जहाँपनाह मुसद्दीलाल - उमा वाचस्पति Jahanpanah Musaddilal - Hindi book by - Uma Vachaspati
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जहाँपनाह मुसद्दीलाल

उमा वाचस्पति

प्रकाशक : शारदा प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :201
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5325
आईएसबीएन :81-8099-035-4

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टी.वी.सीरियल ‘दाने अनार के’ का मूल एवं संपूर्ण रूप...

jahanpnah musaddilal

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

जब मुसद्दी को पता चला कि रूपबाला ने उनका जीवन चरित्र लिखकर छपने दे दिया है तो उन्होंने प्रश्नवाचक मुद्रा में बेग़म की तरफ देखा, बेग़म ने कहा, ‘‘मैंने सोचा, खुदा न करे आपको पौस्थ्यूमस नोबल प्राइज़ मिले और उस समय मैं न होऊं तो कहीं लोग आपके बारे में ऐसी-वैसी बातें न लिख दें, इसी लिए मैंने आपकी ऑथेन्टिक बायोग्राफी लिख दी है। वैसे तो आप के बारे में लिखने को बहुत कुछ है, लेकिन और फिर कभी...’’

एक

मुसद्दीलाल को अपना नाम बिल्कुल पसन्द नहीं था, इसलिये उन्होंने अपने घर में सबसे सुन्दर नाम वाली अपनी पत्नी रूपबाला के नाम से लाटरी का एक रुपये का टिकट खरीदा था।

जब टिकट लेकर घर पहुँचे तो बड़े लड़के को चुपचाप बुलाकर बैठक के पिछली तरफ ले गए और पूछा, ‘‘क्यों मुन्नू, लाटरी हमारे नाम निकलेगी, जरा आँख मूँदकर ध्यान लगा।’’

मुन्नू की बात कई दफा सच हो चुकी थी। मुन्नू माँ से गेंद के लिये ज़िद करने के कारण पिट-पिटाकर बैठा था, उबल पड़ा, ‘‘कभी नहीं आयेगी।’’ मुसद्दीलाल ने एक चाँटा लगाया, ‘‘बदमाश ! आयेगी, और कह रहा है, नहीं आयेगी।’’

माँ ने जो हल्ला सुना तो दौड़ी आई, ‘‘दफ्तर से आते ही क्या भूत सवार हो गया ? बेचारा मुझसे पिटे और आप से भी मार खाये, जी लिया यह तो।’’

पत्नी के पीठ फेरते ही मुसद्दी छोटे लड़के को लेकर सड़क पर उतर आए। बच्चा अभी सवा साल का ही था, बड़े प्यार से पुचकारते हुये पूछा, ‘‘चुन्नू ! पैसे आयेंगे न, बहुत सारे ?’’ बच्चे ने क्या समझा, वह तो भगवान जाने, पर हुँकारा भर कर सिर हिला दिया। मुसद्दी मुश्किल से सीढ़ियाँ चढ़ पाए, मारे खुशी के पाँव लड़खड़ा रहे थे, उन्हें विश्वास, था कि मासूम बच्चा जो कह दे, वह होता ही है। जब वह मैट्रिक में तो रिजल्ट निकलने वाले दिन उन्होंने अपनी डेढ़ वर्ष की बहन से पूछा था कि वह पास हो जायेंगे, तो बहन ने सिर हिला दिया था और वह पास हो गए थे।
खुशी रात तक किसी तरह दिल में छिपाये रहे। जब बीवी सब काम से फारिग़ होकर पास वाली खटिया पर लेटी तो धीरे से पुकारा, ‘‘बेग़म।’’

