विक्रमादित्य साहसांक - गुरुदत्त Vikramaditya Saahsank - Hindi book by - Gurudutt
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विक्रमादित्य साहसांक

गुरुदत्त

प्रकाशक : हिन्दी साहित्य सदन प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :189
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 5368
आईएसबीएन :81-88388-37-8

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एक ऐतिहासिक उपन्यास...

Vikramaditya sahsank

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भारतीय साहित्य जगत में ध्रुव तारे की तरह अपना स्थान रखने वाले गुरुदत्त जी का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। अपने जीवन काल में गुरुदत्त जी ने जितने भी उपन्यास लिखे, वे सभी आज उतने ही लोकप्रिय हैं जितने कि उस समय थे।

विक्रमादित्य साहसांक उनके द्वारा लिखा गया ऐतिहासिक उपन्यास है जो उन्होंने अत्यधिक अध्ययन और खोज के बाद लिखा। इस उपन्यास का नायक चन्द्रगुप्त द्वितीय है जिसे गुरुदत्त जी ने विक्रमादित्य साहसांक मानते हुए विक्रम संवत का प्रवर्तक सिद्ध किया है।
प्राचीन ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर राजनीति तथा प्रेम का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है यह उपन्यास अति रुचिकर तथा विवेचनापूर्ण है।
निःसन्देह हिन्दी भाषी पाठकों के लिये यह उपन्यास अत्यन्त ही मनोरंजक सिद्ध होगा।

श्री गुरुदत्त की अपार खोज के परिणामस्वरुप प्रणयित उपन्यास जिसमें उन्होंने भारतीय इतिहास के युगपुरुष, विक्रम संवत के प्रवर्तक, देश, धर्म व भारतीय वाङ्मय के सेवक, भारतवर्ष की सीमाओं के विस्तार व शत्रु विनाशक, महाराज विक्रमादित्य को नायक के रूप में उभारा है।


प्रथम परिच्छेद



उज्जयिनी के राजपथ से निकलने वाली एक वीथिका के आरम्भ में एक अच्छे-बड़े निवास-गृह में शंख, घड़ियाल, छैने, झांझर इत्यादि की ध्वनि हो रही थी। निवास-गृह में एक प्रांगण था। गृह-द्वार इसी प्रांगण में खुलता था। प्रांगण के वाम पार्श्व में एक बड़े-से आगार में मन्दिर था, जिसमें दुर्गा भवानी की मूर्ति स्थापित थी। गृह के इस मन्दिर में आरती हो रही थी।

परिवार के सभी सदस्य मन्दिर में उपस्थित थे। सबसे आगे प्रौढ़ावस्था का एक ब्राह्मण खड़ा था। सिर पर बड़ी सी चोटी और गले में मोटे सूत का यज्ञोपवीत था। उनके पार्श्व में उसकी धर्मपत्नी, जो आयु में उससे पर्याप्त छोटी प्रतीत होती थी, खड़ी थी। इन दोनों के पीछे, इनका परिवार था। एक ओर पण्डितजी का पुत्र अपनी युवा पत्नी के साथ था और दूसरी ओर पण्डितजी की कन्या अपने भाई के पुत्र के साथ खड़ी थी। लड़की की आयु पन्द्रह-सोलह वर्ष की थी।
आरती से पूर्व पण्डितजी ने पूजा की। अब दुर्गा स्तोत्र अत्यंत ही मधुर स्वर में पाठ किया जा रहा था—


आगच्छ वरदे देवि दैत्यदर्पनिषूदिनी।
पूजां गृहाण सुमुखि नमस्ते शंकरप्रिये।।
देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य।
प्रसीद विश्वेशवरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य।।
दुर्गां शिवां शान्तिकरीं ब्रह्माणीं ब्रह्मणः प्रियाम्।
सर्वलोकप्रणेत्रीं च प्रणमामि सदा शिवाम्।।


इस प्रकार एक घड़ी-भर पूजा तथा इस प्रार्थना के उपरान्त आरती आरम्भ हुई। परिवार के सभी सदस्य आरती गाने लगे तथा साथ ही घड़ियाल, छैने इत्यादि स्वरताल के साथ बजने लगे। एक स्वर में सब गा रहे थे—

