कक्काजी कहिन - मनोहर श्याम जोशी Kakkaji Kahin - Hindi book by - Manohar Shyam Joshi
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कक्काजी कहिन

मनोहर श्याम जोशी

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2007
पृष्ठ :175
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5332
आईएसबीएन :81-8143-670-9

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एक चर्चित नाटक...

Kakkaji Kahin

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

अगर लोगों से पूछा जाए, कि दूरदर्शन से प्रसारित सत्ता-प्रतिष्ठान पर सबसे करारी चोटें करने वाला कौन सा सीरियल था तो वे बेहिचक जवाब देगें-‘कक्काजी कहिन’। दर्शकों के लिए इसका प्रसारण जितने सुखद आश्चर्य का विषय था, उतने ही दुखद आश्चर्य का विषय था दफ्तरशाहों और नेताओं के लिए। तो यह भी सच है कि एक दुस्साहसिक दफ़्तरशाह, तत्कालीन सूचना-प्रसाऱण सचिव एम.एस.गिल ने ही जोशी जी से बी.बी.सी.के ‘येस मिनिस्टर’ जैसी कोई चीज लिखने को कहा था। लेकिन उनके सेवा-निवृत्त होते ही यह कहा गया की ‘येस मिनिस्टर’ जैसी चीज दूरदर्शन नहीं दिखा सकता। तो जोशी जी ने धारावाहिक दुबारा लिखा और मुख्य भूमिका से मंत्री जी को हटाकर अपने पुराने व्यंग्य स्तम्भ से नेता जी को बैठा दिया।

इस धारावाहिक के प्रसारण में तरह-तरह के अड़ंगे लगाए गए। पहले उसे बनाने ही नहीं दिया गया। बनाने की अनुमति दी तो दो पायलट नामंजूर कर दिए गए और आखिर में धारावाहिक का प्रसाऱण हुआ भी तो ‘नेता जी’ को ‘कक्का जी’ बनवा कर और हर एपीसोड में से कुछ अंश कटवा कर और कुछ संवादों की बोलती बन्द करवा कर। इसके बावजूद सत्तावान बिरादरी ने इस धारावाहिक का यह कहकर विरोध किया कि देश के नेताओं को बदनाम किया जा रहा है तो दफ्तरशाहों ने तेरहवें एपीसोड पर ही धारावाहिक की तेरहवीं करवा दी।

‘कक्का जी कहिन’ लेखक के ‘नेताजी कहिन’ से प्रेरित है और दोनों का चलनायक गोया चालू नायक भी एक ही है लेकिन ‘कक्काजी कहिन’ और ‘नेताजी कहिन’ की शैली और सामग्री दोनों ही बिल्कुल अलग हैं। इसलिए ही नहीं कि टेलि-नाटक की विधा व्यंग्य स्तम्भ लेखन की विधा से अलग होता है। बल्कि इसलिए भी कि-‘कक्का जी कहिन’ में अनेक ऐसे प्रसंग और पात्र हैं जो ‘कक्काजी कहिन’ में नहीं रखे जा सके या रखने नहीं दिए। सेंसर का तो यह हाल था कि नेताजी का, क्षमा कीजिए कक्का जी का, ओठों के आगे अँगुलियाँ लगाकर पीक की पिचकारी छोड़ना भी धारावाहिक में दिखाया नहीं जा सका।
व्यंग्य लेखन के लिए ‘अट्ठहास शिखर सम्मान’ ‘चकल्लस पुरस्कार’ और ‘शरद सम्मान’ से विभूषित मनोहर श्याम जोशी की इस व्यंग्य-कृति को पढ़कर आपको अवश्य आनन्द आएगा।

नेता का निर्धारित लक्ष्य: एक करोड़ रुपया

एक छोटे से कस्बे में रहने वाला बी.ए.फेल नौजवान बुधना दिल्ली जाने की तैयारी में अपना बिस्तर गोल कर रहा है। इसी बीच वह अपने किसी दोस्त के सवालों के जवाब भी देता जा रहा है।
दोस्त: अरे ओ बुधना कहाँ की तैयारी है ?
बुधना : जनसेवक की दौड़ राजधानी तक। दिल्ली जाय रहे हैं अपनी किस्मत आजमाने।
दोस्त: दिल्ली में क्यों ?
बुधना: सेर बनने का फैसला किए हैं हम और तुम जानो जब गीदड़ को सेर बनने की सूझती है तब ऊ दिल्लीयै दरबार की तरफ दौड़ता है।
दोस्त: पढ़ाई-लिखाई छोड़ रहे हो का ?