अपना नया नामकरण सुनकर रुपबाला चौंकी ‘मुन्नू की माँ’ से ‘बेग़म’? मुसद्दीलाल ने समझाया, ‘‘अस्सी हज़ार की लाटरी आने पर कितने ही नौकर और नौकरानियाँ होंगी, उनके सामने ‘मुन्नू की माँ कहने से तुम्हारी बेइज्जती होगी। सब्ज़ीवाली ‘छुन्नू की माँ’ है, जमादारिन तारो की माँ। अब से तुम बेग़म और हम जहाँपनाह--‘मुन्नू के चाचा मत पुकारना।’ कलुआ नाई की बीवी भी कलुआ को ‘गुन्नू के चाचा’ पुकारती है। हाँ, याद रखना, तुम बेग़म और हम जहाँपनाह।’’
‘‘अरे ! अभी तो दस दिन पड़े हैं, नतीजा तो निकलने दो।’’ रुपबाला ने हँसते हुए कहा।
‘‘मुझे तुम्हारी यह रोने वाली आदत बिलकुल पसन्द नहीं। आशा रखनी चाहिए, आशा ! आशा पर दुनिया कायम है।’’

दूसरे दिन दफ्तर से लौटते ही हुक्म हुआ, ‘‘बेग़म, बस खिचड़ी चढ़ा दो, इन्तजाम बहुत करना है, समय सिर्फ नौ दिन का है। जल्दी से खिला-पिलाकर काम निबटाओ, बजट बनाना है। अब तक बिना बजट के चले इसी से सदा दिवाला निकला रहा।’’ रूपबाला अपने पति को देवता समझती थी, इसलिए हुक्म के मुताबिक आठ बजे ही सब काम से निबट गयीं। बच्चे डरा-धमकाकर सुला दिये गये।

मुसद्दीलाल दौड़कर पास की दुकान से एक नोट-बुक उधार ले आये, पेंसिल घर में मिल गई।
बीवी को फिर हुक्म हुआ, ‘‘काम मुश्किल है, इसलिए दरी बिछा ली जाये और लिहाफ को मोड़कर गाव तकिया बना लिया जाये।’’ अपने आप आराम से बैठकर उन्होंने बीवी को भी आराम से बैठने की ताकीद की।
‘‘हाँ, तो हाथ में अस्सी हज़ार नोट करो। सबसे पहले, जिनसे हमने उधार लिये हैं उनको देने हैं, एक हज़ार सूद-ब्याज सहित होंगे बल्कि सौ सौ ऊपर से..नहीं, नहीं काटो, यदि पहले उधार चुकाना शुरू किया तो सब उधारखाते में ही चला जायेगा। पहले कथा कहलाई जायेगी, लिखो एक हज़ार। घर में इतने आदमी आएँगे, बच्चों के पास कपड़े नहीं, मेरे तुम्हारे पास कौन से हैं ? लिखो, कपड़े एक हज़ार। चौंको मत, कौन दर्जी से सिलवाये जायेंगे। हाँ, अभी तक तुम नकली जेवर पहनती हो, लिखो जेवर पाँच हज़ार। हँसने लगीं ? वाह मेरी जान ! तो कपड़े भी हो गये, जेवर भी हो गये। इस मकान को सजाने का खर्च भी करना होगा, लिखो, सोफासेट आदि एक हज़ार। इतने बढ़िया कपड़े, इतना जेवर पिकनिक नहीं मनेगी ? कौन टैक्सी में जायेगा, लिखो, फर्स्ट क्लास कार पच्चीस हज़ार। ओ बाबा। सबसे पहले तो यार दोस्त मिठाई खाएँगे। लिखो, फर्स्ट क्लास डिनर, पाँच हज़ार।’’

