शहंशाह-ए-तहबाजारी - शीतांशु भारद्वाज Shahnashah-A-Tahbazari - Hindi book by - Sheetanshu Bhardwaj
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शहंशाह-ए-तहबाजारी

शीतांशु भारद्वाज

प्रकाशक : सहयोग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :232
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5311
आईएसबीएन :81-8070-041-0

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सामाजिक समस्याओं पर आधारित उपन्यास...

Shahanshah-a-tahabajari

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

उत्तराँचल विधान सभा की पहली चुनावी हलचल का मैं प्रत्यक्षदर्शी रहता रहा हूँ। उसमें जो भी उठक-पटक, घात-प्रतिघात होते रहे, उन्हीं के भागों से मैंने प्रस्तुत उपन्यास का ताना-बाना बुना है। पच्चीसेक वर्ष मैं राजधानी दिल्ली में भी रहा हूँ। वहाँ के फुटपाथियों की जीवन-शैली से मैं रू-बू-रू होता रहा हूँ। अस्तु देखी-परखी हुई सामाजिक समस्याओं को ही मैंने इस कृति के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।

नग्न यथार्थ पर आदर्श का थोपा जाना शायद पाठकों को कुछ अखरे। इस संबंध में मेरा यही निवेदन है कि लेखक होने के नाते यह मेरा अधिकार भी बनता है। जिस प्रकार एक कलाकार अपनी कला कृति के माध्यम से कोई आदर्श प्रस्तुत करता है, वही मैंने भी किया है। यदि पाठक इसे मेरी अनाधिकार चेष्टा मानें तो इसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ।

डॉ. शीतांशु भारद्वाज

शहंशाह-ए-तहबाज़ारी
  एक


पुत्र का जूता जब पिता पहनने लगे, पिता की बुशर्ट पुत्र के बदन पर फिट आने लगे तो एक दुनिया ही बदलने लगती है। तब पिता, पिता न रह कर पुत्र का मित्र ही हो आता है। दोनों ही एक-दूसरे के साथ मित्रवत् व्यवहार करने लगते हैं। यहीं से वैचारिक पीढ़ी-संघर्ष भी आरंभ होने लगता है। ऐसे में पिता की अपेक्षायें धूमिल पड़ने लगती है। उसके सामने अनेक प्रश्न खड़े हो जाते हैं। दोनों ओर से अहम् की टकराहट शुरू होने लगती है। मैं-मैं, तू-तू के इस युद्ध में दोनों ही डटे रहते हैं।
प्रौढ़ावस्था में कभी देवदा पत्रकारिता के पेशे से जुड़ना चाहते थे। बहुत भागदौड़ करने पर भी उन्हें इसमें सफलता नहीं मिल पाई थी। तब बेचारे मन मसोस कर ही रह गए थे। अब जबकि उनका पुत्र रक्षित उन्हीं के बराबर हो चला था, वे उससे बहुत-सी अपेक्षाएँ किया करते थे। वे चाहते थे कि वह भी उन्हीं की भाँति कलमजीवी बनकर अपनी जीविका चलाए। ग्रेज्युएशन के बाद वे उससे कहते रहते थे कि वह किसी प्रकार कहीं से भी पत्रकारिता का डिप्लोमा प्राप्त कर ले ताकि वे उसे किसी समाचार-पत्र समूह से जोड़ सकें।
-इससे क्या होगा ? एक दिन रक्षित ने उनसे पूछा था।

