प्रवंचना - गुरुदत्त Pravanchana - Hindi book by - Gurudutt
लोगों की राय

राजनैतिक >> प्रवंचना

प्रवंचना

गुरुदत्त

प्रकाशक : हिन्दी साहित्य सदन प्रकाशित वर्ष : 1982
पृष्ठ :212
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5343
आईएसबीएन :00000

Like this Hindi book 1 पाठकों को प्रिय

60 पाठक हैं

राजनीतिक उपन्यास...

Pravanchana

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भूमिका

एक विख्यात कवि का कहना है

यूनान, मिस्र, रोमा सब मिट गये जहां से,
कुछ बात ही कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।

इस पद्यांश में कवि क्या कहना चाहता था, यह स्पष्ट नहीं होता, फिर भी जो कुछ इसमें समझ में आता है वह अति गम्भीर सत्य है। न यूनान मिटा है, न मिस्र, रोम भी ज्यों का त्यों बना हुआ है। इन देशों में मनुष्य भी अभी भी रहते हैं और अपने को यूनान आदि देश का रहने वाला मानते हैं। उनमें अभी भी अपने देश के लिए भक्ति और प्रेम की भावना विद्यमान है। उक्त वाक्य के यदि शाब्दिक अर्थ लिए जाएँ तो पद्यांश निरर्थक-सा प्रतीत होता है। फिर भी कवि के उक्त कथन में तथ्य है।
यूनान, मिस्र और रोम ये प्राचीन महान् राष्ट्र थे। इन देश वालों ने भारी समर विजय किए थे। और अपने देश की मान-मर्याद, उसका प्रभुत्व और उसका दबदबा बहुत विस्तृत किया था। केवल यही नहीं प्रत्युत इन देशों के रहने वालों ने अपनी सभ्यता और आचार-विचार का प्रचार और विस्तार भी किया था। ये देश अभी भूतल पर हैं। इनमें मनुष्यों का भी वास है, परन्तु वे विचार और सिद्धान्त अब नहीं रहे जिनके लिए ये देश और इनके देसवासी प्रसिद्ध थे।

भारतवर्ष की बात इससे सर्वथा भिन्न है। भारत के रहनेवाले भी अपनी विशेष सभ्यता रखते थे। इनकी भी एक संस्कृति थी। ये अपनी संस्कृति और सभ्यता की प्रेरणा वेदों, उपनिषदों, ब्राह्मण-ग्रन्थों और वाल्मीकि रामायण, महाभारत आदि कथा-सागरों से लेते रहे हैं। भारत विजित हुआ। विदेशियों ने इस पर आक्रमण किए और यहाँ के लोगों की स्फूर्ति के स्रोतों पर कुठाराघात करने का यत्न किया। उस विचार और आचार के लोगों ने ही, जिन्होंने मिस्र, यूनान तथा अफ्रीका के उत्तरी किनारे के साथ-साथ के सब देसों को पददलित कर वहाँ के आचार-व्यवहार को मटियामेट कर दिया था, भारत पर भी आक्रमण किया। यहाँ सात सौ वर्ष तक राज्य भी किया और कोई उपाय नहीं छोड़ा जिससे यहाँ के रहनेवालों का आचार-विचार वैसा ही बन जाए जैसा कि यूनान, मिस्र और ईरान इत्यादि देशों के विजित होने पर बन गया था। परन्तु वह प्रेरणा वह स्फूर्ति जो भारत के रहने वाले लोगों को वेदों, पुराणों, उपनिषदों और प्राचीन साहित्यों और कथाओं से मिलती थी, अभी भी स्थिर है। आज भी ऐसे लोग विद्यमान हैं जो वेदों को निर्भ्रान्त मानते हैं। रामायण और महाभारत में लिखी श्रेष्ठ बातों को श्रद्धा, भक्ति और आदर से देखते हैं और उन पर आचरण करने का यत्न करते हैं।