कुछ देर पाँव सहलवाने के बाद मुसद्दी गम्भीर मुद्रा में बोले, ‘‘खर्च की तो कोई हद नहीं, मँहगाई का ज़माना ठहरा। देखो, धोबन को तो घर पर ही रख लिया जायेगा, वही जो पैरों में पायल पहनकर छमछमाती पास से निकल जाती है, पसन्द है न तुम्हें ? जमादारिन भी पूरे टाइम रहेगी, सारे दिन तुम्हें इन बच्चों का गंद उठाना पड़ता है। और हाँ, अब यह दूधवाला भैंसों सहित घर पर रहेगा, देखूँ कैसे दूध में पानी मिलाता है। इनके अलावा खाना बनाने वाला, बर्तन माँजने वाली, चौंकीदार और एक दो बाँदियाँ तुम्हारी सेवा-टहल के लिये रहेंगी। वैसे तो एक चपरासी हमें भी चाहिए, परन्तु जमाना मँहगाई का है, इसलिए हम अपनी फाइलें खुद ढोकर दफ्तर ले जाया करेंगे।’’ कहते कहते रुक गये और एक बार जोर से हँसकर बोले, ‘‘हम कितनी बेवकूफी की बात कह गये बैग़म, और तुमने टोका भी नहीं। तुम पानदान लेकर बैठी रहना और हम...तुम्हें देखा करेंगे। शादी के दस महीने बाद तो तुम मून्नू की माँ बन गई थीं, और फिर हमारा सारा रोमाँस बीच में ही ठप्प हो गया था, खैर ! कोई बात नहीं अब फिर चालू।’’

रूपबाला तिनकर जो उठने लगी तो हाथ पकड़कर बैठाते हुए कहा, ‘‘अच्छा अब जोड़ लो, कितने बचे ?’’
जोड़ लगाया ही जा रहा था कि एक मित्र आ धमके। चुपके से नोटबुक यह सोचकर सरका दी कि कहीं मित्र-वैसी बात मुँह से निकालकर अपशकुन न कर दे।
एक बार एक परीक्षा में बैठने की सोच रहे थे कि एक दोस्त ने नाक मार दी थी, ‘‘इस उम्र में क्या पढ़ेगा ?’’ बस वह इम्तिहान नहीं दे सके।

लगातार आठ दिन, शाम को सात-आठ बजे तक काम निबटाकर मियाँ-बीवी बजट बनाते, परन्तु उनकी समझ में जैसा होना चाहिए था, बजट न बना, आखिर अचानक एक बार बहुत बढ़िया बजट बन ही गया, परन्तु बाद में पता लगा कि अगर कभी कोई बीमार पड़ जाये तो हिसाब में एक धेला भी न निकले। फिर सब ओर कटौती की गई तो बेग़म नाराज़ हो गयीं, ‘‘अस्सी हज़ार आने के बाद बीमार ही कोई क्यों पड़ेगा ? घर में घी, दूध मक्खन, फल, सब्जी सभी कुछ तो होगा। बीमारी, वह घर में घुसी तो उसकी टाँग न तोड़ दी जायेगी ? हाँ आज जब मैंने घी माँगा तो बनिये ने वही डालडा एक छटाँक तौल दिया। मेरा तो पारा चढ़ गया, अस्सी हज़ार के हम मालिक और डालडा ? मैंने डाँटकर कहा, असली घी दो। बेचारा बनिया रौब में आ गया।’’

‘‘बहुत होशियार हो, आखिर नूरजहाँ हो। अब इतने नौकर-चाकर घर में होंगे, यह सल्तनत तुम्हें ही तो सम्भालनी है न ! हाँ ! तो बेग़म एक बात मानोगी ? अब पीना शुरू कर देंगे। जिंदगी में एक बार मज़ा आ जायेगा। अच्छा, आज ही एक पौव्वाभर टेस्ट करके देखेंगे। तुम भी चखोगी ? अच्छा, अच्छा, न सही। तुम बस सुराही में से डालती जाना, नूरजहाँ की तरह। सुराही सोने की होगी, गिलास चाँदी का पड़ा है न जो तुम्हारी माँ ने मुन्नू के जन्म पर भेजा था ? बस ठीक है। बढ़िया-सा कालीन खरीद लेंगे, इधर-उधर लोबान जलाकर, इत्र छिड़ककर हम लेटे होगे और तुम पास आगरे के जरी किनारी मढ़े लहँगे टुपट्टे में, आँखों में खुमानी-सी भरकर हमारे पास बैठी होंगी। कभी लखनऊ का ज़र्दा डालकर गिल्लौरी पेश करोगी, कभी फर्शी हुक्के को नै (बीड़ी छोड़ देंगे), हमारे मुँह में लगा दोगी और कभी सुराही से गुलाबी शर्बत...वाह मेरी बेगम..तुम तो अभी से शरमाने लगीं।’’