-मैं तुझे किसी समाचार-पत्र में संवाददाता की नौकरी दिलवा दूँगा। देवदा मुस्करा दिए थे, जीवन में जो मैं न कर पाया, उसे करते हुए मैं तुम्हें देखना चाहता हूँ।
-छोड़ो भी, पापा ! पत्रकारिता के नाम पर रक्षित ने मुँह बना लिया था, आप जीवन भर कलम घिसते रहे। इससे आपको ही क्या मिला ?
अप्रत्यक्ष रूप से रक्षित का वह प्रश्न देवदा के गाल पर तमाचा ही था। वे अंदर-ही-अंदर तिलमिला कर रह गए थे। अगले ही क्षण वे उसके कथन को गुणने लगे थे। उसके कहने में वजन था। एक वे ही नहीं, उनके सभी समकालीन लेखक जानते हैं कि आज के युग में मात्र लेखन के बल पर ही गुजर-बसर नहीं हो सकती। उन्हें मौन देखकर रक्षित ने उनकी ओर प्रश्नों की बौछार ही शुरू कर दी थी, बोलिए न पापा। आपको कितनी प्रतिष्ठा मिली ? लेखन-कार्य से आपको क्या मिला? इससे आपने कितना कमाया ?

-देखो रक्षित ! वे अपनी प्रतिष्ठा पर पैबंद लगाने लगे थे, मैंने जो कुछ भी लिखा है, उससे मैं पूरी तरह से संतुष्ठ हूँ। देश में मेरे ढेरों पाठक हैं। मैं उनका प्रिय पाठक हूँ। मेरे लिए यह बहुत बढ़ी उपलब्धि है। यही मेरी जमा पूँजी भी है। रॉयल्टी के रूप में यही पूँजी आगे चलकर तुम दोनों भाइयों को सहारा देती रहेगी।
-हुँह ! रक्षित ने नाक-भौं सिकोड़ कर कहा था, इतनी लंबी-लंबी कहानियाँ लिख कर भी आपको मात्र बीस-बीस रुपये ही तो मिला करते हैं।
-देखो बेटे ! वे उसे अपने ही ढंग से समझाने लगे थे, रुपया ही तो सब कुछ नहीं हुआ करता। रुपये के अलावा आदमी का अपना मान-सम्मान भी तो कुछ मायने रखता है न !

-नहीं, पापा ! उसने उनके कहे का खंडन कर दिया था, आज के जमाने में रुपया ही सब कुछ हुआ करता है। उसके बल पर कुछ भी संभव है। यह रुपया तो अच्छे-अच्छों को नाच नचवा सकता है।
रुपये की महिमा पर देवदा को उस दृश्य की याद आई थी जब वे सातवें दशक में दिल्ली में नौकरी किया करते थे। उन दिनों वे प्रात: तड़के ही घर से निकल कर बस द्वारा पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से ट्रेन पकड़ कर साहिबाबाद के एक निजी कॉलेज में पढ़ने जाया करते थे।

वह शरद् ऋतु की सुबह थी। देवदा बस से कश्मीरी गेट से कुछ पहले ही उतर गए थे। उस समय लाहौरी गेट से कश्मीरी गेट तक बह रहे गंदे नाले में रुपयों की ढेरों गड्डियां तैर रही थीं। आस-पास के लोग जो सुबह का दूध लेने जा रहे थे, उन्होंने जब उस दृश्य को देखा तो वे उन रुपयों को बटोरने के लिए उस गंदे नाले में कूंद गए थे। वे लोग रुपये बटोर पाते कि तभी पुलिस ने चारों ओर से उस नाले की घेराबंदी कर ली थी। मल-मूत्र के पानी में डुबकियाँ लगाकर भी वे बेचारे उन रुपयों से वंचित रह गए थे। बाद में पता चला कि पिछले दिन डाकुओं ने महानगर के किसी बैंक को लूटा था। रुपयों की वे गड्डियाँ उसी लूट की थीं। रुपयों के लोभी हाथ मलते ही रह गए थे।
-क्या सोचने लगे पापा ? रक्षित ने उनकी तंद्रा भंग की थी।