जय अम्बे जगदम्बे जग जननी माँ जय जय।
भयहारिणी भवतारिणी भवभामिनी जय जय।।


चौथाई घड़ी तक आरती चलती रही। इस सब समय में गृहस्वामी हाथ में दीपक लिये, जिसमें छः घी की बाती जल रही थीं, देवी के मुखे के चारों ओर घुमाता रहा। लड़की घड़ियाल बजा रही थी। बड़ा पुत्र शंख बजा रहा था। उसके समीप खड़ी उसकी पत्नी छैने बजा रही थी।
लड़की के समीप खड़ा एक अन्य बालक घंटा बजा रहा था।

आरती समाप्त हुई। गृहस्वामी ने हाथ का दीपक दुर्गा भवानी के चरणों में रख दिया और परिवार के सब सदस्य उस दीपक की ज्वाला के ऊपर हाथ घुमा, अपने-अपने मस्तक, मुख और चक्षुओं को लगाने लगे। तदनन्तर सबने आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए अपने मस्तक देवी के चरणों में नवा दिए।
परिवार मन्दिर से बाहर निकला। प्रांगण के दक्षिण कक्ष में भोजनागार था। वहां पाचक खड़ा परिवार के सभी सदस्यों की, जलपान के लिये, प्रतीक्षा कर रहा था।

मन्दिर से निकलकर सब उस ओर ही घूमने वाले थे कि गृह के बाहर अश्व के हिनहिनाने की आवाज का शब्द सुनाई पड़ा। शब्द सुन सबसे पूर्व कुमारी कन्या ने प्रफुल्लित हो, गृहस्वामी से कहा, ‘‘बाबा !! वे आए हैं।’’
पिता ने लड़की की ओर मुस्कुराकर देखते हुए कहा, ‘‘वे कौन ?’’
लड़की की आंखों में लज्जा झुक गई और उसके कपोल उषा की लाली के समान रक्तिम हो गये।
किसी के उत्तर देने की आवश्कता नहीं पड़ी। एक युवक गृह-द्वार से प्रवेश कर प्रांगण में लंबे-लम्बे पग भरता हुआ पण्डितजी के सम्मुख आ, उनके चरणस्पर्श करने लगा। परन्तु पण्डितजी ने उसको बाजू से पकड़कर ऐसा न करने से रोक लिया। तदनन्तर उसकी पीठ पर आशीर्वाद सूचक हाथ फेरते हुए बोले, ‘‘वररुचि ! तेरे अश्व के हिनहिनाने को कालिंदी भली-भांति पहचानने लगी है।’’

इतना कह पिता अपनी पुत्री की ओर देखने के लिए घूमा। तब तक कालिंदी ने स्वयं पर नियंत्रण कर लिया था। वह मुस्कुरा रही थी। पिता ने पूछा—‘‘क्यों कालिन्दी ! इनके अश्व के हिनहिनाने का स्वर कैसा है ?’’
यह सुन सब हंसने लगे। पण्डितजी की पत्नी ने आगन्तुक युवक को कहा, ‘‘बेटा भीतर चलो ! अल्पाहार तैयार है।’’
‘‘माताजी ! आप अल्पाहार कीजिये। मैं अभी शौचादि से निवृत नहीं हुआ। दिन के द्वितीय प्रहर का चला आपके द्वार पर ही अश्व से उतरा हूं। जब यहां पहुंचा तो आपके आरती के स्वर सुनाई दिए। उसमें विघ्न न बनने के विचार से मैं द्वार पर ही खड़ा रहा। गुरुजी से एक अत्यावश्यक विषय पर बात करनी है। उसके उपरान्त ही शौचादि से निवृत्त होकर जलपान करूंगा।’’

घर के सभी प्राणी भोजनागार में चले गये। पण्डितजी ने गृह-द्वार के साथ वाले आगार में, जो बैठक के रूप में प्रयुक्त होता था, आगन्तुक युवक के साथ प्रवेश किया और उसको आसन पर अपने समीप ही बैठाकर पूछने लगे, ‘‘हां, कहो। रात्रि-भर यात्रा करके आने का क्या कारण है ? तुम्हारी मौसी तथा अन्य बन्धुगण तो सकुशल हैं ?’’
‘‘सब कुशल पूर्वक हैं गुरुवर ! मैं घर से नहीं आ रहा। सीधा विदिशा से आ रहा हूं। वहां एक समाचार प्रख्यात हो रहा है कि राजकुमारी ध्रुवदेवी का विवाह कुमार राम से हो रहा है। इस विषय में सत्य ज्ञान प्राप्त करने के लिए मैं राज्य-सभा में उपस्थित हुआ। प्रथा के अनुसार मुझको कुछ गायन करने के लिए कहा गया तो मैंने महाराजाधिराज के कनिष्ठ पुत्र राजकुमार विक्रम के रूप-लावण्य और पराक्रम की प्रशंसा में कविता-गान किया।

