरे-धीरे सुवास से कहा-‘‘पढ़ने की तो खैर कोई बात नहीं, पर हारमोनियम मैं कैसे सीखूँगी ?’’ क्यों, सीखने को क्या हुआ ! अम्मा तो घर पर रहती ही नहीं। धीरे-धीरे गाया करना। अरे बाप रे ! अब गाना भी होगा’’- सुवास से चकित भाव से एक लम्बी साँस छोड़ी। अपने घर पर तो उसने अपनी किसी भाभी को भाई के साथ जोर से बोलते भी नहीं देखा था। ‘‘बिना गाये हारमोनियम कैसे सीख सकोगी..’’ विमल ने जरा गरम होकर कहा-‘‘तुम तो बिल्कुल बच्चों जैसी बातें करती हो ! पति की भवें टेढ़ी होती देखकर सुवास सहम गई। उसके पीहर में उसकी माँ, भाभी, चाची, ताई कोई भी तो अपने स्वामी की बात को उलटती नहीं, तब वह ही यह सब कैसे करेगी। ‘‘अच्छा सीखूंगी-’’ कहकर उसने बात वहीं समाप्त कर डाली।

कई दिन निकल गए। न तो सुवास ने ही अपने मुख से कहा कि मुझे सिखाओ और न विमल ही इसमें तत्परता दिखा सका। दिखाए भी क्या, मुद्दई सुस्त गवाह चुस्त वाली बात थी...। आज सवेरे से ही थोड़ी-थोड़ी घटा हो रही थी, सन्ध्या होते न होते वह घनी होकर बरसने लगी। विमल ऑफिस से लौट रहा था; तब नन्ही-नन्ही फुहारें पड़ रही थीं, बाजार का मोड़ घूमते समय एस.एन. दीन के सोडेवाटर की दूकान के ऊपर वाले छज्जे से किसी का परिचित स्वर सुन पड़ा। उसका ही सहपाठी आनन्द हारमोनियम पर गा रहा था-‘झुक आई बदरिया सावन की...।’ सुनकर विमल की इच्छा हुई घर जाने की अपेक्षा आनन्द के यहाँ जाकर थोड़ी देर मन बहलावे। किन्तु पेट की आँतें बार-बार कुड़कुड़ाकर भूख का अल्टीमेटम सुना रही थी, इस दशा में किसी के घर जाना उसे ठीक न जँचा। वह घर की ओर ही चल पड़ा। आज कितने दिन बाद उसे अपने हारमोनियम की सुध आई। लगभग तीन महीनों से उसने उसे छुआ भी नहीं था। छू करके भी क्या, बिना पूरे साज के गाने का आनन्द कहाँ आता है। घर पर बजावे भी क्या, तबला तो दूर, वहाँ तो कोई हाथ का ठेका देने वाला भी तो नहीं था..सुवास..सुवास का ध्यान आते ही उसके हृदय से एक ठण्डी निश्वास निकल पड़ी...यदि इस योग्य ही होती...। लाइब्रेरी दिखाई दे रही थी, उसे याद आया सुवास के पढ़ने को कुछ लेता चलूं। वह लाइब्रेरी में घुस गया। उसके बन्द होने का समय समीप था, जल्दी-जल्दी चल पड़ा...बूँदें कुछ तेजी पकड़ रही थीं। आज सुवास को एक-दो सरगम सिखाऊँगा अवश्य ही। उसकी कल्पना उड़कर ऊपर चढ़ने लगी। उसने देखा सुवास गुलाबी रंग की सुवासित साड़ी पहने..दोनों पैर मोड़कर सुराहीदार गर्दन जरा टेढ़ी करके अपनी चपल उँगलियों के थिरकते हुए स्वरों से उसे पागल बनाए दे रही है..। घर आ गया, वह कमरे में घुसा। हठात् उसका स्वप्न भंग हो गया। कमरे में गर्द भरी हुई थी और उसी गर्द भरे कमरे में धूल से सनी हुई सुवास अपनी धोती के छोर से हारमोनियम के बक्स को पोंछते-पोंछते बड़बड़ा रही थी..‘‘बड़ा बजाने का चाव है। धूल तो बाजे में नौ मन चढ़ी हुई है। किसी वस्तु की कदर करना तो जानते ही नहीं’’....विमल का आँख, मुख और मन सभी किरकिरा हो उठा। ‘‘सुवास !‘’ उसका मस्त-सा स्वर सुनकर वह चमक पड़ी। बक्स पोंछना छोड़कर, अपने बिखरे बालों को समेटकर वहीं धूल भरा आँचल माथे पर डालती हुई सुवास ने व्यस्त भाव से कहा-‘‘दालान में चले जाओ, देखो तो यहाँ कितनी धूल उड़ रही है..।’’

