परित्राणाय साधूनाम् - गुरुदत्त Paritranaya Sadhoonam - Hindi book by - Gurudutt
लोगों की राय

पौराणिक >> परित्राणाय साधूनाम्

परित्राणाय साधूनाम्

गुरुदत्त

प्रकाशक : हिन्दी साहित्य सदन प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :844
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5359
आईएसबीएन :0000

Like this Hindi book 9 पाठकों को प्रिय

438 पाठक हैं

प्रस्तुत हैं महाभारत की कथा...

Paritranaya Sadoonam

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

क्यों ?

हिन्दुओं में यह किंवदन्ति प्रचलित है कि यदि महाभारत की कथा की जायेगी तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में महाभारत मच जायेगा। मैं बाल्यकाल से इस किंवदन्ति को सुनता चला आया हूँ और इसका आधार जानने का यत्न करता रहा हूँ।

मैं जब स्कूल में ही पढ़ता था कि हमारे मोहल्ले के एक मन्दिर में महाभारत की कथा रखी गई। उन दिनों आर्य समाज और सनातन धर्म सभा में शास्त्रार्थों की धूम थी। कुछ मुहल्ले के सनातन धर्मी युवकों में धर्म ने जोश मारा और वे हिन्दुओं की प्रसिद्ध धर्म-पुस्तक महाभारत की कथा कराने लगे।
उस समय एक वयोवृद्ध सनातनधर्मी पण्डित ने कहा था, ‘‘ये नौजवान ठीक नहीं कर रहे। इसका परिणाम ठीक नहीं होगा। हिन्दुओं में रामायण की कथा तो होती है, परन्तु महाभारत की नहीं।’’
विरोध करने वाले हिन्दुओं में उठने वाले नवीन उत्साह से मैं भी प्रभावित हो रहा था। अतः उन पण्डित महोदय से मैंने पूछ लिया, ‘‘पण्डित जी महाभारत भी तो हमारा धर्म-ग्रन्थ है। इसमें तो भगवद्गीता लिखी है, भला इसका कथा से क्या अनिष्ठ हो सकता है ?’’

पण्डित जी ने कहा था, ‘‘गीता तो पुस्तक का एक छोटा-सा अंश है। उसकी कथा तो हो सकती है परन्तु पूर्ण ग्रन्थ की कथा करने से तो लाठी चल जायेगी।’’ ‘‘आखिर ऐसा क्यों ?’
‘‘अनुभव यही बताता है।’’
मैंने इस बात को इस प्रकार समझा कि प्रचलित हिन्दू-धर्म में कुछ ऐसा हो जो महाभारत में लिखे हुए के अनुकूल नहीं। मेरे विस्मय का ठिकाना नहीं रहा, जब कथा में आदि पर्व के समाप्त होने के पूर्व ही एक दिन श्रोतागणों में मुक्का-मुक्की हो गयी। बात पुलिस तक गई और बहुत कठिनाई से दोनों दलों में सन्धि कराई गई।
तब से मैं इस विषय पर बहुत मनन करता हूँ। कई बार महाभारत पढ़ा इस किंवदन्ति और महाभारत के पाठ की जो मेरे मन पर प्रक्रिया हुई उसी का परिणाम यह पुस्तक है।
‘अवतरण’ उस प्रक्रिया का प्रथम अंश है। अगला अंश ‘सम्भवामि युगे-युगे’ तथा विनाशाय च दुष्कृताम्’ के रूप में पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत है। कथा महाभारत की है, रूप उपन्यास का है।
यह सम्भव है कि मेरी विवेचना अशुद्ध हो। इसके संशोधन के लिए मैं सदा तत्पर रहूँगा।

गुरुदत्त


एक



मैं बम्बई से दिल्ली आ रहा था। फन्टियार मेल के फर्स्ट क्लास के डिब्बे में सीट रिजर्व कराकर यात्रा हो रही थी। डिब्बे में एक साहब और थे। सांयकाल गाड़ी में सवार हुआ तो बिस्तर लगा दिया। दूसरे यात्री ने पहले ही बर्थ पर बिस्तर लगाया हुआ था। मैंने बिस्तर बिछाया तो वह नीचे सीट पर आकर बैठ गया।