(बुधना चूना तम्बाकू रगड़ने लगता है।)
बुधना: वो अईसा है कि जब से किताबें खोलकर परीक्षा दिए के बावजूद बी.ए.में हम फेल हुए हैं तब से इस सिक्सा ब्यौस्था से हमरी आस्था टोटली में उठ गई है।
दोस्त: दिल्ली में रिहाइश और गुजर-बसर का जुगाड़ कैसे करोगे भाई ?
बुधना : अरे हम कौनो देहाती लावारिस लल्लू केटेगरी में थोड़े ही जा रहे हैं दिल्ली। हम तो गजानन बाबू के पी.पी. बनकर वहाँ पहुंच रहे हैं।
दोस्त : पी.पी. क्या ?

बुधना : पी.पी. नहीं बूझते हो ? परम पुछल्ला। तुमको तो पता ही है कि गजानन बाबू का अस्टेट की राजनीति से पत्ता काटने के लिए उन्हें विधानसभा से राज्यसभा में लतिया दिया गया है। हमने जाके उनके चरण पकड़े और कहा कि अब हमरा खेला भी नयसनल लयवल पर करवा दिया जाए। आप फर्स्ट क्लास में जाए रहे हैं हमें अटेन्डेन्ट वाले टिकट पर साथ ले चलें। आप वहाँ कोठी में रहिएगा हमको आउट हाउस में जगह दे दीजिएगा। आपकी दया से अब हमहूँ अपनी किल्ली दिल्ली में गाड़ब।
(बुधना हँसकर तम्बाकू की चुटकी मुँह में रखता है और फिर से बिस्तर बाँधने लगता है।)
(एक ही साल में दिल्ली में जनसेवक बुधना कक्काजी के नाम से मशहूर हो गए।)

कक्काजी एक पार्टी में पाँच-छह आदमियों से घिरे खड़े हैं। वह बाजू वाले व्यक्ति की पीठ पर जोर से धौल जमाते हैं-धौल खाने वाला कराहता-सम्हलता है।
कक्काजी : (हँसते हुए) उसके बाद ससुर ने कभी आँख नहीं मिलाई। (हँसते ही चले जाते हैं।)
आवाज़ : ये हिनहिनाती हँसी हमारे कक्काजी की ही हो सकती है।
कक्काजी : ये हँसी अपना कापीराइट है। बाकी कक्काजी-उक्काजी हम नहीं हैं। अदने से सेवक हैं दुखियारी जनता के। रेल रिजर्वेसन कराना हो, सरकारी अस्पताल में इलाज की ब्यौस्था करनी हो, तबादला कराने या रुकवाने का सवाल हो, या फाइल निकलवाने या दबवाने का हो, तो हमें याद कीजिएगा। परोपकार के लिए हमेशा तैयार हैं। काम हो गया कक्काजी की कृपा, काम नहीं हुआ ऊपरवाले की मरजी। (ठहाका लगाते हैं।)

