खण्डहर बोल रहे हैं - भाग 1 - गुरुदत्त Khandahar Bol Rahe Hai 1 - Hindi book by - Gurudutt
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खण्डहर बोल रहे हैं - भाग 1

गुरुदत्त

प्रकाशक : हिन्दी साहित्य सदन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :356
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 5393
आईएसबीएन :000

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एक रोचक उपन्यास...

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Khandahar Bol Rahey Hain

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

जब वे वहाँ से अजन्ता की ओर चले तो यात्री ने पुनः बात आरम्भ कर दी। उसने कहा, ‘‘मिरज़ा, तुमने कहा है कि मिरज़ा का लकब लिये आपकी पन्द्रह पीढ़ियाँ गुजर चुकी हैं।’’
जी ! तेरह गुजर चुकी हैं। चौदहवीं, पन्द्रहवीं और सोलहवीं अभी जीवित हैं। मेरे वालिद शरीफ अभी हैं। मेरी अपनी भी औलाद है। एक लड़का और एक लड़की।’’
‘‘इसका मतलब यह हुआ कि इस मुगल खानदान की शुरुआत हुए साढ़े तीन सौ से ज्यादा साल हो गये हैं। तो क्या औरंगज़ेब का इससे किसी किस्म का ताल्लुक है ?’’
‘‘औरंगज़ेब का हमारे खानदान से तो इतना ही ताल्लुक है कि वह हमारी बरबादी में वजह हुआ था। उसने हमारे बुजुर्ग की माँ को बहुत तंग किया था।’’
‘‘तो ये सब बातें लिखी हैं उस किताब में ?’’
‘‘जी।’’

‘‘किस ज़बान में लिखी हैं ?’’
‘‘देवनागरी लिपि में और उस काल की बोली जाने वाली ज़बान में। वह ज़बान आज कही जाने वाली हिन्दी ज़बान ही है। कई इल्फाज़ हैं जो फारसी के उसमें आ गए हैं। वह जरूर कहानी लिखने वाली ने शाही महल में सीखे होंगे।’’
‘‘आगे क्या-क्या लिखा है उस किताब में ?’’
‘‘साहब ! वह तो पाँच सौ बड़े-बड़े पन्नों पर लिखी किताब है। उसमें बीस पन्नों के ऊपर खानदान के दूसरे लोगों ने अपने हालात लिखे हैं।’’

‘‘फिर भी कोई बात तो बताओ।’’
‘‘नीलमणि को शाहजहाँ ने अपनी बेगम बनाया था और शाहजहाँ के दो बेटे उस पर मोहित हो उसे अपनी बीवी बनाने की कोशिश में थे। वे थे दारा और औरंगज़ेब। जहाँ सल्तनत उनमें झगड़े की जड़ थी वहाँ वह देवी भी थी। नीला ने दोनों को अपना बेटा कहकर उनके प्रेम को अस्वीकार कर दिया था। दोनों वालिद के रहते ही सल्तनत पर और उसकी सबसे छोटी बेगम पर हक हासिल करने की ख्वाहिश कर रहे थे। इस ख्वाहिश का खात्मा हुआ शाहजहाँ के बीमार होने पर।

भूमिका


यह एक ऐतिहासिक उपन्यास है। इसकी पृष्ठभूमि में हिन्दुस्तान के उस काल का इतिहास है जिसे मुगलों के ह्रास का काल कहा जाता है। इस कथा का आरम्भ हमने विक्रमी संवत् 1705 तदनुसार सन् 1648 से किया है।
कुछ इतिहास-लेखक मुगल सम्राट शाहजहाँ की न्यायप्रियता के लम्बे-लम्बे गीत गाते हैं, परंतु जो कुछ उसके काल में शाही महलों में निर्माण हुआ और जो कुछ देश में घटा, वह न्याय और शान्ति का परिणाम नहीं कहा जा सकता। यह शहंशाह शाहजहाँ ही था, जिसकी अपनी प्रिय बेगम के पेट से उत्पन्न हुआ औरंगज़ेब गाज़ी। शाहजहाँ के काल में ही आगरा के किले में बन्दी शहंशाह की सैकड़ों अविवाहिता बेगमें थीं। इस सबकी प्रतिक्रिया में देश में पैदा हुए शिवाजी, चम्पत बुन्देला, गुरु गोविन्दसिंह तथा मथुरा के जाट इत्यादि।
ये सब उत्पन्न हुए सम्राट शाहजहाँ के काल में और लड़े-मरे औरंगज़ेब के काल में। हमारा ऐतिहासिक निष्कर्ष यह है कि ह्रास का बीजा-रोपण होता है राज्य के विलास काल में और उसका परिणाम निकलता है विलास उपरान्त विश्रान्ति काल में।