‘‘महाराज के वामपार्श्व में महारानी तथा उनके समीप कुमारी धुव्रदेवी उपासीन थीं। जब मैं राजकुमार के रूप-लावण्य की प्रशंसा करता था, तो ध्रुवदेवी की मुख प्रफुल्लित हो उठता था। महाराज ने इसको लक्ष्य किया तो मेरे गान को बन्द कराकर कहा, ‘‘पण्डित ! राजकुमार राम के विषय में कुछ और सुनाओ।’’
‘‘मैंने कहा, ‘‘महाराज ! मैं आज उज्जयिनी जाता हूं और जो कुछ भी महाराजधिराज के ज्येष्ठ पुत्र की प्रशंसा में उपलब्ध होता है, बटोरकर ले आता हूं। अभी तो उसके किसी भी गुण की ध्वनि इस नगरी में पहुंची नहीं।’’
‘तुम नहीं जानते कि राजकुमार रामगुप्त महाराजाधिराज का उत्तराधिकारी है ? क्या गान करने के लिए यह पर्याप्त गुण नहीं ? तुम नहीं जानते कि रामगुप्त के पिता का विरुद-समर शत वितत विजयोजितरि जिजिर पुरजित व्याघ्र पराक्रमः है। क्या यह कुछ नहीं ?’

‘महाराज ! यह तो जलकुण्ड में मार्तण्ड का प्रतिबिम्ब मात्र है। मार्तण्ड के अस्त होते ही वहां जल-मात्र रह जाएगा। राजकुमार रामगुप्त का कोई स्वतंत्र कीर्तिमान कृत्य अभी वर्मगोचर नहीं हुआ है। आज्ञा हो तो उज्जयिनी के राज्य-पथ अथवा उसकी वीथिकाओं में खोज करने चला जाऊं। इतने बड़े महानात्मा के ज्येष्ठ पुत्र की महानता के कुछ तो चिह्न मिलने ही चाहिए।’’

‘‘विदिशा-नरेश के मस्तक पर त्योरिया चढ़ गईं। मेरी दृष्टि राजकुमारी के मुख पर पड़ी तो मैंने देखा कि उसका मुख विवर्ण हो रहा था। यदि मैं ब्राह्मण-कुमार न होता और उसकी कृपा से वेद-वेदांग का परांगत न होता तो यह मुण्ड ही रुण्ड से पृथक् होकर राज्य-सभा में लुढ़का दिखाई देता। अपने सम्मुख ब्रह्मतेज से परिपूर्ण इस पुञ्ज को देख महाराज अपना क्रोध भीतर-ही-भीतर पी गये और बोले, ‘‘अच्छा वररुचि ! जाओ और देखो, इस, राम की कीर्ति और उसका यश किस प्रकार विख्यात किया जा सकता है। हमारी रुचि इस कुमार में है।
जाओ, जब तक तुम्हें इस दिशा में तुम्हें कुछ प्राप्त न हो, विदिशा में तुम्हारे आने की आवश्यकता नहीं है।’’

मैंने महाराज को नमस्कार किया और राजसभा से बाहर हो गया। अपने निवास-स्थान पर पहुंच, अश्व लेकर सीधा इस ओर आया हूं। रात्रि-भर की यात्रा के अनन्तर आपके द्वार पर पहुंचा हूं।’’