इससे कवि का कहना कि यूनान इत्यादि जहान से मिट गये हैं पर हम अभी भी अपना नाम और निशान रखते हैं, सोलह आने सत्य है। एक विशेष विचार-धारा है, जिसके अनुसार भारत की जनता अपना पूर्ण श्रेष्ठ आचरण बनाने में यत्नशील रहती है और वह विचारधारा वैदिक काल से आज तक अटूट चली आ रही है। इससे कवि के यह कहने का अभप्राय कि ‘हस्ती मिटती नहीं हमारी’, मनुष्य की हस्ती से नहीं, प्रत्युत भारत की भारतीयता से है।

जातियों का आस्तित्व भौगोलिक सीमाओं से नहीं बनता। यह विचार की हिमालय से हिन्दमहासागर तक रहनेवाले भारतीय हैं और इनका परस्पर गठबन्धन रहना चाहिए, इतिहास से और युक्ति से भ्रममूलक सिद्ध हुआ है। यह न कभी रहा है न कभी रहेगा। इंग्लिस्तान, जर्मनी, फ्रांस इत्यादि छोटे-छोटे देशों में भी यह विचार कि वे एक देश में रहने मात्र से एक हैं कुछ काल के लिए चल सकता है परन्तु भारत जैसे विशाल देशों और साम्राज्यों में लोग केवल मात्र भौगोलिक बन्धनों से नहीं बँध सकते। लोगों को बाँधकर रखने के लिए तोप, बन्दूक अथवा अन्य शास्त्र भी सफल नहीं होते। यदि विशाल देशों में लोग एक बन्धन में बँध सकते तो वह अपने आचार-विचार और व्यवहार के नाते ही बँध सकते हैं। इसको सांस्कृति ऐक्य अथवा सांस्कृति गठबन्धन कहना चाहिए।

भारतवर्ष में संस्कृति वैदिक काल से अटूट चली आती है। नाम बदले, राज्य बदले और प्रजा भी बदली परन्तु संस्कृति ज्यूँ की त्यूँ चली आ रही है। वैदिक काल में देश का नाम ब्रह्मावर्त था, पश्चात् आर्यावर्त हुआ। इसके बाद भारतवर्ष, हिन्दुस्तान, अन्त में इण्डिया बना। इसी प्रकार इसमें सूर्यवंशी राजा हुए, चंद्रवंशी राजा हुए, हूण, सीदियन, मुसलमान इत्यादि आक्रमणकारी आए और या तो वापस लौट गए अथवा इसी भारतीय खान में भारतीय हो गये। जो वस्तु स्थिर रही, वह वैदिक, भारतीय अथवा हिन्दू संस्कृति है। यह क्यों संभव हुआ ? जब दूसरी संस्कृतियाँ काल का ग्रास बन गईं तो यह क्यों नहीं बनी ?
यह कोई चमत्कार नहीं है। न ही इसमें कोई अनहोनी बात है। इसमें भारतीय संस्कृति की विशेषता ही केवल कारण है। यह संस्कृति परमात्मा के विश्वास पर, कर्मफल मीमांसा पर, पुनर्जन्म सिद्धान्त पर  अवलमिबित होने से सर्वश्रेष्ठ है ही, साथ ही राम, कृष्ण और अनेकानेक अन्य महाजनों के पावन चरित्रों से प्रेरणा प्राप्त कर भारतियों को सत्य मार्ग पर आरूढ़ करने में सफल होती है।

एक छोटे से पारिवारिक क्षेत्र में मैंने निम्न प्रकार की संस्कृति के साथ भारतीय संस्कृति के संघर्ष की कथा लिखी है। सब पात्र काल्पनिक हैं क्योंकि यह उपन्यास है। इसमें सत्य तो केवल विचारधाराओं में संघर्ष है। एक ओर वे लोग हैं, जो अपने प्रत्येक कर्म के फल की प्राप्ति को अनिवार्य मानते हैं। इस कारण प्रत्येक कार्य में अपने व्यवहार को ऐसा बनाने में लगे रहते हैं जैसा कि वे चाहते हैं कि लोग उनसे व्यवहार करें। दूसरी ओर वे हैं, जो यह मानते हैं कि वर्तमान जीवन में ही सबकुछ है। इससे से पूर्व और पश्चात् कुछ भी नहीं। इस प्रकार वे अपना जीवन अपने सुख और आनन्द के हेतु व्यतीत करते हैं। किसी दूसरी प्रकार से यदि वे कभी सद्वयवहार करते हैं तो अपने ही हित की कामना से अथवा विवश होकर। यही उनके जीवन की प्रवंचना है। इनमें पहले भारतीय हैं, दूसरे अभारतीय।
गुरुदत्त