मुगलों के ह्रास के लिए भूमि तैयार हुई थी जहाँगीर के काल में, बीजा-रोपण हुआ शाहजहाँ के काल में और ह्रास पनपा औरंगज़ेब के काल में तथा मुगल वृक्ष मुरझा गया औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद।
हमारी इस कथा का मुख्य पात्र कल्पित किया गया है वीनिस के एक पर्यटक निकोला मनूशी (Niccolao Manucci) निम्न वृत्तान्त से। मनूशी ने अपनी पुस्तक Storia-Do-Mogor (मुगलों की कहानी) के प्रथम भाग के पृष्ठ 342-343 में इस प्रकार लिखा है—
‘‘औरंगज़ेब ने दारा की दो छोटी बेगमों को बुला भेजा। एक थी बेगम उजयपुरी जो जिओर्जिया की रहने वाली थी और दूसरी थी रा-ना-दिल। यह जन्म से हिन्दू थी।
‘उदयपुर आई तो औरंगज़ेब ने उसे अपनी पत्नी बना लिया। उससे शहज़ादा कामबख्श का जन्म हुआ।
‘रा ना-दिल नही आयी। उसने पूछ भेजा कि उसे किस लिए बुलाया जा रहा है। नौकरानियों ने बताया कि वह उसे अपनी पत्नी बनाना चाहता है। यह ‘शरअ’ में दर्ज है कि बड़े भाई के मरने पर उसकी पत्नियाँ छोटे भाई की पत्नी बनें। इस पर रा-ना-दिल ने फिर पुछवाया कि उसके किस गुण के कारण वह उसे पत्नी बनाना चाहता है। औरंगज़ेब ने बताया कि वह उसके सुन्दर बालों पर मुग्ध है। रा-ना-दिल ने अपने बाल काटकर उसको भेज दिये और साथ ही कहला भेजा कि यह है वह सौन्दर्य, जिस पर वह लट्टू है।

‘औरंगज़ेब ने पुनः कहला भेजा कि वह उसके सुन्दर मुख पर मुग्ध है। वह उसको उतनी ही मान-प्रतिष्ठा देगा, जितनी दारा से उसे प्राप्त थी। इस पर रा-ना-दिल ने अपने मुख को काटकर कुरूप बना लिया और काटने से निकले हुए रक्त में कपड़ा भिगोकर औरंगज़ेब के पास भेद दिया। साथ ही उसने कहला भेजा, यह है मेरे मुख के सौंदर्य का सार।
‘इसके उपरान्त औरंगज़ेब ने इस औरत को तंग नहीं किया और उसको शाही-महल में मान-प्रतिष्ठा से रखा।’
परन्तु कथा का भाव लिया है डा. आशीर्वादीलाल एम.ए., पी-एच.डी., डी. लिट्. की पुस्तक The Moghul Empire (मुगल साम्राज्य)से। डॉ. आशीर्वादीलाल आगरा विश्वविद्यालय में इतिहास के प्राध्यापक हैं। आप अपनी पुस्तक के द्वितीय संस्करण के पृष्ठ 339-342 पर लिखते हैं—

’Aurangzeb believed in the Islamaic theory of king-ship and sovereignty which enjoins the ruler to enforce the Quranic law in the administration of state and to covert his country from a heathen-land into the land of Islam (दारा-उल-हरब से दारा-उल-इसलाम)…… He restored Islam to its former position as the state religion and placed the entire resources of the empire at the disposal of missionary propaganda of his faith….

