टाँय-टाँय फिस्स - सरला अग्रवाल Tain-Tain Fiss - Hindi book by - Sarla Agrawal
लोगों की राय

हास्य-व्यंग्य >> टाँय-टाँय फिस्स

टाँय-टाँय फिस्स

सरला अग्रवाल

प्रकाशक : हिन्दी साहित्य सदन प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :152
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5313
आईएसबीएन :81-8073-001-8

Like this Hindi book 9 पाठकों को प्रिय

115 पाठक हैं

पारिवारिक एवं सामाजिक विसंगतियों पर आधारित हास्य-व्यंग्य...

Tay Tay Fis

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

डॉ. सरला अग्रवाल के ये पच्चीस निबंध कथात्मक शैली में लिखे गये हैं। ये निबंध रोचक होते हुए भी जीवन की जटिल-कुटिल व्यावहारिकता को बड़ी सहजता के साथ प्रस्तुत करते हैं। इन हास्य लेखों के विषय आस-पास घटित, देखे-सुने, नित्य-प्रति के सोचे-समझे और अनुभूत हैं, जिनमें आज की सोच और संघर्ष है, छल-कपट और शोषण है, पर साथ ही मानव मन की कोमल अनुभूतियों की मनोवैज्ञानिक पकड़ भी।

दूषित राजनीति, आतंकवाद और अपराध की दुनिया से बचाकर, अच्छा हास्य-व्यंग्य लिख पाना आज बड़ा ही दुष्कर है, पर सरला अग्रवाल के ये हास्य-व्यंग्य इसका सटीक प्रमाण हैं। ये लेख परिवारिक एवं सामाजिक विसंगतियों को पूरी निर्भीकता, स्पष्ट और जीवंत रोचकता के साथ उकेरने में सक्षम हैं।

हास्य प्रधान होते हुए भी ये लेख जीवन की भूलों को सुधारने वाले हैं और लौकिक व्यवहार को एक ज्ञानवान् दृष्टि प्रदान करते हैं। इनकी शब्दावली चुस्त, सटीक; भाषा-शैली प्रवाहमयी तथा अभिव्यंजना गुदगुदाने वाली है। लेख इतने रोचक और चटपटे हैं कि पाठक को पग-पग पर गुदगुदाते चलते हैं।

अग्रेसरण


कथाकार श्रीमती सरला अग्रवाल के पच्चीस लेखों का यह संकलन हमें यह मनवाने को विवश करता है कि श्रीमती अग्रवाल केवल कथा लेखिका ही नहीं हैं; अच्छी हास्य-व्यंग्य लेखिका भी हैं। श्रीमती अग्रवाल के ये निबंध बिल्कुल एक ही सी विधा की सशक्त प्रस्तुति करते हैं। सभी निबंध कथात्मक शैली में लिखे हैं। श्रीमती अग्रवाल में अपनी बात कहने की क्षमता है, तथा उसे विकास दे कर पूर्णता तक पहुँचाने की भी। शब्दावली चुस्त व सटीक है और अभिव्यंजना प्रौढ़ तथा गंभीर। श्रीमती अग्रवाल ने इन व्यंग्य लेखों को हास्य की मुद्रा देने की चेष्टा तो की है, परंतु ये सभी लेख हास्य को स्पर्श करते-करते गंभीरता के समुद्र में डूब जाते हैं। यह प्रौढ़ता सभी लेखों में स्पष्ट बोलती है। हास्य की विषय-वस्तु चुनकर भी श्रीमती अग्रवाल इन लेखों को हास्य प्रधान नहीं बना पाई हैं। शायद उनका मंतव्य निबंधों को हास्य-युक्त बनाने का है भी नहीं। वे अपने सहज सरल स्वभाव वश हास्य लिखना चाह कर भी अपनी प्रौढ़ता को नहीं छिपा पाई हैं। सभी निबंध विवेक की प्रौढ़ दृष्टि का दिग्दर्शन कराते हैं।

इन निबंधों का मैं इसलिए स्वागत करता हूँ कि ये निबंध जीवन की जटिल कुटिल व्यवहारिकता को बड़ी ही सहजता से प्रकट करते हैं। ये निबंध रोचक हैं। पूरा पढ़ने की इच्छा अंत तक बनी रहती है। लेखन को श्रीमती अग्रवाल ने मुहावरों और आधुनिक शब्दावली से अलंकृत किया है। इससे लगता है, लेखिका वर्तमान को भली-भाँति अपने में पचाये है।