गाड़ी चल पड़ी। साथी यात्री बार-बार मेरी ओर देखता और मुस्कराकर कुछ कहने के लिए तैयार होता, परन्तु कहता कुछ नहीं था। ऐसा प्रतीत होता था कि कोई उसको कुछ कहने से रोक रहा है। मैं उसकी इस हिचकिचाहट को देख रहा था, परन्तु स्वयं को उससे सर्वथा अपरिचित जान कुछ कहने का मेरा भी साहस नहीं हो रहा था।

मैंने अपनी अटैची केस में से ‘रीडर्स डायजेस्ट’ निकाला और पढ़ना आरम्भ कर दिया। वे महाशय सीट पर ही पलथी मारकर बैठ गये। उनकी आँखें मुँदी हुई थीं इसलिए मैंने समझा कि वे सन्ध्योपासना कर रहे होंगे। अगले स्टेशन पर गाड़ी खड़ी हुई। भोजन के लिए डाइनिंग कार में जाने के विचार से मैंने ‘रीडर्स डायजेस्ट’ को अटैची में रख, उसको ताला लगा सीट पर से उठकर खड़ा हुआ तो देखा कि सहयात्री भी उतरने के लिए तैयार खड़ा है। मैंने कहा, ‘‘मैं खाना खाने जा रहा हूँ, और आप...।’’

‘‘मैं भी चल रहा हूँ। हम गार्ड को कहकर ताला लगवा देते हैं।’’
‘‘ठीक है।’’ मैंने कहा और गाड़ी से उतरकर गार्ड के कम्पार्टमेंट की ओर चल पड़ा। जब तक कि मैं गार्ड के कम्पारेटमेंट बन्द करने के लिए आया तब तक मेरा साथी धोती-कुर्ता पहने, कन्धे पर अंगोछा डाले तैयार खड़ा था। गार्ड ने डिब्बे को चाबी लगाई तो हम ‘डाइनिंग कार’ में एक-दूसरे के सामने जा बैठे। मैंने सोचा अब परिचय हो जाना चाहिए। इस कारण यात्रा में परिचय करने का स्वाभाविक ढंग अपनाते हुए मैंने उससे पूछा, ‘‘आप कहाँ तक जा रहे हैं ?’’
‘‘अमृतसर तक।’’
‘‘आप गुरात के रहनेवाले मालूम होते हैं।’’
‘‘हाँ, परन्तु मैं आपको जानता हूँ। आजकल तो आप दिल्ली में रहते हैं न ?’’
‘‘जी हाँ।’’
‘‘चिकित्सा कार्य करते हैं ?’’

‘‘जी।’’
‘‘परन्तु मेरा परिचय आपसे बहुत पुराना है। आप भूल गये हैं। कदाचित् इतने काल की बात स्मरण भी नहीं रह सकती।’’
मेरी हँसी निकल गई। अब तक गाड़ी चल पड़ी थी। मुझे हँसता देख सामने बैठे यात्री ने मुस्कराते हुए पूछा, ‘‘इसमें हँसने की क्या बात है ?’’
उसकी मुस्कराहट में सत्य ही एक विशेष आकर्षण और माधुर्य था। मैं मन्त्र-मुग्ध सा उसके मुख पर देखता रहा। उसने ही फिर कहा, ‘‘यह जीव का धर्म है कि काल व्यतीत होने के साथ ही वह अपनी पिछली बातें भूल जाता है। देखिए वैद्यजी ! इस संसार में इतनी धूलि उड़ा रही है कि कुछ ही काल में मन-मुकुर पर मोटी मिट्टी की तह बैठ जाती है, जिससे उस दर्पण में से मुख भी नहीं देखा जा सकता।’’
मैंने अपने हँसने का कारण बताते हुए कहा, ‘‘मैं आपसे इस अलंकार को भली-भाँति समझता हूँ और यह बात सत्य है कि मुझे अभी तक भी स्मरण नहीं कि मैंने इससे पूर्व आपको कहाँ देखा है ? मैं इस कारण हँस रहा था कि यदि भूल जाना जीव का धर्म है तो आपको मैं कैसे स्मरण रह गया हूँ ?’’
‘‘वह इस कारण कि मेरे गुरु ने मुझे एक ऐसा झाड़न प्रदान किया है, जिससे मैं मन के दर्पण पर पड़ी गर्द भली-भाँति झाड़ सकता हूँ। झाड़ देने के पश्चात् मन पुनः निर्मल हो जाता है और उसमें से प्रत्येक वस्तु का प्रतिबिम्ब स्पष्ट दिखाई देने लगता है।’’