आखिर पच्चीस तारीख हो गई, छब्बीस को रिजल्ट निकलना था। सुबह से ही मुसद्दीलाल बौखलाए घूम रहे थे, ‘‘क्या मुसीबत है, बेग़म, तुम तो बिल्कुल मदद नहीं कर रहीं। पाँच सौ आदमियों की लिस्ट बनानी है, अभी कुछ भी इन्तजाम नहीं। कहाँ से शामियाना, ,कहाँ से बर्तन...फिर मिठाईवाले को आर्डर देना है....बैरे-खानसामे, कैसे सब होगा ? सिर घूम रहा है।’’
रुपबाला थीं तो सीधी-साधी, परन्तु इस समय जिव्हा पर सरस्वती आ बैठीं, ‘‘आज कल घर पर कोई नहीं खिलाता, फिर हम क्या ऐसे-वैसे हैं ? किसी बढ़िया से होटल में डिनर दे दो।’’ मुसद्दी ने लपककर बेग़म को बाहों में भर लिया।
ऑफिस का टाइम हुआ देखकर रूपबाला ने कहा, ‘‘शाम को आर्डर दे देना आखिर वो खाना कल के लिये आज तो पकाकर रखेंगे नहीं। दफ्तर जाइये, दस तो यहीं बज गये।’’

‘‘एक मिनट में नूरजहाँ की तरह फरमान जारी करती हो और दूसरे क्षण साधारण औरत की-सी बात करती हो, दफ्तर कौन जा रहा है। स्तीफे की चिट्ठी लिख दी है, लाला संतराम के घर भिजवा दो, दफ्तर में दे देंगे। नहीं इसकी भी ज़रूरत नहीं, मूर्खों को खुद अकल होनी चाहिए कि अस्सी हज़ार आने के बाद कोई उनकी नौकरी क्यों करेगा। बस बेग़म, अब तो तुम्हारी ही नौकरी करेंगे। ज़रा एक पान तो खिलाओ बढिया-सा। केवड़ा कहा था न तुमसे मँगाने को ? कत्थे में, मंगाकर डाल दो। ज़र्दा तो, वह अपना लँगोटिया यार है न हरिराम, वह लखनऊ से लायेगा, कह दिया है मैंने। हाँ भई, चलना चाहिए। आज तो तुम हमें वह मखमल की धोती और लखनऊ वाला चिकन का कुर्ता निकाल दो। ऐं ? फट गए दोनों ? कब, कैसे ? ओ मुन्नू के बच्चे, चल जल्दी कर तैयार हो। मोटर देखनी है, कुतुब तक की ट्रायल लूँगा। चलो तुम तैयार हो जाओ...नहीं, नहीं बेग़मों को हरम में ही रहना चाहिए।..हाँ, एक बात तो दिमाग़ से उतर गई, एक ड्राइवर भी रखना होगा। सारे दोस्त अपनी कार में ही लाये जाएँगे।’’