इन निबंधों को मैं हास्य निबंध नहीं, ललित भावपूर्ण निबंध मानता हूँ। सभी लेख अनुभवों की एक बड़ी पिटारी में संजोये हैं। विषय को लेखिका ने विविध आयामी विस्तार दिया है। विषय के सभी पूर्वा पर संबंधों को खोजा है तथा लेखनी की नोक से कागज के पृष्ठों पर बड़ी शालीनता से उतारा है। ये सभी लेख बड़े शिक्षाप्रद हैं। हँसना जीवन के लिए अनिवार्य है। यह हास्य लेख नहीं, जीवन की सफलता को बताने वाला एक ज्ञान-वर्धक पाठ है।

जैसा मैंने प्रारम्भ में ही कहा कि श्रीमती अग्रवाल एक सफल कथाकार हैं इसलिये उनके लिए किस्सों को शब्दायित करना बहुत ही आसान बात है। फिर चाहे वह किस्सा एक शादी का हो या स्कूल के दाखिले का। किस्सा रैगिंग का हो या बाल कटवाने का या फिर दास्तान एक पाक-विधि की हो। किस्से ही किस्से हैं जिनमें स्वयं का निकटता से देखा, पढ़ा-सुना, समझा अनुभव स्पष्ट बोलता है। फूलन देवी के प्रति जो करुणा का भाव लेखिका में देखने को मिलता है वह नारी सुलभ है। सेवाभावी क्लब की अध्यक्षा के फीचर में भी नारी सुलभ ईष्या भाव ही प्रकट होता है। जहाँ तक इमरजेंसी-भर्ती की मैजिस्ट्रेटी या नारी जीवन हाय, तुम्हारी यही कहानी, अध्यापिकी अंग्रेजी स्कूल की, वाले निबंधों का प्रश्न है, ये भागे हुए अनुभवों के अधिक निकट लगते हैं।

सभी निबंध, इन्हें ‘हम लेख-कहे’ या हास्य-व्यंग मेरी दृष्टि से पठनीय एवं मननीय हैं तथा जीवन की भूलों को सुधारने वाले हैं। लौकिक व्यवहार को एक ज्ञानवान् दृष्टि देने वाले हैं। मैं यह नहीं कहता कि ऐसे लेख नित्य प्रति पत्रिकाओं में नहीं आ रहे हैं। पत्रिकाओं को तो चाहिये ही ऐसे लेख, जिसमें रोचकता हो, चटपटापन हो, विषय आकर्षक हो, लेखन सरल-स्पष्ट व बोधगम्य हो।

श्रीमती अग्रवाल के ये सभी लेख विभिन्न शीर्षस्थ पत्र-पत्रिकाओं में पूर्व में छप चुके हैं। ये सभी निबंध वास्तव में आज के दैनिक पत्रों के साप्ताहिक संस्करणों की आवश्यक सामग्री हैं।
आश्चर्य मुझे यह देखकर है कि श्रीमती अग्रवाल जिस शालीन एवं शांत स्वभाव की हैं, उनके भीतर ऐसा व्यंग्य एवं हास्य के झूले पर झूलता आनंदजीवी हृदय भी बैठा है।

यह भी सुखद बात है कि सभी निबंधों में लेखिका भौंडी या ऊलजलूल की बातों में नहीं उलझी है जिसमें उलझना ऐसे शीर्षकों वाले लेखों में बहुत संभव होता है। मुझे विश्वास है ये लेख हास्य दें या न दें, पाठक को कुछ नवीन प्रेरणास्पद मार्गदर्शी जीवनोनुभव अवश्य देंगे। घर-घर में अवश्य ही इनका स्वागत होगा। अतएव लेखिका साधुवाद का पात्र हैं।