वृद्ध ब्राह्मण का नाम आचार्य हरिषेण था। वररुचि उनका एक अत्यंत प्रतिभाशाली शिष्य था और इस समय विदिशा की रज्य-सभा की शोभा था। आचार्य हरिषेण महाराजाधिराज समुद्रगुप्त का बालसखा एवं गुप्त परामर्शदाता रह चुका था। महाराजाधिराज के पिता के काल में भी एक बार ऐसी ही समस्या आ उपस्थित हुई थी। उस काल की घटना को स्मरण कर आचार्य ने वररुचि को बताया—‘‘मैं वर्तमान महाराज के राज्यारोहण से पूर्व की एक घटना का वर्णन करता हूं। महाराज तब कुमार ही थे, इनके एक ज्येष्ठ भ्राता थे, कच्छ। राजकुमार कच्छ के मातृपक्ष के सम्बन्धी उसे अपने पिता का उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे। मुझको यह बात देश और समाज के हित में प्रतीत न हुई। इस कारण नहीं कि राजकुमार समुद्रगुप्त मेरा सखा था प्रत्युत यह इसलिए था कि कच्छ दुर्बलआत्मा तथा विषय-लोलुप था। इसके विपरीत समुद्रगुप्त शौर्य युक्त तथा धार्मिक प्रवृत्ति रखता था। पक्षपातयुक्त होने का लांछन, अपने सिर पर लेते हुए मैं भी महाराज चन्द्रगुप्त को समझाने के लिए तैयार हो गया।

‘‘गुप्त परिवार का पुरखा श्रीगुप्त दक्षिण से आया था। वहां वह केवल एक मण्डलीक मात्र था। इनका परिवार वहां लक्ष्मी का उपासक था। ऐसा किंवदन्ति है कि लक्ष्मी ने श्रीगुप्त को स्वप्न में उत्तर पथ का मार्ग दिखाया और कहा कि उसका कीर्तिपथ उस ओर है। वह वहां से उज्जयिनी आया और यहां शक्ति संचय कर पाटलिपुत्र पर अधिकार कर लिया। पाटलिपुत्र के दुर्बल नरेशों को पदच्युत कर वह स्वयं राजा बन गया, परन्तु इससे अधिक वह कुछ नहीं कर सका। उसके उपरान्त चन्द्रगुप्त राजसिंहासन पर बैठा।

‘‘एक दिन वह मृगया के लिए गंगा पार कर वैशाली के समीप वन में गया हुआ था कि वैशाली की राजकुमारी कुमारदेवी की उससे भेंट हो गई। राजकुमारी उससे प्रेम करने लगी। तत्कालीन वैशाली-नरेश की एकमात्र सन्तान वह राजकुमारी ही थी। राजकुमरी ने अपने मन के भाव मेरे गुरुजी को एक पत्र में लिखे। गुरुजी ने उस समय मगध के राज-पुरोहित थे। उन्होंने इस अवसर को ईश्वर-प्रदत्त मान यत्न किया और चन्द्रगुप्त का विवाह राजकुमारी से सम्पन्न हो गया।
‘‘वैशाली मित्र-राज्य होने के उपरान्त चन्द्रगुप्त के अंग और कामरूप को अपने आधीन कर लिया। इस प्रकार पूर्व और उत्तर दिशा में अपने राज्य को सुरक्षित कर, पश्चिम की ओर उसने राज्य का विस्तार करना आरम्भ कर दिया।
‘‘राजकुमार कच्छ, महाराज की ज्येष्ठ महारानी का पुत्र था। ज्येष्ठ महारानी मगध रेवार की थी। अतः मातृपक्ष के लोग अपने दुहिते को सिंहासन दिलाना चाहते थे। इससे उनका आशय पुनः अपना प्रभाव बढ़ाने का था। वह प्रभाव कुमार देवी के उपरान्त समाप्त-प्रायः हो चुका था।

‘‘समुद्रगुप्त कुमारदेवी का पुत्र था और उसकी रक्तवाहिनियों में लिच्छिवियों के रक्त का अंश था। इसके अतिरिक्त उसने अपने पिता के साथ पश्चिम-पथ के समर में भी भाग लिया था तथा कोई बार अपने शौर्य का परिचय दिया था। मैं और समुद्रगुप्त, दोनों गुरुजी के शिष्य थे और मुझको गुरुजी की शिक्षा-दीक्षा पर पूर्ण विश्वास था।
‘‘कच्छ पाटलिपुत्र के राजप्रासाद में पला तथा खेला था। स्त्रियों से क्रीड़ा करने में वह सिद्धहस्त था। महाराज चन्द्ररगुप्त समुद्रगुप्त के साथ उज्जयिनी गये हुए थे। मैं पाटलिपुत्र में था कि मेरे हाथ एक स्वर्णमुद्रा लग गई, जिस पर कच्छ को महाराजाधिराज के रूप में प्रस्तुत किया गया था। वह मुद्रा कच्छ के मातृपक्ष वालों ने प्रसारित की थी।