भूमि

पंजाब यूनिवर्सिटी में सीनेट हॉल के बाहर विद्यार्थियों की भीड़ लगी थी। लड़के एक-दूसरे के कन्धे पर चढ़-चढ़कर लकड़ी के बोर्ड पर चिपकाए हुए पर्चे को देख रहे थे। पर्चे पर पंजाब यूनिवर्सिटी  की मैट्रिक परीक्षा का फल लिखा हुआ था।
लड़कों की भीड़ में एक सुकुमार लड़का, जो तेरह-चौदह वर्ष से अधिक आयु का प्रतीत नहीं होता था, आगे जाकर अपना फल देखना चाहता था, परन्तु दूसरे लड़के, जो उससे आयु में बड़े और शरीर में बलिष्ठ थे, उसको आगे जाने नहीं दे रहे थे।
बालक प्रेमनाथ कई बार आगे जाने का यत्न कर चुका था, परन्तु प्रत्येक बार पीछे धकेल दिया गया था। वे लड़के, जिनका नाम उत्तीर्ण लड़कों में होता था, कूदते-फाँदते निकलते थे और जिनका नाम उस बोर्ड पर लगी सूची में नहीं होता था, मुँह लटकाए निकलकर चुपचाप चले जाते थे। कई लड़के ऐसे थे, जो देने के लिए बार-बार भीड़ में घुसते थे, देखते थे और बाहर आकर अनुत्तीर्ण होने वालों पर हँसा करते थे।

प्रेमनाथ प्रातः सात बजे का आया हुआ मध्याह्न के ग्यारह बजे तक अपना नाम सूची में देखने में असफल हो, हताश एक ओर खड़ा था। एक-दो ने उसको आकर कहा भी था कि वह उत्तीर्ण हो गया है पर वह अपनी आँखों से देखकर विश्वास करना चाहता था।
ग्यारह बजे के लगभग भीड़ कम हुई और वह बोर्ड के समीप पहुँचने में सफल हुआ। वहाँ अपना रोल नम्बर, नाम और प्राप्त अंक पढ़कर उसके चित्त को शान्ति हुई तो वह घर की ओर चल पड़ा।

उसका घर शाहदरे में था। शाहदरा लाहौर से पाँच मील के अन्तर पर एक छोटा-सा गांव है। परीक्षा में उत्तीर्ण होने से उसका चित्त हल्का और प्रसन्न था। चिरकाल से लदा बोझ मन से उतर गया प्रतीत हो रहा था। इससे हल्के चित्त से चलते हुए उसकी अपने होश सँभालने से लेकर अब तक की जीवन-स्मृतियाँ जीवित हो उसके सम्मुख आने लगीं।
वह चार वर्ष का बालक था। यह उसकी पहली स्मृति थी। वह अपनी छोटी बहिन इन्द्रा के साथ अपने मामा की दुकान पर बैठा सरसों के तेल में बने ‘अन्दरसे’
खा रहा था। ये मामा ने उनको खाने को दिये थे और बहुत शोकग्रस्त मुख से वह उनकी ओर देख रहा था। वह अनुभव कर रहा था कि कुछ बात हुई है जो उसके मामा को रुचिकर प्रतीत नहीं हुई।