डॉ. दयाकृष्ण विजय
पूर्व अध्यक्ष राजस्थान साहित्य अकादमी

हँसना जीवन के लिए अनिवार्य है


जीवन के लिए ‘हास्य’ नितांत आवश्यक है। पर आज जब संसार प्रगति के मार्ग पर अग्रसर है, भौतिक सुखों की उपलब्धि में मानव अपनी अमूल्य हँसी खो बैठा है। इस तेज दौड़ में हम कहीं अपनों से पीछे न रह जाएँ—यह भय हमें हर पल कचोटता रहता है। भाई चारे-सहानुभूति, सहृदयता, मानवीय संवेदना व स्नेह-प्रेम के नितांत अभाव ने आज केवल पारस्परिक ईर्ष्या, द्वेष, जलन को ही प्रोत्साहन दिया है। इस अंधी होड़ में प्रथम आने की व्यस्तता ने हमारे मुँह से हँसी छीन ली है। आज हमारे पास इतना समय ही कहाँ है कि हम बैठ कर दो घड़ी हँस लें—हँसा लें। परंतु यदि सच पूछा जाए तो मुनष्य और जानवर में अंतर ही क्या है, सिवा इसके कि मुनष्य हँस सकता है परंतु जानवर हँस नहीं सकता। अर्थात ‘हँसना’ मानवता का गुण है और न हँसना पशुता है।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार ऐसे कई मानसिक रोग हैं जिनका इलाज केवल हास्य द्वारा ही किया जा सकता है। खिल-खिला कर उन्मुक्त हँसी हँसना बहुत से रोगों की राम बाण औषधि है। हँसने से हमारे अंदर एक विशेष प्रकार की प्रक्रिया होती है जो अत्यंत स्वास्थ्यकर है। दिल खोल कर हँसना अच्छे स्वास्थ्य की निशानी है। हँसने से शरीर में शुद्ध रक्त का निर्माण होता है, रक्त बढ़ता है, रक्तचाप संतुलित होता है तथा बीमारी दूर होती है। खुश रहने वाले लोगों को हृदय रोग नहीं होते। बेन जानसन के अनुसार—‘हँसिये और स्वस्थ होइये’ हास्य जीवन में ‘टॉनिक’ की भाँति है। जिस प्रकार ‘टॉनिक’ से शरीर में स्फूर्ति आती है व रक्त संचार होता है उसी प्रकार हास्य से जीवन में स्फूर्ति आती है व रक्त-संचार होता है, विषाद की कालिमा छँट कर जीवन स्फूर्तिमय तथा आनंददायी हो उठता है।

साहित्य में वर्णित नौ रसों में एक रस ‘हास्य’ है। प्राचीन संस्कृत नाटकों में हास्य का पूरा ध्यान रखा जाता था। प्रत्येक नाटक के बीच-बीच में हास्य-प्रसंग अवश्य होते थे। विकृत, आकार, वाणि, वेश, मोटापा, थुल-थुल शरीर अथवा चेष्टाओं द्वारा हास्य की सृष्टि की जाती रही है। हास्य कई प्रकार के होते हैं—स्मित, हसित, विहँसित, अतिहँसति । इसके अतिरिक्त हास्य में अट्टहास, मंद हास तथा उपहास भी शामिल है। सभी भाषाओं के काव्य शास्त्रों में हास्य का कुछ न कुछ वर्णन अवश्य मिलता है। पाश्चात्य साहित्य में हास्य की काफी रोचक सामग्री मिलती है। हिंदी के माध्यकालीन युग में तुलसी, बिहारी, कबीर, जैसे महान् कवियों की रचनाओं में भी हास्य व्यंग्य का समावेश है।

हास्य की आवश्यकता को स्वीकार कर लेने के कारण ही आज फिल्मों में बीच-बीच में हल्के-फुल्के हास्य दृश्य अवश्य दिये जाते हैं। ताकि दर्शक फिल्मों की गंभीरता भूलकर दो घड़ी तनाव मुक्त हो लें। टुनटुन, मुकरी, महमूद, ओमप्रकाश, जानीवाकर, प्रीति गांगुली आदि ऐसे कलाकार हैं जो हर फिल्म में कोई विशेष रोल न होने पर भी केवल दर्शको को हँसाने गुदगुदाने के लिए ही लिए जाते हैं। कुछ लोग तो गंभीर फिल्म देखना पसंद ही नहीं करते। उनका तर्क है कि दैनिक जीवन की उदासी दूर करने के लिए ही तो वे फिल्म देखते हैं। सचमुच जीवन के दुःखों को कम करने के लिए ‘हास्य’ बहुत जरूरी है। जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश मकान के अंदर की गंदगी, सीलन, व अस्वस्थकर वातावरण को दूर कर रोशनी, चमक तथा गर्मी पहुँचाता है, उसी प्रकार ‘हँसी’ मुनष्य के अंदर के दुःख कष्ट की अनुभूतियों को दूर करके सुख, उत्साह एवं प्रेम का संचार करती है।