मुसद्दीलाल जब होटल में गए तो बड़े अन्दाज़ से अकड़ते हुए मैनेजर के पास गए। कुछ क्षण तो उसकी ओर देखा ही नहीं। फिर इशारे से उससे कहा कि वह पास खड़े सब लोगों को हटा दे, एक प्राइवेट बात करनी है। सबके हट जाने पर कान के पास मुँह करके बोले, ‘‘तुम पाँच सौ आदमियों का खाने का प्रबन्ध कल शाम को कर सकते हो ?’’
मैनेजर ने मुसद्दी के कपड़ों और चेहरे का मुआयना करते हुए कहा, ‘‘हाँ, हो सकता है।’’
‘‘बस, तो कर डालो।’’
‘‘कुछ एडवांस जमा कर जाइये।’’
‘‘जमा ? बस जमा ही समझो। देखो, तुम हमारे अपने आदमी हो, किसी से कुछ न कहो तो बतायें।’’ मुसद्दी ने मुँह मैनेजर के कान के और पास कर लिया।
‘‘हाँ, हाँ, फरमाइए।’’

‘‘बात ये है, कल है छब्बीस तारीख, हमारी अस्सी हज़ार की लाटरी...तुम समझे नहीं ? अस्सी हज़ार की लाटरी आ रही है। कम से कम पाँच सौ दोस्तों को तो तुम्हारे होटल में डिनर देना ही होगा। चाहिए कि नहीं ? बस, ऐसा खाना खिला दो, जैसा आज तक किसी ने न खिलाया हो। पैसे कहीं नहीं जाते। हाँ, हमारा पता नोट कर लो...क्या बात है, तुम नोट नहीं कर रहे ?’’
‘‘याद रहेगा। आप तशरीफ तो ले जाइए।’’ जब होटल वाले ने कहा तो मुसद्दी को उसके कहने का ढंग बिल्कुल पसन्द नहीं आया, परन्तु सोचकर कि शायद इसको कब्जी की शिकायत है, घर लौट गये।


दो।



बेग़म तो रात भर सोती रहीं, परन्तु जहाँपनाह न सो सके, रात भर में पूरा घड़ा खाली कर दिया, बड़े घर भी कई दफा गये-परन्तु उन्हें विशेष चिन्ता नहीं हुई..कोई बड़ा काम करने से पहले घर के बड़े को यह शिकायत हो ही जाती है।
सुबह चार बजे ज़िन्दगी में पहली बार, रसोई में एक तख्ते पर रखी जगदम्बा की मूर्ति को नमस्कार करके बोले, ‘‘हे माता ! मेरी मनोकामना पूरी कर दे तो ग्यारह कन्याओं को ओढ़नी उढ़ाऊँ और साकुम्बरी देवी तक नाक रगड़ता जाऊँ।’’ उन्हें अपनी मौसी के वह शब्द याद आ रहे थे जो वह अपनी लंगड़ी बेटी के ब्याह के लिये एक साल तक, दिन में कई दफा दोहराया करती थीं।
इसके बाद जैसे-तैसे एक कप चाय पी कर, सड़क की ओर वाली मुँडेर के पास स्टूल रख कर जा बैठे। जब उकता गये तो अखबार हाथ में ले लिया, परन्तु झट यह सोचकर कि कहीं तार वाला निकल न जाये, अखबार फेंक दिया, आने-जाने वालों को ग़ौर से देखते रहे। आखिर नीचे जा कर आस-पास की सब दुकानों पर कह आये, ‘देखो, हमारी पत्नी रूपबाला...अच्छी तरह सुन लो, उनका ना रूपबाला’’, उनके नाम से तार आयेगा, तुम तार वाले को फौरन ऊपर भेज देना। या भाई, राम तुम्हारा भला करे, हमें ही पुकार लेना, ओ छोकरे, पाँच नये पैसे ही हैं इस समय हमारे पास, फिर दूँगा तेरा इनाम, बस जैसे ही तार वाला दीखे, मुझे पुकार लेना।’’

मुसद्दी उस सख्त धूप में भी मुडेर के पास से हटते न थे। बीवी उबल रही थी, ‘‘जरा से में लू लग जाये तो निकल जायेंगे अस्सी हज़ार। चलिये कमरे में।’’