‘‘तो आपने अपने मन-मस्तिष्क से मिट्टी झाड़कर उसे निर्मल कर लिया है ?’’
इसका उसने कोई उत्तर नहीं दिया और वह मुस्कराने लगा। इस समय बैरा आर्डर लेने आया तो मैंने उसको ‘सामिष भोजन’ लाने के लिए कह दिया। साथी ने उसको वैसा ही आर्डर दे दिया, पश्चात् अर्दनिमीलित नेत्रों से, किसी अतीत की स्मृति में विलीन होते हुए उसने कहना आरम्भ किया, ‘‘एक समय मुझको एक ऐसा कार्य करना पड़ा था कि मैं उस काल के अनेकानेक महापुरुषों के सम्पर्क में आया था। कुछ लोगों से मिलने, उनसे बातचीत करने और उनकी संगति में रहने का इतना अवसर मिला था कि उनकी स्मृति मेरे मन पर अति गहरी छाप छोड़ गई है। उनमें से एक आप भी हैं।’’

बैरा सूप लाकर सामने रख गया। मैं उस पर नमक आदि डाल कर पीने के लिए तैयार हो रहा था। मेरे साथी ने भी नमकदानी उठाई और मेरे मुख पर ध्यान से देखते हुए कहा, ‘‘प्राचीन परिचितों से पुनर्मिलन कितना मधुर होता है !’’
मेरे मन में एक भय-सा लगने लगा था। सभी जानते हैं कि रेल आदि यात्राओं में ठग बहुत घूमा करते हैं और उनकी बातें भी इसी प्रकार की होती हैं। पुराना परिचय और उसका मधुर स्मरण, वर्तमान में प्रायः घनिष्ठता उत्पन्न करने का प्रथम चरण होता है।
किंचिन्मात्र परिचय को घनिष्ठता के रूप में प्रकट करना, किसी दूरस्थ सम्बन्धी का नाम लेकर निकटस्थ होने का दावा करना अथवा परस्पर सुख-दुःख में साथी होने की बात बताना, परिचय को मैत्री की सीमा तक पहुँचाने में सहायक होते हैं।
यात्रा में ठगा जाना मैं किसी प्रकार की गौरव की बात नहीं मानता। इस कारण मैंने उसकी बातों का उत्तर देने की अपेक्षा सूप पीना उचित समझा। मुझको चुप देखकर उसने भी सूप की प्लेट में से चम्मच भरकर पीते हुए पूछा, ‘‘आप बम्बई किस काम से आये थे ?’’