आवाज़ : जनता का काम करते-करते आपका काम भी बन जाएगा कक्काजी ?
कक्काजी : आप सबका अस्नेह अऊर आसीर्वाद रहा तो काम बनहि जाएगा हमारा भी। हमहूँ कक्काजी हो जाएँगे ट्वैन्टी फर्स्ट सैन्चुरी तक।
(एक बैरा व्हिस्की, बीयर वगैरह की ट्रे लेकर आता है और कक्काजी की ओर बढ़ाता है।)
कक्काजी: अरे ई सब का ले आए हमरे वास्ते ?
आवाज़ : आप तो सेवन करते हैं कक्काजी ।
(कक्काजी नींबू पानी का गिलास उठाते हैं।)
कक्काजी :हम सिर्फ नींबू-पानी पीते हैं।
(बैरा जाने को होता है। कक्काजी इशारे से उसे रोकते हैं और ट्रे में से एक जिन का गिलास उठाकर नींबू-पानी के गिलास में उड़ेल लेते हैं।)
कक्काजी : (धीमे से) थोड़ी जिन मार के।
(कक्काजी गिलास में उँगली डालकर छींटा मारते हैं।)

कक्काजी : बम भोले। इंगलिस मीडियम चीयर्स बोले। (जाम उठाते हैं।)
आवाज़ : चीयर्स। वैसे कक्काजी आपकी जितनी पहुँच है आप तो क्लास वन नौकरी पा सकते थे।
कक्काजी : क्लास वन हो या क्लास फोर, ए किर्रू इज किर्रू।
आवाज़ : किर्रू ! मतलब ?
कक्काजी : किर्रू, मतलब किरानी क्लर्क। किर्रू उस जंतु विसेस को कहते हैं जो पहली तारीख को तनख्वाह और बीस तारीख को उधार लेने के लिए है, समझे ना, और पहली से तीस-इकतीस तारीख तक रोजाना किसी-न-किसी कतार में लगने के लिए पइदा हुआ हो। माया-मोह में पड़ा व्यक्ति किर्रू जोनि से मुक्त नहीं हो पाता। जो माया-मोह से थोड़ा उबरता है वह बिजनेस की दुनिया में पहुँच पाता है। जनसेवा और राजनीति के क्षेत्र में वहीयै आ पाता है जो बाकायदा सिर पर कफन बाँध लेता है।

आवाज़ : लेकिन कक्काजी आपके सिर पर तो कफन छोड़ गाँधी-टोपी तक नहीं है।
कक्काजी : अरे उ सब ढकोसला अब चलता नहीं। एक तो ढकोसला करो दूसरे यह खतरा मोल लो कि कोई भी अइरा-गैरा आकर उछाल देगा टोपी को।
आवाज़ : अरे कक्काजी मंत्रीजी आ गए।
कक्काजी : मंत्रीजी होंगे आपके लिए, हमरे लिए तो दद्दा हैं। बड़े भैया आए हैं। जरा पाँय लगी करि आएँ। अपना दुई परसेंट कमीसनगिरी का धंधा जरा मंद चल रहा है आजकल।
(कक्काजी एक ओर से चलते हुए आते हैं। हाथ दिखाते हैं लेकिन कोई टैक्सी नहीं रुकती। वह बगैर परेशान हुए पान चबाते रहते हैं।)

आवाज़ : धंधा इतना मंदा है कक्काजी कि अपना गाड़ी-स्कूटर नहीं खरीदा अब तक ?
कक्काजी : अइसा है प्यारे भाई कि प्रोफाइल लो रखना ही ठीक रहता है। ऊ गाड़ी-कोठी वाला हाई प्रोफाइल कर देंगे एक दम से तो इन्कमटैक्स वाला आ धमकेगा।
(कक्काजी के हाथ देने से एक टैक्सी आकर रुक जाती है। कक्काजी उसमें बैठते हैं।)
टैक्सीवाला : किधर चलना है ?
कक्काजी : फिलहाल तो स्वच्छंद विहार और कई जगह जाएँगे। अउर अपना अइसा है डिरेवर बाबू कि कस्बे का रिक्शा हो या नेसनल कैपिटल की टैक्सी, सुबह करते हैं तो रात को घर लौटने पर ही छोड़ते हैं। (मुस्कराकर धीरे से) जब पेमेंट किसी भगत से ही करवाना है तो इस गरीब की गरीबी क्यों न हटवा दें।
(टैक्सी चल पड़ती है।)