…..He forbade the old temples to be repaired and a little later issued an order the governors of the provinces ‘to demolish the schools and temples of the infidels (काफिरों के) and to put down their teaching and religious practices strongly.’ The Muhtasibs had to go round and destroy Hindu temples and shrines within their jurisdictions, ‘So large was the number of official temple-breakers that a daroga (superintendent) had to be placed over them to guide and unite their activities. Even the universally respected old temples of Vishwanath at Banaras, Keshav Deo at Mathura and Somnath at Patna, were razed to the ground. Even those in the states of friendly Hindu Rajas, such as Jaipur, were not spared and the destruction of temples and images were ‘of hen accompanied by wanton desecration, such as slaughtering of the cows in the sanctuary and causing the idols to be trodden down in public quarters’.

On April 12, 1679 the emperor promulgated an order reimposing Jizya on Hindus ‘with the object of spearding Islam and overthrowing infidel practices’…He ignored Hindu protests. He also re-imosed the pilgrim’s tax on the Hindu, each of whom had to pay rupees six and annas four for bathing in the Ganga at Prayag, and a similar sum other holy places. The emperor abolished the customs duties in the case of Muslim n:erchants, but continued it at the old rate 5% in case of Hindus.

यह वक्तव्य है जिसने हमारी इस कहानी में भाव भरे हैं।
उक्त उदाहरणों के बाद उपन्यास की पृष्ठभूमि के पक्ष में सफाई देने के लिए अन्य कुछ भी आवश्यक नहीं रह जाता।
यह इतिहास और कहानी वर्तमान और आगे के आने वाले शासकों के लिए एक उदाहरण बननी चाहिए। इस नीति और इस परिणामों का अध्ययन प्रत्येक शासक को बार-बार पढ़कर मनन करना चाहिए।
विलास तथा भोग विकृत मस्तिष्क निर्माण कहते हैं। विकृत मस्तिष्क मानसिर सन्तुलन खोकर विनाश की सृष्टि करते हैं। प्रजातन्त्रात्मक राज्यों में उत्तरदायित्व केवल शासकों का ही नहीं रहता वरन् यह जनता के भाग में भी चला जाता है। शासक उपज हैं जनता की मनोवृत्ति के और जनताब नती है शासकों का अनुकरण करती हुई। इस प्रकार पाप-पुण्य में अब दोनों भागीदार बन गए हैं। अतएव यह और भी आवश्यक हो गया है कि इतिहास के उक्त पाठ को जन-जन भाषा में और उसके समझ सकने योग्य रूप में लिखा जाए।

अतः यह उपन्यास है मुगल सम्राट औरंगज़ेब द्वारा बनाये खण्डहरों की मुँह बोलती कहानी।
विषय-भोग तथा विलास ह्रास का बीजारोपण करते हैं और बीज वृक्ष बन जाता है जब विलास के उपरान्त विश्रान्ति काल आता है।
इसको रोकने का सुगम उपाय है सरल, शुद्ध, पवित्र और संयमपूर्वक जीवन-यापन, शासकों द्वारा और जनता द्वारा भी।
पुस्तक तीन भागों में समाप्त हुई है। प्रथम भाग पाठकों की सेवा में उपस्थित है।
इसकी औपन्यासिकता का मूल्यांकन पाठकों के लिये छोड़ा जाता है। वर्तमान भारत (हिन्दू तथा मुसलमान) के पथ-प्रदर्शक में यह प्रयास सफल हो, यही कामना है।

निवास-18
मार्ग-28, पंजाबी बाग,
नई दिल्ली-110026
-गुरुदत्त

प्राक्कथन


:1:


औरंगाबाद के इम्पीरियल होटल में ठहरा एक धोती कुरता धारी यात्री होटल के बरामदे में खड़ा एक टैक्सी-ड्राइवर से गुफाओं को देखने के लिए टैक्सी भाड़े का मोलभाव कर रहा था। ड्राइवर ने चालीस रुपये मांगे थे। उस पर भद्र पुरुष का कहना था, ‘‘बहुत अधिक हैं ?’’
‘‘तो ऐसा करिये।’’ ड्राइवर ने कहा, ‘‘कुछ स्थान कम कर दीजिए। तब भाड़ा कम कर दूँगा।’’
‘‘क्यो छोड़ने से कितना कम कर दोगे ?’’
एक तो आप दौलताबाद का किला मत देखिये और दूसरे औरंगज़ेब का मकबरा छोड़ दीजिए तो पाँच रुपये कम कर दूँगा।’’
‘‘औरंगज़ेब का मकबरा तो जरूर देखूँगा।’’