‘‘अखिल भारतीय वैद्य महासभा के प्रधान बम्बई में रहते हैं। उनसे कुछ काम था। मैं उस सभा का प्रधानमंत्री हूँ।’’
‘‘ओह ! वैद्यराज श्री महीपतिजी ?’’
‘‘जी ! तो आप उनसे परिचित हैं ? क्या आप भी वैद्य हैं ?’’
‘‘जी नहीं। मैं वकील हूँ। पण्डित श्री महीपति से भी पूर्व-परिचय था। परन्तु जब मैंने उनको उनसे परिचय का स्थान और काल बताया तो वे खिलखिलाकर हँस पड़े और मुझको ये गोलियाँ देकर बोले—तीन से छः तक इनका नित्य प्रयोग करूँ और गाय के दूध का अधिक मात्रा में सेवन करूँ। देखिए, ये गोलियाँ हैं।’’
इतना कहकर उन्होंने एक शीशी, जिस पर ‘सर्पिना’ लिखा हुआ था, अपने कुरते की जेब में से निकाल कर दिखा दी। मैंने शीशी पर लेबल पढ़ा तो मुस्कराकर सामने बैठे यात्री के मुख पर देखने लगा। वह सूप पीता रहा। दो-तीन चम्मच सूप पीकर उसने समीप रखी स्लाइस में से एक ग्रास मुख से लेकर चबाते हुए मेरे मुख की ओर देख पुनः मुस्कराना आरम्भ कर दिया।

‘सर्पिना’ उन्माद की औषधि है। इसमें सन्देह नहीं कि पण्डित महीपतिजी ने इस यात्री को उन्माद रोग से ग्रस्त समझा होगा। उसके परिचय की बात को छोड़ मुझको उसके पागल होने का कोई लक्षण दिखाई नहीं दिया था। ‘क्या जाने’, मैं विचार कर रहा था, ‘‘इसको उनका परिचय हो। पण्डित महीपतिजी इतने व्यस्त व्यक्ति हैं कि वे स्वयं भूल गये हों।’ इतनी-सी बात के लिए किसी को पागल की संज्ञा देना ठीक नहीं प्रतीत होता। परंतु मैं स्वयं भी अभी तक स्मरण नहीं कर सका था कि मैं इस व्यक्ति से कब मिला हूँ और कहाँ उसके संपर्क में आया था ? मैंने सूप पीना जारी रखा।

बैरा प्लेट उठाने आया तो साथी यात्री ने प्लेट को उठाया और एक ही घूँट में सारा सूप पीकर प्लेट खाली कर दी।
बैरा के चले जाने पर उसने प्रश्नभरी दृष्टि से मेरी ओर देखते हुए पूछा, ‘‘क्या आपको भी मैं पागल दिखाई देता हूँ ?’’
मैंने सूप पीने से कुछ उत्तेजित होते हुए कहा, ‘‘देखिए जी ! जितने महापुरुष हुए हैं, वे सब अपने काल के जन-साधारण द्वारा पागल ही माने जाते रहे हैं। अधिकांश महापुरुष तो अपने मरने के पश्चात् ही ख्याति-लाभ करते हैं।’’
इस पर वह व्यक्ति खिलखिलाकर हँस पड़ा। उसका हँसना तो उसके मुस्कारने से भी अधिक मधुर प्रतीत हुआ। वह पागलों की हँसी नहीं थी। उसमें व्यंगात्मक ध्वनि थी। मैं आश्चर्य से उसका मुख देखने लगा। उसने केवल यह कहा, ‘‘मैं विश्वास दिलाता हूँ कि मैं पागल नहीं हूँ।’’

अब मैंने मुस्कराते हुए कहा, ‘‘परन्तु श्रीमानजी ! इस आश्वासन की तो पण्डित महीपति जी को आवश्यकता थी। आपको चाहिए था कि उन्हें विश्वास दिलाते।’’
‘‘मैंने यह आवाश्यक नहीं समझा। कारण यह है कि न वे आप हैं और न ही आप वे। जिस काम की आवश्यकता और जिसके सफल होने की आशा आपसे की जा सकती है, वह उनसे कदापि नहीं।’’
मैं इसका अर्थ नहीं समझा। जो मैं समझ सका वह यह था कि ये महाशय मुझको पण्डित महीपति से अधिक भोला-भाला अथवा मूर्ख मानते हैं। इस समय बैरा खाने की अन्य वस्तुएँ रख गया। मैंने नमक, काली मिर्च डालकर खाना प्रारम्भ किया। उसने भी वही किया। कुछ देर तक हम दोनों चुपचाप खाने में लगे रहे। वह आदमी बहुत ही जल्दी-जल्दी खाता था। मैं एक ही स्लाइस खा पाया था कि उसने तब तक मछली के तीन टुकड़े और दो स्लाइस समाप्त कर दिये थे। मक्खन तो कभी का समाप्त हो चुका था।