उसका मामा शाहदरे में हलवाई की दुकान करता था। तेल की पूरी और तेल की मिठाई ही देहातियों के लिए बनती थी और बिकती थी। प्रेमनाथ और उसकी माँ पहले भी शाहदरा मामा के यहाँ आया करते थे और उनके आने पर मामा का मुँह खिल जाया करता था। परन्तु उस दिन, यह स्मृति 1905 की थी, वह अपनी माँ और बहिन के साथ आया था। पहले की भांति मामा ने उसको दुकान पर रखी चौकी पर बिठाया और चावल के आटे और गुड़ के ‘अन्दरसे’ खाने को देकर गंभीर हो, उसके मुख पर देखने लगा था। उसकी माँ दुकान के ऊपर मामी के पास चली गई थी।
मामा को शोकग्रस्त देखकर प्रेमनाथ को कुछ ऐसा लगा था कि उस दिन उसका पहले से कुछ भिन्न प्रकार का स्वागत हो रहा है। इससे उसको उस दिन की बात आज भी याद थी। उसने पूछा था, ‘‘मामा ! तुम क्या देख रहे हो, क्या हो गया है ?’’
मामा ने केवल यह कहा था, ‘‘अब तुम लोग वापस लाहौर नहीं जाओगे।’’
‘‘क्यों ?’’ प्रेमनाथ का प्रश्न था।
‘‘भगवान की ऐसा हा इच्छा है।’’

प्रेमनाथ के मस्तिष्क में यह बात सर्वथा स्पष्ट अंकित थी कि वह उस समय मामा की बात सुनकर रो पड़ा था। इससे उसके मामा ने उसको गोदी में बिठाकर अपने मैले, तेल लगे कुर्ते से उसकी आँखें पोंछकर कहा था, ‘‘प्रेम बेटा ! रोओ नहीं, जिस भगवान् ने ऐसा विधान किया है कि तुम लोग शाहदरे में रहो उसने कुछ और प्रबन्ध भी किया होगा। वह बेमतल और बिना विचारे कोई बात नहीं करता। अच्छा, एक अन्दरसा और लोगे ?’’

प्रेमनाथ को धुँधली सी स्मृति उस घर की भी थी जिसमें वह शाहदरे आने से पहले रहा करते थे। एक बड़ा विशाल मकान था। उसमें कई कमरे थे। प्रेमनाथ और इन्द्रा घर वालों से पृथक् एक कमरे में सोया करते थे। रात माँ उनको सुला जाती थी और प्रातः उनके जागने से पूर्व उनके पास आती और सिर पर प्यार दे, मुख चूम अथवा कभी गुदगुदी कर जगाया करती थी। बड़े-छोटे बहुत-से लोग घर में और भी रहते थे। किसी को वह बाबा कहा करता था, किसी को काका। कोई अम्मा थी कोई चाची। अपनी माँ को, जो उन सबसे अधिक स्नेह रखती थी, केवल माँ कहकर पुकारा करता था। यह मकान दो छत का था। मकान के सामने कुछ थोड़ा-सा स्थान खाली था जिसमें घास लगी थी और फलों के गमले और क्यारियां थीं। वह कई बार उन फूलों पर उड़ती रंग-रंग की तितलियों को पकड़ने का यत्न किया करता था। कभी पकड़ता तो माँ डाँटकर छुड़ा देती था। इससे छोड़ने की इच्छा न रहते हुए भी वह उसे छोड़ दिया करता था।

घर में और बच्चे भी थे परन्तु वे प्रायः इससे खेलना पसन्द नहीं करते थे। इस कारण वह अपनी बहिन इन्द्र से ही खेल सकता था। घर में एक वृद्ध व्यक्ति भी थे। उनकी लम्बी दाढ़ी और मूछें उनका स्मरण थीं। वह वृद्ध अपनी दाढ़ी को खुजाने का बहुत शौकीन था और बात करते समय दाढ़ी खुजलाते हुए प्रायः कहा करता था, ‘देखो, न मैं कहता हूँ।’
इस पर प्रेमनाथ को हँसी भी आती, परन्तु उससे सब घरवाले और विशेष रूप से उसकी माता घूँघट करती थी और डरती थी। इस कारण मन में उसकी, ‘देखो न, मैं कहता हूँ,’ पर हँसता हुआ भी वह प्रत्यक्ष में कभी नहीं हँसता था।
एकाएक यह चित्र विलीन हो गया। वह अपनी माता और बहिन के साथ शाहदरा के छोटे-से और गन्दे गांव में आकर रहने लगा। शाहदरा में एक प्राइमरी स्कूल था, इस कारण इन्द्र घर पर ही माँ से पढ़ने लगी।