-मैं रुपयों की महिमा पर ही सोच रहा था। वे फिस्स-से हँस दिए थे।
तभी देवदा की पत्नी गोपा बैठक में चाय-नाश्ता ले आई थी। चाय बनाते हुए उसने पति को उलाहना ही दे डाला था, आप तो अपनी दुनिया में रमे रहते हैं।
-ऐसी क्या बात हो आई ? उन्होंने पूछा था।
-कभी परिवार का भी भार ले लिया करें। गोपा ने कुछ खीझ कर कहा था। उसने चाय की प्याली थमा कर कहा था, आप रक्षित के बारे में भी तो सोचा कीजिए न !
-अरे भई ! उन्होंने चाय की घूँट भर कर कहा था, वह खुद ही अपने बारे में सोचता रहता है। उसमें मुझसे भी कहीं अधिक समझदारी है। अब ऐसे में-।

-बात समझदारी की नहीं है, पापा ! रक्षित बीच में ही बोल पड़ा था।
-तो ?
-आप मेरी मदद कीजिए न ! उसने कहा था, मैं अपना खुद का धंधा करना चाहता हूँ।
-कौन-सा भला ? उन्होंने चौंक कर पूछा था।
-मैं जूस का धंधा करना चाहता हूँ। रक्षित ने अपने मन की बात उड़ेल दी थी।
रक्षित ने देवदा को बताया था कि वह मॉडल टाउन के मुख्य बाजार में ठेले पर फलों का रस बेचा करेगा। इसके लिए उसे चारेक हजार रुपयों की जरूरत है। इस पर देवदा कुछ सोचने लगे थे। तभी गोपी ने कह दिया था, अजी, इसमें सोचना क्या ? उसे भी अपने ही मन की करने दीजिए न !

तब देवदा ने रक्षित को चुपचाप चारेक हजार रुपये थमा दिए थे। उसने उनसे लकड़ी का ठेला बनवा लिया था। उसके बाद वह निगम पार्षद जुगलाल सब्बरवाल उर्फ भाईजी से मिला था। भाईजी ने उसे हरी झंड़ी दिखला दी थी, ठीक है, बच्चे ! कोई टोका-टाकी करे तो मेरा नाम ले लेना। पहले मैं भी तो ऐसे धंधा किया करता था।
-आप ? रक्षित की आँखों में आश्चर्य उमड़ आया था।
-हाँ ! मैं यानी जुगलाल सब्बरवाल। भाईजी मुस्करा दिए थे, मैं भी तो होश संभालने के बाद अनेक प्रकार के पापड़ बेलता रहा हूँ।

-वो कैसे, भाईजी ? रक्षित ने उसी आश्चर्य  से पूछा था।
-जब मैं किशोर अवस्था का था तो किंग्वेज कैंप के चौहाहे पर सुबह से दोपहर तक भुट्टे भूनकर उन्हें बेचा करता था। भाईजी उसके आगे अपना अतीत खोलने लगे थे, दोपहर बाद मैं पढ़ने के लिए स्कूल जाया करता था। मेरा स्कूल दूसरी पारी का हुआ करता था।
-आप तो-।
-हाँ ! उन्होंने कन्धे उचका कर कहा था, काम करने में किसी प्रकार की शर्म नहीं होनी चाहिए। जब मैं कॉलेज में पहुँचा तो सुबह- शाम घंटाघर के नीचे बैठ कर अंडरवियर-बनियानें बेचा करता था। आज मैं जो कुछ भी हूँ उसी मेहनत के बलबूते पर तो हूँ।

रक्षित फुटपाथी जीवन पर सोचने लगा था। एक दिल्ली ही नहीं, देश के अनेक नगरों, महानगरों में फुटपाथी तहबाजारी का धंधा खूब फल-फूल रहा है। भाईजी के उस जुझारू व्यक्तित्व ने उसे बहुत प्रभावित किया था। उसने उनके पाँव छूकर कहा था, फिर तो भाईजी, आप मुझे भी आशीर्वाद दें कि मैं इस काम में कामयाब हो सकूँ। अपने पाँवों पर खड़ा हो सकूँ !
भाईजी ने उसकी पीठ थपथपा दी थी, डटे रहो ! फूलो-फलो !
उन दिनों रक्षित अपनी ही दुनिया में रमा रहता था। एक दिन आजादपुर की मुख्य सब्जी मंडी से फल लेकर, ठेले को सजाधजा कर वह मॉडल टाउन के मुख्य बाजार में चल दिया था। अभी उसकी बोहनी भी नहीं हो पाई थी कि उसके पास एक लंबा तगड़ा आदमी आ खड़ा हुआ था। उसने उसे डपटकर पूछा था, ऐ ! ये ठेला किसकी इजाजत से लगाया है ?
-मुझे भाईजी ने कहा है। रक्षित बोला था।
उस आदमी ने भाईजी के नाम पर एक भद्दी गाली उछाल दी थी। मूँछों पर ताँव देकर उस आदमी ने पूछा था, जानता हैं, मैं कौन हूँ ?