मैं अभी खा ही रहा था कि उसने अपना परिचय देना आरम्भ कर दिया। उसने कहा, ‘‘मैं आजकल बम्बई में वकालत करता हूँ। वैसे, मैंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की है।’’
‘‘‘बम्बई से पूर्व कहाँ प्रैक्टिस करते थे ?’’ मैंने पूछा। यह प्रश्न तो खाते-खाते कुछ बात करने की दृष्टि से ही मैंने पूछा था। वैसे मैं अपने मन में यह निश्चय कर चुका था कि इस व्यक्ति से सतर्क रहना ही ठीक होगा।
        
उसने कुहनियों को मेज पर रख और दोनों हाथों से पंजे बाँध अपनी ठुड्डी के नीचे रख मेरी ओर ध्यानपूर्वक देखते हुए कहा, ‘‘मैं प्रैक्टिस आरम्भ करने से पूर्व दो काम करना चाहता था। एक तो प्राचीन इतिहास और धर्मशास्त्र का अध्ययन और दूसरे अपने बाल्यकाल के स्वप्नों का अर्थ समझने के लिए योग-साधना। इस कार्य में मुझे तीस वर्ष लग गये। पश्चात् जीवन में स्थिर होने के लिए मैंने बम्बई में प्रैक्टिस आरम्भ कर दी है।’’

अब मेरे विस्मय का ठिकाना न रहा। मैं अपने सम्मुख बैठे व्यक्ति की आयु का अनुमान लगाने लगा था। मुझको तो वह पच्चीस-तीस वर्ष की आयु का युवक प्रतीत होता था। मैं उसके मुख पर देखकर विचार कर रहा था कि क्या वह सत्य ही पागल है अथवा आयु के विषय में मेरा अनुमान गलत है ? जब मैं उसके मुख पर देख रहा था, उस समय वह मुझे देखकर मुस्करा रहा था। उसकी मुस्कराहट से तो वह पागल प्रतीत नहीं होता था। बैरा प्लेट उठाने आया। मैंने खाना छोड़ा तो वह प्लेट उठाकर ले गया।
जब तक बैरा अगला भोज्य पदार्थ लाता, मैंने अपने संशय का निवारण करने के लिए उससे पूछ लिया, ‘‘क्षमा करें, आपकी आयु इस समय कितनी होगी ?’’
उसने कहा, ‘‘साठ वर्ष के लगभग।’’
‘‘साठ ! मैं आश्चर्यचकित हो उसके मुख पर देखने लगा।

‘‘जी हाँ। आपका आश्चर्यान्वित होना भी स्वाभाविक है। मुझे बम्बई में प्रक्टिस करते हुए पाँच वर्ष बीत गये हैं। तीस वर्ष तक मैं तिब्बत के पुंगी नामक ग्राम में एक बौद्ध-विहार में साधना करता रहा हूँ और कानून की पढ़ाई समाप्त करने के पश्चात कलकत्ता के एक वकील श्री एस. सी. सेन से मैंने काम सीखा है।’’
‘‘परन्तु देखने से तो आप अभी पच्चीस वर्ष के युवक प्रतीत होते हैं।’’
‘‘हाँ, ऐसा होना ही चाहिए। वास्तव में मुझको मेरे गुरुजी ने सिखा दिया है कि मैं काल से तटस्थ होकर किस प्रकार उसके क्षयकारक प्रभाव से बच सकता हूँ।’’