जीवन एक-सा चलता गया और कोई ऐसी घटना नहीं घटी जो उसके मष्तिष्क पर किसी प्रकार का विशेष प्रभाव छोड़ सकी हो। हाँ, शाहदरा गाँव के समीप ही एक विशाल इमारत थी जिसमें बड़े-बड़े लम्बे-चौड़े घास के मैदान थे, फूलों की क्यारियाँ थीं और संगमरमर के एक विशाल चबूतरे पर लाल पत्थर की चैकोर इमारत थी। इस इमारत के चार कोनों पर चार मीनार थे और उन पर चढ़ने की सीढ़ियाँ बनी थीं। यह जहाँगीर का मकबरा था। कभी-कभी उनकी माँ उसको, इन्द्रा को और उसके मामा के लड़के ज्योति को वहाँ ले जाया करती थी और खेलने का बहुत ही सुखप्रद अवसर मिलता था।

अगली घटना जो उसको स्मरण थी, वह पाँचवीं श्रेणी की पढ़ाई समाप्त कर स्कूल में सबसे अधिक अंक लेकर पास करना था। इन्द्र, जो उससे दो वर्ष छोटी थी हिन्दी की पाँचवीं पुस्तक घर पर ही पढ़ती थी। गणित उसके बराबर जानती थी और भूगोल यद्यपि पढ़ती नहीं थी पर मुख्य-मुख्य बातें उतनी ही जानती थी जितनी प्रेमनाथ जानता था।

वह स्कूल से जब पाँचवी कक्षा का परीक्षा-फल सुन घर आया और उसने जब माँ को बताया कि वह स्कूल में प्रथम रहा है और स्कूल की कमेटी की ओर से उसको छठी श्रेणी में वजीफा मिलेगा, तो प्रसन्नता से फूलने के स्थान पर माँ उसको गले लगा कर फूट-फूटकर रोने लगी थी।
इन दिनों वे मामा के घर के साथवाले मकान में रहते थे। दो रुपये मासिक उसका भाड़ा देते थे। इस मकान में दो कमरे और रसोई थी। मकान बहुत छोटा और अँधेरा था पर इसका उनको अधिक कष्ट नहीं था। वे प्रायः मकान के बाहर ही खेलते रहते थे।

माँ को रोते देख प्रेमनाथ को बहुत ही विस्मय हुआ था, परन्तु माँ के ऐसा कहने पर उसका विस्मय मिट गया था,. ‘‘यहाँ तो स्कूल है ही नहीं, पढ़ोगे कैसे और वजीफा कैसे लोगे ?’’
‘‘तो माँ, मैं लाहौर जाकर पढ़ूँगा।’’
‘‘वहाँ रहोगे कहाँ ?’’
‘‘एक मकान था न वहाँ। बहुत बड़ा। उसमें चलकर रहेंगे।’’
 ‘‘वह मकान अब नहीं है।’’
‘‘क्या हुआ है उसको  ?’’
‘‘छिन गया है बेटा।’’
‘‘किसने छीना है ?’’
‘‘भगवान ने।’’