‘‘तुम्हें यही समय मिला था सुवास, कमरा साफ करने के लिए..।’’ विमल ने कहा।
‘‘अब क्या करें, आज चाची आई, कल बुआ जी आईं....ऐसे ही रोज एक न एक काम लग जाता है, फिर किस समय करें साफ-‘‘कहती हुई सुवास कमरा वैसा ही छोड़कर स्वामी के जलपान की सामग्री ठीक करने चली गई विमल क्लान्त भाव से वहीं पलंग पर बैठ गया। बैठे ही बैठे उसने बक्स में से हारमोनियम खींच लिया और अनमने मन से उँगलियाँ फेरकर धुन निकालने लगा-‘झुक आई बदरिया सावन की’। अपनी विवशता वह किसी तरह दूर भी करे। सुवास आई उसी सजे-सजाए वेश में-वही मैली धोती पहने, रूखे बालों का जूड़ा बाँधे। हाथ अवश्य ही धुले हुए थे। बाएँ हाथ में समोसों की प्लेट और दाहिने हाथ में पानी का गिलास था। वह चुपचाप गीत सुनने लगी। गीत बड़ा मीठा लगा। पढ़ने से तो उसे भय लगता था, किन्तु सुनकर हारमोनियम सीखने को उसका मन हो आया। गीत समाप्त करके विमल ने देखा-सुवास जलपान लिए खड़ी थी। चारों ओर की इस मन लुभाने वाली छटा के बीच में सुवास का सोने-सा रंग भी काला सा लग रहा था। विमल की इच्छा हुई, सुवास को इस ढंग पर रहने के विषय में एक फटकार दे डाले, पर अपने इस भाव को दबाकर वह चुपचाप समोसा खाने लगा। ‘‘हमें भी सिखा दो’’-सुवास ने हारमोनियम के रीड्स पर उँगलियाँ फेरते हुए कहा-‘‘उस दिन तो कहते थे सिखाऊँगा।’’

‘‘सीख लो, विमल ने उदासी से पूछा-क्या सीखोगी ?
बस यही गीत-बच्चों जैसी फुर्सी दिखाकर सुवास धोंकनी देने लगी। विमल को हँसी आ गई, सुवास की इस अज्ञता पर।
यह गीत तो अभी न सीख सकोगी। पहले तो सरगम सीखनी पड़ेगी, तब कहीं जाकर इसका नम्बर आयेगा।
न भई, सरगम-वरगम मैं कुछ नहीं सीखती। मुझे तो बस यही गीत सिखा दो। सुवास गीत सीखने को उतावली सी हो उठी। बताओ-‘‘ उसने फिर कहा। सुवास के इस अप्रत्याशित उत्साह से विमल भी जरा जग पड़ा। आस-पास के वातावरण को भूलकर वह अपनी कल्पनाप्रसूत भावनाओं में रम जाने की चेष्टा करने लगा।‘‘ आओ’’ वह बजाने लगा। सुवास देखती रही, वह बजा रहा था...। एक ही गीत को बार-बार सुनकर वह कुछ ऊब उठी कई बार बजाकर विमल ने रुककर कहा-‘‘तनिक बजाओ तो।’’ किन्तु परदों पर हाथ रखकर सुवास को जान पड़ा कि वह सब इतना सरल ही है। धौंकनी देने से रीड्स पर उँगलियाँ न चलती थीं..रीड्स को देखती तो धौंकनी नदारद। सुवास की विवशता लक्ष्य करके विमल के हृदय में खीज के साथ-साथ ही करुणा का भाव उदय हो आया। यह न सीख सकेगी सुवास-उसने अपने थके हुए मस्तिष्क को, जो सुवास के अस्तव्यस्त हाथों की बेसुरी रागिनी सुन-सुनकर संतप्त हो उठा था, अपने हाथों को दबाते हुए कहा-‘‘पहले सरगम सीखो।

‘‘अच्छा सिखाओ हारकर सुवास ने कहा। इच्छा न होते हुए भी विमल थके हुए मन से सिखाने लगा। लगभग घण्टे भर सिर मारने पर सुवास सरगम की एक आवृत्ति कर पाई। वह दत्तचित्त होकर...उँगलियों का पूरा जोर देकर स्वर निकाल रही थी-स रे ग म प..सुनते सुनते विमल ऊब गया। ऊबने की बात थी भी, उसने कई बार कहा, सुवास जरा गला खोलकर आवाज मिलाओ न। किन्तु यह सुवास के बस का था नहीं। गाना और वह भी गला खोलकर। हाय रे, आज कैसी मुसीबत आई उसकी। भली वह बाजा सीखने बैठी। क्या करे घबराहट में वह अब याद किए हुए परदे भी भूल चली। ‘‘रहने दो कल बजाना।’’ अन्त में विमल ने ही उसकी जान बचा दी। वह एक साँस में ही हारमोनियम खिसकाकर रसोईघर में भाग गई.. और विमल...वह हाथ में ली हुई यशोधरा को सिरहाने रख, बुझे मन से पलंग पर लुढ़क पड़ा। सावन की बरसती हुई बदरिया में भी उसके हृदय में अंधड़-सा चल रहा था..।








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