‘‘साहब ! उसमें कुछ भी तो देखने योग्य नहीं है। एक छोटा-सा स्थान ही तो है। कोई देखने योग्य इमारत भी नहीं है।’’
‘‘मगर एक निहायत काबिल आदमी की यादगार तो है।’’
उस यात्री ने समझा था कि उसके ऐसा कहने पर ड्राइवर प्रसन्न होगा। वह शक्ल-सूरत से एक मुसलमान प्रतीत होता़ था। उसने दाढ़ी तथा मूँछें रखी हुई थीं और सलवार तथा कुरता पहिने था। सिर पर तो गाँधी टोपी थी। परन्तु यात्री के विस्मय का ठिकाना न रहा, जब उसने कहा, ‘‘यदि आपको उसको देखने का हठ करते हैं तो चालीस रुपये से एक पाई कम नहीं होगी।’’
यात्री ने कुछ और सौदेबाजी करने के लिए कह दिया, ‘‘यदि दौलताबाद का दुर्ग न देखें और शेष सब स्थान देखें तो क्या लोगे ?’’
यही चालीस रुपये।’’
‘‘दौलताबाद न जाने पर भी ?’’
‘‘जी ! सिर्फ औरंगज़ेब के मकबरे को देखने जाने के भी चालीस ही लगेंगे।’’
‘‘ओह ! यह क्यों ?’’
‘‘जी बस ! यही होगा। आप कोई और टैक्सी कर सकते हैं।’’ यात्री समझा कि यह औरंगज़ेब को काबिल कहे जाने पर चिढ़ गया है। अपने सन्देह की पुष्टि के लिए उसने पूछ लिया, ‘‘अच्छा जी ! अगर दौलताबाद का किला देखने जाएं और औरंगज़ेब का मकबरा देखने न जाएं तो क्या लोगे ?’’

‘‘पर साहब ! आप एक लायक शहंशाह की यादगार को देखने क्यों नहीं जाएंगे ? आपके लिए पाँच रुपये क्या चीज है ?’’
इतना कह सलाम कर जाने के लिये वह बोला, ‘‘आप किसी और की टैक्सी कर लीजिए।’’ वह घूम कर सीढ़ियों की ओर चला तो यात्री ने उसे बुला लिया , ‘‘ए ड्राइवर साहब ! जरा सुनो तो भाई, नाराज किस लिए हो रहे हो ?’’
वह खड़ा हो घूम कर बोला, ‘‘मुझे यह भागवत पसन्द नहीं है।’’
‘‘अच्छी बात। आपकी बात मान लेता हूँ। क्या नाम है आपका ?’’
‘‘मिरज़ा रामदीन।’’
मिरज़ा और रामदीन। यात्री समझ गया कि यह हिन्दू है ; परन्तु यह मिरज़ा क्यों है, वह समझ नहीं सका।
यात्री उसको कमरे के अन्दर ले गया और कहने लगा, ‘‘अच्छा भाई ! मैं उसका मकबरा देखने नहीं जाऊँगा और दौलताबाद दिखाना अथवा न दिखाना यह तुम्हारी इच्छा पर है ; तुमको तीस रुपये दे दूँगा। अब तो ठीक है न ?’’
‘‘जी। कुछ पेशगी मिल जाये, जिससे में बात पक्की समझूँ और सवेरे छः बजे यहाँ आ जाऊँ।’’
यात्री ने जेब से पाँच रुपये निकाल कर ड्राइवर के हाथ में दे दिए और पूछ लिया, ‘‘यह मिरज़ा के क्या अर्थ हैं ?’’
ड्राइवर चुपचाप मुख देखने लगा। यात्री प्रश्नभरी दृष्टि से उसको ओर देख रहा था। उसने टालने के लिए कह दिया, ‘‘यह हमारा पारिवारिक उपनाम है।’’
‘‘मगर यह उपनाम तो मुगल सन्तान के लिए होता है।’’
‘‘जी जानता हूँ। मगर इसकी एक लम्बी कहानी है।’’
‘‘बहुत लम्बी है ?’’