परन्तु मुसद्दी अन्दर बाहर करते ही रहे। उन्हें डर लग रहा था कि कहीं तारवाला किसी और को तार न दे डाले या लौट जाये।
आखिर दो बज गये, उन्हें जैसे निराशा सी होने लगी थी। इसी समय एक कौवा आकर बरामदे में बंधे बाँस पर बैठकर ज़ोर-ज़ोर से काँव-काँव करने लगा। मुसद्दी जोर से चिल्लाये, ‘‘ओ मुन्नू ! कहाँ है, जरा खाट खड़ी कर उस पर चढ़ कर देख, कहीं तारवाला इसे दूर से आता दिखाई दिया है...इनकी आँख बड़ी तेज़ होती है बेग़म बस मज़ा आ गया, स्टोव जला कर चाय का पानी तो रख दो, जरा लपक कर साथ मिठाई भी ले आओ, तारवाले का मुँह तो मीठा करना ही होगा। वह भी क्या याद रखेगा किसी का तार लाया था। बेगम कौवा चीखे जा रहा है।... मेरी कसम खाकर बताओ, पहले यह कभी यहाँ बैठ कर ऐसे चीखा है ?...मेरे यार तेरी सौ के बदले दो सौ की उमर हो—तेरी चोंच सोन से मढ़वा दूँगा। मुन्नू, लाल स्याही की दवात लाना, इस पर छिड़क दूँ जिससे पहचानने में दिक्कत न हो...कल सवेरे तेरी ही दावत रही—बता खीर खायेगा या मीट। बस, बुला ले तारवाले को।’’
स्याही के छींटे पड़ते ही कौवा जो उड़ा तो मुसद्दी चिल्लाये, ‘‘देख मुन्नू किधर को गया है ?’’
‘‘पापा जी, पहाड़ी की तरफ गया है।’’
‘‘ठीक, ठीक पोस्ट ऑफिस उधर ही है।’’

‘‘मियाँ किसका तार आने वाला है ? साली आ रही है क्या ?’’ कहते हुए एक पड़ोसी मित्र जीना चढ़ते दिखाई दिए।
पहले तो मुसद्दी ने बात छिपानी चाही लेकिन यह सोचकर कि तार वाला तो आ ही रहा है, अब नजर क्या लगेगी, बता दिया।
मित्र थोड़ी देर बाद यह कहते हुए उठ खड़े हुए कि तार आते ही खबर देना, मिठाई फौरन मिलनी चाहिए।
रूपबाला को यह बात बिल्कुल नहीं जँची, कुछ नाक-भौं सिकोड़ कर बोली, ‘‘भाई साहब, वहाँ तक आने की फूर्सत आज बिल्कुल नहीं होगी। हाँ, खबर आपके कानों में पहुँच जाएगी। यह पुराना पानी का घड़ा मैं ऊपर से सड़क पर फेंकूँगी, आप फौरन चले आइएगा, मिठाई तैयार मिलेगी।’’ रूपबाला इस पुराने घड़े को देख-देखकर रोज कुढ़ती थी, परन्तु अभी तक नया लेने के लिए बजट में व्यवस्था नहीं हो सकी थी।

शाम के पाँच बज गए, आँखें थक गईं परन्तु तारवाला न आया। आखिर बेग़म से न रहा गया, ‘‘छोड़ो इस झगड़े को, क्या मुसीबत हो गई। गाँठ की सूखी रोटी भी आज नहीं मिली। चलो बैठो आराम से, चाय तो पीयें।’’
रात बड़ी बेचैनी से कटी, घंटियाँ कई बार बजीं, परन्तु पता लगा कि सामने की पहाड़ी पर दूधवालों की भैसों के गले की घंटियाँ थीं, तारवाले की नहीं।
सुबह यह कहकर तौलिया लेकर नहाने चले गए, ‘‘अच्छा हुआ बेग़म लाटरी नहीं आई। पता नहीं किन-किन बेइमानों, रिश्वतखोरों का पैसा हमारे पास आता। ईमानदारी की कमाई में अपने यहाँ बहुत बरकत है। बच्चे अच्छे रहें, हमें दो लाख के दो लाल तो मिले हुए हैं, रिजर्व बैंक में ही समझो। चिन्ता काहे की है ?’’ परन्तु कहते-कहते भी एक बार सड़क पर झाँक लिया, सोचकर कि हो सकता है तार की लाइन ही खराब हो गई हो...कभी-कभी तो तार दो-दो दिन बाद मिलता है।