बैरा चावल और ‘चिकन करी’ ले आया। हम दोनों ने खाना आरम्भ कर दिया। मैंने पुनः अनुभव किया कि वह मुझसे दुगनी गति से खाता है। मैं धीरे-धीरे चबा-चबा कर खा रहा था। चबाता तो वह भी प्रतीत होता था, परन्तु जो कार्य मैं दस बार मुख चलाने से कर सकता था, वह कार्य वह दो-तीन बार मुख चलाने से ही कर लेता था।
परिणाम यह हुआ कि मैंने आधी प्लेट ही खाली की थी वह पूर्ण प्लेट चट कर गया। पश्चात् वह पुनः मुझसे बातें करने लगा।


(2)



उसने बताना प्रारम्भ किया, ‘‘मैं जब कलकत्ता में विद्यार्थी था तब मैंने स्वामी रामकृष्ण और स्वामी विवेकानन्द से परस्पर प्रथम परिचय की कथा सुनी थी।
स्वामी रामकृष्ण दक्षिणेश्वर में पीपल के पेड़ के नीचे बैठे कीर्तन कर रहे थे और भक्तगण उनके कीर्तन में साथ दे रहे थे।
‘‘उस समय विवेकानन्द, जिसका नाम नरेन्द्र था, तब विद्यार्थी ही था। वह कुछ विद्यार्थियों के साथ स्वामीजी की हँसी उड़ाने के लिए उस कीर्तन में पहुँच गया। नरेन्द्र स्वयं उस समय गजले गाया करता था। स्वामी जी के कीर्तन में कभी-कभी भक्तगण भी भजन गाया करते थे। विद्यार्थियों का विचार था कि वे उस दिन नरेन्द्र से कीर्तन करने के लिए कहेंगे और वह गजलें गायेगा। उस समय सब विद्यार्थीगण मिलकर स्वामीजी की हंसी उड़ायेंगे।
‘‘इसके विपरीत बात यह हुई कि जब यह मण्डली कीर्तन-स्थल पर पहुँची तो स्वामी रामकृष्ण ने कीर्तन बन्द कर नरेन्द्र की ओर उँगली करके कहा, ‘‘आओ, आओ नरेन्द्र ! मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा हूँ।’’

‘‘सब लोग विशेष रूप से विद्यार्थीगण, विस्मय से स्वामीजी की ओर देखते रह गये। उनके विस्मय का ठिकाना नहीं रहा, जब नरेन्द्र उनके बीच में से निकल स्वामीजी के पास चला गया और स्वामीजी के संकेत करने पर उनके समीप जा बैठा। सब भक्तजनों को ऐसा प्रतीत हुआ कि दोनों पूर्व-परिचित हैं।
‘‘कीर्तन में स्वामी रामकृष्णजी ने नरेन्द्र को भजन सुनाने के लिए कहा, ‘‘बेटा, करो न भजन !’ नरेन्द्र गाने लगा—‘हरि बिन मीत न कोऊ।’ पन्द्रह-बीस मिनट तक उसने यह भजन गाया। उसके गाने में विशेष रस था। जब सभा समाप्त हुई तो स्वामी रामकृष्णजी ने कहा, ‘‘नरेन्द्र ! फिर आना।’

‘‘ऐसा सुना जाता है कि सभी से लौटते हुए विद्यार्थियों ने नरेन्द्र से पूछा कि उसने भजन क्यों गाया, गजल क्यों नहीं गायी ? नरेन्द्र ने उत्तर दिया वह स्वयं नहीं जानता। उसको तो भजन कण्ठस्थ नहीं था। उसने आज तक कभी कोई भजन गाया भी नहीं। जब स्वामी जी के आदेश पर वह गाने लगा तो अनायास ही उसके मुख से इस भजन के स्वर निकल गये। उसको प्रतीत हो रहा था कि इस भजन के स्वर और बोल स्वयं ही उसके मन में प्रस्फुटित हो रहे हैं, मानो उसको कोई भीतर से ही प्रेरित कर रहा हो। जैसे नाटक में ऐक्टरों को ‘प्रोम्पटर’ उनका पार्ट स्मरण कराता रहता है, ठीक वही स्थिति उसकी भी थी।
‘‘विद्यार्थीगण नरेन्द्र की हँसी उड़ाने लगे। जिस प्रकार इस घटना ने नरेन्द्र के मन में आश्चर्यजनक परिवर्तन उत्पन्न किया उसी प्रकार इस कथा ने मेरे मन में भी एक अनिवार्चनीय उत्सुकता उत्पन्न कर दी। यह उत्सुकता पहले तो सर्वथा धुँधली-सी थी, परन्तु शनैः-शनैः वह एक निश्चित रूप धारण करती गई।