‘‘यह भगवान् कौन है ? उसने क्यों छीना हमारा मकान ?’’
‘‘वह मकान तुम्हारा था, यह किसने बताया है तुमको ?’’
 प्रेमनाथ इस प्रश्न का उत्तर सोचने के लिए गम्भीर विचार में पड़ा गया। वह उसमें रहता था माँ ने माना है। क्यों रहता था और फिर किसने वह उससे छीन लिया है ? इस समय उसको बूढ़े, श्वेत दाढ़ी-मूँछवाले आदमी की बात याद आई, जो कहा करता था, देखो न, मैं कहता हूँ।’ इस बात के स्मरण आते ही उसने माँ  से पूछा, ‘‘माँ, एक थे न; बहुत बूढ़े। सफेद दाढ़ीवाले। मूँछें लम्बी-लम्बी थीं। क्या वही भगवान थे ?’’
माँ की आँसुओं में मुस्कराहट निकल आई। उसने कहा—‘‘बेटा, नहीं, वह भगवान् नहीं था। वह तो भगवान् का बन्दा था। परन्तु अब वह नहीं है। पर मकान उसका दिया नहीं था और न उसने छीना था।’’

इतना कह माँ ने एकाएक प्रेम को गोदी से उतारा और नल पर जा मुख धोकर आँसू पोंछने लगीं। प्रेमनाथ विस्मय में उसका मुख देखता रहा गया।
अगले दिन जब वह उठा, माँ घर पर नहीं थी। उसकी मामी ने उसको जगाया और स्नान आदि करवाया। प्रेमनाथ ने मामी से पूछा, ‘‘माँ किधर गई ?’’
‘‘लाहौर गई है। शाम तक आ जाएगी।’’
प्रेम समझ नहीं सका कि किस कारण माँ वहाँ गई है। इस पर वह भी उत्सुकता से माँ की प्रतीक्षा करता रहा। इन्द्रा तो दिन भर रोती रही थी। जब माँ लौटी तो सायं काल होने वाला था।
प्रेम ने देखा, माँ का मुख बहुत उदास था। प्रेम ने जब पूछा, ‘‘माँ, कहाँ गई थीं ?’’
माँ ने उत्तर दिया था, ‘‘रोटी खाई है प्रेम ?’’

‘‘हाँ माँ !’’
‘‘इन्द्रा कहाँ है ?
‘‘रोती-रोती सो गई है।’’
‘‘क्यों ? रोई क्यों थी ?’’
‘‘माँ-माँ करती थी।’’
माँ के मुख पर क्षीण मुस्कराहट की रेखा दिखाई दी और शीघ्र ही लोप हो गई। रात को जब प्रेम अपनी चारपाई पर लेटा हुआ था तो उसको सो गया समझ उसके मामा ने, जो वहाँ आया हुआ था, उसकी माँ से पूछा, ‘‘क्या हुआ बहिन, वहाँ ?’’
‘‘एक बजे मकान में भेंट हुई। वे अपनी मेम को ले साथ मिलने आए, उनसे मेरा परिचय कराया, पश्चात् मेरे वहाँ आने का कारण पूछा। मैंने जब बताया कि लड़के को पढ़ाई के लिए लाहौर में भरती होना है और मेरे पास बोर्डडिंग हाउस में भरती कराने के लिए खर्चा नहीं है तो वे बताने लगे कि उनके पास इस समय देने के लिए रुपया नहीं है। तब मैंने कहा कि लड़के को वहाँ अपने पास रख लें। रोटी में रोटी खा लिया करेगा और कपड़ों में से कपड़े पहन लिया करेगा। फीस और पुस्तकों का प्रबन्ध मैं अपने खर्च से कर दूँगी तो उन्होंने कहा, ‘नहीं, यह ठीक नहीं। प्रेम तो बिगड़ेगा ही और, साथ ही दूसरो बच्चों पर भी असर पड़ेगा।’’