‘‘जी। एक मिनट में नहीं बताई जा सकती है।’’ ड्राइवर ने सलाम की और चल दिया।
वह ड्राइवर अपनी श्रेणी के लोगों से कुछ खिन्न दिखाई दिया था। उसने यह कह कर कि केवल औरंगज़ेब के मकबरे पर जाने के लिए भी चालीस रुपये ही लेगा, यात्री के मन में कुछ कौतूहल उत्पन्न कर दिया था। फिर उसके व्यंगात्मक कथन के लिए कि आप एक लायक शहंशाह की यादगार को देखने क्यों नहीं जाएँगे, यात्री के कौतूहल को और बढ़ा दिया था।
यात्री इस ड्राइवर का रहस्य जानने के लिए मन में उत्सुकता अनु-भव करने लगा। उसने मन में यह निश्चय कर लिया कि वह अगले दिन इससे जरूर पूछेगा।
अगले दिन यात्री ने एक बड़े से ‘टिफिन कैरियर’ में प्रातः का अल्पाहार और मध्याह्न का खाना ले लिया। दो ‘थर्मस’ में गरम-गरम चाय भी डलवा ली। इस प्रकार छः बजे से पहले ही वह चलने के लिए तैयार हो गया।
ठीक छः बजे टैक्सी वाला आया और यात्री ने टैक्सी की पिछली सीट पर टिफिन कैरियर और चाय का सामान रख दिया और स्वयं ड्राइवर के साथ अगली सीट पर बाठ गया। ड्राइवर ने कह दिया, ‘‘हुजूर ! पीछे आपको आराम रहेगा।’’
‘‘नहीं। वहाँ टाँगें सिकोड़ कर बैठना होगा। यहाँ पर टाँगें फैलाई जा सकती हैं। मुझे आगे सुविधा रहेगी।’’
ड्राइवर को इस बात पर विस्मय हुआ। प्रायः यात्रियों का ऐसा चलन नहीं होता था। वह कुछ विचार कर वह बोला, ‘‘जिस तरह आपको आराम मालूम हो।’’

यात्री पिछले दिन की बात को चलाना चाहता था और उसने पीछे की सीट पर बैठ कर ड्राइवर से बातचीत करना कठिन जान उसने अगली सीट पर बैठना पसन्द किया था।
जब गाड़ी चल पड़ी तो ड्राइवर को अपनी कहानी बताने में उत्साहित करने के लिए उसने कहा, ‘‘भाई ! एक बात पूछूँ, नाराज को नहीं होंगे ?’’
‘‘आपसे नाराड होने की कोई वजह नहीं हो सकती।’’
‘‘मैं कल देख रहा था कि तुम्हें औरंगज़ेब के नाम से चिढ़ थी।’’
ड्राइवर मुस्कराया और बोला, ‘‘यह तो आपके हठ करने पर ही मैंने कहा था। देखिये, यहाँ लोग औरंगज़ेब का मकबरा देखने के लिए नहीं आते। लोग आते हैं एलोरा और अजन्ता की गुफाएँ देखने। यहाँ, औरंगज़ेब का मकबरा देखना को एक फोकट की बात होती है। आपने जब यहाँ की जगहों की सूची सुनाई और उसमें औरंगज़ेब के मकबरे का नाम सबसे पहले लिया तो मैं समझ गया कि आप किसी खास खसलत के मालिक हैं। आपने अपनी इस खसलत को और भी नुमाया कर दिया, जब आपने कहा कि मकबरा तो जरूर देखना है। इसकी गूँज ही मेरे मन में उठी थी और मैं समझ गया कि वहाँ जाने का खास दाम लेना चाहिये।’’

‘‘परन्तु मेरे विचार में बात केवल इतनी ही नहीं है। इससे कहीं अधिक हैं। कुछ-न-कुछ जरूर तुम्हारे मन में भी है। जब तुमने कहा कि इतने लायक शहंशाह की यादगार देखने क्यों नहीं जाइयेगा, मैं तब ही समझ गया था कि औरंगज़ेब के लिए तुम्हारे दिल में खास जगह है।’’
इस पर ड्राइवर हँस पड़ा। वह गाड़ी वेग से चला रहा था। इस कारण यात्री की ओर न देख, सामने ही दृष्टि डाले हुए उसने कहा, ‘‘मैं इस काफिर से नफरत करता हूँ। इस कारण वह तंज बात मेरे मुख से अपने-आप निकल गई थी।’’
‘‘परन्तु उससे नफरत क्यों करते हो ? उसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है ?’’
‘‘यह एक लम्बी कहानी है।’’
‘‘कल तुमने कहा था कि नाम के साथ तखल्लस की भी एक लम्बी कहानी है। तो क्या यह कहानी से किसी से कहोगे नहीं ?’’