एक डाइनिंग टेबल पर बैठी निशा एक फिल्मी मैगजी़न पढ़ रही है। वह हँसती है।)
निशा : हमारी फिल्मी दुनिया अब हालीवुड के कान काट रही है। एक-एक एक्टरवा के दो-दो बीवियाँ।
(पास ही दूसरी कुर्सी पर निशा का पति बैठा अखबार पढ़ रहा है। पढ़ते-पढ़ते नाश्ता भी कर रहा है। वह निशा की तरफ देखता है।)
रवि : सिनेमा की चकाचौंध से तुम्हें यह नहीं दिख रहा कि देश किधर जा रहा है। यह देखो...। (निशा को अखबार दिखाता है)।
रवि : छापे में इन्कमटैक्स वालों को एक करोड़ रुपइया मिला।
(निशा फिल्मी मैगजी़न का पन्ना पलटती है।)
निशा : अरे कोई हमारा घर था जहाँ फूटी कौड़ी भी न मिलती।
(रवि खाते हुए बोलता है-)
रवि: देश को कहाँ ले जा रहा है यह भ्रष्टाचार-गरीब देश में खुशहाल देशों का खाऊ-पीऊ....।
(रवि खाते-खाते खाँसने लगता है।)

निशा : कितनी बार कहा सवेरे-सवेरे अखबार मत पढ़ा कीजिए। दिनभर पित्त चढ़ा रहता है तुम्हारा।
रवि : हम जर्नलिस्ट हैं। अखबार न पढ़ें ?
निशा : दफ्तर में पढ़ा कीजिए।
रवि : दफ्तर में अखबार निकाले जाते हैं पढ़ते नहीं।
(तभी बाहर से शोर-शराबा होने और नारे लगने की आवाज़ सुनाई देती है।)
नारे :स्वच्छंद विहार यूथ एसोसियशन जिंदाबाद। बनाके रहेंगे कराटे क्लब।
(रवि नाश्ता छोड़कर उठ जाता है और अन्शन की तख्ती सम्हालता है।)
रवि : ये आशीष माना नहीं। अगर ये पार्क की जमीन पर कराटे क्लब बनाने की जिद करेगा तो हम आमरण अनशन पर बैठ जाएँगे।

निशा : जब तुम्हारे रेजीडेन्ट एसोसियशन के प्रेसीडेन्ट और सेक्रेटरी ने अपने-अपने घर के पीछे पड़ने वाली पार्क की जमीन पर कुछ-न-कुछ बना लिया है तो हमारा बेटा हमारे घर के पीछे की जमीन पर कराटे क्लब क्यों नही बना सकता ?
रवि : सब कुएँ में गिर रहे हों तो हम भी गिर जाएँ ?
निशा : कुएँ में खजाना हो तो क्यों नहीं गिरें ?
(रवि बाहर की ओर निकल पड़ता है।)
रवि : हमें करनी पड़ेगी भूख हड़ताल।
(निशा उसके पीछे-पीछे जाती है। दरवाजे पर दोनों उधर से आते हुए कक्काजी से टकराते हैं।)
कक्काजी : पायलागी जीजाजी। गोड़ लागी निशा जीजी।
निशा : जीता रह बुधना। कब आया ? कैसे आया ?
कक्काजी : आ तो परसों ही गए थे गुरुजी के साथ। उन्हें चीफ मिनिस्टरी में लतियाके ऊपर राज्यसभा में भेज दिया गया है। फर्स्ट क्लास में उ आए, अटेन्डेन्ट में हम।