‘‘मेरे लिए और कुछ कहने के लिए नहीं था और मैं वापस लौट आई।’’
‘‘समय तो बहुत लगा है ?’’
‘‘हाँ, नदी किनारे बैठकर विचार करती रहू हूँ कि क्या किया जाए ?’’
‘‘तो क्या करोगी अब ?’’
‘‘प्रेम पढ़ेगा कैसे, यह तो भगवान् के अधीन है।’
प्रेम इस बात को सुन, समझने का यत्न कर रहा था कि वह कौन है जो मेम लेकर माँ से मिलने आया था ? उससे माँ क्यों मिलने गई थीं ? इत्यादि।
अगले दिन प्रेम ने माँ से पूछा, ‘‘माँ, मैं कैसे पढ़ने जाऊँगा ?’’
‘‘देखो प्रेम ! प्रातःकाल पाँच बजे ‘दीन’ की टमटम से तुम शहर चले जाया करो। वह तुमको हीरामण्डी उतार दिया करेगा। वहाँ मैं तुम्हें दयालसिंह स्कूल में भरती करवा दूँगी। दोपहर को वह तुमको ले आया करेगा। वह एक स्थान बता देगा। तुम स्कूल के बाद वहाँ बैठे रहना, वहाँ से तुमको टमटम में बैठा लाया करेगा।’’

प्रेम को स्मरण था कि इस प्रबन्ध से उसको जो प्रसन्नता हुई थी, पाँच वर्ष पश्चात् आज भी उसे वह अनुभव करता था। पांच वर्ष तक शाहदरा से नित्य टमटम में बैठकर हीरामण्डी के अड्डे पर जाना, वहाँ से स्कूल जाना और दोपहर के समय अथवा सर्दियों में चार बजे हीरामण्डी के टमटमों के अड्डे पर पीपल की छाया में बैठकर टमटम की प्रतीक्षा करना, दीन की टमटम में बैठकर घर आना, स्नान कर भोजन करना और पश्चात् स्कूल का पाठ स्मरण करना—यह एकरस कार्य पाँच वर्ष तक चलता रहा। इसमें एक दिन दूसरे के इतना समान था कि वह अब एक दूसरे में भेद नहीं कर सकता था।
हाँ, एक दिन एक और घटना हुई भी। रविवार का दिन था, वह गाँव के कुछ लड़कों को साथ ले जहाँगीर के मकबरे में गुल्ली-डण्डा खेल रहा था। उनके खेल से कुछ दूर एक पढ़े-लिखे परिवार के लोग सैर करने आए हुए थे। प्रेमनाथ के खेलने की बारी थी। एक बार उसने टुल इतने जोर से लगाया कि गुल्ली उन सैर करने वालो में जाकर गिरी। वह किसी को लगी अथवा नहीं प्रेम ने देखा नहीं था, परन्तु वह यह देख रहा था कि गुल्ली बहुत दूर गई है। इससे वह प्रसन्न हो इन लोगों की ओर देखने लगा था। दूसरे लड़के, जो इस समय प्रेम को खेला रहे थे, वहाँ से गुल्ली लाने में डरते थे। प्रेम ने कहा, ‘‘अब जाओ, लाओ।’’

‘‘तुम ही ले आओ न। वे मारेंगे।’’
‘‘क्यों मारेंगे ?’’
‘‘तो स्वयं ही जाकर ले आओ न।’’
प्रेम के हाथ में डण्डा था। वह उसको लिए हुए ही वहां जा पहुँचा। सैर करनेवालों में गुल्ली गिरने से, कुछ विघ्न तो उनके मनोरंजन में पड़ा था—यह वह उनके मुख पर क्रोध को देख कर अनुभव कर रहा था। उसने जाकर कहा, ‘‘गुल्ली दे दीजिए।’’
एक औरत जो गौर वर्ण की थी और अंग्रेजी ढंग का पहनावा पहने थी, प्रेम के पास आई और एक चपत उसके मुख पर लगाकर बोली, ‘‘भाग जाओ !’’
चपत का बदला लेने के लिए अनायास ही उसका डण्डेवाला हाथ उठ गया, फिर तुरन्त ही उसका हाथ नीचे हो गया और उसने दूसरे हाथ से गाल मलते हुए कहा, ‘‘औरत हो नहीं तो मजा चखा देता। मेरी गुल्ली दे दो।’’
इस समय एक पुरुष वहाँ आया और उसने उसको पीटने के लिए हाथ उठाया। प्रेम लपककर पीछे हटकर बोला, ‘‘शर्म नहीं आती ? इतने बड़े होकर बच्चे को मारने दौड़े हो !’’
‘‘तुमने गुल्ली यहाँ पर क्यों फेंकी है ?’’