तीन



मुसद्दीलाल ऑफिस की टेबल के ऊपर पैर फैलाये, छत की ओर एक टक ताकते हुए कुर्सी की पीठ का सहारा लिए निरन्तर बीड़ियाँ फूँक रहे थे कि चमनलाल ने भड़ाक् से दरवाजा खोला, ‘‘क्यों रे मुसद्दी, तेरी घड़ी बंद हो गई क्या ?’’
‘‘बन्द हो तेरे बाप की, मेरे साले की दी हुई फेब्रेल्यूबा क्यों बंद हो ?’’
‘‘अरे, मेरे बाप की बात क्या करता है ? उसकी घड़ी क्या, दिल की धड़कन ही कभी की बंद हो चुकी। अरे भाभी तुझे रो रही होगी। कब खाना खाने जाएगा ? कब लौटेगा ?’’
‘‘यार, बात ये है कि मुझे जाना ही नहीं। तेरी भाभी मुझे तेल की छुकी दाल खिलाएगी जो मैंने कभी पीहर और ससुराल में भी नहीं खाई।’’

‘‘देख यार, तू इस छोकरी की उपासना बंद कर दे। सारी दुनिया लक्ष्मी की पूजा करती है, तू इस बिना घर-बार की सरस्वती को पूजता है। हालत तो देख अपनी, कल तेरी शेम-शेम होते बच गई, जल्दी से तूने कुरता ठीक न कर लिया होता तो तेरी टिली-लिली हो जाती। मैं तुझे सुन्दर-सा लक्ष्मी का चित्र ला दूँगा। मेरे कहने से तू एक बार लक्ष्मी की आराधना करके तो देख।’’ चमन ने कहा।
और सुनते हैं, दूसरे दिन से मुसद्दी ने बड़ी जोर से लक्ष्मी का पूजन आरम्भ कर दिया। मुसद्दी जो अब तक सरस्वती का अनन्य भक्त था...वह और लक्ष्मी का पूजन ? लक्ष्मी का सिंहासन हिलने लगा।

लक्ष्मी का दरबार लगा हुआ था कि सिंहासन के पाये एकदम ऐसे चर-चराने लगे जैसे भूकम्प आ गया हो, तो फौरन चित्रगुप्त को बुलवाया गया। ऐसी लाइट्रिंनग कॉल पर चित्र गुप्त का कान में कलम अटकाए, धोती की लाँग उनसते फौरन हाज़िर हुए। लक्ष्मी ने पूछा, ‘‘चित्रगुप्त मृत्युलोक में एक मुसद्दीलाल है, उसका खाता देखकर बताओ, उसके हिसाब में कुछ बकाया है ?’’
चित्रगुप्त के ऑफिस में मृत्युलोक के एक एक आदमी का अपटूडेट खाता रहता था परन्तु मुसद्दी एक ऐसा व्यक्ति था जिसका रजिस्टर आते ही एक तरफ रख दिया जाता था। उस बेहिसाब आदमी का हिसाब रखने को कोई भी एकाउन्टेन्ट तैयार नहीं होता था, इसलिए चित्रगुप्त सिर खुजाते हुए लक्ष्मी के दरबार से लौट गए।
मुसद्दी ने जब लक्ष्मी का पूजन आरम्भ किया तो उसमें एकाग्रता से लीन हो गए जैसे कि वह पहले सरस्वती की आराधना में खो जाया करते थे, वह कुछ भी करते हों, थे तो कवि और कालकार। लक्ष्मी के नाम पर आठ आने वाला पुष्पा धूप का पैकेट एक दिन में लग जाता था।