निशा : बुधना तो कक्काजी है। ये सुलझा देगा पार्क की समस्या। चलिए अब भीतर भूख हड़ताल करने की जरूरत नहीं है।
(कक्काजी रवि के हाथ में आमरण अनशन की तख्ती देखते हैं।)
कक्काजी : आमरण अनशन ? ये क्या चक्कर है जीजाजी ?
निशा : इनको दिन में दो बार अनशन ही सूझता है।
(कक्काजी हँसते हैं)
कक्काजी : जीजाजी जरा हमें नास्ता-पानी करने दिया जाए। फिर हमहूँ अनसन बैठेंगे तुम्हारे साथ।
(निशा सामने की रुकी हुई टैक्सी की ओर इशारा करती है।)
निशा: अरे टैक्सी तो छोड़ दे बुधना। दूसरी मिल जाएगी।
कक्काजी : (रुकते हुए) रवि के साथ भीतर जाते-जाते कहते हैं) अरे अब पेमेंन्ट किसी भगत से ही कराना है जीजी तो इस गरीब की गरीबी थोड़ी क्यों न हटवा दें।
निशा : नाश्ते में क्या खाएगा भैया ? चिउरा कि सतुआ।
(कक्काजी उसे एक टोकरी देते हैं।)
कक्काजी: अब तु्म्हारी दया से हलुआ ग्रेड में आए गए हैं। ये मिठाई का टोकरा ग्रहण किया जाए जीजी। एक भगत दे गया था।

(निशा टोकरी ले लेती है।)
निशा : इनको कोई कुछ नहीं देता और दे भी क्यूँ, ये भी अपने अखबार में सबको गालियाँ ही देते रहते हैं।
(कक्काजी हँसते हैं।)
कक्काजी: कबहुँ गाली देने से भी खुसहाली बढ़ती है।
(तभी आशीष अपने तीन-चार दोस्तों के साथ धड़धडाता हुआ भीतर आता है। ये सब किशोर हैं और कराटे की पोशाक में हैं।)
आशीष : पाजी, चोट्टे, कमीने, बच्चों से लड़ने के लिए गुंडे बुलवा लिए हैं। अरे हम भी गुंडों के ग्रांडफादर बुलवाएँगे।
(आशीष कक्काजी की तरफ नहीं देखता और सीधा टेलीफोन का नम्बर घुमाने लगता है।)
निशा : अरे आशीष !
आशीष: (फोन पर) आपसे नहीं कह रहे हैं कक्काजी, आप कौन बोल रहे हैं ? अरे हम का कोई नाम भी होगा ना। तो ऐसे कहो कि बचुआ बोल रहे हैं। हम बोल रहे हैं, जैसे मिनिस्टर हों कहीं के। छुन्नन-मुन्नन हैं ? आएँ तो कहना फौरन हमारे यहाँ पहुँचे। स्वच्छंद विहार में लाठी-वाठी लेकर। हम आशीष बोल रहे हैं और कौन। बबुआ मत कहो, हम बहुत बड़े हो गए हैं।
(आशीष फोन रखता है और रवि तख्ती उठाकर बाहर जाने लगता है।)
रवि : हमें तुरन्त प्रोटैस्ट फॉस्ट पर बैठना होगा नहीं तो वायलैंस हो जाएगा, आशीष।
आशीष: हम वायलैंस से नहीं डरते पापा। आने दो ब्लैक छुन्नन-मुन्नन को। आज इस ग्रीन बैल्ट में रैड ब्लड न बहा दिया तो हम अपनी ब्राउन बैल्ट उतार फेंकेंगे।

(आशीष अपनी बैल्ट उतारने लगता है। कक्काजी उसके पास आते हैं।)
कक्काजी: नहीं आसीस, हम तुम्हें मारपीट नहीं करने देगें और जीजाजी, हम आपको भी अनशन पर नहीं बैठने देंगे।
रवि: अगर हमें अनशन पर नहीं बैठने दिया गया तो हम आमरण अनशन कर देंगे।
कक्काजी: जरूर कीजिएगा अनशन लेकिन पहले हमें समझने दिया जाए कि मामला क्या है। हमें बगैर लाठी ब्रेक किए साँप को सेट करने की विद्या आती है।
आशीष : आइए ! मैं बताता हूँ।