‘‘आपको ज़रा दूर हटकर बैठना चाहिए था !’’
‘‘ओह ! तुम इस स्थान के मालिक मालूम होते हो !’’
‘‘आप भी तो मालिक नहीं हैं। हम पहले आए थे, आप बाद में आए हैं। गुल्ली दे दीजिए और अपना सामान उठाकर ज़रा दूर ले जाइए। फिर गुल्ली वहाँ नहीं आएगी।’’
बहुत ही ढीठ और गँवार मालूम होते हो। किसके बेटे हो ?
प्रेमनाथ ने दयालसिंह स्कूल में भरती होते समय अपने पिता का नाम लिखाया था। इससे बोल उठा, ‘‘श्री अमरनाथ चोपड़ा का।’’
‘‘कहाँ रहते हो ?’’ उस आदमी ने कुछ विस्मय से पूछा।
‘‘शाहदरा में।’’
‘‘मेरा मतलब है तुम्हारा पिता भी वहाँ रहता है क्या ?’’
‘‘नहीं।’’ इतना कहकर प्रेमनाथ चुप हो गया। आदमी विस्मय से प्रेम का मुख देखता रहा। उस औरत ने भी इस उत्तर पर कुछ विस्मय प्रकट किया। पश्चात वह आदमी अपने सामान पर पड़ी गुल्ली उठा लाया और प्रेमनाथ को देकर बोला, ‘‘देखो !...’’ वह आदमी कुछ सोचने लगा। पश्चात् बोला, ‘‘क्या नाम है तुम्हारा ?’’

‘‘इससे आपको क्या मतलब ? मेरे पिता का नाम जान लिया, अब मेरा नाम पूछ रहे हैं ? मैं बताने की आवश्यकता नहीं समझता।’’ इतना कह वह जाने लगा, परन्तु उस आदमी ने पुकारा, ‘‘हाँ ! प्रेमनाथ ! सुनो !’’
प्रेम अपना नाम सुन विस्मय में पड़ लौटकर देखने लगा, ‘‘ज़रा दूर चले जाओ, यह गुल्ली आँख में भी लग सकती है।’’
‘‘तो आप ही ज़रा पीछे हट जाइए। एक चपत मुफ्त में ली है, और आप क्या चाहते हैं ?’’
‘‘अच्छा देखो !’’ उस आदमी ने कहा, ‘‘एक रुपया ले लो थोड़ी दूर चले जाओ।’’
‘‘हम भीख नहीं लेते। जब आप नरमी से कहते हैं तो हम पीछे हट जाएँगे। लड़के दूसरे घास के मैदान में चले गए। जब खेलते-खेलते थक गए तो बैठकर बातें करने लगे। एक लड़के ने कहा था, ‘‘उस मेम ने मारा था तो एक डण्डा तो टिका देना था।’’

‘‘मेरा हाथ उठा तो था पर आदमी औरतों पर हाथ नहीं उठाते।’’
‘‘तुम आदमी हो क्या ?’’ यह कह सब हँसने लगे, ‘तुम्हारी दाढ़ी-मूछें कहाँ हैं ?
प्रेम आदमी शब्द की यह विवेचना सुन लज्जा से लाल हो गया। वे अभी इस प्रकार की बातें कर ही रहे थे कि वही औरत और दो बच्चे कागज़ में कुछ लपेटा हुआ लेकर इनकी ओर आते हुए दिखाई दिए। लड़के भयभीत होकर भागना चाहते थे कि प्रेम ने कहा, ‘‘बहादुर आदमियों ! अब भागते क्यों हो ? बैठे रहो और देखो वह क्या कहती है।’’
वह औरत आई और कागज़ में लपेटा हुआ सामान सब लड़कों के बीच रख बोली, ‘‘यह तुम लोगों के खाने के लिए है।’’
    

प्रथम पृष्ठ

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book