‘‘यह बात नहीं। इसका यहाँ कइयों को पता है। मगर इससे आपकी क्या और कितनी दिलचस्पी है, मैं नहीं जानता। इसलिए आपका समय खराब करने से डरता था।’’
‘‘मगर मुझे तो इसके जानने की बहुत उत्सुकता है। मैं एक लेखक हूँ, इस कारण इस किस्म की बातें सुनने और फिर उनसे अपने नतीजे निकालने में रुचि रखता हूँ। अगर कोई ऐसी बात न हो, जिससे तुम्हें किसी राज के फाश होने का डर हो तो बता सकते हो। मैं इस सब में वजह जानना चाहता हूँ। तुम हिन्दू हो या मुसलमान ?’’
‘‘जन्म से मुसलमान हूँ और खयालात से न हिन्दू न मुसलमान ?’’
‘‘मगर यह मिरजा और रामदीन का मेल कैसे हुआ है ?’’
‘‘यह नाम तो वालिद साहब ने रख दिया है। वह भी मेरी तरह न तो हिन्दू हैं न मुसलमान। उनका नाम है मिरजा मुरली था।’’

‘‘ओह ! यह कहानी तो दिलचस्प मालूम होती है। उनका यह नाम उनके वालिद साहब ने रखा होगा ?’’
‘‘जी। उनका नाम मिरज़ा सीतलदीन था। मेरे बाबा तो अब जिन्दा नहीं हैं, मगर वालिद हैं।
‘‘अगर एक लफ्ज में कहूँ तो कहानी यह है कि हमारे एक बुजुर्ग एक मुगल की औलाद थे और उनकी माँ एक हिन्दू ब्राह्मण की लड़की थी। तब से हमारे खानदान में यह रिवाज चला आता है कि हम मुगल हिन्दू हैं। हिन्दू इसलिए हैं कि हमारे बुजुर्ग जो एक मुगल और ब्राह्मण स्त्री की औलाद थे, मुसलमान नहीं थे और मुसलमानों से अपनी बगावत ज़ाहिर करने के लिए अपनी औलाद का नाम हिन्दुआना रखने का रिवाज़ छोड़ गए थे। साथ ही वे जानते थे कि हिन्दू उनकी औलाद को अपनी लड़की नहीं देंगे। इसलिए मिरजा का लकब लगाने का रिवाज़ छोड़ गए हैं।’’
‘‘ओह ! और आप तब से इस लकीर को पीटते चले आए हें ?’’

‘‘हाँ, मगर इसमें भी एक राज़ है। उस बुजुर्ग की माँ जो ब्राह्मण की लड़की थी, एक किताब लिखकर छोड़ गई है। वह किताब हमारे खान-दान में मौजूद है। उसमें उसने अपने उस बदकार मुगल की बीवी बनने की कहानी लिखी है। साथ ही अपनी औलाद को उसमें अपना शिजरा-खसरा लिखने के लिए कहा है। हम उस जबान को जिसमें वह किताब लिखी है, पढ़ते हैं। उसमें अपना नाम और ज़िन्दगी का मुख्तार हाल लिख देते हैं। इससे यह रिवाज चला आता है। उस औरत से लेकर अब तक हमारे खानदान के सभी हालात उस किताब में दर्ज हैं।’’
‘‘कितनी पीढ़ी हो चुकी हैं, तब से आज तक ?’’
‘‘मैं पन्द्रहवीं पीढ़ी में हूँ।’’
‘‘और आपके उस पुरखा का क्या नाम है जो ब्राह्मण की सन्तान थी ?’’
‘‘उसका हिन्दुआना नाम था नीलमणि और मुगल ने उसका नाम रख दिया था महताब बेगम।’’
‘‘भाई, यह कहानी तो बहुत दिलचस्प है।’’
 

       

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