(कक्काजी रवि और निशा आशीष के पीछे-पीछे मकान के पिछवाड़े की तरफ जाते हैं जहाँ पार्क है।)
आशीष: यह देखिए कक्काजी। पार्क का यह हिस्सा हमारे घर के पीछे पड़ता है। इसे हमने अपने कराटे क्लब के लिए घेर लिया है। सोसाइटी के प्रेसिडेण्ट धर्मवीर और सेक्रेटरी राजेन्द्र बाबू आँखें दिखा रहे हैं।
निशा: जबकि उन्होंने अपने-अपने मकानों के पीछे की जमीनें दबोच ली हैं। वो देखो प्रेसीडेण्ट धर्मवीर बाबू ने अपनी पिराइवेट टैक्सियों का अड्डा खोल लिया है और सेक्रेटरी राजेंद्र ने मोहल्ले के चौकीदार के नाम पर सर्वेन्ट क्वार्टर बना लिया है।

आशीष: और कक्काजी उन दोनों की नीयत हमारे हिस्से के पार्क पर भी कब्जा जमाने की है।
रवि:सवाल उनकी नीयत का नहीं है।
निशा: आपको जो कहना हो अपने अखबार के एडिटोरियल में कहा कीजिए। यहाँ हमें बोलने दीजिए।
निशा: (कक्काजी से) पहले धर्मवीर बाबू आए। बोले, बहनजी, आपके घर के पीछे की जमीन में पहले ड्राइवर लोगों के लिए शेड बनवा दूँ। फिर राजेन्द्र बाबू आए। बोले, बहनजी, इस जगह चौकीदारों के लिए बाथरूम बनवा दूँ। अरे हमारे घर की सीध में जो जमीन पड़ती हैं। उसे हम गिरेब करेंगे कि तुम ?
रवि: पब्लिक पार्क मोहल्ले का फेफड़ा है, हम अपनी जान दे देंगे लेकिन पब्लिक का फेफड़ा नहीं जाने देंगे।
कक्काजी: आशीष की तरफ से हम वचन देते हैं रवि बाबू कि यह कराटे क्लब नहीं बनाएगा। आप अनशन का इरादा छोड़ दीजिए।

(आशीष परेशान होता है।)
आशीष: अरे यह क्या कह रहे है कक्काजी ?
कक्काजी: हमें कक्काजी कहते हो तो हमारा कहा मानो।
रवि: खाली कराटे-क्लब न बनने से क्या होगा। टैक्सी स्टैण्ड और सर्वेण्ट क्वार्टर तो फिर भी बने रहेंगे। आलतू-फालतू लोग यहाँ आते रहेंगे। माता-बहनों का पार्क में आना मुश्किल हो गया है। भूख हड़ताल के अलावा कोई चारा नहीं है।
कक्काजी: माताओ-बहनों की चिंता आप दो घंटों के लिए मुतलवी कर दीजिए। हम तमाम आलतू-फालतू लोगों को यहाँ से हटवा देंगे।
(कक्काजी हाथ पकड़कर रवि को अंदर ले जाते हैं। डाइनिंग टेबल पर रखे हुए मिठाई के डिब्बे में से लड्डू उठाते हैं।)
कक्काजी: लीजिए। मीठा लड्डू खाए के कड़वा फास्ट ब्रेक कीजिए।
(रवि वाशबेसिन की ओर बढ़ता है।)
रवि: कक्काजी, तुम तो हाथ धोके पीछे पड़ जाते हो। हम हाथ भी न धोएँ।
(कक्काजी हाथ धोते हुए रवि के मुँह में लड्डू डाल देते हैं।)
कक्काजी: कक्काजी के हाथ तो बगैर धुले ही पवित्र रहते हैं।
(रवि भुनभुनाता हुआ लड्डू खाता है। हाथ धोता है। डायनिंग टेबल पर बैठता है। निशा खुश है लेकिन आशीष और उसके दोस्त बहुत खफा हैं। कक्काजी अब उनके पास जाते हैं।)
कक्काजी: का बात है । आशी़ष