पुराने जमाने में जीवन की गति धीमी थी, लोगों के पास पर्याप्त समय होता था, उस समय के राजा-महाराजा, नवाब घंटों ताश, शतरंज खेलते थे, तीतर बटेर तथा पतंग के पेंच लड़ाते थे। दरबार में विदूषक होते थे—हँसना-हँसाना, चुटकुले, कहानी चलती ही रहती थी। अकबर-वीरबल विक्रमादित्य, राजा भोज के दरबार के लतीफे व किस्से आज भी बड़े चाव से पढ़े व सुनाये जाते हैं। होली-दीवाली पर जनता खुलकर रंग-व्यंग्य करती थी। शादी-ब्याहों में गाली-गलौज, एक-दूसरे पर फब्ती कसना नाच-गानों के माध्यम से चलता रहता था। ऐसे अनेक नेग-टेले थे जैसे कंगना-खिलावाना, मटकैने तुड़वाना डंडी खिलवाना व दूल्हे से शादी के पश्चात छंद सुनना जो केवल निर्मल-आनंद व विशुद्ध हास्य के लिए ही किये जाते थे। अब कहाँ वह नेग-टेले ? कहाँ वह सहन शक्ति जो हास्य-परिहास-व्यंग्य को पचा सके ? होली का त्योहार ही क्या हम उसके सही परिप्रेक्ष्य में देख पाते हैं ? आज हमें यह अपना सबसे अधिक बेहूदा त्योहार लगने लगा है !

वास्तव में हमारे जीवन में दुःख समस्याएँ व मानसिक तनाव इतने बढ़ते जा रहे है कि हँसना चाहकर भी हम हँस नहीं पाते फिर आज ‘विशुद्ध एवं मौलिक हास्य’ हमें ढूँढे़ से भी नहीं मिल पाता। जीवन नीरस बनता जा रहा है। यही कारण है कि पिछले दो-चार वर्षों से कवि सम्मेलन, साहित्यिक सम्मेलन न होकर हास्य सम्मेलन होते जा रहे हैं। जनता को हँसाने का मौका मिलता है तो वह हास्य कवियों के सम्मुख अच्छे शीर्षस्थ साहित्यकारों को भी टिकने ही नहीं देती है। वे बेचारे दूर-दूर से आकर भी केवल एक आध कविता कहने भर पर ही ‘हूट’ कर दिये जाते हैं जबकि तुकबंदी वाले, भावभंगिमाओं से रिझाने वाले, राजनीतिक छींटाकशी करने वाले, स्त्री-पुरूष संबंधों को लेकर व्यंग्य व नोक-झोक करने वाले छंद विहीन कवि (?) पद्य में गद्य कहते हुए घंटो मंच पर डटे रहते हैं। कवि-सम्मेलन साहित्य सम्मेलन न होकर अब भांड या विदूषक सम्मेलन होते जा रहे हैं। अच्छा हो कि अब कवि-सम्मेलनों का नाम ही बदल दिया जाये तथा उसमें उच्च साहित्य मनीषी बुलाये ही न जायें। इससे महान् साहित्यकारों का अपमान भी न होगा तथा जनता-जनार्दन भी प्रसन्न रहेगी। साहित्यिक गोष्ठी अलग से केवल प्रबुद्ध वर्ग के लिए ही हो।

तथाकथित उच्च समाज के प्रबुद्ध व्यक्तियों ने तो गंभीरता का जामा इस कदर ओढ़ लिया है कि वे गंभीरता को शीलनता का पर्याय समझने लगे हैं। हँसना-हँसाना उन्हें निम्नस्तरीय बातें लगने लगी हैं। हँसना-हँसना वे भूल चुके हैं। विशुद्ध हास्य के कार्यक्रम-लौरल-हार्डी की फिल्में, टी.वी. पर दिखाई जाने वाली— ‘गुडीज’, ‘लूसी’ तथा ‘लड्डू सिंह टैक्सीवाला’ उन्हें अब हँसा नहीं पातीं वरन् हास्य में भी वे कुछ काम की बात ढूँढतें रहते हैं। इसी वर्ग के लोगों में हृदय रोग व अन्य बीमारियाँ अधिक पायी जाती हैं। डॉक्टरों का मत है कि हास्य व्यंग्य को बड़े पैमाने पर जीवित करने के तुरंत कदम न उठाये गये तो हमारा समूचा देश दिल और दिमाग के रोगियों का अस्पताल बन जायेगा।