एक महीने तक बराबर जब मुसद्दी ने लक्ष्मी को याद किया तो उसका एक पलंग तो अनसर्विसेबल करार दिया जा चुका था और सिंहासन इस बुरी तरह हिलने लगा था कि कुछ हीरे-पन्ने फिर से एरल्डाइट से चिपकवाने पड़े। उस दिन सिंहासन कुछ इस बुरी तरह हिला कि लक्ष्मी को दोनों हाथ से पकड़ कर अपने आप को सम्भालना पड़ा। चित्रगुप्त को हॉट लाइन पर बुलाया गया उनके आने पर लक्ष्मी ने पूछा, ‘‘चित्रगुप्त लगता है तुम सठिया गए हो। मुसद्दी का हिसाब बना ?’’
‘‘एक कर्मचारी लगाया है, आज ही सारा एकाउन्ट डिपार्टमेंट इस काम पर लगा देता हूँ।’’
‘‘सारा दफ्तर ?’’
‘‘जी,। जी वह आदमी सारी ज़िंदगी कुछ ऐसे चला है कि उसका हिसाब लगाते वक्त मेरे क्लर्को को कई-कई गोली एनासीन की खानी पड़ती हैं। होल-सेल में सिरदर्द की दवा लेने एक बार तो नारद जी को भेजना पड़ा था। आप चाहती हैं तो मैं इस काम पर कुछ एक्स्ट्रा स्टाफ भी लगा देता हूँ। बस, मुझे एक सप्ताह की और मोहलत दीजिए।’’

ठीक है एक सप्ताह बाद चित्रगुप्त स्वयं लक्ष्मी के सामने पहुँचे और हाथ जोड़कर खड़े हो गए।
‘‘कुछ सफलता मिली ?’’ लक्ष्मी ने पूछा तो चित्रगुप्त ने इन्कार में सिर हिला दिया। चित्रगुप्त जैसा हिसाब में माहिर तीन लोक में दूसरा नहीं था, लक्ष्मी जानती थी, समझ गई कि मामला उसे स्वयं ही निपटाना होगा।
उस समय मृत्युलोक में रात थी और मुसद्दी पड़ोस के सेठ साहब की गाय के दूध के ऊपर से उतारी मलाई से बने घी की पूरियाँ, तली हुई मछलियों के साथ खाकर खुर्राटें ले रहे थे कि लक्ष्मी के सामने उपस्थित कर दिया।
मुसद्दी की आँखें लक्ष्मी के दरबार की सजावट, उसमें जड़े हीरे-जवाहरात की चमक-दमक से चकाचौंध हो गयीं, जोर-जोर से आँखें हाथों से मलीं।

‘‘कहो मुसद्दी कैसे हो ?’’ लक्ष्मी ने पूछा।
कवि और कलाकार मुसद्दी ने कल्पना में लक्ष्मी का जो रूप बनाया था उससे लक्ष्मी की समानता पाने के बाद उन्हें यह जानने में देर न लगी,‘‘जी, अच्छा हूँ।’’ उन्होंने अपनी तहमद सम्भाते हुये कहा।

‘‘इन दिनों तुम हमें बहुत याद कर रहे थे, हाथ कुछ तंग है क्या ?’’
‘‘नहीं, ऐसी कोई खास बात तो नहीं, अभी कुछ देर पहेल ही कामधेनु जी वो पड़ोसी की गाय है न, उसके घी की कचौरियाँ और फ्राइड पाप्लेट..’’ कहते कहते
मुसद्दी घबरा गए, लक्ष्मी ठेठ शाकाहारी, उसके सामने कैसी बात कह दी ?



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