आशीष: आपने तो सारा खेल चौपट कर दिया। कमाल है। आप हमें अपना लैंड खुद गिरेब नहीं करने दे रहे हैं। आपको मालूम है जमीन की कीमत क्या है ?
कक्काजी: मालूम है इसीलिए कहि रहे हैं कि उसे हड़पने के वास्ते नन-वयलन्स का रास्ता अपना। सारी वयलैन्स, सारी हिंसा अपोनेन्टस को आपस में करने दे।
आशीष : मतलब ?
(कक्काजी आशीष के कान में कुछ कहते हैं। आशीष खुश होता है। कराटे के दाँव दिखाता हुआ उछलता है। मिठाई का डिब्बा उठाता है। वो और उसके साथी लड्डुओं पर टूट पड़ते हैं और बाहर चले जाते हैं।)

एक मकान का मुख्य द्वार। इस पर धर्मवीर कुमार की नेमप्लेट लगी है। आशीष कालबेल प्रेस करता है। धर्मवीर दरवाजा खोलता है और बहुत ही हमलावराना तरीके से आशीष को देखता है।
धर्मवीर:पार्क में पिट के तसल्ली नहीं हुई जो मेरे घर भी चला आया।
आशीष: हम सॉरी कहने आए हैं धर्मवीर अंकल। हमें तो राजेन्द्र अंकल ने भड़का दिया था। कहते थे कि आप पक्के चोर हैं, सारा पार्क हथिया लेंगे।
धर्मवीर: चोर तो वो आप हैं। मोहल्ले के चौकीदारों के रहने की जगह का सुआल उठाकर असोसियशन के पैसे के आउटहाउस बना छोड़ा है पार्क में और अब टॉयलेट बनाने की सोचने लग पड़ता है।
(टायलेट का जिक्र आते ही आशीष नाक पकड़ता है।)
आशीष : अंकल, मेरे पापा ने कहलवाया है कि हमारे घर के पीछे आप गैराज बना लें, राजेंद्र बाबू को टॉयलेट न बनाने दें।
धर्मवीर: तू बेफिकर रह पुत्तर। मैंने बंद करा छोड़ना है उस बलवीर का टॉयलेट।

दरवाजे पर राजेंद्र माथुर की नेमप्लेट। आशीष जाकर कॉलबेल प्रेस करता है। राजेंद्र दरवाजा खोलता है।
राजेंद्र: देखो, मिस्टर तुमने पार्क में मुझे गालियाँ दीं, इससे तुम्हारे खिलाफ दफा...के तहत केस बन चुका है। अब मेरे घर में जबरदस्ती घुसे तो मैं दफा...के तहत भी केस दायर कर दूँगा।
आशीष: एक दफा मेरी बात तो सुन लीजिए राजेंद्र अंकल। मैं माफी माँगने आया हूँ। धर्मवीर अंकल के भड़काने पर लड़ पड़ा था। वे कह रहे थे कि आप चोर हैं। आपने एसोसियशन के पैसे से चौकीदारों के नाम पर अपने नौकरों के लिए आउटहाउस बना लिया है।

राजेंद्र: वो धर्मवीर इस तरह बदनामी करता रहा तो मैं दफा 506 में केस दायर कर दूँगा। तू इस धर्मवीर को सचमुच धर्मवीर समझता है। भैये इसका जितना अधर्म करने वाला तो नरक में सर्चलाइट लेके ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलेगा। इसने अपनी विधवा भाभी की सारी प्रापर्टी मार ली है और सुन भैये...।
आशीष: अंकल दफा पाँच सौ..।
(आशीष उसके ओठों पर अंगुली रख देता है। राजेंद्र सकपकाता है।)
आशीष: मैं तो आपको पापा का मैसेज देने आया हूं कि हमारे घर के पीछे की जमीन में धर्मवीर बाबू का गैराज मत बनने दीजिए। वहाँ आप चौकीदारों के लिए टॉयलेट बनवा दीजिए। इमरजेंसी में हमारे भी काम आएगा।
राजेन्द्र: नार्मली भी बेटे, नार्मली भी।





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