‘‘अतः महाराज चन्द्रगुप्त के लौटते ही मैं उनके सम्मुख उपस्थित हो आशीर्वाद देकर कहने लगा, ‘महाराज ! नगर द्वार पर पत्थर बना सिंह आपके राज्य की रक्षा कर रहा है  अथवा श्रीमान की चतुरंगिणी सेना को यह श्रेय प्राप्त है ?’
‘‘महाराजा ने मुस्कुराते हुए पूछा, ‘‘ब्राह्मण कुमार ! यह श्रेय किसको देना चाहते हैं ?’ ‘‘मेरे श्रेय देने से क्या होगा ? महाराज ! मैं तो अपने मत प्रकट करने वाला ही रहूंगा। सारा लेख तो जब राज्य से मुद्रांक्ति होगा, तब ही प्रमाण माना जाएगा। यह श्रेय सेना को प्राप्त है, परन्तु इस श्रेय पर श्रीमान् का मुद्रांकन होना चाहिए।’
‘हो जाएगा।’
‘और महाराज ! सेना के सेनापति तथा पश्चिम-पथ की समर के विजयी राजकुमार की सेवाएं स्वीकार होनी चाहिए ’
‘समुद्रगुप्त के विषय में कह रहे हो, विप्र !’

‘‘महाराज बुद्धिमान हैं। यह बात किसी के युवराज अथवा सम्राट बनने की नहीं है। इससे पूर्व भरत खण्ड के भाग्य का वारा-न्यारा होने वाला है। महाराज का आरम्भ किया कार्य पूर्णता को प्राप्त होना चाहिए। देश की हो रही दुर्गति, जो बौद्ध भिक्षुओं की अशुद्ध और अयुक्ति-संगत भावनाओं से प्रेरित सम्राट् अशोक ने की थी और जिसका विरोध महाराज पुष्यमित्र ने आरंभ किया था और अब आप कर रहे हैं, वह कार्य, यदि भारत-सम्राट् का पद एक वेश्यागामी, दुराचारी और निर्बुद्धि व्यक्ति का भोग बन गया तो खटाई में पड़ जाएगा।’

‘देवता ! क्या राजा का ज्येष्ठ कुमार राज्य का उत्तराधिकारी नहीं बनना चाहिए ?’’
‘‘महाराज ! राज्य के विषय में ये बातें सत्य नहीं हैं। यदि यह सिद्धांत अचल होता तो महाराज अशोक भारत के सम्राट् नहीं बनते। न ही शुंग-परिवार की स्थापना होती। पुष्यमित्र पुनः वैदिक यज्ञ-याग प्रचलित न कर पाते और न ही आपके पूर्वज श्रीगुप्त अशोक के सुन्दर वर्ण्य तुल्य प्रासाद का सुख-भोग कर पाते।
‘राज्य करना अधिकारी का अधिकार है। अयोग्य के हाथ में दिया राज्य सदा विनाश को प्राप्त होता है।
‘महाराज ! देश का धर्म तथा इसकी संस्कृति पुकार-पुकार कह रहे हैं कि अनाधिकारी को अधिकार देकर काल की चक्की में गुप्त-राज्य-परिवार को पिसने के लिए मत छोड़िए।’

‘‘इस प्रकार मेरा निवेदन सुनकर महाराज गंभीर भाव में निमग्न हो गए। कुछ क्षण तक विचार कर कहने लगे, ‘‘आचार्य ! आप जैसे योग्य विद्वान् कच्छ कुमार को शिक्षा क्यों नहीं देते ? आप अपनी अयोग्यता को छिपाने के लिए, हमें अस्वाभाविक कार्य करने को कहते हैं। ज्येष्ठ पुत्र के रहते मैं किस प्रकार कनिष्ठ पुत्र को उत्तराधिकारी मान लूं।’

‘महाराज ! पूर्व-जन्म के कर्मफल को आचार्य कैसे मिटा सकते हैं ? कृषक क्षेत्र में बीजारोपण करता है। उर्वरा भूमि में वह बीज फलीभूत होता है, परन्तु ऊसर भूमि में पड़ा बीज सड़ जाता है। बुद्धिमान स्वामी तो फले बीज के फल को बटोर लेते हैं तथा ऊसर भूमि को त्याग देते हैं।’