‘‘जब मैं ‘लॉ’ की पढ़ाई समाप्त कर मिस्टर सेन के साथ वकालत का अभ्यास कर रहा था, उस काल में मेरा तिब्बत के एक लामा से परिचय हो गया। पहले ही दिन जब मैं उससे मिलने गया तो वह उठकर मेरा स्वागत करने लगा और मुझको आदर से अपने साथ बैठने का आग्रह करने लगा। मैं इससे भारी संकोच में पड़ गया। बहुत आग्रह करने पर वह मुझको अपने आसन पर बैठने के लिए राजी कर सका। तत्पश्चात् उसने कहा, ‘‘मैं आपकी एक मास से प्रतीक्षा कर रहा हूँ।
‘एक मास से, परन्तु मुझको तो आपके विषय में कल ही मेरे एक मित्र श्री मनमोहन सानियाल ने बताया था कि आप बहुत विद्वान् और स्वप्नों को अर्थ बताने वाले व्यक्ति हैं।’
‘हाँ, यह ठीक है। मिस्टर सानियाल परसों यहाँ आए थे। मैंने उन्हें उनके बचपन के एक स्वप्न का अर्थ बताया था। ऐसा प्रतीत होता है कि वे उससे अति प्रभावित हुए हैं।’

किन्तु आपकी खोज तो बहुत पहले से हो रही है। मैं तिब्बत में पुंगी के विहार में एक भिक्षु के रूप में रहता हूँ। पिछले वर्ष हमारे गुरुजी ने मुझको बुलाकर कहा, इस पृथ्वी पर एक महान् आत्मा कलकत्ता में भटक रही है। तुम जाओ और उसको यहाँ ले आओ।
‘मैंने गुरु महराज से जब पूछा कि उस आत्मा को किस प्रकार पहचान सकूँगा तो उन्होंने आपके मस्तक पर विद्यमान लक्षण बताये। अतः मैं आपकी खोज में चल पड़ा। कलकत्ता में आये मुझे एक मास से अधिक हो गया है और मैं समझ नहीं रहा था कि किस प्रकार आपकी खोज की जाय।
‘‘आज आपको स्वयं यहाँ उपस्थित देखकर मैं अपनी खोज की सफलता पर फूला नहीं समाता। सो अब आप चलने के लिए तैयार हो जाइये।’
‘‘इस एकाएक निमन्त्रण से मैं चकित रह गया। इस पर भी बात टालने के लिए मैंने पूछा, ‘वहाँ चलने से क्या होगा ?’
‘हमारे गुरुजी दो बातों के ज्ञाता हैं। एक तो वे भूतकाल के अन्धकार में ऐसे देख लेते हैं, जैसे बिल्ली अंधेरे में सबकुछ देख सकती है। दूसरे, वे भविष्य के बादलों को छिन्न-भिन्न कर उनके पार की बात जान लेते हैं।’
‘इन दोनों बातों को जानने से क्या होगा ?’