कहा जाता है कि पतले-सुकडे़ व्यक्तियों की अपेक्षा मोटे व्यक्ति अधिक खुशमिजाज होते हैं क्योंकि वे हँसते खूब हैं व स्वयं पर हँस पाने की शक्ति भी रखते हैं। वास्तव में स्वयं पर हँस पाना बहुत ऊँची चीज है। महात्मा गांधी के लिए ये प्रसिद्ध है कि वे खूब खुल कर हँसते थे और स्वयं को लक्ष्य करके हँसा करते थे। दूसरों की हँसी उड़ाना या ‘उपहास’ करना बहुत ही निम्न श्रेणी का हास्य है। इससे भलाई के बदले बुराई ही हाथ आती है। इससे जिसकी हँसी उड़ाई जाती है कई बार बुरा मानकर लड़ाई तक ठान बैठता है। द्रौपदी की दुर्योधन पर हँसी गयी ‘हँसी’ ने महाभारत का ऐतिहासिक युद्ध करवा दिया था। ‘उपहास’ को स्वस्थ हास्य नहीं कहा जा सकता।

उन्मुक्त हँसी, वह अनुभूति है जो मनुष्य को वेदना रहित करती है। भोले-भाले शिशुओं की उन्मुक्त किलकारियाँ सुन कर कौन आनंदित नहीं हो उठता ? एक क्षण के लिए उदास से उदास व्यक्ति भी खिलखिला उठता है ! जो स्वयं प्रसन्न रहता है, उसे प्रकृति का प्रत्येक अवयव हँसता मुस्कुराता दिखाई देता है। हरे-भरे बाग प्रसन्नता पूर्वक खिले तथा झरने कल-कल निनाद से हँसते तथा सूर्य व चंद्र मुस्कराते प्रतीत होते हैं, परंतु जो स्वयं दुखी व निराश होते हैं उन्हें प्रकृति भी फीकी व उदास दिखाई देती है। अतः जीवन से निराशा, बीमारी व दुःखों को दूर करने के लिए आप भी हँसिए, खूब हँसिए !!

किस्सा एक शादी का


भारतीय पद्धति एवं रीति–रिवाज के अनुसार सदियों पूर्व से लेकर आज तक विवाह के अवसर पर लड़के वाले बारात लेकर धूमधाम से लड़की वाले के द्वार पर जाते रहे हैं, चाहे वह किसी भी शहर, गाँव या कस्बे में क्यों न हो। अब बारात उन्हें चाहे बस से ले जानी पड़े या रेलगाड़ी से। हाँ, रेलगाड़ी से उतरते ही स्टेशन से ही उनकी खातिर-तवाजों का सिलसिला आरंभ हो जाता है और शादी के बाद डोली लेकर वापस अपने घर पहुँचने तक नाज-नखरों के साथ चलता रहता है। अपने जीवन भर के देखे सारे सपने व अभिलाषाएँ आखिर बेटे वाले को बेटी वाले की जीवन की समस्त कमाई पर जी खोलकर पूरी करने की आजादी होती है, पुरातन काल से ऐसा होता आया है। बेटी वाला भी ‘उफ’ नहीं करता, चाहे बिक ही क्यों न जाए अपनी बेटी की खुशी के लिए, आखिर बेटी वाला जो हुआ।

पर वाह री महँगाई ! बजाय इसके कि लड़के वाले बारात लेकर लड़की वालों के घर आएँ, इसने अब बेटी वाले को लड़के वालों के शहर में अपने परिवार जनों एवं रिशतेदारों–मित्रों की ‘घरात’ लेकर जाने को मजबूर कर दिया है। कहने का मतलब यह है कि अब लड़के वालों को दूसरे शहर में बारात लेकर जाने का खर्चा भी बरदाश्त करना गंवारा नहीं होता है। भारतीय रेलों व बसों ने किराए ही इतने बढ़ा दिए हैं तो वे बेचारे क्या करें ! अतः यह खर्चा भी अब बेटी वालों के सिर। सो बेटी वाले अब बारात लाने का खर्च लड़के वालों को देने के स्थान पर स्वयं ही अपना बोरिया-बिस्तर बाँधकर बेटे के शहर जा पहुँचते है और वहाँ जा कर विवाह करते हैं अपनी लाडली का।


अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book