‘‘महाराज चन्द्रगुप्त बुद्धिमान शासक थे। वे मान गये और उन्होंने उसी समय समुद्र गुप्त को बुलाकर, उसका राज्यभिषेक कर दिया और स्वयं वानप्रस्थ लेकर वन चले गये।

‘‘महाराजाधिराज समुद्रगुप्त अब वृद्ध हो चुके हैं और वे इस प्रश्न की महानता को समझ नहीं सकते। अन्यथा रामगुप्त को किसी अन्य ढंग से सन्तुष्ट किया जा सकता था।’’
‘इस पर भी गुरुजी ! यत्न तो करना ही चाहिए।’’ वररुचि ने कहा।
‘‘ठीक है। तुम स्नान-संध्या से अवकाश पाकर भोजन कर लो। एक प्रहर भर विश्राम कर पाटिलपुत्र के लिए प्रस्थान कर दो। तुम मेरे योग्य शिष्य हो और कोई कारण नहीं कि तुम वह कुछ नहीं कर सको, जो मैंने किया था।
‘विदिशा-नरेश तो ध्रुव देवी का विवाह भारत के भावी सम्राट से करने की इच्छा रखते हैं। उनको राम तथा विक्रम में अन्तर प्रतीत नहीं होता। उनको तो अपनी कन्या को साम्राज्ञी-पद प्राप्त कराना है।’’

‘‘मुझको बात इसके सर्वथा विपरीत प्रतीत होती है। विदिशा-नरेश राम का आश्रय लेकर स्वयं भारत का सम्राट बनना चाहता है। विक्रम उसका आश्रय नहीं बन सकता। इस कारण दुर्बलात्मा को साधन बनाने का वह आयोजन करना चाहता है।’’
‘‘तो जाओ, मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है।’’



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विदिशा एक छोटा-सा राज्य था। विदिशा-नरेश के वाकाटक-परिवार की एक शाखा में से था। विदर्भ के वाकाटकों का मुख्य शासक इस समय पृथ्वीनरेश था। उसकी राजधानी पुरिका थी। पृथिवीसेन के पिता रुद्रसेन प्रथम ने समुद्रगुप्त की आधीनता स्वीकार कर ली थी।
 
वाकाटक परिवार की कनिष्ठ शाखा सर्वसेन की अध्यक्षता में विदिशा में थी। रुद्रसेन के समुद्रगुप्त के आधीन हो जाने से सर्वसेन विक्षुब्द-सा हो गया था और ऐसे अवसर की प्रतीक्षा में था, जब वह परिवार की प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित कर सके।
सर्वसेन की कनिष्ठ रानी की कन्या ध्रुवदेवी का सौन्दर्य जब निखरने लगा तो सर्वसेन ने इसका लाभ उठाने का निश्चय कर लिया। वह उसका विवाह रामगुप्त के साथ कर मगध राज्य को अपने प्रभाव में लाने का आयोजन करने लगा। उसका इस योजना में राज्य का पुरोहित गल्हण भी सहायक हो गया।

रामगुप्त समुद्रगुप्त की बड़ी रानी चन्द्रावती का पुत्र था। पुत्र को जन्म देकर चन्द्रावती तीव्र ज्वर में ग्रस्त हो गई। जब महारानी के जीवन की आशा कम हो गई तो उज्जयिनी के एक धन्वंतरि ने उनका पेट चीर कर गर्भाशय में से एक सड़ रहा औल (जरायु) का टुकड़ा निकाला। जीवन तो बच गया। परंतु धन्वंतरि ने महारानी को पुनः गर्भ धारण करने के आयोग्य घोषित कर दिया। अतः चन्द्रावती को उज्जयिनी में ही रहने दिया गया और समुद्रगुप्त ने एक अन्य, दत्तदेवी नाम की कन्या से विवाह कर लिया।

दत्त देवी से भी महाराज को एक पुत्र-रत्न प्राप्त हुआ। इसका नाम विक्रम रखा गया। समय पाकर विक्रम युवक हुआ तो महाराज के साथ समर पर जाने लगा। पश्चिम-पथ पर समर के समय तो विक्रम को महाराज ने सेनापति के पद से विभूषित कर दिया।




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