‘‘यह तो मैं नहीं जानता। आप गुरुजी के पास चलकर पूछ लीजिये।’
इतनी सी बात जानने के लिए मुझे पुंगी जाना होगा ? कहाँ है वह स्थान ?’
यहाँ से हम कैलिम्पौंग जायेंगे। वहाँ से एक सप्ताह की पूर्वोत्तर की यात्रा पर पुंगी विहार है। ऐसा कहा जाता है कि गुरु विश्वेश्वरजी वहाँ पर तीन सौ वर्षों से योगाभ्यास कर रहे हैं। इसके द्वारा वे मनुष्य-योनि में श्रेष्ठ व्यक्तियों की उपस्थिति जान लेते हैं।’
‘‘मैंने बाहरी दृढ़ता दिखाते हुए कहा, ‘‘महाराज ! यहाँ इतना अधिक काम है कि मुझको इतनी लम्बी यात्रा के लिए अवकाश नहीं है।’
‘देखिये मणिकलालजी ! मैंने आपको अपने गुरुजी का सन्देश दे दिया है। शेष आपके विचार करने की बात है।’
‘‘मैं वहाँ से लौटा तो मुझको बार-बार स्वामी रामकृष्णजी तथा स्वामी विवेकानन्द की प्रथम भेंट की घटना स्मरण हो रही थी। वे पूर्वजन्म के परिचित थे। अतः एक-दूसरे को परस्पर पहचान लिया था। तो क्या इस भिक्षु के गुरु भी मेरे पूर्व-परिचित हैं ?

‘उसी सांयकाल मैं सानियाल से मिलने गया। मैंने उससे जाते ही कहा, ‘‘क्या उस तिब्बती बैद्ध भिक्षु ने मुझको बुलाने के लिए आपसे कहा था ?’
‘क्या मतलब ?’ सानियाल ने प्रश्नभरी दृष्टि से मेरी ओर देखकर पूछा।’
‘‘मैंने अपने कहने का अभिप्राय बताते हुए कहा, ‘‘मैं आज उनसे मिलने गया था। उन्होंने मुझको बताया कि वे मेरी एक मास से प्रतीक्षा कर रहे हैं। इसी कारण मैं पूछ रहा हूँ कि क्या उन्होंने आपको मेरे वहाँ जाने के विषय में कुछ कहा था ?’
‘ना भाई माणिक ! ऐसी कोई बात नहीं हुई। मैं परसों पहली बार ही उनसे मिलने गया था। उन्होंने मेरे एक स्वप्न का अर्थ इस ढंग से बताया कि उससे जहाँ मैं चकित हुआ, वहाँ उनके ज्ञान से प्रभावित भी। तुम भी अपने बाल्यकाल के अनेकानेक स्वप्नों की बात बताया करते हो; इस कारण मैंने तुम्हें उसकी बात बता दी। अन्यथा न तो मैं उसको अधिक जानता हूँ, न ही वह मुझसे विशेष परिचय रखता है।

‘हाँ मेरे मित्र मिस्टर दास ने उनकी बहुत प्रशंसा की थी। उसने बताया था कि वह महायोगी है।’
‘‘‘मैं उस रात उस विचित्र निमन्त्रण का अर्थ समझने का प्रयत्न करता रहा। कलकत्ता में मेरी किसी में भी लगन नहीं थी। मेरे पिता का देहान्त हो चुका था। अभी जब मैं कॉलेज में पढ़ता था कि मेरी माँ मेरे छोटे भाई-बहनों को लेकर अपने पिता के घर अहमदाबाद चली गई थी। मैं कॉलिज में पढ़ रहा और पश्चात् मिस्टर सेन के साथ कलकत्ता में ही काम सीखता रहा। बीच-बीच में मैं अहमदाबाद जाकर माँ से मिल आया करता था। यह भी किसी लगन के कारण नहीं था। केवल माँ को मिलना अपना कर्तव्य जानकर वहाँ जाया करता था। अपने भाई-बहिन से तो मेरी किसी प्रकार की समन्वयता नहीं थी। बहिन का विवाह हो गया तो वह अपने घर चली गई और भाई अहमदाबाद में एक फर्म में काम करने लगा था।
‘मैं रात-भर यह विचार करता रहा था कि मुझको तिब्बत जाना चाहिए या नहीं। दिन निकलने तक भी मैं निर्णय नहीं कर सका था। उस दिन मैंने मिस्टर सेन से पूछा, ‘तिब्बत जाने के लिए पासपोर्ट का प्रबन्ध किस प्रकार हो सकता है ?’


अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book