-    नहीं जी ! रक्षित ने सिर हिलाकर कहा था।
-    मैं इस मार्केट कमेटी का महामंत्री हूँ। उस मुच्छड़ ने उसे अपना परिचय दिया था, मुझे द्रोणवीर कहते हैं। इस मार्केट में मेरी इजाजत के बिना कुछ भी नहीं हो सकता।
-    तो साहब, आप ही इजाजत दे दीजिए। रक्षित ने उससे प्रार्थना की थी।
-    इसकी इजाजत नगर निगम से मिला करती है। द्रोणवीर ने कहा था, जाके निगम से ठेले के लाइसेंस के कागजात ले आ।
तब रक्षित ने वह ठेला वहीं सड़क की रेलिंग से बाँध लिया था। गर्दन लटकाये हुए उधर से वह घर चला आया था। देवदा ने उसकी उदासी का कारण जानना चाहा था। उसने बुझे हुए स्वर में कहा था, मेरे साथ तो वही हुआ न पापा कि सिर मुँडाते ही ओले पड़े।
पुत्र की बातें सुन कर देवदा उसे धैर्य बँधाने लगे थे, ऐसा कर कि तू एक बार फिर से भाईजी से मिल ले। वे ऊँची तोप हैं। तेरा काम बन लेगा।
उसी शाम रक्षित भाईजी की कोठी में चल दिया था। उसकी बातें सुनकर भाई जी ने कहा था, वो साला विरोधी पार्टी का है। मैं उससे कुछ नहीं कह सकता। वो तो....।
-तो ?

-ऐसा कर कि तू नगर निगम में आहूजा के पास चला जा। भाईजी ने कहा था, वहाँ उनसे मेरा नाम ले लेना। वो तेरा काम करवा देगा।
दूसरे दिन रक्षित नगर निगम के मुख्यालय में प्रवीण आहूजा से मिलने चल दिया था। आहूजा ने उसकी बातें ध्यान से सुनी थीं। उन्होंने कहा था, देखो मिस्टर ! इन दिनों ठेलों के लाइसेंस नहीं दिये जा रहे हैं। फिर भी, मैं कोशिश करूँगा। शायद तुम्हें लाइसेंस मिल जाए। भाईजी का हुक्म तो बजाना ही होता है न !
रक्षित नगर निगम के कई चक्कर काटता रहा था। एक बाबू ने उससे कहा था, देखो भाई ! काम तो तुम्हारा बन जाएगा। लेकिन इसके लिए तुम्हें ‘सुविधा शुल्क’ देना होगा।
-कितना ?

-कम-से-कम पाँच सौ रुपये। बाबू ने कहा था।
घर आकर रक्षित ने देवदा से ‘सुविधा शुल्क’ का अर्थ पूछा था। उन्होंने उस गोपनीय शब्द की व्याख्या ही कर दी थी। उसी समय उन्होंने उसे पाँच सौ रुपये थमा दिए थे। अगले दिन वह उस बाबू को पाँच सौ रुपये रिश्वत दे आया था।
-हो जाएगा। उस बाबू के रुपये जेब के हवाले कर कहा था, परसों आ जाना। लाइसेंस हाथों-ही-हाथ ले जाना।



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